
जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।

देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। आपके चित्त की मूल अहं–वृत्ति ही देवी महामाया हैं, जो संसार बनकर हमें दृष्टिगत होती हैं। वह देवी स्वयं संसार भी हैं और संसार की दृष्टा और अनुभोक्ता भी। उस मूल अहं–वृत्ति से अनेकों वृत्तियाँ निकलती हैं, जिनको अलग-अलग देवियों का नाम दे सकते हैं। मूल प्रकृति ही आगे चलकर तीन गुणों में विभाजित हो जाती है, जो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं — सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली।






आचार्य प्रशांत: ये इन सबको रीयल! (वास्तविक) क्योंकि अनरीयल (अवास्तविक) कैसे बोलोगे! भई, तुम जिसे अनरीयल बोलते हो, किस आधार पर बोलते हो? कुछ भी तुम अनरीयल कैसे बोलते हो?


प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब आप बोलते हो कि शुरुआत होगी तथ्य से, तो तथ्यों को देखना हैं, अब हर समय ऐसे तथ्यों को दूर ही से नहीं देखा जाता। जैसे अतीत है तो अतीत में भी उन तथ्यों के पास जाकर क्योंकि वो वहाँ लगातार हो रहे हैं तो


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सही गुरु की पहचान कैसे करें? क्योंकि सारे रास्ते तो मन ही दिखाता है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हमेशा आपको आदर्श की तरह देखता हूँ, आपको सुनने के बाद कुछ-कुछ मेरे अन्दर बदलाव आये, मैं

प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं


आचार्य प्रशांत: किसी मुर्दे को आज तक बीमार पड़ते देखा है तो इसका क्या अर्थ है? बीमारी कहाँ से उठती हैं? प्राणों से उठती है। बीमारी प्राण का सन्देश है तुम्हें, कुछ गलत हो रहा है। बीमारी प्राण का सन्देश है कि करीब आओ, मेरे पास रहो, मेरे जैसे हो


आचार्य प्रशांत: और जो परेशान हो, अपनी ज़िन्दगी को लेकर के, वो बच्चों का वीडियो गेम खेलने लग जाए तो अपने साथ कोई इंसाफ़ या उपकार तो नहीं कर रहा, या कर रहा है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ‘परमात्मा तत्व’ का मतलब क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: कोई उसका मतलब होता नहीं, उसका मतलब नहीं पूछना चाहिए। हम जिन मतलबों में घिरे रहते हैं, उनकी सच्चाई जाननी चाहिए। ‘परमात्मा तत्व’ कोई साधारण, सामान्य तत्व नहीं है, वो कोई तत्व ही नहीं है। तो उसके विषय…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, उपनिषदों में कई जगह बताया गया है कि ऐसा है। अस्तित्व के बारे में बताया गया कि ऐसा है या अपने बारे में बताया गया है कि ऐसा है। पर क्यों हमारी प्रकृति ऐसी है, क्यों हम ऐसे पैदा हुए, मनुष्य ऐसा क्यों है? क्यों ये माया…

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर


आचार्य प्रशांत: मुझे कभी विज्ञान विरुद्ध बातें करते देखना, मुझे कभी ऐसी बातें करते देखना जिनको विज्ञान कभी स्वीकार नहीं करेगा, जिन पर विज्ञान हँस देगा। तुरन्त समझ लेना कि माया मुझ पर भी छा गयी।

आचार्य प्रशांत: आम आदमी की पूरी ज़िन्दगी देख लो। और हम कुछ कर ही नहीं रहे। ऊपर-ऊपर से लगेगा कि अभी हम पढ़ाई कर रहे हैं, ठीक है? अब हम ब्याह कर रहे हैं, अब हम व्यापार कर रहे हैं, अब हम घर बना रहे हैं, अब हम तरक्की कर…

आचार्य प्रशांत: पति पत्नी से परेशान रहता है मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करती। पत्नी भी तो बराबर ही परेशान रहती है ना पति से, ये मेरी उम्मीदें नहीं पूरी करता। पति कहेगा मैं इसकी उम्मीदें क्यों पूरी करूँ, इसकी उम्मीदें ही नाजायज़ हैं। पत्नी कहती है मैं इसकी उम्मीदें क्यों



प्रश्नकर्ता: सर, हृदय का अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: अर्थ, मन गढ़ता है। उसका कोई भी यदि आपको अर्थ दिया जाएगा तो आप उसके बारे में सोचना शुरु कर देंगे, उसके बारे में फिर से एक मानसिक धारणा बना लेंगे। अर्थ मत पूछिए, बस इतना समझ लीजिए कि मन सीमित…

प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न थोड़ा कुतार्किक लगेगा, पर मुझे पूछना था। होता यह है कि अभी आप देखोगे हर तरफ़ क्या होता है कि हम आज का पेपर भी पढ़ेंगे, न्यूज़ चैनल हो या फिर कोई



