
सही काम आनंद पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वही सही है। सही काम करते समय सुख मिले या बोरियत, दोनों को समान रूप से स्वीकार करना ही आनंद है। पढ़ाई, विशेषकर गणित, केवल परीक्षा का विषय नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन की भाषा है, जो दुनिया को समझने की क्षमता देती है. गलतियाँ स्वाभाविक हैं और उनसे सीखना चाहिए, लेकिन बेईमानी कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। सच्ची सफलता पूर्णता में नहीं, बल्कि ईमानदारी में है।







जो व्यक्ति अपनी पशुता को नहीं पहचानता और अपने भीतर के जानवर को मर्यादित करने के लिए कोई मेहनत नहीं करता। फिर उसकी सज़ा ये है कि वो जानवर की तरह जीता है और जानवर की तरह ही मरता है। अफ़सोस की बात ये है कि सज़ा सिर्फ़ उसको नहीं मिलती। उसके साथ-साथ पूरी दुनिया को मिलती है, वो फिर पूरी दुनिया को तबाह करता है।



प्रश्नकर्ता: मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हैं और मैं उन दोनों के बीच में ही डोलती रहती हूँ। पहला भाग मुझे जीवन के प्रति उत्सुक रखता है और दूसरा भाग मुझे आलसी बनाता है। पहला भाग योजनाएँ बनाता है आगे की, और दूसरा वाला आगे की सोचता ही नहीं। आचार्य



आचार्य प्रशांत: ये जो खाक उड़ रही है हवाओं में, ये कभी अपनी नज़रों में बड़ा गम्भीर मसला थी। बड़े-बड़े महलों में जो रहते थे, उनकी कब्रों को कुत्ते खोद रहे होते हैं। ये औकात है हमारे गम्भीर मसलों की। सबसे गम्भीर मसला तो जीवन ही है न, अभी मर


प्रश्न: आचार्य जी, क्या अध्यात्म और गृहस्थ जीवन को साथ चलाना सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: दोनों को अलग कैसे चला लेते हो? कह रहे हैं गृहस्थ जीवन और अध्यात्म को साथ कैसे चला लेते हैं। मुझे बड़ी उत्सुकता है जानने की कि वो गृहस्थी कैसी होगी जिसमें अध्यात्म नहीं है।…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी तक उपनिषद पढ़ते समय जो मैंने सीखा है वो ये है कि जैसे सुख है या दुःख है, अगर आपका अटेंशन (ध्यान) वहाँ जाता है तो आप उसका थोड़ा अन्वेषण करें, देखें कि ये कहाँ से आ रहा है? केंद्र क्या है उसका? तो करती

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, आचार्य जी मेरा क्वेश्चन (सवाल) बहुत सामान्य सा है। मैं अध्यात्म से दो साल से जुड़ी हुई हूँ, मेरा प्रमुख जो इंस्पिरेशन (प्रेरणा) है वो श्रीमदभगवद्गीता ही है। तो श्रीमदभगवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने बार-बार ये बात बोली है कि इंद्रियों पर कंट्रोल (नियन्त्रण) रखो, …


आचार्य प्रशांत: ऐसे तरीक़े से कमाकर क्या करोगे जिसमें तुम्हारा मन टिकना ही नहीं चाहता? पेटभर चलता रहेगा, मन जलता रहेगा, ऐसे जीना है? पेट फूल जाएगा, मन राख हो जाएगा, ऐसे जीना है?
ऐसे नहीं देखा जाता रोज़गार को या आमदनी के स्रोत को कि पहले कुछ कमाने लगें…

आचार्य प्रशांत: इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि गुरु भ्रष्ट है और इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि गुरु और व्यापारी और राजनेता इन तीनों में साँठ-गाँठ हो गयी है। ऐसा पहले कम हुआ था। धर्म और राजनीति तो अतीत में भी हुआ है…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! लगभग एक साल से ऊपर हो गया आपको सुन रही हूंँ। शुरुआत में बहुत ज़्यादा सबकुछ सकारात्मक मिल रहा था, सकारात्मक बदलाव आ रहे थे उसके बाद फिर अभी ये मार्च दो हज़ार इक्कीस का शिविर भी किया था,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी, मेरा प्रश्न हैप्पीनेस (खुशी) के बारे में है कि व्हाट एग्ज़ेक्टली हैप्पीनेस इज़?


