प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दीक्षा में पढ़ते हुए जो पहला श्लोक था, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,” तो इसमें पूर्ण का क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: जिसकी तुम्हें तलाश है।
प्र: पूर्ण किससे पूर्ण है?
आचार्य: पूर्ण किसी से पूर्ण नहीं होता। पूर्ण मात्र पूर्ण होता है।
प्र: क्या उसमें संसार का भी कार्य है, संसार भी पूर्ण है? जहाँ से आये वो भी पूर्ण है, तो फिर संसार किससे पूर्ण है?
आचार्य: जो पूर्ण है, उसके लिए संसार पूर्ण है। जिसकी चेतना पूर्णता को उपलब्ध हो गयी, उसके लिए संसार भी पूर्ण है। उसे अब संसार में कुछ जोड़ना नहीं है। और चूँकि वो स्वयं पूर्ण है, इसीलिए उसे संसार से कुछ पाना नहीं है।
तो जो तुमने शांति पाठ पढ़ा, “पूर्णमदः पूर्णमिदं”, ये सिर्फ़ आकाश का तारा है तुम्हारे लिए, बहुत दूर, पर दृष्टव्य है। बहुत छोटा, पर प्रकट और उपलब्ध। कि है तो, पर मुझसे बहुत दूर है। ऐसे श्लोक तुम्हें बस याद दिलाने के लिए हैं कि यह पूर्णता तुम्हें भी कभी उपलब्ध हो सकती है। पर ऐसे श्लोकों को पढ़ कर यह मत समझ लेना कि तुम ही पूर्ण हो। क्योंकि तुम्हारा जो रोज़मर्रा का जीवन है, वो कहीं से भी पूर्णता की गवाही नहीं देता।







