
आचार्य प्रशांत: कई बातें कह रहे हैं श्रीकृष्ण यहाँ पर — श्रीमद्भगवद्गीता, चौथा अध्याय, 42वाँ श्लोक, और कई बातों में एक बात ये है कि संशय को काटो। और रोचक बात ये है कि जब कई बातें होती हैं, तो संशय हो जाता है। कई बातें कह रहे हैं श्रीकृष्ण। कई बातों में एक बात है कि संशय को काटो। लेकिन अगर संशय को काटने के लिए भी कई बातें कही जाएँगी, तो संशय हो जाएगा।
तो जो धर्म का क्षेत्र है, वो जाने-अनजाने इस तरह के संशयों का भी बहुत शिकार हुआ है। कैसे संशय? कि संशय को काटने के लिए बहुत सारी बातें कह दी गईं। उन बहुत सारी बातों से ही संशय हो गया। बहुत सारी बातें क्यों कह क्यों दी गईं? क्योंकि संशय को काटना बहुत ज़रूरी था। क्योंकि संशय को काटने के बाद जो शेष रहता है, वो प्यारा इतना होता है कि आप संशय को काटने के लिए हर दिशा से प्रयत्न करते हो। कुछ बात इधर से कहते हो, कुछ उधर से कहते हो, कुछ कहीं से, कुछ कहीं से।
दर्जनों तरह की तो समाधियाँ हैं। नए-पुराने मिलाकर के 50 से ज़्यादा प्रकार के योग हो रहे हैं, और ऐसा नहीं कि समाधि की या योग की — ज्ञान के भी बहुत प्रकार हो गए। प्रेम के न जाने कितने प्रकारों का उल्लेख आ जाता है आध्यात्मिक साहित्य में। और ऐसा नहीं कि वो सब बातें इसलिए कही गईं ताकि आप उलझ जाएँ और आपको संशय हो जाए। उन सब बातों का कहा जाना वैसा ही है जैसे कोई वैश्विक महामारी हो, तो उससे निपटने के लिए छोटे-बड़े सब देश, सब प्रयोगशालाएँ, सब प्रांत, सब शहर अपने-अपने स्तर पर प्रयोग कर रहे हों।
किसी ने उस बीमारी को काटने का कोई तरीक़ा निकाला, किसी ने कोई। कई बार एक ही तरीक़े को दो अलग-अलग नाम दे दिए गए, क्योंकि वो महामारी है न, और वैश्विक है। सबको लगती है और बहुत मारती है। वैश्विक महामारी, सबको लगती है और बहुत मारती है। जैसे अभी कोविड की महामारी आई थी, दुनिया के कितने ही देशों में उस पर प्रयोग हुए। सब अपने-अपने तल पर काट निकालने में लगे हुए थे, क्योंकि सब प्रभावित थे, संक्रमित थे और बहुत पीड़ा होती थी। वही बात जो अंदरूनी बीमारी है अज्ञान की, उस पर भी लागू होती है। सबको प्रभावित भी करती है और पीड़ा बहुत देती है। तो सब लोग अलग-अलग तरीक़ों से लगे हुए हैं, उसका उपचार, निदान, समाधान खोजने में।
और कोविड के साथ तो ये था कि जो हुआ, वो इतिहास के लगभग बस एक क्षण में हुआ। एक-दो-तीन साल इतिहास की धारा में पलक झपकने जैसे होते हैं। लेकिन जो भीतरी बीमारी है, वो तो सदा से चली आ रही है। तो उसका सिर्फ़ सबने अपने-अपने तल पर ही उपचार नहीं खोजा है — एक ही जगह पर कई-कई सदियों में, अलग-अलग शताब्दियों में उसके उपचार खोजे गए। और ज़ाहिर है कि उनकी प्रक्रियाएँ, उनके नाम, वो सब अलग-अलग ही होंगे।
तो एक खोज है, जो पूरी दुनिया में चली है। पहली बात तो पूरी दुनिया में चली है। दूसरी बात अभी की नहीं है, सदा से चली आ रही है। जब से चेतना है, तब से अज्ञान है। तब से उसकी पीड़ा है, तो तब से उपचार की खोज है। पूरी दुनिया में चली है, और जब से चेतना है, तब से चली है। तो ज़ाहिर है उस खोज के बहुत सारे परिणाम, बहुत तरह के उपचार, प्रक्रियाएँ, विधियाँ सामने आए होंगे। उनका सामने आना ही अपने आप में संशय पैदा कर देता है।
एक संशय तो ये होता है कि बीमारी क्या है? और उसके ऊपर चढ़कर दूसरा और बैठ जाता है कि कौन-सा उपचार करें? अब उपचार इतने हैं कि आदमी पगला जाए। इतने तरह के उपचार हैं कि आदमी पगला जाए। और चेतना का जो क्षेत्र है पूरा, धर्म की जो बात है पूरी, वो बड़ी भ्रमित हो गई है इन्हीं शब्दों के वाग्जाल में उलझ के।
आज का श्लोक बड़ा सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
श्रीकृष्ण कह रहे हैं, देखिए कितनी बातें कह रहे हैं। कह रहे हैं, अज्ञान से। और अज्ञान में भी उन्होंने क्या करा? स्पष्ट ही कर दिया है, कौन-सा अज्ञान है? आत्म-अज्ञान है। “अज्ञानसम्भूत” फिर उसके बाद, मन का संशय। पहले तो आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान से अगली बात आ गई, मन पर। मन में भी क्या है? संशय है।
गिनते चलिएगा —
आत्मज्ञान।
आत्मज्ञान किस जगह अवस्थित है? — तो कहा, मन में।
मन में वो क्या रूप लेता है? — संशय का रूप लेता है। आत्मअज्ञान, मन, संशय।
फिर क्या करना है? — ज्ञान की तलवार से उसको काटना है। ये चौथी बात हो गई।
ज्ञान आ गया चौथी बात में। पाँचवी बात क्या हो गई? कि योग में तुम स्थित हो जाओ — तिष्ठ, बैठना, आतिष्ठ, योग में स्थित हो जाओ। पाँचवी बात। और ये सब कुछ कुल एक श्लोक के भीतर चल रहा है। ये पाँचवी बात हो गई कि योग में स्थापित हो जाओ। और फिर अभी कहा था तिष्ठ, अब कह रहे हैं उत्तिष्ठ, उत्तिष्ठ एक तरह से तिष्ठ का विपरीत होता है। तिष्ठ माने बैठना, उत्तिष्ठ माने खड़े हो जाना। फिर कह रहे हैं कि अब तुम खड़े हो जाओ। ये छठी बात हो गई, एक श्लोक के अंदर।
अब ये बातें इतनी होती हैं कि अगर सावधान न रहे व्यक्ति, तो इन बातों में ही उसे संशय हो जाएगा। तो क्या करना है हमें?
सुंदर वृक्ष है श्रीकृष्ण के वचनों का, अध्यात्म का विशाल झूमता वटवृक्ष है, जिसमें कितनी शाखाएँ, प्रशाखाएँ हैं, पत्तियाँ, जो कुछ हो सकता है। हमें उसकी जड़ तक जाना है। और जड़ क्या है? शुरुआत ही करी है किससे? ये सारी जो बात है, कि आत्म-अज्ञान से आता है मन का संशय। फिर उसको कहा है कि फिर उसको काटना है किससे? ज्ञान से। फिर कहा कि उसका परिणाम ये होगा कि तुम योग में स्थापित हो जाओगे। कहा कि योग में स्थापित हो जाओगे तो तुम फिर उठोगे। उठो।
उठने के यहाँ दो अर्थ हो सकते हैं, एक अर्थ ये भी हो सकता है कि वो जो बैठ गए थे रथ में कि “युद्ध नहीं करूँगा,” तो कह रहे हैं कि उठ खड़े हो जाओ। दोनों अर्थ हो सकते हैं। पर हम जो सूक्ष्मतम अर्थ है, वो लेंगे। उठना माने चेतना का आरोहण।
तो इन सारी बातों के मूल में क्या बात है? सब कुछ शुरू किससे हो रहा है? आत्मअज्ञान से। आत्मअज्ञान से सब शुरू हो रहा है। ठीक है न? आत्मअज्ञान को ही हटाना है ज्ञान से। बाक़ी सब बातें परिधिक हैं। बाक़ी सब बातें अलंकरण जैसी हैं। बाक़ी सब बातें और ज़्यादा स्पष्ट करके समझाने के लिए हैं। मूल बात बस इतनी ही है। और जो मूल बात है, वो पिछले श्लोक में भी थी। मूल बात है, क्योंकि वो मूल है, इसीलिए हर श्लोक में होगी। मूल बात है, आत्म-अज्ञान को ज्ञान से हटाना।
और अब हम करेंगे एक छोटा-सा प्रयोग। अब हम देखेंगे कि अगर मूल बात से चूक जाएँ, तो इस श्लोक में ही कितनी अलग-अलग दिशाओं में बिखरा जा सकता है। मन कितनी ही दिशाओं में विचलन ले सकता है। विक्षेप शब्द याद है? कब बात करी थी?