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सुख और आनन्द में क्या अन्तर है? कभी-कभी यह आभास होता है कि आनन्द है और कभी-कभी यह आभास होता है कि आनन्द सिर्फ़ क्षण भर था, अब चला गया।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुदेव। गुरुदेव बाहर एक टी-शर्ट रखी हुई थी जिस पर लिखा था, 'पिटते रहो, उठते रहो।' तो ये पिटने में इतना स्वाद क्यों है? और जॉर्ज गुर्डजिएफ़ भी कहते हैं कि अ मैन केन गिव अप एवरीथिंग बट नॉट हिज़ सफरिंग (एक आदमी सबकुछ छोड़ सकता है पर…

प्रश्नकर्ता: आज आचार्य जी आपने दो चीज़ें समझायीं, साथी और काम के बारे में, साथी कैसा चुनें और काम कैसा चुनें। साथी के बारे में तो काफ़ी कुछ समझ में आ गया, काम को लेकर इतनी स्पष्टता नहीं हुई। क्योंकि हर काम कहीं-न-कहीं अन्त में पैसे से जुड़ता है और

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जितनी भी बात आपने बतायीं उसके मूल में यही था कि अध्यात्म का उद्देश्य तो मन को शान्त करना है, सरल करना है। आज का जो अध्यात्म है उसका उद्देश्य मन की शान्ति और सरलता नहीं, बल्कि कुछ और ही है। और क्योंकि उद्देश्य बदल चुका है

प्रश्नकर्ता: आनन्द को पाने के लिए लाइफ़ (जीवन) की क्वालिटी (गुणवत्ता) थोड़ी सी ज़्यादा रखनी पड़ती है, क्योंकि आनन्द आसानी से तो मिलता नहीं है। और जो खुशियाँ होती हैं वो तो आम ज़िन्दगी में हम बटोरते ही रहते हैं, छोटी-छोटी चीज़ों में ही हमको आसानी से मिल जाती हैं।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मौन और आनन्द के क्षण रहते हैं, उनमें भी भय बना रहता है। ये क्या है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। पिछले कुछ दिनों में मेरे जीवन में कुछ ऐसे पल आये जो कि बिलकुल


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे दफ़्तर का काम तो हम करते ही हैं, लेकिन अपनी जो ख़ुद की इच्छा है, चैन या शांति की, उसके लिए अलग से समय कैसे निकालें?
आचार्य प्रशांत: ऑफिस (दफ़्तर) कोई प्रथम मूल्य तो नहीं हो सकता न, कि ऑफिस जाना ही जाना है। ऑफिस में…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिंगला गीता में श्लोक क्रमांक १८ से २१ से प्रश्न है।

कार खरीद कर और फर्नीचर खरीद कर ज़िंदगी नहीं बन जाती है। सुख के नाम पर क्या है? एक गाड़ी है, एक ईएमआई पर घर खरीद लिया है, एक घर पहले से था, फिर बीवी है जो बुढ़ा रही है, दो बच्चे हैं जो खून पीने को तैयार हो रहे

प्रेम का अर्थ ये नहीं कि, “तुम मुझे खुश रखो, मैं तुम्हें खुश रखूँ।“ बिलकुल भी नहीं!


यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥२, १५॥


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सामान्यत: तो हम ऐसे होते हैं कि अपने लिए कर्म करते हैं, अपने हित का सोचते हैं। और अपने लिए ना करने का चुनाव, यह करने वाले भी क्या हम ही होते हैं?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए, यानी सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानी कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो वो सत्य जैसा प्रतीत होता है?
आचार्य प्रशांत: दुःख का…

प्रश्नकर्ता: आप कहते हैं कि सामान्य ज़रूरतों के लिए बहुत ज़्यादा पैसों की ज़रूरत नहीं है, पर अगर हमारे पास समय है और सामर्थ्य भी, तो ज़्यादा क्यों न कमाएँ? इस दुनिया में बहुत से सुख हैं जिनको पूरा करने के लिए पैसा चाहिए। उदाहरण के लिए, विश्व भ्रमण करने

प्रश्नकर्ता: हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर क्यों होती हैं?

