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वो माँ है - जो तुम चाहोगे वो दे देगी || आचार्य प्रशांत, वेदान्त महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं कुछ समय पहले अभी बस्तर गया था, कुछ पचास कि.मि. दूर, गाँव में – कुछ आदिवासियों को समझने के लिए। तो वहाँ पर जो कुछ चीज़ें मैंने ऑब्ज़र्व किये, मुझे समझ में नहीं आया कि इसको कैसे लूँ। जैसे कि वो शिकार करते हैं और जानवरों की हड्डियों से बिमारियों का इलाज करते हैं। शादियाँ नहीं होती हैं, साथ में रहते हैं। अगर डोमेस्टिक वॉयलेन्स (घरेलू हिंसा) होता है तो वाइफ़ (पत्नी) छोड़कर दूसरे के साथ रहने लगती है।

तो इस तरह के बहुत सारे क़िस्से मैनें देखे हैं। भगवान को नहीं मानते हैं, वहाँ भगवान जैसा कुछ नहीं है, वन को ही मानते हैं क्योंकि वन से ही वो सामग्री लाते हैं और खाते हैं। तो मन में ऐसी जिज्ञासा थी, कुछ समझ में नहीं आया। क्या इनके लिए ये चीज़ें ज़रूरी हैं? क्या ये जो कर रहे हैं, क्या ये हिंसा में आता है? या इनको, जैसे हम वेदान्त समझ रहे हैं, क्या इनके लिए भी ये चीज़ें ज़रूरी हैं या जैसे हैं उन्हें वैसे ही रहना चाहिए? तो थोड़ा सा समझना चाहता था आपसे।

आचार्य प्रशांत: देखिए, वो प्रकृति के बच्चे हैं। आप आदिवासियों की बात कर रहे हैं न? वो प्रकृति की गोद में खेलती संतानें हैं। और प्रकृति माँ के रूप में बड़ी उत्कृष्ट होती है, वो अपने बच्चों को अपनी गोद में खिलाती है। इंसानों को भी, पशुओं को भी, पक्षियों को भी, कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को, सबको वो अपनी गोद में खिलाती है और पूरा ख़याल रखती है। उनका नाम ही है देखिए, ‘आदिवासी।’ आदिवासी का मतलब समझते हो? आप नहीं थे, आपकी सभ्यता नहीं थी, आपकी संस्कृति नहीं थी, आपके ग्रन्थ नहीं थे, वो तब से हैं, वो आदिकाल से हैं। प्रकृति ने उनका इतना ख़याल रखा है।

वो आदिकाल से उनका ख़याल रख रही है, वो बच्चे ही जैसे तब थे, वो बच्चे ही जैसे आज भी हैं। माँ उनको अपनी गोद में खिलाये जा रही है, खिलाये जा रही है, आदिकाल से। लेकिन उसमें एक ख़तरा पैदा हो जाता है। ख़तरा ये है कि प्रकृति इतनी मोहमयी माँ है कि वो बच्चे को अपने से कभी दूर नहीं जाने देती। जबकि बच्चे के लिए बहुत ज़रूरी है कि वो माँ की गोद से उतरे, माँ का आँचल छोड़े और आगे बढ़े।

सामान्यता भी हमारे घरों में आप कई बार देखते हैं न कि कोई माँ होती है, या बाप भी होता है, उसकी मोह-ममता इतनी ज़्यादा है कि वो बच्चे को पकड़े ही रह जाते हैं। उसे घर से ही नहीं निकलने देते। वो बच्चा कैसा हो जाता है? वो बच्चा शारीरिक रूप से बिलकुल सही रहेगा, बल्कि जो बच्चे दूर हो जाएँ घर से उनकी सेहत हो सकता है थोड़ी सी ऊपर-नीचे हो जाए, लेकिन जो माँ के सान्निध्य में बच्चा है, वो बिलकुल शरीर से स्वस्थ होगा और एक तरह की प्रसन्नता में रहेगा।

