देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। आपके चित्त की मूल अहं–वृत्ति ही देवी महामाया हैं, जो संसार बनकर हमें दृष्टिगत होती हैं। वह देवी स्वयं संसार भी हैं और संसार की दृष्टा और अनुभोक्ता भी। उस मूल अहं–वृत्ति से अनेकों वृत्तियाँ निकलती हैं, जिनको अलग-अलग देवियों का नाम दे सकते हैं। मूल प्रकृति ही आगे चलकर तीन गुणों में विभाजित हो जाती है, जो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं — सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली।
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आचार्य प्रशांत: राजा पूछते हैं, 'जिन्हें आप महामाया कहते हैं वो देवी कौन हैं?'
मुनि ने जो अब सामने आख्यान रख दिया है उसमें बताया जा रहा है कि राजा और वैश्य दोनों के दुख के मूल में और दोनों के संभावित मुक्ति के मूल में एक ही हैं — भगवती महामाया। तो फिर स्पष्ट ही है कि राजा की उत्सुकता होगी कि ये महामाया हैं कौन। इन्होंने मुझे फँसाया और यही मुझे मुक्ति देंगी। 'तो ऋषिवर मुझे बताइए महामाया कौन हैं?'
तो अब आगे का जो पूरा ग्रंथ है वो महामाया का वृत्तांत देगा। अब राजा ने पूछा कि आप मुझे महामाया के बारे में बताइए। तो ऋषि अब इस अध्याय में और जो शेष बारह अध्याय हैं, उनमें महामाया का पूरा वृत्तांत देंगे। और जैसा की स्पष्ट ही है ग्रंथ के समापन तक आते-आते राजा को और वैश्य को अपने अपने मनवांछित पदार्थों का और स्थितियों का लाभ होगा हम देखेंगे।
"जिन्हें आप महामाया कहते हैं वे देवी कौन हैं? ब्राह्मण, उनका आविर्भाव कैसे हुआ? उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि, उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।" मुझे बताइए देवी कौन हैं। प्रादुर्भाव क्या है उनका, कहाँ से आई हैं, क्या करती हैं। और ये भी कहिए की उन्हें प्रसन्न करना कैसे संभव हो?