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मन जल्दी से कनक्लूज़न (निष्कर्ष), सर्टेनिटी (निश्चितता) की ओर जाना चाहता है। मेरा मन जल्दी से

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं कुछ समय पहले अभी बस्तर गया था, कुछ पचास कि.मि. दूर, गाँव में – कुछ आदिवासियों को समझने के लिए। तो वहाँ पर जो कुछ चीज़ें मैंने


प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

आचार्य प्रशांतः दुबई से हैं। चौदहवें अध्याय के तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें श्लोक को उद्धरित किया है, जहाँ चर्चा हुई है सत, रज, तम तीनों गुणों की।



प्रश्नकर्ता: आपने बताया कि संकल्प बदलने मात्र से ही जीवन बदल जाता है। तो अब तक मैं जितना समझ पाया हूँ कि कर्म करना ही जीवन है। हम कर्म ही कर सकते हैं और अगर मैं अपने जीवन को देख पा रहा हूँ, तो जो कुछ जीवन में पहले चल

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैंने शिविर में आने की बात अपने जानने वालों को बतायी तो सबकी ओर से एक सी ही प्रतिक्रिया आयी कि ये तो जोगी बनने जा रहा है या संन्यास लेने की सोच रहा है। तो मेरा प्रश्न ये है कि समाज में अध्यात्म की

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, संयुक्त परिवार में रहने की वजह से जो भी चुनौतियाँ आयीं, उनका सामना घर के बड़े-बुजुर्गों ने ही किया। जीवन में बस एक बार चुनौती का सामना करने जैसा लगा, जब मैं सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था, वो भी एक अन्धी दौड़ जैसी ही


प्रश्नकर्ता: कॉलेज में फर्स्ट टाइम (पहली बार) मैं आपसे मिली थी एंड सात साल हो गये हैं, कॉलेज के थर्ड ईयर में मिले थे आप, जब मैं बी-टेक कर रही थी।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। नवरात्रि आ रही है तो कन्याओं को पुस्तक देने की सोची। तो उसमें अमर चित्र कथा में पढ़ रहा था, उसमें अंगुलिमाल का एक प्रसंग आता है। उसमें दिखाते हैं कि उसने काफ़ी लोगों की हत्या कर दी। लेकिन बुद्ध के सम्पर्क में आने के बाद