आप आदिवासी समाज में देखें तो उनको कई तरह की मानसिक बीमारियाँ जो शहरों में पायी जाती हैं, आदिवासियों को नहीं होती। उनके पास एक बहुत सरल सी प्रसन्नता रहती है, वो उसी में अपना मस्त रहते हैं। जीने के उनके बड़े सरल तरीक़े हैं, सरल क़ायदे हैं, उसमें वो मस्त रहते हैं क्योंकि वो प्रकृति की गोद में खेल रहे हैं। लेकिन फिर वहाँ चेतना से चूक जाते हैं, क्योंकि जो प्रकृति माँ है, ये चाहती ही नहीं है एक तरह से कि बच्चा उससे दूर जाए। या ऐसे कह लीजिए कि माँ का कोई विशेष आग्रह नहीं है कि बच्चा उससे दूर जाए।

इतना तो तय है कि प्रकृति की व्यवस्था इस तरह से निर्मित नहीं है कि व्यक्ति अपनेआप ही चैतन्य हो जाएगा। आप प्रकृति की व्यवस्था के भीतर जन्म ले सकते हैं, पूरा जीवन गुज़ार सकते हैं और जीवन आपका लगभग सुखपूर्वक ही बीत जाएगा और आप प्रकृति की गोद में ही फिर मर भी सकते हैं अस्सी-नब्बे साल जीकर के, बिना अपनी चेतना को उठाये। प्रकृति कोई आपत्ति नहीं करेगी।

प्रकृति कहेगी, ‘ठीक तो जिये! खाये-पीये, मस्त रहे! खाये-पीये, मस्त रहे। और कुछ संतानें तुमने पैदा कर दीं तो अब मेरा जो चक्र है प्रकृति का वो आगे चलता रहेगा अपना।’ प्रकृति को कोई आपत्ति उसमें नहीं होती।

बात समझ रहे हो?

अब ये बात अच्छी है या बुरी है ये तुम्हें फ़ैसला करना है क्योंकि प्राकृतिक जीवन जीने का भी एक सुख है। इसीलिए तो तुम फिर गोवा की ओर जाते हो, या हिमालय की ओर जाते हो, क्योंकि प्रकृति में एक सुख होता है। तो आदिवासियों को वो सुख लगातार मिलता है और इस मामले में वो शहरी, सामाजिक लोगों से शायद बेहतर भी हैं क्योंकि शहर में और सामाज में जिस तरह का तनाव है, वो आदिवासियों में अक्सर नहीं देखने को मिलता। उनके पास कई बार बीमारियाँ रहती हैं क्योंकि उनके पास चिकित्सा सुविधा नहीं है, ज्ञान नहीं है, आधुनिक शिक्षा नहीं है, तो वो बीमार हो जाएँगे, कुछ हो जाएँगे, ये सब हो जाएगा। उनके पास सुख-सुविधाएँ नहीं हैं तो उसका कष्ट भी रहेगा, लेकिन उसके बाद भी वो प्रसन्नचित्त रहते हैं, क्योंकि जो सामाजिक स्तर का तनाव है, जो सभ्यताजन्य तनाव है, संस्कृति हमारे भीतर जिस तरह की उथल-पुथल पैदा करती है, वो उनमें नहीं होता तो वो सुख से जीते हैं। ये प्रकृति की गोद में खेलने के लाभ हैं। अब ये तुम्हें तय करना है कि तुम्हें प्रकृति की गोद में खेलने का सुख चाहिए या प्रकृति की गोद से उतरकर के चेतना का पहाड़ चढ़ने में जो सुख है, वो चाहिए। ये दो अलग-अलग तरीक़े के सुख होते हैं। बात समझ रहे हो?

एक सुख है जैसे नन्हा शिशु होता है। नन्हा सा बच्चा है, वो घास में लोट रहा है। उसको सुख है कि नहीं है? पशुवत सुख है। एक नन्हा बच्चा घास में लोट रहा है और देखो क्या किलकारियाँ मार रहा है! सुख है कि नहीं है?

और एक आनन्द वो है कि उसी घास पर कुछ दूर पर एक ज्ञानी बैठा हुआ है चुपचाप, मौन, अचल। और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ उस बच्चे को देख रहा है, उस ज्ञानी में एक आनन्द है। अब ये तुम्हें तय करना है कि तुम्हें बच्चे की तरह घास पर लोटने का सुख चाहिए, या ज्ञानी की तरह उस बच्चे को देखने का आनन्द चाहिए।

एक सुख है प्राकृतिक और एक सुख है आत्मिक। आत्मिक सुख को आनन्द कहते हैं।

बात समझ रहे हो?

