प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जितनी भी बात आपने बतायीं उसके मूल में यही था कि अध्यात्म का उद्देश्य तो मन को शान्त करना है, सरल करना है। आज का जो अध्यात्म है उसका उद्देश्य मन की शान्ति और सरलता नहीं, बल्कि कुछ और ही है। और क्योंकि उद्देश्य बदल चुका है तो अब विधियाँ भी बदल गयी हैं तो इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगे जो नयी विधियाँ निकल रही हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, मन के साथ कुछ भी करने का एक ही उद्देश्य हो सकता है — मन को बढ़िया करना, मन को बेहतर करना। बाक़ी आप जो कुछ भी करना चाहते हो वो मन के क्षेत्र में आएगा ही नहीं या मन के क्षेत्र में आएगा भी तो ऐसे आएगा कि वो मन को और संस्कारित करेगा, कंडीशन्ड करेगा या फिर वो आएगा तन के क्षेत्र में या आएगा वो संस्कार के क्षेत्र में।
आप जो कुछ भी करना चाहते हो अगर वो मन के क्षेत्र में है तो उसका एक ही सही लक्ष्य हो सकता है कि वो मन को शान्त, सरल करे। मन के साथ आप कुछ कर रहे हो तो उसका एक दूसरा और ग़लत उद्देश्य हो सकता है कि आप मन को और ज़्यादा कुटिल और संस्कारित बनाना चाहते हो।
तो एक तो ये हो सकता है कि आप जो कुछ भी कर रहे हो वो इसलिए ताकि मन और ज़्यादा कुटिल हो जाए, और ज़्यादा कंडीशन्ड हो जाए या ये हो सकता है कि आप अध्यात्म के नाम पर मन के क्षेत्र में कुछ कर ही न रहे हो, तन के क्षेत्र में कुछ कर रहे हो कि कह तो रहे हो कि मैं आध्यात्मिक आदमी हूँ और काम सिर्फ़ तन पर कर रहे हो या ये हो सकता है कि आप न मन पर काम कर रहे हो, न तन पर काम कर रहे हो, आप बस संसार को प्रभावित करने के लिए को काम कर रहे हो। बात समझ रहे हो?
उदाहरण के लिए, अध्यात्म के नाम पर आप अगर और ज़्यादा कट्टरपन्थी हुए जा रहे हो और कहते हो, ‘मैं तो आध्यात्मिक आदमी हूँ’ और नारा लगाते हो। इस तरह के भी बहुत आध्यात्मिक लोग मिलेंगे न? ये खूब छा रहे हैं आजकल मीडिया में और