श्रोता: संत सरिता में।
आचार्य प्रशांत: तो कितने तरह के विक्षेप लिए जा सकते हैं मात्र इसी एक श्लोक में। और गीता का हमने तो जितना विक्षिप्त अर्थ करा हुआ है, उसकी कोई सीमा नहीं है। आप किस दृष्टिकोण से आ रहे हैं, आप किस बिंदु से आ रहे हैं — उस पर निर्भर करते हुए आप यहाँ से ही न जाने कितने अर्थ निकाल सकते हैं। और जो मूल बात है, उसको भूल सकते हैं। मूल बात ये है कि सारा जो खेल है, दुख का, बंधन का, मोह का, वो शुरू होता है आत्म-अज्ञान से। उस बात को भूलकर, कितनी ही अन्य दिशाओं में आदमी छिटक सकता है, विक्षिप्त हो सकता है।
विक्षेप माने क्या होता है? विचलन, भटकाव, हट जाना, हिल जाना, भटक जाना — उसको ही कहते हैं विक्षेप। तो विक्षेप की पूरी संभावना है यहाँ पर। कोई आकर कह सकता है कि ये जो पूरा श्लोक है, ये योग के बारे में है। योग के बारे में है। और कौन-सा योग? कहेगा, “ये जो हठ योग है, उसके समर्थन में ही तो पूरा श्लोक है। ये देखो न, इसमें योग की बात हो रही है।”
कोई आकर कह सकता है कि इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि “अगर तुम सचमुच क्षत्रिय हो, तो तलवार उठाओ न। देखो न, इसमें असि की बात हुई है यानी ज्ञान की तलवार। तो इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाना चाह रहे हैं कि ज्ञान भी पर्याप्त नहीं होता बिना तलवार के। तो तुम्हारे पास अगर ज्ञान है, तो ज्ञान को तलवार बन जाने दो। तो ये जो वास्तव में है, इसलिए है ताकि कुछ रक्तपात हो सके, कौरवों का सिर कट सके।”
देखिए, क्या होता है — कि जब आप मेरे सामने हैं, तो मैं जो बात कह रहा हूँ, वो इतनी साफ़ लगती है, इतनी प्रत्यक्ष, इतनी प्रकट लगती है, इतनी अकाट्य लगती है क्योंकि एक तरह का फ़ील्ड बन गया है। कि आपको लगता है कि हाँ, जो बात कही जा रही है, वो तो बिल्कुल सीधी है, और सीधी है तो हमें समझ में आ ही गई। जो बात वक्ता कह रहा है, वो बात हमारी भी है। हमारे भीतर कोई विरोध नहीं है, हम एकमत हैं। ऐसा लगता है लेकिन ऐसा है नहीं।
ये लगभग वैसी-सी बात है कि गणित का कोई सवाल जब शिक्षक बोर्ड पर हल कर रहा होता है, तो लगता है “हाँ, ऐसा ही तो होगा, हो गया, हो गया, हो गया।” पर अगला सवाल आप स्वयं हल करने की कोशिश करेंगे, तो आपसे नहीं होगा या तकलीफ़ आएगी। क्यों आएगी कठिनाई? इसलिए नहीं कि शिक्षक ने जो करा, आपको वो समझ में नहीं आया था। इसलिए क्योंकि शिक्षक ने जो करा, आपके पास उसके अलावा भी पाँच तरह के और समाधान हैं जो आपके अपने हैं।
जब शिक्षक हल कर रहे थे, तो आपने कहा “जो शिक्षक लिख रहे हैं, हम उससे सहमत हैं।” आपने झूठ नहीं बोला, आप बिल्कुल सहमत हैं। लेकिन आप सहमत सिर्फ़ शिक्षक की बात से नहीं हैं, आप 10 और बातों से भी सहमत हैं। वो बातें शिक्षक की उपस्थिति में दब जाती हैं, निष्क्रिय हो जाती हैं, डॉर्मन्ट हो जाती हैं — प्रसुप्त। क्योंकि एक फ़ील्ड रहता है, उस फ़ील्ड में जो आपकी अपनी बात है वो थोड़ा सा दब जाती है, छुप जाती है। लेकिन शिक्षक जैसे ही वहाँ से हटेंगे, और अगला उसी विषय का आपको सवाल दिया जाएगा हल करने को, आप पाओगे कि जो शिक्षक ने करा, उसके अलावा छ:-सात और आपके अपने व्यक्तिगत तरीक़े भी उछल कर सामने आ गए कि “हमें भी तो आज़माओ।” और अब आप कुछ गलत कर सकते हैं।
तो क्या झूठ बोला जा रहा था जब आप कह रहे थे “हाँ, शिक्षक की बात से सहमत हैं हम?” क्या आपने झूठ बोला था? नहीं, झूठ नहीं बोला था। आपने लेकिन कुछ आधा-अधूरा सच बोला था, और आधा-अधूरा सच ही झूठ होता है। आपने ये तो कहा था कि आप शिक्षक की बात से सहमत हैं, बिल्कुल ठीक है। लेकिन आप इस बात को छुपा गए थे कि शिक्षक की बात के अलावा भी आप पाँच-सात और बातों से सहमत हैं। और वो जो पाँच-सात और बातें होती हैं, उन्हीं का नाम तो संशय है न। कि एक नहीं है जीवन में सात और भी हैं।
अब एक की उपस्थिति में तो लगेगा कि एक ही है, लेकिन एक सदा तो रहेगा नहीं। इसलिए नहीं कि वो “एक” चला जाता है, इसलिए कि “आप” चले जाते हैं। एक सदा तो रहेगा नहीं। जब नहीं रहेगा, तो पाँच-सात जो हैं बाक़ी आपके सब रिश्तेदार, मेहमान, दोस्त-यार, हम, पुराना प्यार, वो सब दोबारा कूद आएँगे। और वो आपको कहेंगे “अरे, वो ठीक था पर हमें भी तो आज़माओ! चलो, वो ठीक है, पर थोड़ा बहुत तो हम सही हैं न! या तूने हमें बिल्कुल ही दुत्कार दिया? हम क्या किसी हक़ के नहीं हैं?” तो आप कहोगे “नहीं, हक़ तो तुम्हारा भी बनता है।” और जैसे ही आप वहाँ हक़ देंगे, मामला अटक जाएगा। यही संशय है।
संशय का अर्थ ये नहीं होता कि आपके मन में श्रीकृष्ण-राम के लिए सम्मान नहीं है। संशय का अर्थ ये होता है कि श्रीकृष्ण-राम के लिए तो सम्मान है — सात और भी हैं, जिनके लिए है। आप फँसोगे। और ये संशय का सिर्फ़ पहला तल है, कि राम और श्रीकृष्ण के अलावा सात और के लिए सम्मान है।
आज के श्लोक में संशय का दूसरा तल भी प्रकट हो रहा है, कि जब श्रीकृष्ण भी बात कुछ कह रहे हैं, तो उनकी भी बात के मूल के अलावा पाँच और चीज़ों के लिए भी सम्मान है। इसी श्लोक में एक मूल बात है। मूल बात क्या है? आत्मज्ञान को हटाना है। उस मूल बात के अलावा कितनी और बातें निकली थीं? पाँच और बातें निकली थीं। वो भी संशय हैं।
एक तो ये है कि श्रीकृष्ण के अलावा छ: बैठा रखे हैं, एक तो वो संशय हुआ। दूसरा ये है कि जब श्रीकृष्ण के पास आएँगे भी, तो श्रीकृष्ण के भी मूल की अपेक्षा, श्रीकृष्ण के ही पत्तों-टहनियों में जाकर कहीं उलझ जाएँगे। और ये वाला संशय ज़्यादा घातक है। इससे मुक्त होना ज़्यादा मुश्किल है, क्योंकि यहाँ जो पत्ते-टहनियाँ हैं, वो भी किसके हैं? श्रीकृष्ण के ही हैं। कोई क्या बोलकर आपको वहाँ से हटाएगा? क्या बोलेगा?