पशुओं को इन दोनों में से एक ही उपलब्ध होता है, तो उनको कोई तकलीफ़ ही नहीं, वो निर्विकल्प होते हैं। पशुओं को इनमें से क्या उपलब्ध है? प्राकृतिक सुख। तो पशु तो अपना प्रसन्न हैं, उनको कोई झंझट नहीं, वो अपना प्राकृतिक सुख लेते रहते हैं और फिर मर जाते हैं।

इंसान के सामने ये दोनों रास्ते होते हैं, तुम या तो प्राकृतिक सुख ले लो, या आत्मिक आनन्द ले लो। कहने की ज़रूरत नहीं कि ज़्यादातर लोग कौनसा चुनते हैं? प्राकृतिक सुख। लेकिन आत्मिक आनन्द पुकारता है! तो फिर वो क्या करते हैं? अब जो वो करते हैं, वो चीज़ शहरी ससंकृति में आ गयी। अब वो ये करते हैं कि प्राकृतिक सुख के माध्यम से आत्मिक आनन्द खोजना चालू कर देते हैं। क्योंकि चाहिए तो है आत्मिक आनन्द, लेकिन आत्मिक आनन्द महॅंगा होता है, प्राकृतिक सुख सस्ता होता है, वो घास में लोटकर मिल जाता है। तो क्या करते हैं कि प्राकृतिक सुख के माध्यम से आत्मिक आनन्द खोजने लगते हैं।

जैसे कि कोई कहे कि मुझे सेक्स के माध्यम से समाधि चाहिए। जैसे कोई कहे कि मैं बढ़िया खाना खा-खाकर के आनन्द प्राप्त कर लूँगा।

बात समझ में आ रही है?

तो ये सब प्राकृतिक सुख हैं जिनके माध्यम से आप कहते हैं, ‘आनन्द चाहिए’, लेकिन आपको ये चुनाव करना ही पड़ेगा कि आपको प्राकृतिक सुख चाहिए या आत्मिक आनन्द चाहिए। प्रकृति देखिए बड़ी रहस्यमयी चीज़ है। वही फिर, माता! माता है न वो? माता महामाया भी है और महामुक्ति भी है। ये जो माँ है हमारी, यही महामाया है और यही महामुक्ति है। वो आप पर निर्भर करता है कि आपके इरादे क्या हैं। आप उसका तिरस्कार नहीं कर सकते, ठुकरा नहीं सकते, ये बोलकर कि ये तो माया है, ये तो माया है। कैसे ठुकरा दोगे? वो आपके शरीर में बैठी हुई है। यही (शरीर) तो प्रकृति है न, यहाँ (शरीर में) बैठी हुई है, कैसे ठुकरा दोगे उसको? और न ही आप जीवन भर उसकी गोद में लोटते रह सकते कि कहकर के कि ये तो माँ है, यही महामुक्ति है।

नहीं।

न तो उसको ठुकरा सकते हैं और न ही उसके आँचल तले पूरा जीवन बिता सकते हैं, तो उससे एक बड़ा सधा हुआ सम्बन्ध रखना पड़ता है।

देखिए, मैं कह रहा था किसी से। अब जैसे हिमालय हैं हमारे। हाँ?

हिमालय माने प्रकृति। वो दो काम कर देती है प्रकृति हमारे साथ। अच्छा बताइए हिमालय पर ज़्यादातर लोग किसलिए जाते हैं? ज़्यादातर लोग किसलिए जाते हैं? कब जाते हैं लोग हिल स्टेशंस (ऊॅंची जगहों) पर? मज़े मारने। हनीमून मनाने। राफ्टिंग करने। लड़का-लड़की जाएँगे, ओयो रूम ले लेंगे। शराब पीऍंगे वहाँ बैठकर। यही तो होता है? और साथ-ही-साथ उन्हीं पर्वतों से उपनिषद् भी उठे थे। ऋषि भी हिमालय गये थे।

तो माँ दोनों काम करती है, जिसको माया चाहिए, उसे बहुत सारी माया दे देती है। ‘आओ-आओ-आओ! पहाड़ों पर आओ! आओ पहाड़ों पर आओ! शराब पियो, ऐश करो, सेक्स करो!’ और वही माँ आपको मुक्ति भी दे देती है। ऋषियों को बुलाती है, ‘आओ, मेरे पास आओ! गंगा किनारे बैठो!’