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल एक किताब है डॉक्टर एम स्कॉट पेक की ‘द रोड लेस ट्रैवेल्ड’, उससे है। और शायद अभी जो पहले हम बात कर रहे थे मन की सफ़ाई करने की, तो उसमें एक
मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।
बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
प्रश्नकर्ता: मोहमाया को क्यों छोड़ा जाए? संसार को भी क्यों छोड़ा जाए? प्रभु सिमरन क्यों? समर्पण क्यों? मोक्ष क्यों? अगर मैं नेक हूँ संसार का भला सोचता हूँ, अपने दायित्व निभा रहा हूँ, तो फिर ये आध्यात्मिकता इत्यादि क्यों? उन्होंने एक रिक्त स्थान छोड़ा है। मैं उसको भरे देता हूँ।…
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…
क्या तुम यह चाहते हो कि तुम जो कुछ करते रहो, उसको लेकर भीतर कोई जिज्ञासा ही न उठे और तुम इसी निष्कर्ष में और आश्वस्ति में रहे आओ कि तुम जो भी कुछ कर रहे हो वह ठीक ही है? यह तो एक आंतरिक ईमानदारी और सतर्कता की निशानी होती है न कि जो कुछ भी कर रहे हो उसको लेकर के भीतर सवाल है। उस सवाल का होना अच्छा है। हाँ, उस सवाल के होने से थोड़ी खिसियाहट रहती है, असुविधा रहती है; क्योंकि तुम कभी भी अपनेआप को यह प्रमाण-पत्र नहीं दे सकते कि जो भी तुम कर रहे हो वह अच्छा कर रहे हो।
प्रश्नकर्ता: जो इमैजिनेशन (कल्पना) है।
आचार्य प्रशांत: इमैजिनेशन का पैमाना क्या होता है? आप कह रहे हैं कि जो काल्पनिक…
“ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्। विज्ञानमकामुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प:।।“
“यह जगत् मन का विलास है, दीखने पर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र (लुकारियों की बनेठी)– के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रम मात्र है— ऐसा समझे। ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा…
अन्तरिक्षचयाणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि।।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरणे वाले बलवान पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है। ~ आजगर गीता, श्लोक १६
दिवि सञ्चरमाणानि ह्नस्वानि च महन्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये।।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय…
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि अभी दशहरा आ रहा है और हर साल दशहरा मनाते भी हैं, लेकिन दशहरे का वास्तविक अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके दस सिर वही रावण। रावण वो नहीं जिसके दस सिर थे, जिसके ही दस सिर हैं वही रावण है। और हममें से कोई ऐसा…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जहाँ से मैं आती हूँ उस समाज में जनमानस के बीच ऐसी धारणा हैं कि एक स्त्री को पुरुष की अधीनता में रहकर जीना चाहिए। स्त्री के अस्तित्व को पूरे तरीक़े से एक कोने में रख दिया जाता है। यह समझा जाता है कि…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सौभाग्य है कि उपनिषद् को इतनी सरलता से आपके साथ सुनने का अवसर मिला। मेरा प्रश्न है कि जब मैं अपने सम्बन्धों को देखता हूँ, मैं पाता हूँ कि मैं हमेशा ही उलझा रहता हूँ। समस्या को ढूँढने की भी कोशिश करता हूँ और मैं और…
आचार्य प्रशांत: बोली ठोली मसखरी, हँसी खेल हराम मद माया और इस्तरी, नाहिं सन्तन के काम।। ~ कबीर साहब
जब यहाँ पर कबीर कह रहे हैं, “बोली ठोली मसखरी, हँसी खेल हराम”, तो इसमें ऐसा लग सकता है जैसे कबीर बोलने के और मसखरी के विरुद्ध कुछ कह रहे हैं।…
"जो ज्ञानी मुझे अनन्य भाव से भजते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरी त्रिगुणी माया का उल्लंघन कर जाते हैं”।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं मन व बुद्धि से श्रीकृष्ण का स्मरण…
आचार्य प्रशांत: कह रहे हैं— ‘फल आशा अनुसार नहीं मिलता तो निराशा हावी हो जाती है’ और आशा अनुसार मिलता है तो क्या हावी होता है? तब ‘फल’ हावी होता है! जब फल आशा अनुसार नहीं मिलता तो कह रहे हैं निराशा बड़ी हावी लगती है, अपने ऊपर से विश्वास…
समझ रहे हो?
'माया' का और 'मैं' का बड़ा गहरा नाता होता है। हम…
हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।…
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थिर होकर आत्मा को परमात्मा में लगाए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक १०
प्रश्नकर्ता: श्रीकृष्ण बोल रहे हैं कि “मन और इन्द्रियों सहित शरीर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए, यानी सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानी कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो वो सत्य जैसा प्रतीत होता है?
आचार्य प्रशांत: दुख का…
आचार्य प्रशांत: नहीं, ये तो बहुत अच्छी बात है। सर्टेनिटी का मतलब- कुछ निश्चित हो जाए। कनक्लूज़न का मतलब…
प्रश्नकर्ता: त्रिपुरा रहस्य में संगति के बारे में बहुत बोला गया है। मतलब सत्संगति आपको मोक्ष की ओर ले जाती है। क्या अपनी संगति हम चुन सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बिलकुल! वहीं एक चुनाव है जो आपको जी-जान से करना चाहिए, जिस पर अड़ जाना चाहिए।
प्र: मेरे जीवन में…
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।
“हे कुरुवंशीअर्जुन! जब तमोगुण विशेष वृद्धि को प्राप्त होता है तब अज्ञान रूपी अंधकार, कर्तव्य-कर्मों…
आचार्य प्रशांत: अब पन्द्रह-वर्ष से ऊपर हो गये मुझे सार्वजनिक जीवन में। लाखों लोगों से मिलने का अनुग्रह हुआ है और हज़ारों में उनके प्रश्न लिये होंगे। मुझे नहीं याद आता कि कोई भी ऐसा प्रश्न रहा है जिसने प्रत्यक्ष-परोक्ष, सीधे ही या घुमा-फिराकर के ये न पूछा हो कि…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी-कभी समझ नहीं आता कि जीवन में अपने विकास के लिए क्या करें? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें परीक्षा केन्द्र में पता चले कि तुम किसी दूसरे का पर्चा लिख रहे थे अभी तक; पर्चा किसी दूसरे का था और लिखे तुम जा रहे थे, और…
आचार्य प्रशांत: इस दुनिया में मज़े मारने नहीं आते हैं आप, लुटने आते हो। ये जगत है ही इसीलिए कि हमको मूर्ख बना-बनाकर हमें लूटता जाए। एक-एक चीज़, एक-एक व्यवस्था, आप जिसमें शामिल हैं, आप अगर देख पायें तो दिखेगा कि कैसे उसमें आपका शोषण होता है। एक अस्पताल में…
तो उसके बाद से मैं आपको सुन रही हूँ, ऑन एंड ऑफ़ (कभी-कभी)। बीच में ऐसे-ऐसे इनसीडेंट्स (घटनाएँ) आये…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरे दो सवाल हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पहला प्रश्न यह है कि आप जो हमें समझाते हैं, उपनिषद् हों या हमारे प्रश्नों के समाधान हों, तो आपकी जो प्रज्ञा है और हमारी जो प्रज्ञा है उसमें बहुत अंतर है। हम ख़ुद…