और कोई बोलेगा, तो वो बड़ा अधर्मी जैसा लगेगा, क्योंकि आपको लगेगा कि वो आपको किससे हटा रहा है? श्रीकृष्ण से हटा रहा है। ऐसा लगेगा ये तो अधर्म है! श्रीकृष्ण ने ही तो यहाँ पर बोला हुआ है न — योगम् आतिष्ठ! और कोई आपसे आकर बोलेगा “देखो, इस श्लोक में उन्होंने बिल्कुल बोला है कि योग में बैठो, लेकिन इस श्लोक का मूल नहीं है।” तो आप कहेंगे “देखा ये श्रीकृष्ण-विरोधी है, ये श्रीकृष्ण-विरोधी है!”
आप श्रीकृष्ण की मनचाही कोई छवि बना लें, उस छवि का अलंकरण करें, आभूषण करें। कोई आपसे आकर कहे “देखो, ये मत करो, आओ कुछ और है असली बात, श्रीकृष्ण की मूल वो बताता हूँ,” तो आपको लगेगा, वो व्यक्ति कह रहा है कि “चलो, श्रीकृष्ण से हट जाओ।” तो यहाँ पर माया और ज़्यादा घातक हो जाती है।
संशय की दो तल की बात करी न? पहला तल क्या था? जिसमें हमने शिक्षक का उदाहरण लिया था, कि गणित के एक सवाल को शिक्षक ने एक तरीक़े से हल करा, और जब शिक्षक ने हल करा, तब आपको कैसा लगा?
श्रोता: सब ठीक है।
आचार्य प्रशांत: सब ठीक है। इसीलिए तो आपको वैकल्पिक प्रश्न दिए जाते हैं न, जिसमें एक बात मेरी रहती है और चार बातें आपकी रहती हैं। मैं देखना यही चाहता हूँ परीक्षाओं में, कि आप मुझे चुन रहे हो या अपने आप को चुन रहे हो। आप मुझे चुनते ही नहीं। कई बार मुझे चुन भी लेते हो, तो साथ में तीन और अपने ले आ आते हो। ऐसे तो खेल चलता ही नहीं न।
कृष्ण के पास जाओगे तो बारात लेकर थोड़ी जाओगे, वहाँ अकेले ही जाना पड़ता है। या सब जो पुरानी प्रेम कहानियाँ हैं उसमें ये सुना है, कि सोनी जा रही थी और चार और अपनी सहेलियाँ ले जा रही थी? ऐसे नहीं होता है। तो जब विकल्प सामने आते हैं, तो उसमें अपने को पीछे छोड़ना पड़ता है। वो परीक्षा ही नहीं होती है, वो ध्यान का प्रयोग है। जो जितना ध्यानी, जितना प्रेमी होगा वही परीक्षा में कुछ कर पाएगा।
परीक्षा में आप अटक रहे हो, माने आप बड़े ज़बरदस्त किस्म के सामाजिक आदमी हो। आप जहाँ जा रहे हो, बारात लेकर ही जा रहे हो। छोड़ ही नहीं पा रहे बारात को पीछे, बारात माने आपा, बारात माने अहंकार — वो अब पीछे ही नहीं छूट रहा। वही संशय है। संशय माने सत्य की अनुपस्थिति हो आवश्यक नहीं है। सत्य की अनुपस्थिति तो बड़ी मुश्किल चीज़ होती है। कोई बड़ा सिकंदर चाहिए, कि वो सत्य को अनुपस्थित करके दिखा दे। बहुत-बहुत मुश्किल काम है।
सत्य की अनुपस्थिति नहीं है — संशय, सत्य के अलावा 70 की उपस्थिति है संशय। सत् भी है और सत्तर और भी हैं। वो हो गया स्थूल संशय। वो कौन-सा संशय हुआ? मोटा संशय कि “नहीं, ये तो ठीक है, गीता तो ठीक है, पर और भी चीज़ें तो हैं, देखनी पड़ती हैं न।” इसके लिए मैंने एक नया नाम निकाला है — ऐंवाद। कौन-सा नाम? ऐंवाद “नहीं, बात तो आपकी बिल्कुल ठीक है, लेकिन ऐं…” बात तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन ऐं…, ये हुआ स्थूल संशय।
फिर क्या हुआ? सूक्ष्म संशय। सूक्ष्म संशय क्या हुआ? कि जहाँ आध्यात्मिक वचनों में ही सात-आठ तरीक़े के उलझ गए और उनकी जो मूल बात थी, उससे चूक गए। मैं इतनी किताबें पढ़ पाया, उसमें एक जिस बात से मुझे मदद मिली — कई बातें रही होंगी, पर जो एक बात मुझे याद आती है वो ये है कि आध्यात्मिक साहित्य में ये पुंगी बजाने का बड़ा चलन रहता है।
माने, हो सकता है कि जो ग्रंथ है अपने आप में, वो मात्र किताब में 50 पन्नों का हो, लेकिन किताब होगी 180 पन्नों की! पहले उस पर एक के बाद एक लोग उसमें भूमिका बता रहे हैं, व्याख्या बता रहे हैं, ये सब 50 चीजें चल रही हैं। और जहाँ पर किताब ख़त्म हो रही है, तो उसके बाद भी अभी 30 पन्ने और हैं! कोई बोल रहा है कि “ये जो ग्रंथ है, इसको पढ़ने के बाद ये 70 तरीक़े के और मंत्र हैं और प्रार्थनाएँ हैं — इनका उच्चारण करना चाहिए। नहीं तो इस ग्रंथ को पढ़ने का लाभ नहीं मिलता।”
उदाहरण के लिए — दुर्गा सप्तशती — उसमें भी यही है। सप्तशती से पहले भी इतना कुछ है, और सप्तशती के बाद भी इतना कुछ है। कहते हैं “इतना जब कुछ करोगे, तब सप्तशती को पढ़ने से जो आपने मनोकामना रखी होगी, वो पूरी होगी।” मेरे लिए अच्छा रहा, मैंने 180 में से 50 ही पन्ने पढ़े। और उन 50 में भी मुझे किसी की दी हुई व्याख्या से बहुत मतलब नहीं रहा। मूल तक पहुँचना है न, इधर-उधर क्या छराऊँ अपने आप को।
और अक्सर जो उसमें व्याख्याएँ रहती हैं या जो आगा-पीछा रहता है, वो बहुत ज़्यादा पूर्वाग्रह-ग्रस्त रहता है। किसी संप्रदाय से, किसी मत से आ रहा होता है, किसी दिशा से आ रहा होता है। तो उन लोगों ने उसमें अपना ही सब महिमा-मंडन कर रखा होता है। मैं वो काहे के लिए पढ़ूँ? और वही पढ़ता रह जाऊँगा तो अगली किताब पर कब आऊँगा?