श्रोता: आचार्य जी, आपने जैसे कहा कि, जो भी काम करो उसमें डूब कर पूरी तरह से करो, तो क्या यह सम्भव है क़ि हम एक काम करते रहें और दूसरा विचार-सोच हमारे दिमाग मे ना आये।

जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो,


प्रश्न: मन का जो ढाँचा है, मन उसे फिर-फिर दोहराता है। ये सब कुछ एक अचेतन बहाव की तरह चलता जाता है प्रतिदिन, क्या करें?
आकाश के अणु-अणु में ये बात बसी हुई है कि 'All is already and always perfect', सब कुछ सदा और सर्वथा पूर्ण है। हमें ये विचार है कि कुछ कमी है, और इस कमी को पूरा करने के लिए हम सुख की तरफ़ जाते हैं। ये मानना कि कुछ कमी है — यही कमी है। जहाँ देखा कि मान रहे हो कि कुछ कमी है, वहीं समझ लो — माया है। माया क्या है? कमी का आभास। प्रतीत होती है कि कुछ कम है, कुछ कम है। जबकि हवा में और रोशनी में, हर जगह लिखा हुआ है कि सब परफेक्ट है, पूरा है।
जिस चीज़ को मज़ा बोलते हो और जिस चीज़ को बेमज़ा बोलते हो, जिसको सुख बोलते हो, जिसको दुख बोलते हो दोनों को समझो कि ये मामला चल क्या रहा है, और इस समझने में जो मौज है, वो आनंद है। तो दुख भी चल रहा है तो उसको समझो — दुख में भी आनंदित रहोगे, और सुख चल रहा है तब तो समझो ही समझो। कुछ भी चल रहा है, जो भी चल रहा है उसको समझो — वो आनंद है।
हम छोटे-मोटे उत्सव करके सोचते हैं कि हमे खुशी मिल गई; काश कि मिली होती। ये बड्डे-गड्डे में ताली बजाने से खुशी नहीं मिलती, एक समस्या ज़रूर खड़ी हो जाती है — आप अपने आप को जता लेते हो कि आपको खुशी मिल गई। इंसान को वरदान ये मिला है कि उसे खुशी मिलेगी तो ऊँची मिलेगी। और अभिशाप ये मिला है कि उस ऊँची खुशी के लिए उसे दाम भी ऊँचा चुकाना पड़ेगा। दाम ये है कि अपनी कमज़ोरियों से जूझ जाओ, उनके विरुद्ध संघर्ष करो।
हमारी ज़िन्दगियाँ absurdity का ही एक endless narrative है। यह absurdity दिखाओ, लोग खूब हसेंगे। Comedy, entertainment ये सब बहुत अच्छी चीज़ें हैं यदि ये लोगों को अपनी मूर्खताओं पर, अपने prejudices पर हँसा दे। हमें ऐसी कॉमेडी की बहुत सख्त ज़रूरत है जो clarity देती हो। ऐसी कॉमेडी जहाँ उसको सुनकर सिर्फ़ आप हँसे नहीं हो, आप हल्के हो गए हो। यही तो होता है- ‘Cutting Your Own Inner Clutter.’
समाज ने हमें सिखाया है कि खुश रहना चाहिए। इस सीख को हमने इतना सोख लिया है कि यह बात बिल्कुल अंदर तक पैठ गई है। और जो जितना प्रकट करे कि वह प्रसन्न है, उसके बारे में जान लीजिएगा कि वह आनंदित तो नहीं ही है, वह वास्तव में भीतर से दुखी है। प्रकृति में सुख का अर्थ होता है 'भोग'। तो जो आपको सिखा रहे हैं कि हमेशा हैप्पी नज़र आओ, वे वही लोग हैं जो आपको भोग की तरफ़ प्रेरित कर रहे हैं।