ऋषियों को उपनिषद् दे देती है, भोगियों को और ज़्यादा बन्धन दे देती है। ये तो आपकी नीयत पर है कि आपको क्या चाहिए। ये कोई संयोग भर नहीं है कि देश के वो हिस्से जहाँ प्राकृतिक सम्पदा सबसे ज़्यादा विपुल है, उन्हीं हिस्सों में माँसाहार सबसे ज़्यादा होता है। उत्तराखंड में, गोवा में, झारखंड में, उत्तर-पूर्व में, छत्तीसगढ़ में, दक्षिण के जो तटीय इलाके हैं, यहाँ पर। सबसे कम माँसाहार कहाँ होता है? उन जगहों पर जहाँ प्राकृतिक सम्पदा बहुत पायी भी नहीं जाती। जैसे राजस्थान, जैसे पंजाब, जैसे हरियाणा, जैसे गुजरात, वहाँ कम होता है। ये कितनी विचित्र बात है!

विचित्र बात इसलिए है क्योंकि ये माँ से अगर आपने अचेतन सम्पर्क रख लिया तो आप भी जानवरों जैसे हो जाते हो। जो लोग ऐसी जगहों पर रहते हैं जहाँ प्रकृति बहुत ज़बरदस्त है, वो पशुवत हो जाते हैं। वो जानवर जैसे ही हो जाते हैं। क्योंकि इतनी प्रकृति है उनके चारों ओर कि वो भी प्राकृतिक हो जाते हैं। और जब प्राकृतिक हो जाओगे तो फिर कभी जानवर खाओगे, कभी मछली खाओगे, कभी कुछ खाओगे।

लेकिन यही वो जगहें हैं जहाँ से अध्यात्म के बड़े-से-बड़े खजाने भी उठते हैं। उठते हैं न? आप बार-बार, बार-बार पढ़ते हो, देवभूमि बोलते हैं उत्तराखंड को। ये कैसे हो गया? अगर देवभूमि है तो वहाँ इतना माँसाहार कैसे? इतना अन्धविश्वास कैसे? वो देवभूमि भी है और मायाभूमि भी है, ये निर्भर इस पर करता है कि माँ से आपका सम्बन्ध क्या है। और पूरा जीवन आपका इसी बात से तय हो जाता है कि माँ से आपने रिश्ता क्या रखा।

कुछ समझ में आ रही है बात?

ये जितने दर्शन हैं न, वो कुल मिलाकर के सब इसी प्रश्न से जूझ रहे हैं — माँ से क्या सम्बन्ध रखना है? न माँ को त्याग सकते हैं और न माँ की ही गोद में लोटते रह सकते हैं।

“सही सम्बन्ध रखना है माँ से। ग़लत सम्बन्ध रख लिया तो माँ महामारी बन जाएगी। सही सम्बन्ध रख लिया तो मुक्ति दिला देगी!”

किसलिए जाना है हिमालय पर? शराब पीने में भी वहाँ बड़ा सुख आता है। लोग शराब के पूरे-पूरे क्रेट लेकर जाते हैं। पचास-पचास बीयर की बोतलें भरकर गाड़ियों में जा रहे हैं वहाँ पर पंजाब वाले, दिल्ली वाले लोग। चंडीगढ़ से जा रहे हैं वहाँ पर। क्या जा रहा है? ‘शराब पीऍंगे! मज़ा आएगा वीकेंड पर!’