मूल से मतलब रखिए। श्रीकृष्ण क्या हैं? सत्य हैं। सत्य माने मूल। और अगर मूल सही है तो बाक़ी सब जो फूल-पत्तियाँ हैं, वो अपने आप सही हो जाएँगे। सत्य, शरीर में जैसे स्टेम सेल होती है न, वैसा होता है। शरीर में तरह-तरह की कोशिकाएँ होती हैं न, लेकिन आपकी नाक की जो कोशिका है, वो आपके बाल की कोशिका नहीं बन पाएगी। लेकिन एक कोशिका ऐसी होती है शरीर में, जो सारी कोशिकाएँ बन सकती हैं। वो पहली कोशिका होती है, जो माँ के गर्भ में होती है, वो पहली। आपकी जितनी भी कोशिकाएँ हैं, वो सब उसी से निकली हैं। असली माँ वही है — द फर्स्ट सेल।
सत्य फर्स्ट सेल होता है। वही लिवर बन जाता है, वही किडनी बन जाता है, वही नाक बन जाता है, वही सब बन जाता है, वही आदमी बन जाता है, वही औरत बन जाता है, वही आँख बन जाता है, जीभ बन जाता है, खाल बन जाता है। बताओ, सब वही बन जाएगा। वो एक चीज़ है अगर आपके पास, तो फिर बाक़ी सब चीज़ें बन जाएँगी। इसलिए स्टेम सेल का इतना महत्त्व होता है।
अब आजकल बच्चे पैदा होते हैं, तो उनकी स्टेम सेल वग़ैरह रख लेते हैं — इसलिए, क्योंकि वो एक चीज़ ऐसी है वो पकड़ ली, तो सब हो जाएगा। एक साधे सब सधे। और उसकी जगह…ऐसा नहीं आप किसी का अगर स्किन सेल ले लोगे तो ऐसा नहीं है कि आप उससे पूरा इंसान पैदा कर सकते हैं। कर सकते हैं, लेकिन मुश्किल आएगी। उसके भी तरीक़े हैं अब, लेकिन वो उतना मज़ेदार काम नहीं है।
सत्य उस पहली कोशिका की तरह है, जिससे पूरा इंसान खड़ा हो जाता है।
अलग-अलग तरह का हमारे जितने अंग हैं, सब में अलग-अलग तरह की कोशिकाएँ हैं भाई। अब सोचो, हड्डी की कोशिका है, और एक खून की कोशिका है, इनमें कोई समानता है? और खून में भी रेड ब्लड सेल है, वाइट ब्लड सेल है, ये कोई एक जैसी हैं? और ये सारी की सारी कोशिकाएँ एक मदर सेल से आई हैं। वही मदर सेल डिफरेंशिएट होकर ये सब कुछ बन गई। सत्य वो मदर सेल है। जिसने उसका ध्यान कर लिया, उसको बाक़ी पूरे जो शरीर है, इसका ध्यान नहीं करना पड़ेगा।
शरीर माने ये पूरा ब्रह्मांड और हमारा अस्तित्व, ये शरीर है। उसको फिर इसका ख़्याल नहीं करना पड़ेगा, अपने आप स्वस्थ हो जाएगा। जिसकी वो पहली सेल स्वस्थ थी, उसका पूरा शरीर स्वस्थ रहेगा। और जिसकी वो पहली सेल ही गड़बड़ थी उसका सब गड़बड़ रहेगा। नहीं रहेगा? जो ज़ाइगोट है, जो भीतर एकदम नया-नया अभी तैयार हो रहा है पहला। अगर वही ख़राब निकल गया तो बच्चा, बच्चे का जीवन, जो वो वयस्क बनेगा वो सब कैसा रहेगा? कोई संभावना ही नहीं है, ख़त्म है वो बेकार है।
सत्य वो चीज़ है। बाक़ी सब क्या है? बाक़ी सब ऐसा है कि हाथ है, पाँव हैं — उनका अपना महत्त्व है। पर हाथ-पाँव सब ठीक हो जाते हैं यदि वो पहली चीज़ ठीक हो। जिस बच्चे की वो पहली सेल ठीक है, उसके हाथ-पाँव सब ठीक हो जाएँगे न? और जिसकी पहली सेल ठीक नहीं है, उसका क्या ठीक होगा? वो पहली सेल ठीक रखिए। हम ये नहीं कह रहे कि हाथ-पाँव का महत्त्व नहीं है। हम कह रहे हैं, हाथ-पाँव बाद में आते हैं। पहले वो पहली कोशिका आती है।
वो पहली कोशिका ठीक है, तो सब ठीक है। वो पहली कोशिका गड़बड़ है, तो सब गड़बड़ है। इसलिए सत्य को "मूल" कहते हैं। मूल — रूट, फंडामेंटल, ओरिजिन, फर्स्ट, स्रोत, परम, आदि, आरंभ। उसका जिसने ख़्याल कर लिया, उसकी आगे की झंझट बहुत कम हो जाती है। और जिसने उसका ख़्याल नहीं किया, सोचो कि वो जो फर्स्ट सेल है उसका आपने कुछ ख़्याल किया नहीं। अब बच्चा पैदा हुआ, आप उसके हाथ की मालिश कर रहे हैं, कुछ होगा बहुत उससे? अब क्या होगा? अब हाथ की मालिश करके क्या होगा?
सोचो, हाथ में और उस सेल में कितना अंतर है। हाथ कट जाए, नया हाथ आएगा? आपका लिवर ख़राब हो गया है — हाथ का टुकड़ा लेके लिवर में लगा सकते हैं क्या? लेकिन वो जो फर्स्ट सेल है, वो सब कुछ बन जाती है। सब कुछ बन जाती है। वो निर्गुण जैसी है, वो सब कुछ बन जाती है। उसका ख़्याल करना होता है। जिसने उसका ख़्याल नहीं किया, वही हो गया फिर संशय आत्मा।
वो 50 और चीज़ों में लगा हुआ है, सत्य का ख़्याल किया नहीं है। श्रीकृष्ण के मर्म से मतलब नहीं है। गीता को कह रहा है, कि “बिल्कुल सोने के सिंहासन पर रखूँगा, सोने का चौका बनवाऊँगा एक, और उसको हीरों से जड़ूँगा, और उस पर श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति रखूँगा।” ये कोई तुमने अपराध नहीं कर दिया, ये बात अगर विशुद्ध प्रेम में हो तो समझ में भी आती है। पर गीता के मर्म से यदि मतलब नहीं, गीता को कभी समझा नहीं और फिर तुम गीता को स्वर्णजनित, रत्नजनित जगह पर रखो तो उसे क्या मिल जाएगा? समझ में आ रही है बात?
कोई ज्ञान की बहुत बात करे और अज्ञान काटा नहीं, तो क्या मिल जाएगा? क्योंकि ज्ञान तो आंतरिक अर्थ में कुछ होता ही नहीं है। अपने अज्ञान को जानना ही ज्ञान है, और तो कोई ज्ञान होता नहीं। आप दनदनाकर के बता दो कि कितने पुराण हैं, और किस पुराण की क्या विषय-वस्तु है, कहाँ कितने स्कंध हैं। तो इससे क्या हो जाएगा? आप एक के बाद एक श्लोक सुना दो, ये सब ज्ञान की श्रेणी में आता ही नहीं है। बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं।
ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
तो जो मैं बात आपसे अभी कह रहा हूँ न। अभी अगर सुन रहे हों मान लो 10-20 हज़ार लोग, तो उसमें से 19 हज़ार के लिए ये बात क्या है? अविद्या मात्र है। क्योंकि बाहरी बात है। होगी बहुत ऊँची बात, लेकिन अविद्या का निर्धारण इससे नहीं होता कि बात ऊँची है कि नीची है। अविद्या का निर्धारण इससे होता है कि बात अपनी है या बाहरी है। बहुत ऊँची बात भी जब तक बाहरी है, वो अविद्या ही है।
पर ग्रंथों के साथ एक संभावना होती है। संभावना ये है कि ग्रंथ, अविद्या से शुरू करके आपको विद्या तक ले जा सकते हैं। यही है भवसागर को पार करना, इस पार से शुरू कर के उस पार तक ले जा सकते हैं। ये संभावना साधारण अविद्या के साथ नहीं होती। साधारण अविद्या बहरी है और बाहरी ही आपको रखेगी। वो बाहर से आई है, और आपकी आँखे बाहर की ओर ही रखेगी। ये साधारण अविद्या है। और ग्रंथ जो बातें कह रहे हैं, वो बातें हैं तो बाहर की। भाई, ग्रंथ से पढ़ रहे हो, आप बाहर की ही बात है, लेकिन उन बातों में एक ख़ासियत होती है। क्या? शुरुआत वो बाहर से हो रही है लेकिन आपको भीतर ले जा सकती है।
उस बात की शुरुआत वहाँ है, उसने कही, लेकिन वो बात ऐसी है कि आपको कहेगी — अब तुम इधर देखो। लेकिन आपको कह सकती है, आपको मजबूर नहीं कर सकती। आप भीतर देखोगे कि नहीं देखोगे, ये आपका चुनाव है। तो अविद्या के विद्या बनने के रास्ते में आप खड़े हुए हैं बिल्कुल। हाँ भाई, हमें पार करके दिखाओ। बाक़ी सब बातें तो ठीक हैं, गीता भी महान और श्रीकृष्ण भी महान। पर सबसे महान तो हम हैं ना। नाम हमारा — ऐं झुन्नू लाल! हमारे आगे सब हारे। कब से स्थापित है गीता, झुन्नू तो झुन्नू ही रहा ना। तो कौन जीता?
