क्या तुम यह चाहते हो कि तुम जो कुछ करते रहो, उसको लेकर भीतर कोई जिज्ञासा ही न उठे और तुम इसी निष्कर्ष में और आश्वस्ति में रहे आओ कि तुम जो भी कुछ कर रहे हो वह ठीक ही है? यह तो एक आंतरिक ईमानदारी और सतर्कता की निशानी होती है न कि जो कुछ भी कर रहे हो उसको लेकर के भीतर सवाल है। उस सवाल का होना अच्छा है। हाँ, उस सवाल के होने से थोड़ी खिसियाहट रहती है, असुविधा रहती है; क्योंकि तुम कभी भी अपनेआप को यह प्रमाण-पत्र नहीं दे सकते कि जो भी तुम कर रहे हो वह अच्छा कर रहे हो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरी उम्र बत्तीस साल है और मैं पिछले एक-डेढ़ साल से आपको सुन रहा हूँ। और ये मेरा फ़र्स्ट टाइम है, जो मैं आपसे इंटरेक्ट (बातचीत करना) हो रहा हूँ ऑनलाइन शिविर के माध्यम से। जब मैंने आपको सुनना नहीं चालू किया था तो मेरे जीवन जीने के जो मूल्य थे, ऐसा था कि चलो भई अच्छा काम करना है, जैसे— जो अपना काम करना है, ईमानदारी से करना है, भ्रष्ट नहीं होना है और जैसे समाज के लिए कुछ करना है, दान-पुण्य करना है; मतलब जो चीज़ें अच्छी मानी जाती हैं, आदर्श मानी जाती है समाज में, वैसा जीवन जीना है। लेकिन फिर जब से आपको सुनना चालू किया तब से समझ में आया कि ये सब तो कंडीशनिंग (संस्कार) है और सब उल्टा-पुल्टा है, मतलब एक नया ही आयाम जानने को मिला।
तो अभी मेरा प्रश्न यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, तो मेरे मन में फिर डाउट (संदेह) आने लगता है। और मैं आपकी शिक्षाओं को भी फिर उसमें जोड़ने लगता हूँ कि क्या मैं यह सही कर रहा हूँ? तो फिर मेरे मन में शंका आती है कि क्या इससे भी अच्छा कोई काम हो सकता है? क्या मैं अपना समय बर्बाद तो नहीं कर रहा हूँ? तो क्या सही है, क्या गलत है, इन दोनों के बीच मन डाउट में रहता है।
आचार्य प्रशांत: तो अच्छा है न। क्या, इसमें समस्या क्या है? जिसको तुम डाउट कह रहे हो, शंका, उसको जिज्ञासा की तरह देखो। क्या तुम यह चाहते हो कि तुम जो कुछ करते रहो, उसको लेकर भीतर कोई जिज्ञासा ही न उठे और तुम इसी निष्कर्ष में और आश्वस्ति में रहे आओ कि तुम जो भी कुछ कर रहे हो वह ठीक ही है?