खुशियाँ बहुत स्तरों की होती हैं। खुशी पाने के लिए तुम्हें यह जानना चाहिए कि मुझे किस स्तर की खुशी चाहिए। आम आदमी की खुशी वह होती है जो अपने पीछे ग़म और उदासी लेकर आती है, जबकि बुद्ध की खुशी उच्चतर स्तर की और असली होती है। जो भी अपने सामर्थ्य से बढ़कर कुछ ऊँचा करता है, उसे ऊँची खुशी मिलती है। जितने ऊँचे स्तर की तुम खुशी चाहोगे, उतने ही ऊँचे स्तर का तुम्हारा जीवन होगा।
श्रोता १: वास्तविक में कुछ नया नहीं है। लेकिन हम उसे नया बनाना चाह रहें हैं। जैसे कि मैं आज आया हूँ यहाँ पर, वैसे काफ़ी समय बाद आया हूँ। और कहीं-न-कहीं मैं ये चाह रहा था कि आज मैं जाऊँ। क्योंकि आज न्यू ईयर वाला है दिन और मैं…
प्रश्नकर्ता: 'मैं ये नहीं हूँ' ये बात मुझे मन के तल पर तो समझ में आ गयी है, लेकिन ये मेरे जीवन में कैसे उतरे?
आचार्य प्रशांत: 'मैं नहीं' एक निगेशन (नकार) है। वो निगेशन किसी चीज़़ का ही हो सकता है, कुछ होगा तभी तो उसे निगेट करेंगे। जैसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! कल के सेशन में आप एक बहुत ही एलिवेटेड स्टेट में लेकर गए, बहुत ट्रैंकफुल स्टेट(शान्ति की स्थिति) में लेकर गए। अब सवाल ये है कि वो स्टेट, वो मनोस्थिति को बरकरार कैसे रखें? डे टू डे ट्रिगर्स के बीच में वही पीसफ़ुलनेस कैसे मेंटेन…
प्रश्नकर्ता: जैसा आपने बताया कि कोई अन्तिम अवस्था नहीं होती है। हमें निरन्तर जीवनपर्यन्त अपनेआप को शुद्ध करते रहना होगा। तो हम जिन जीवनमुक्त महात्माओं के बारे में हमने जो पढ़ा है ‘निसर्गदत्त महाराज’,’रमण महर्षि’, ‘परमहंस योगानन्द’। वो जिस निरन्तर अवस्था में रहते हैं, वो जो बिलकुल फ्री फ्लो एटीटयूड…
संतों, सो निज देश हमारा। जहाँ जाए फिर हंस न आवे, भवसागर की धारा ।। सूर्य-चन्द्र नहीं तहाँ प्रकाशित, नहीं नभमंडल तारा । उदय न अस्त दिवस नहीं रजनी, बिना ज्योति उजियारा ।। पाँच तत्व गुण तीन तहाँ नहीं, नहीं तहाँ सृष्टि पसारा । तहाँ न मायाकृत प्रपंच यह, लोक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चालीस वर्षीय महिला हैं, डॉक्टर हैं पेशे से। लिखती हैं, 'प्रणाम, आचार्य जी। मैं छोटे शहर की निम्न-मध्यवर्गीय, रूढ़ीवादी परिवार की सबसे बड़ी लड़की हूँ। बचपन से ही ग़रीबी, डिप्रेशन (अवसाद), डोमेस्टिक वायलेंस (घरेलू हिंसा) बहुत कुछ झेला, फिर सोचा कि इस जीवन को बदलना है; अत्यन्त…
लेकिन…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…
दुख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ~ शबद हज़ारे (नितनेम)
मैं उसकी सेवा करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो सदा-सदा से देने वाला है।
आचार्य प्रशांत: मैं उसकी सेवा करूँगा, करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो…
आचार्य प्रशांत: आनन्द आता नहीं, आनन्द होता है। ये आने-जाने वाले सारे काम मन की लहरों के…