झुन्नू वो जिसके आगे गीता भी बस प्रतीक्षा कर रही है, जिससे गीता भी जैसे प्रार्थना कर रही है — कि झुन्नू, मान ले मेरी बात। और वो कह रहा है, "गीता वग़ैरह सब अलग, महान तो हम हैं।" समझ में आ रही है बात? मूल पर जाना है, मूल पर।
पहली बात तो, ये जो पूरा संसार बिखरा हुआ है इसमें सारी सेना, सारी सजावट, ये सारी जो दावत है और सारी जो बारात लगी हुई है। इसकी अपेक्षा श्रीकृष्ण को, गीता को, माने जो आपको दुख से मुक्त कर सकता हो, उसको महत्त्व देना मुश्किल है। और ‘महत्त्व’ से मेरा आशय है — एकनिष्ठ महत्त्व। बिखरा, विक्षिप्त महत्त्व नहीं — एकनिष्ठ, एक्सक्लूसिव महत्त्व। और इस नाते वो शिक्षक वाला उदाहरण, कि शिक्षक ने जो विधि बताई वो तो ठीक है। इतने दुस्साहसी हम नहीं हैं कि कहते हैं कि शिक्षक गलत है।
हम कभी ये नहीं कहते कि शिक्षक गलत है। हम कहते हैं, शिक्षक तो सही है पर हमारा भी तो कुछ ख़्याल करो ना। नहीं, हम भी तो कुछ हैं। थोड़ा बहुत "एक्सक्यूज़ मी, लिटिल बिट, एडजस्ट प्लीज़।" भारतीय रेलवे की आदत पड़ गई है, सीट किसी के लिए भी आरक्षित हो, तो थोड़ा सा हमारा "एक्सक्यूज़ मी, एक्सक्यूज़ मी थोड़ा सा एडजस्ट प्लीज़।" घुसे ही चले आते हैं, और सारा खेल ख़त्म।
सत्य बड़ा नाज़ुक जैसा होता है। अब मैं जो बोल रहा हूँ उससे समझ लीजिए — कुछ होता है, कुछ नहीं होता है — पर समझाने के लिए बोल रहा हूँ। उसके साथ इस तरह की धृष्टता करोगे तो वो पूरा ही हट जाता है। उसको आप ज़रा सा हटाओगे तो वो पूरा ही हट जाएगा। या तो उसको पूरी जगह दो, और उससे इतनी सी भी जगह लोगे तो पूरा ही हट जाएगा। और आप कहोगे "हमने क्या किया? "ही इज़ जस्ट बीइंग फिनिकी।”
हमने 99 तो उसको ही दिया था, हम थोड़ा सा “एक्सक्यूज़ मी, अ लिटिल बिट।" वो फिर कहता है "लिटिल बिट नहीं, तुम पूरे ही अपने चलो। हम पूरे ही हट जाते हैं।" बहुत नज़ाकत है उसमें। रहेगा तो पूरा रहेगा, नहीं तो अर्धसत्य जैसा कुछ नहीं होता कि थोड़ा-थोड़ा। और वही अर्धसत्य है, वो उम्मीद, वो आशा, जिसको तलाशती है माया। कहती है "नहीं, आप अपना रखिए, थोड़ा सा तो हमारा छोड़ दीजिए ना, थोड़ा सा। बाक़ी तो हम पूरी बात आपकी मानेंगे, थोड़ा तो हमारा चलने दीजिए ना।" ये जो ‘थोड़ा’ है — यही तुम्हें खा जाता है।
अहंकार को भी सत्य ऐसा नहीं है कि पूरी तरह बुरा ही लगता है। देखो ना, अहंकार भी जब एकदम अपनी ही हरकतों से पिट-पुट लेता है, दुखी हो लेता है, त्रस्त हो लेता है, तो आता तो सत्य की शरण में ही है ना। मंदिरों में वरना इतनी लंबी कतारें क्यों लगतीं? ध्यान केंद्र, योग केंद्र इतने क्यों प्रचलित होते? अहंकार को भी सत्य चाहिए। पर कितना? आधा-आधा। थोड़ा तुम्हारा, थोड़ा हमारा 50-50। वो माया है, अहंकार की आशा कि सत्य के साथ सहअस्तित्व संभव है।
सत्य बहुत काम का होता है अहंकार के लिए भी। जब अहंकार पिट लेता है तो राहत किससे मिलती है? फिर आ जाता है, कहता है "भजन सुना दो।" कोई गीता के सत्र ना सुन रहा हो — एक ही संभावना है, उसका सब अच्छा चल रहा है। और जब बहुत अच्छा चलने लगेगा तो वो अगले महीने रजिस्टर भी नहीं करेगा। जब पिटने लगता है दुनिया से, तो फिर यहाँ आता है। ऐसा नहीं कि अहंकार को सत्य से शत-प्रतिशत तकलीफ़ ही हो, नहीं। उसे सत्य चाहिए।
सत्य के बिना अहंकार जी ही नहीं सकता। अहंकार के जो लक्षण हैं, वो तो पिटने के ही हैं। तो दुनिया के पीछे भागता और फिर दुनिया से दुलत्ती भी खाता है। और जब दुलत्ती खाता है, तो किधर को आता है? वो सत्य की तरफ़ आता है। तो सत्य तो उसको चाहिए, लेकिन उतना ही जितना उसकी छोटी सी जेब में घुस जाए। बस उतना ही चाहिए। उससे ज़्यादा नहीं। उससे ज़्यादा मिलने लगता है तो फिर वो "गड़बड़ हो रही है"। समझ में आ रही है बात?
तो फिर वो क्या करता है? ये भी नहीं कर सकता कि दूर जा सके। और उसे अगर पूरा ही मिल गया तो उसकी जान निकल जाएगी। लोगों के गले दबते होंगे तो कोई कैसी-कसी आवाज़ निकालता होगा, अहंकार का गला दबता है तो बस एक ही आवाज़ आती है "क्या ऐं!"
तो दूर जा नहीं सकते, क्योंकि दूर जाएगा तो दुनिया के पीछे जाएगा, तो बहुत दुलत्ती खाएगा। तो फिर लौट-लौट के देखते नहीं, सेल्फ-हेल्प कितना बिकता है? ये क्या है? एक विकृत कोशिश ही है, किसी तरह से सत्य की जूठन चाटने की। और जितने विकृत रूप हैं धर्म के ये क्यों प्रचलित हैं? ये भी एक तरह की कोशिश है सत्य का किसी प्रकार का सान्निध्य पाने की। असली नहीं तो नकली ही सही, लेकिन आवश्यकता तो उसकी है। वो बिल्कुल ना हो तो अहंकार की हालत ख़राब हो जाती है। और पूरा मिल जाए — तो “ऐं" हो जाता है।
तो करें क्या?
एकदम ना मिले, तो दुनिया से दुलत्ती खाता है। और पूरा मिल जाए, तो "ऐं" हो जाता है। तो फिर वो क्या करता है? वो ये करता है कि "रहे भी" ताकि हमें ये कहने को हो, कि है। और ऐसे रखें कि उससे नुकसान भी ना हो। अहंकार के देखे तो सत्य नुकसान की ही चीज़ है ना, पर ऐसे रखो कि नुकसान भी ना हो।
तो फिर वो सत्य की परिधि पर जो कुछ होता है वो उसको चूमना, चाटना शुरू कर देता है। कि जैसे कोई मंदिर की दीवारों को चाट रहा हो, कि जैसे कोई श्लोक के मर्म को छोड़ कर के शब्दों को रट रहा हो, कि जैसे श्लोक में जब छ: बातें कही गई हों तो मूल को छोड़कर बाक़ी पाँच पर ध्यान दिया जा रहा हो, कि जैसे सोचा जा रहा हो कि सब श्लोकों में अलग-अलग बातें हैं और अलग-अलग बातों का जो एक साझा मूल है, उसकी उपेक्षा की जा रही हो। ये सब मात्र असावधानी या दुर्घटनावश नहीं होता, ये हमारी चाल होती है। कि हम ये कह भी दें कि हम सत्य के पास हैं, और सत्य के पास आने पर जो नुकसान होता है, माने जो कीमत चुकानी पड़ती है, वो कीमत भी न चुकानी पड़े।
हमने पढ़ी है गीता, और गीता का कोई ऐसा श्लोक और उसका कुछ ऐसा अर्थ उठा लाएँगे कि आप चौंक जाएँगे। आप कहेंगे — इस आदमी को पूरी गीता में ये बात मिली? और उसका उसने ये अर्थ निकाला? वो निकाल सकता है। अब वो अपने आपको गीता का प्रेमी भी बोल सकता है, गीता विज्ञ भी बोल सकता है, और गीता की जो कीमत चुकानी चाहिए थी, वो भी नहीं चुकानी पड़ी। है ना बढ़िया सौदा?