और साधक भी सब हिमालय को जाते हैं। साधक को भी साधना की पूर्ति माँ से ही होनी है और भोगी को भी भोग माँ से ही मिलना है। अब आप तय कर लीजिए कि प्रकृति से आपको क्या रिश्ता रखना है।

गोवा आकर के दोनों काम हो सकते हैं। बहुत सारे लोग तो यही बोलकर आते हैं, ‘सी फूड (समुद्री भोजन) बड़ा बढ़िया मिलता है!’ जैन साहब हैं लखनऊ के, एकदम शुद्ध शाकाहारी। गोवा आने का उनको बहुत शौक है। मुझे बताए, गोवा आकर क्या करते थे वो राज़ तब खुला जब उन्हें बिमारियाँ हो गयीं कुछ। ऐसी बीमारियाँ जो माँस खाने वालों को ही होती हैं। फिर राज़ ये खुला कि वो गोवा आकर के यहाँ पर ओएस्टर, प्रौन, ऑक्टोपस, क्रोकोडाइल (मगरमच्छ)।

(श्रोतागण हँसते हुए)

आप इसलिए भी गोवा आ सकते हो। और आप इसलिए भी आ सकते हो कि भाई यहाँ बैठे हैं, बहुत अच्छा मौसम है, ऐसे मौसम में मन को एकाग्र करना और आसान हो जाता है। इस हरियाली में कुछ राज़ हैं जीवन के जो ज़्यादा आसानी से समझ में आने लग जाते हैं। आप इसलिए भी आ सकते हो गोवा। तो आपकी पूरी ज़िन्दगी इसी बात से तय हो जानी है कि आप गोवा किसलिए आये हो। माँ से आपने रिश्ता क्या रखना है?

कुछ आ रही है बात समझ में?

आदिवासियों ने एक तरह का रिश्ता रखा है, वो उनका चुनाव है। आपको देखना है आपको कैसा रिश्ता रखना है। लेकिन रिश्ता रखना तो पड़ेगा। कोई ये तो बोले ही नहीं कि मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मैं तो कहीं और ही...

तुम क्या रिश्ता नहीं रखोगे, ये देह ही माँ है! इसके साथ रिश्ता रखे बिना कैसे जी लोगे?

स्पष्ट हो रहा है कुछ?

जहाँ प्रकृति बहुत होती है, वहाँ भोगी में ज़बरदस्त भोग की कामना जग जाती है। लड़का-लड़की का जोड़ा होगा, वो किसी ऐसी जगह पर पहुँच जाए जहाँ बहुत खूबसूरत दृश्य है, उनमें दोनों में कामवासना जग जाएगी। ये माँ की माया है। और जिसके भीतर योग की इच्छा है, जब वो किसी प्राकृतिक जगह पर पहुँचता है तो उसका योग सफल हो जाता है, ये माँ का वरदान है। निर्भर आप पर है।

“माँ भोगी को भोग दे देती है, योगी को योग दे देती है। आपको क्या चाहिए आप जानो!”

क्या चाहिए?

अब समुद्र तट पर आप ये भी कर सकते हो कि वहाँ जाकर के फूहड़ हरकतें कर रहे हो। चले जाओ वहाँ पर अभी घूम रहे होंगे आजकल लोगों को लगता है, सस्ता है, आ जाते हैं। वो कुछ नहीं कर रहे होते, एक-दूसरे के कच्छे खींच रहे हैं। और ऐसे ही समुद्र तटों पर कवि बैठ जाते हैं तो सुन्दर कविताएँ रच देते हैं। और निर्भर ये करता है कि माँ से आपको सम्बन्ध क्या रखना है। वही समुद्र तट आपमें अश्लीलता भी भर सकता है और आपमें कविता भी भर सकता है। सबकुछ आप पर निर्भर करता है। सत्र हम कभी इतनी सुबह शुरू करते ही नहीं। इसीलिए करा है कि शाम होने से पहले आपको स्वतन्त्र छोड़ दिया जाए कि जाइए, गोवा देखिए। अब आप क्या देखेंगे वो आपके ऊपर है। देखना तो पड़ेगा! माँ से छुटकारा सम्भव नहीं है, क्योंकि वो चारों ओर है बाहर भी और है भीतर भी। छुटकारा नहीं मिलेगा। रिश्ता क्या रखना है वो आप देखिए।

आपको तो अभी छोड़ देंगे थोड़ी देर में। फिर आप क्या करेंगे आप जानिए।

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