प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य जी, मेरे इन दो हिस्सों के बीच बहुत संघर्ष है और उस संघर्ष से, द्वन्द से, मुझे तनाव होता है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: मेलों में चरखी झूला हुआ करता था। अभी भी जो बड़े मनोरंजन पार्क होते हैं, अम्यूज़मेंट पार्क्स वग़ैरह, उनमें होता होगा। उस झूले में एक बड़ा चक्का होता है, उसपर बैठ जाते हैं लोग और वो ऐसे गोल-गोल घूमता है। देखा ही होगा! नीचे से ऊपर ले जाता है, ऊपर से नीचे ले जाता है और बड़ी गति से करता है। लोगों को उसमें निश्चित रूप से मज़ा तो मिलता ही है, कुछ उत्तेजना तो आती ही है। चीखें मार रहे होते हैं लोग। पैसा देकर के, खतरा उठा करके भी जाते हैं, उस झूले पर बैठते हैं और एक बार नहीं, बार-बार बैठते हैं।
उस झूले का नाम है हमारी ज़िन्दगी, और वही झूला आपके इस सवाल में मुझे झूलता नज़र आ रहा है। जाना है हमें आकाश की ओर। मतलब ऊपर को बढ़ना है, उठना है। और झूला भी आपको कुछ देर तक तो ऊपर की ओर ले ही जाता है। और जब तक झूला आपको ऊपर की ओर ले जा रहा है, आपका एक पक्ष, आपका एक हिस्सा,बड़ा सन्तोष मानेगा। वो कहेगा, ‘देखो, जीवन में तरक्की हो रही है, ऊपर उठ रहे हैं, ऊर्ध्वगमन हो रहा है। यही तो चाहिए था! संसारियों ने भी और आध्यात्मिकों ने भी जो बात कही है कि उठो! बढ़ो! वही बात हमारे साथ हो रही है। हम कितने खुशनसीब हैं!
क्या हो रहा है अभी आपके साथ? आप झूले पर बैठे हो और झूला आपको नीचे से ऊपर की ओर ले जा रहा है। चक्का विशाल है। जो चक्का, जो पहिया आप बच्चों के खेल में और मेलों में, पार्कों में देखते हैं, उसमें नीचे से ऊपर पहुँचने में कुछ सेकंड का वक्त लगता है। ज़िन्दगी का पहिया थोड़ा ज़्यादा बड़ा है। उसमें नीचे से ऊपर जाने में वक्त लग जाता है। हफ़्ते लग जाते हैं, महीने लग जाते हैं, कई बार साल भी लग जाते हैं। और इस दरमियान हम इस ही खुशफ़हमी में रहते हैं कि देखो, हमारे साथ कितना अच्छा हो रहा है। हम ऊपर उठ रहे हैं! हम ऊपर उठ रहे हैं!