यही संशय है। संशय कोई दुर्घटना नहीं होती, संशय एक चालाकी होती है। और हम भी माफ़ कर देते हैं, दूसरों को भी और अपने आप को भी संशय के लिए। देखो, वहाँ माफ़ करना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा जहाँ कोई कहे कि "कृष्ण को छोड़कर मैं सात-आठ और चीज़ों की ओर जा रहा हूँ।" वहाँ तो हम बोल देंगे "नालायक है, अधर्मी है।" है ना?
कोई बोले "कृष्ण नहीं चाहिए, और चीज़ें चाहिए, इधर जा रहा हूँ, उधर जा रहा हूँ, दुनिया के जितने काम होते हैं, वो सब करने।" तो उनको तो हम बोल देते हैं "अधर्मी है।" वो अधर्मी तो पता नहीं कितना है, पर थोड़ा मासूम है। उसको ऐसा लग रहा था कि उसे श्रीकृष्ण नहीं चाहिए, तो उसने साफ़ बोल दिया कि "नहीं चाहिए।" उसने बोल दिया "मैं जा रहा हूँ फिल्म देखने मुझे नहीं गीता सत्र करना। मैं जा रहा हूँ फिल्म देखने।" उसने बोल दिया।
ज़्यादा गड़बड़ हुआ आदमी है, जो बैठकर सुन भी रहा है और इस तरीक़े से सुन रहा है कि कुछ सुनाई न पड़े। अब ये अपने आप को प्रमाणित करेगा कि "वो जो पिक्चर देखने गया है ना, मैं उससे श्रेष्ठ हूँ। अब मुझे हक़ मिल गया।" वो पिक्चर देख के आए, मैं लानतें भेजूँगा उस पे — "कलियुगी राक्षस! असुर! दानव! भ्रष्ट! दुष्ट! मूर्ख! तू चलचित्र देखकर आ रहा है और मैं अभी गीता का पाठ कर रहा था!" तो एक तो इसको ये मिल गया ज़बरदस्त अधिकार। और दूसरा, गीता का प्रेमी होने की जो कीमत चुकानी पड़ती है, वो इसने चुकाई नहीं। तो माने ये अधिकार भी इसने झूठमूठ ही मुफ़्त में लूट लिया। समझ में आ रही है बात?
पहले वाले को गीता नहीं चाहिए थी तो उसने स्थूल तरीक़ा अपनाया, वो बोला "मैं पिक्चर देखने जा रहा हूँ।" दूसरा, गीता नहीं चाहिए थी तो उसने सूक्ष्म तरीक़ा अपनाया। और ये जो सूक्ष्म वाला है, ये ज़्यादा गड़बड़ है। गड़बड़ पहले वाला भी है, स्थूल वाला भी — पर ये सूक्ष्म वाला ज़्यादा गड़बड़ है। बहुत ज़्यादा चालाक आदमी है। इसीलिए मैंने कहा कि जो स्थूल वाला है, वो थोड़ा मासूम है। ये जो दूसरा है सूक्ष्म वाला, ये ज़्यादा चालाक है। ये गीता सुनेगा, गीता पढ़ेगा, पर ऐसे पढ़ेगा कि मर्म से दूर रहे, बाक़ी इधर-उधर की चीज़ें पकड़ लेगा।
मर्म बस एक है, आत्म-अवलोकन के थ्रू आत्मअज्ञान को हटाओ। माध्यम क्या है? आत्म-अवलोकन। वो विधि है, वो मार्ग है, वो माध्यम है, वो साधन है। और उद्देश्य क्या है? आत्मअज्ञान को हटाना, आत्मज्ञान को हटाना भी नहीं है। आत्म-अज्ञान को जानना, जानने से स्वयं ही हट जाता है। इतनी सी बात है कुल। देखो ख़ुद को, और भीतर सब कीड़े ही बिलबिलाते नज़र आएँगे। बस इतनी सी बात है।
इस बात को छोड़कर के कहना कि गीता में तो और 100 बातें लिखी हुई हैं। गीता में बताया गया है कि क्षत्रिय धर्म का पालन कैसे करना है, गीता में बताया गया है कि किस मुहूर्त में कौन मरता है, तो उसकी आत्मा किस दिशा में प्रस्थान करती है। गीता में बताया गया है कि किस वर्ण को जीवन में कौन से काम, पेशे वग़ैरह अपनाने चाहिए। और कुल गीता की इतनी सी बात है, देखो अपने आप को। उस बात को छोड़कर कोई भी और बात करना, ये सूक्ष्म चालाकी है।
मैं कह रहा हूँ, ये सूक्ष्म चालाकी ज़्यादा ख़तरनाक है, उस चालाकी से या उस रुख से जहाँ कोई कहता है "गीता नहीं चाहिए, फिल्म देखनी है।" उसको कम से कम ये कहने का हक़ तो नहीं मिलेगा न कि "मैंने गीता पढ़ रखी है।" ज़्यादा ख़तरनाक वो हैं, जो गीता की बात करते हैं और गीता से कोसों दूर हैं। ये ज़्यादा ख़तरनाक है।
और हम भूल क्या करते हैं? मैंने कहा, हम ऐसों के प्रति थोड़ी सहानुभूति रख लेते हैं, चाहे वो दूसरा व्यक्ति हो, चाहे वो व्यक्ति हम ही हों। हम ऐसों के प्रति सहानुभूति रख लेते हैं। हम कहते हैं "जो भी है, जैसा भी है, पिक्चर देखने से तो अच्छा है न कि गीता सत्र सुन रहा था। नहीं, गीता का विकृत अर्थ करता है पर कम से कम गीता पढ़ता तो है, गीता की बात तो कर रहा है। तो ये उससे तो बेहतर है जो पिक्चर देखने चला गया था।”
मैं कह रहा हूँ — नहीं, बिल्कुल नहीं! ये ज़्यादा ख़तरनाक, ज़्यादा काईयाँ, ज़्यादा कुटिल आदमी है। वो जो पहला व्यक्ति है, जो गीता छोड़ के पिक्चर देखने चला गया, तो उसकी माफ़ी हो सकती है। उसको सचमुच लगता है कि पिक्चर में ज़्यादा कुछ है। जो दूसरा व्यक्ति है, कभी माफ़ नहीं किया जाना चाहिए, जो गीता के नाम पे न जाने क्या चला रहा है।
इसी तरह से जिन लोगों को धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, उनको एक बार माफ़ करा जा सकता है। पर जो लोग धर्म के क्षेत्र में घुसे हुए हैं, और धर्म के नाम पर न जाने कौन सी गंदगी फैला रहे हैं, इनको माफ़ नहीं किया जाना चाहिए। पर हमें ये लगता है कि "हैं तो ये भी धर्म के ही ना? थोड़ा भटक गए हैं, थोड़ा बहक गए हैं, थोड़ा जोश में, थोड़ा तैश में आ गए होंगे, कुछ बेहोशी छा गई होगी पर हैं तो धर्म के ही लोग, ना?"
नहीं! धर्म के लोग नहीं हैं। ज़्यादा गड़बड़ लोग हैं वो। ज़्यादा गड़बड़ आदमी कहाँ मिलेगा सबसे पहले? कहाँ मिलेगा? दर्पण में। हम ऐसे लोगों को बर्दाश्त इसीलिए करते हैं क्योंकि हम भी ऐसे ही हैं। यही संशय है।
दो तलों के संशय की हमने बात करी। पहला तल, सत्य की अपेक्षा संसार की विविधताओं को अपनाना, संशय हुआ। एक सत्य की अपेक्षा अनेक संसार को अपनाना, संशय हुआ — ये स्थूल है।
सूक्ष्म क्या है?