प्रश्नकर्ता: तलब एक हैप्पिनेस (खुशी) है सर, हैप्पिनेस को किस तरह कन्सिडर (मान) कर सकते हैं?...कि मतलब हमारी जो इच्छाएँ हैं वो पूरी हो जाएँ? या उसमें कोई दुख वगैरह उसको कन्सिडर करते हैं? सर एक लाइन (पंक्ति) है कि हर लाइफ़ (जीवन) की एक हैप्पी एंडिंग (सुखान्त) होती है,…
प्र: ऊपर से ऐसा लगता है कि आनन्द-ही-आनन्द है।
आचार्य: आनन्द की किसी कृत्रिम परिभाषा से, उन क्षणों का मिलान हो…
आचार्य प्रशांत: अ फ़्री विल (मुक्तेच्छा) माने उसका कर्म उसकी समझ से निकलता है। ही अंडरस्टैंड्स एंड फ़्रॉम दैट अंडरस्टैंडिंग, हिज़ एक्शंस अराइज़। एंड देन, देअर इज़ नो क्वेश्चन ऑफ़ लैक ऑफ़ कॉन्सेंट्रेशन, देअर इज़ नो क्वेश्चन ऑफ़ टाइम मैनेजमेंट। (वो समझता है और उसका कर्म उसकी समझ से निकलता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले कुछ दिनों से उदासी रहती है, सब ठीक चल रहा है फिर भी पता नहीं क्यों रोना आ जाता है, समझ नहीं आ रहा क्या करूँ? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तो जो हो रहा है, उसको होने दो, उसके साथ रहो, बुरा मत मानो इसका।…
“संसार में विषयों की तृष्णा से जो व्याकुलता होती है, उसी का नाम दुःख है, और उस दुःख का विनाश ही सुख है। उस सुख के बाद (पुनः कामनाजनित) दुःख होता है। इस…
दूसरे को सुख देने…
ये लाज की, धिक्कार की बात है कि छोटे से सुख से ही खरीद लिया गया। अगर मैं छोटा आदमी होऊँगा ज़रूर, जो छोटे से सुख से बिलकुल लार टपका दी मैंने। फिर सवाल पूछते हैं अपने-आप से कि, “तू इतना गिर गया, इतनी बड़ी चीज़ हो गई तेरे लिए…
प्रश्नकर्ता: श्रीभगवद्गीता में श्रेष्ठ बुद्धि वाले मनुष्य के…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं चौबीस साल का हूँ और मेरा सवाल ये है — हमारे जीवन में उदासी क्यों बनी रहती है?
मैं बहुत बार जब अपने-आपको देखता हूँ तो किसी-न-किसी विचारों में बहुत बार लिप्त हो जाता हूँ, और ख़ुद को पाता हूँ कि उदास ही हूँ, वो…
आचार्य प्रशांत: वो तो एक सुंदरता होती है जो तुमको असहाय कर देती है,…
आचार्य प्रशांत: नहीं, संभव तो है ही है, संभव क्यों नहीं है।
श्रोता:…
नीम ना मीठी होय, सींचै गुड़ घीव सो।।
संत कबीर
प्रश्न: जब स्वभाव बदल ही नहीं सकता तो गुरु किसी मनुष्य को कैसे जगाने में सहायता कर सकता है?
आचार्य प्रशांत: यहाँ पर कबीर जिस स्वभाव की बात कर रहे हैं,…
But when thou doest alms, let not thy left hand know what thy right hand doeth.
Mathew(6:3 )
किन्तु जब तू किसी दीन दुःखी को देता है तो तेरा बायाँ हाथ न जान पाये कि तेरा दाहिना हाथ क्या कर रहा है।
मैथ्यू(6:3)
आचार्य प्रशांत: बाएं हाथ को पता भी…
वक्ता: करना क्या है? जो होना है वो हो ही रहा है।
तुमने कहा, “बेहोशी का एक प्रबल बहाव है”, तुमने कहा एक तरीका है,…