सत्य से संबंधित पारिधिक बातों को पकड़कर, सत्य के केंद्र को छोड़ना, संशय हुआ। पहले हमने क्या कहा? — अनेक संसार को पकड़ लिया, एक सत्य को छोड़ा, ये स्थूल संशय हुआ। और फिर सत्य की पारिधिक बातों को पकड़ लिया। "पारिधिक" माने — बाहरी, सतही, सुपरफिशियल। सत्य की बाहरी बातों को पकड़ लिया और सत्य के केंद्र को छोड़ दिया, ये सूक्ष्म संशय हुआ।
आत्मज्ञान वो मदर सेल है जिससे अध्यात्म का पूरा शरीर निर्मित हो जाएगा। अध्यात्म भी अपने आप में बहुत बड़ा शरीर है न। सब कुछ आता है उसमें।
जैन साधकों के पास जाओगे तो वो कभी कहेंगे "सही से निशाना लगा दो, निर्माण हो जाएगा। निशाना ऐसा लगाना कि निशानेबाज़ ना बचे, तो निर्वाण हो जाएगा।" कभी कहेंगे "चाय ऐसे पियो कि चाय पीने वाला ना बचे, निर्वाण हो जाएगा।" कभी कहेंगे "ताली ऐसे बजाओ कि एक हाथ से ही बच जाए, निर्वाण हो जाएगा।" एक तरफ़ ऐसा अध्यात्म है।
सूफ़ियों की तरफ़ जाओगे, वो कहेंगे "ऐसे मगन हो के गोल-गोल घूमो कि जैसे पृथ्वी गोल-गोल घूम रही है। कोई घुमाने वाला नहीं है, बस गोल-गोल घूम रही है। वैसे तुम भी बस गोल-गोल घूमने वाले बचो, कोई घुमाने वाला नहीं — तुम मुक्त हो गए।"
प्रेमियों के पास जाओगे, वो कहेंगे "ऐसा भजन करो, ऐसा भजन करो कि भजन बस शेष रहे, भजने वाला नहीं — तुम मुक्त हो गए।" ज्ञानियों के पास जाओगे, वो कहेंगे "जब ज्ञानी मिट गया, तो समझो कुछ ज्ञान हुआ। ज्ञानी जब तक है, तब तक कहीं कोई ज्ञान नहीं है।" समझ में आ रही है बात? कोई कहेगा "हमें एकांत में बैठना है।" कोई कहेगा "नहीं, सामूहिक कीर्तन होना चाहिए।" ये सब अध्यात्म का शरीर है।
जैसे शरीर में सब कुछ अलग-अलग होता है न, बताओ हाथ में और नाक में क्या समानता है? कोई समानता नहीं। ये तो बाहरी चीज़ें हैं फिर भी। आँत में और दाँत में क्या समानता है? किसी का आँत निकाल के दाँत में लगा दें, दाँत निकाल के आँत में लगा दें, तो बचेगा क्या? कितनी भिन्नता!
वैसे ही अध्यात्म का शरीर है, इसमें सब अलग-अलग हैं चीज़ें और उनमें बड़ी भिन्नता है। पर हमें शरीर से क्या मतलब? जो मूल बात है वो क्या है? वो जो स्रोत कोशिका है, वो जो पहली कोशिका है, उसका क्या नाम है? — आत्मज्ञान। वो आत्मज्ञान है, तो भजन सार्थक है। वो आत्मज्ञान है, तो ध्यान सार्थक है। वो आत्मज्ञान है, तो प्रेम सार्थक है। वो आत्मज्ञान है, तो सब कुछ सार्थक है। वो आत्मज्ञान नहीं है, तो अध्यात्म का पूरा शरीर निर्जीव है।
हमने कहा न, आत्मज्ञान वो है जो अध्यात्म की सभी विधियों की प्राण-प्रतिष्ठा करता है। आत्मज्ञान नहीं है तो सब विधियाँ मुर्दा हैं, पूरा शरीर निर्जीव है। प्राण नहीं है तो बताओ, शरीर में जीवन कहाँ है? है कहीं? तो आत्मज्ञान प्राण जैसा है शरीर में। प्राण नहीं तो ऐसे कहोगे — "नाक में प्राण है अभी, वैसे तो मर चुके हैं लेकिन कान फड़फड़ा रहे हैं।" ऐसा हो सकता है? हो सकता है?
तो आत्मज्ञान नहीं है तो आपको जो विधि लगानी हो, आप लगाइए। तमाम तरह की विधियाँ, कुछ विधियाँ हैं जिनमें सफ़ाई का बड़ा महत्त्व है, और कुछ ऐसे हैं जो श्मशान में जाकर बैठ जाते हैं। सब अलग-अलग तरीक़े की बातें हैं। ठीक वैसे ही जैसे शरीर में कुछ अंग ऐसे हैं जो एकदम साफ़ रहते हैं — क्या बात है, माथा! — और कुछ ऐसे हैं जो गंदे ही गंदे, पर है वो सब शरीर का मामला। सब शरीर ही शरीर है। वैसे ही कोई श्मशान वाला है, और कोई स्वच्छ जगह वाला। कोई कुछ कर रहा है।
कुछ कहते हैं "बिल्कुल, एकदम शाम ढले सो जाओ।" और कुछ कहते हैं "रात्रि जागरण होगा तभी मजा आएगा।" ये सब शरीर की बातें हैं। पूरा शरीर अनुप्राणित हो जाएगा अगर आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान है तो जैसे शरीर में अनंत कोशिकाएँ होती हैं न, वैसे अनंत विधियाँ निकल आएँगी। ये भी नहीं कि 20, 40, 10 दर्जन, 200 — इतनी विधियाँ हो सकती हैं। आत्मज्ञान है तो प्रतिपल एक नई विधि स्वतः स्फूर्त खड़ी हो जाएगी।
आत्मज्ञान नहीं है तो फिर कहते रहो कि "फलाना ग्रंथ है, उसमें ध्यान की 112 विधियाँ बताई गई हैं।" 112 बहुत छोटा आँकड़ा है। जीवन में कितने पल होते हैं? हर पल एक नया प्रश्न होता है, जो एक नया उत्तर माँगता है। हर उत्तर एक नई विधि होगा। वो विधि कहाँ से लाओगे? वो विधि तभी आ सकती है जब प्राण है। आत्म-ज्ञान ही प्राण है। वो है तो सब विधियों में जीवन आ जाएगा। नहीं तो ऐसे ही यांत्रिक तरीक़े से विधि लगाते रहो, ऐसे चेष्टा करो, फलानी किताब पढ़ो, उससे कुछ होना नहीं है।
न जाने कितने ज्ञानी घूम रहे हैं, जिन्हें आत्मज्ञान नहीं है। तो क्या हो जाएगा? ज्ञान मार्ग कुछ नहीं होता। ज्ञानियों से ज़्यादा स्वयं को ले भ्रम में शायद ही कोई होता हो। क्योंकि ज्ञानियों को लगता है "हमने पढ़ ली हैं 70 किताबें, तो काम हो गया।" 70 किताबें, सब किताब में जो लिखा है — अविद्या है। ऊँची से ऊँची किताब में जो लिखा है, वो भी अविद्या है। अविद्या को विद्या तो आत्मज्ञान बनाता है।
हाँ, किताब में जो लिखा है, वो बात बहुत ऊँची है। पर बात ऊँची होगी, तुम्हारे लिए तो तब ऊँची बनेगी न, जब उस बात का तुमसे रिश्ता बने। और रिश्ता तभी बन सकता है जब तुम स्वयं को जानते हो, वो आत्म-ज्ञान है स्वयं को जानना।
आपको ये तो नहीं भ्रम था न कि किताबें दो तरह की होती हैं कुछ विद्या वाली, कुछ अविद्या वाली? ऐसा तो था? कि जो विज्ञान की किताब है, विज्ञान माने साइंस — वो अविद्या की किताब है, और जो अध्यात्म की किताब है — वो विद्या की किताब है? नहीं! उपनिषद् स्वयं कहते हैं कि "हम भी अविद्या हैं।" पर वो विशेष तरह की अविद्या है, वो ऐसी अविद्या है जो तुम्हें प्रेरित करती है विद्या की तरफ़ जाने को।
विद्या किसी किताब में लिखी नहीं जा सकती। ठीक वैसे जैसे आत्मज्ञान कोई चीज़ नहीं है जिसको किसी किताब में लिखा जा सकता हो। वो एक डायनेमिक बात है। जो चीज़ डायनामिक है, वो किताब में छप कैसे जाएगी? डायनामिक माने जिसका जीवन मात्र एक पल का है, जो गतिशील है, जो प्रवाहमान है। उसको कैसे पकड़ लोगे?
जब तक किताब में लिखोगे, तब तक वो आगे बह जाएगा। आत्मज्ञान माने जो हो रहा है, उसको देखना। जो हो रहा है उसको कैसे देखो? क्या, कैसे पकड़ोगे? फोटो खींचोगे उसकी? फोटो खींचोगे तो जब तक फोटो खींची, तब तक निकल गया। आत्मज्ञान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो किसी किताब-किताब में पढ़ लोगे। ईमानदारी से, कीमत चुका करके स्वयं को देखना पड़ता है।
कीमत क्या है? स्वयं को देखोगे तो अच्छा नहीं लगेगा, यही कीमत है। जो भी ख़ुद को देखेगा, घिना जाएगा…। ये “ऐं” नहीं था ध्वनियाँ पकड़ना सीखो, ये मंत्र है। ये क्या था? ब..!
हम अपने आप को मानते हैं कि साफ़, स्वच्छ, निर्मल हैं एकदम! और ख़ुद को देखोगे तो अच्छा तो नहीं लगेगा, ठीक वैसे ही जैसे कई बार सुबह-सुबह घिन आती है कि "सपने में क्या देख रहे थे?" और जो तुम देख रहे थे किसी और ने तो दिखाया नहीं, कहाँ से निकला? सपने में जो चीज़ है, वो कहाँ से आ रही है? रात के सपने में वहीं से आता है जहाँ सुबह-सुबह शौचालय में आता है। सब भीतर से ही आता है अपने। और कुछ बहुत हसीन तो नहीं आता कि आता है।
आत्मज्ञान का मतलब है, देख लेना कि ऊपर-ऊपर तो ठीक है थोड़ा चमक रहा है मामला। अंदर सपने ही जैसा, शौच भरा हुआ है। यही अहंकार है, अपने आप को ऐसा मानना जो तुम हो नहीं। हम अपने आप को जो भी मानते हैं, हम उससे बहुत ज़्यादा सड़े-गले, गलीच, जाहिल ही हैं। आ रही है बात समझ में? और ये मानना अच्छा नहीं लगता। अध्यात्म का क्षेत्र इसलिए नहीं है कि तुमको सुगंधित और सुशोभित करके कह दे कि "तुम महान, दिव्य, पवित्र, पावन आत्मा हो।" ये अध्यात्म का काम नहीं है। हमने यही बना दिया है।
आध्यात्मिक आदमी को बिल्कुल यही, सबसे पहले तो जो आध्यात्मिक हो जाता है उसको "जी" बोलना शुरू कर देते हैं — फलाने जी! अरे! काहे का जी? जिसको देखो सब "जी" हैं? साधारण आदमी को भले "जी" न बोलो, किसी को जान लो कि "ये जाया करता है हफ़्ते में दो बार मंदिर," तो "जी" हो जाता है। अध्यात्म का काम ये थोड़ी है कि तुम्हें और इज़्ज़तदार बना दे। अध्यात्म का काम है तुम्हें दिखा दे कि तुम कितने बेइज़्ज़त आदमी हो। आत्मज्ञान में यही जाना जाता है। इसीलिए आध्यात्मिक आदमी का विनोद प्रिय होना, हास्यप्रिय होना, विटी होना, ह्यूमरस होना — बहुत ज़रूरी है। नहीं तो इतना घिनाओगे कि जी नहीं पाओगे।
तरीक़ा बस एक है, जैसे ही दिखाई दे अपना अगला झुनूपना तुरंत हँसने लग जाओ। डिसऑन कर दो। कह दो — "हम हैं ही नहीं।" हँसो उसके ऊपर। समझ में आ रही है बात? वो लोग कहते हैं "ओ, यू आर ग्लोरियस!" तुम बोलो "नो, आइ एम हिलेरियस!" वो ग्लोरी-ग्लोरी से नीचे नहीं उतर रहे — इसकी ग्लोरी, उसकी ग्लोरी — काहे की ग्लोरी? आत्मज्ञान माने,अपने आप को हिलेरियस (हास्यास्पद)। अपने आप को हास्यास्पद जान लेना। मुझ पर सिर्फ़ हँसा जा सकता है। और जो अहर्निश स्वयं पर हँसना शुरू कर दे, लगभग समझ लो — मुक्त ही हो गया।
यही जो हँसी है अपनी मूर्खता पर भी, अपने दुख पर भी, यही आनंद कहलाती है। अहम् तुम्हारी गंभीरता पर पलता है। "ऐं, हम भी कुछ हैं!" ठीक है न, "ऐं" और "हैं" कैसे तुकांत हैं, "हैं" माने अस्तित्व — आई एम। किसी को भी इज़्ज़त दे लेना, ख़ुद को मत देना किसी हालत में। और लोक संस्कृति ऐसी है कि उसने जुमला उछाल रखा है, स्वाभिमान। स्व-अभिमान। कैसे बचेगा ये समाज, किसको होने वाली मुक्ति? जब तक स्वाभिमान बड़ा ऊँचा शब्द है। इससे पागल शब्द कोई हो सकता है? स्वाभिमान!
आप लोग यहाँ आ गए हो तो चलो जो स्थूल माया है, उससे छूटने का तो कुछ प्रयास कर ही रहे हो। नहीं तो यहाँ नहीं बैठे होते। खिचड़ी-उचड़ी खा के जो भी है, दाल-तोरई पका के बढ़िया सो गए होते। कई तो सो ही रहे होंगे। स्क्रीन चलती रहती है, सोते रहते हैं। तो स्थूल माया से तो कुछ बचे हो। आप सब फँसोगे, फँसे हुए हो सूक्ष्म माया में। सूक्ष्म माया क्या होती है?कि बहुत कुछ सोच लेना कि है अध्यात्म में। बहुत कुछ नहीं है अगर बहुत कुछ है तो संशय है।
बहुत कुछ नहीं है, सिर्फ़ "मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ!" "मैं" के अलावा अध्यात्म में किसी की बात नहीं है। बाकी सब प्रपंच है। भयानक माया है। बहुत बुरा फँसोगे। जब पूर्णिमा की रात को पीपल से गिरता हुआ शहद का बूँद तुम चाटते हो ना, धर्म के नाम पर कहीं का नहीं छोड़ेगा! हम पगला जाते हैं बिल्कुल। पूर्णिमा आ जाए, अमावस्या आ जाए — महीने में ज़्यादा नहीं, 30-40 तो ऐसे दिन आते ही हैं। कम से कम 30 दिन महीने में ऐसे होते हैं, जो हमारे पगलाने के लिए ही आरक्षित रखे गए हैं। कई बार महीने में 40-50 भी ऐसे दिन होते हैं।
और वो सब क्या कहलाता है? धर्म! अरे दिन और दिन में अंतर होता है क्या? पागल! रात और रात में कोई अंतर होता है? किसने तुमसे कह दिया कि सूरज और पृथ्वी ये सब सत्य हैं? दिन माने क्या? एक गोला घूम रहा है। उस गोले पर तुम एक चींटी की तरह कहीं चिपके हो। चींटी तो बहुत बड़ी होती है, धूल के एकदम नैनो पार्टिकल की तरह कहीं चिपके हुए हो। वो गोला घूमते हुए दूसरे गोले के सामने आ गया, तुम कह देते हो "दिन हो गया।" और तुम कहते हो "अरे कितनी बड़ी बात हो गई! सूर्यदेव उदित हुए हैं!"
सूर्य देव क्या उदित हुए? गोला खड़ा हुआ है। इतना क्या पगला रहे हो? और जैसे तुम घूम रहे हो, वैसे गोला भी घूम रहा है। और एक दिन वो गोला बुझ जाएगा। क्या सूर्य देव? ये सब धर्म नहीं होता।
हाँ पृथ्वी पर तुम्हारा जो शारीरिक जीवन है, उसकी सारी शक्ति, सारी ऊर्जा उसी बड़े गोले से आ रही है। इस नाते तुम्हारे मन में उसके लिए कोई स्थान हो, तो अलग बात है — पर कोई परालौकिक बात नहीं है। सूरज है, समझ में आ रही बात? तो कुछ तो वे पगले जो धर्म से दूर हैं, इसलिए माया में फंसे हैं। कुछ वो, जो धर्म के भीतर हैं और इधर-उधर की बातों में फंसे हुए हैं। इधर-उधर की बातें ही सब संशय हैं। ज़्यादा दुर्गति उनकी है जो धर्म में आकर भी धर्म की पारिधिक, बाहरी बातों में फँस गए। धर्म के केंद्र को पकड़ो! धर्म के केंद्र को पकड़ो! नहीं तो वही होगा—
"मोटी माया सब तज़ें, झीनी तजी ना जाय। पीर पैगंबर औलिया, झीनी सबको खाय।"
मोटी माया संसारी को खाती है, और झीनी माया गीता के प्रतिभागियों को। उनको लगता है बिल्कुल पकड़ ही लिया। कोई भी श्लोक आपको समझ में नहीं आया है, अगर उसमें आपको "मैं" नहीं सुनाई दे रहा तो, ये कसौटी है जाँच लीजिएगा।
जब तक श्लोक सिर्फ़ श्रीकृष्ण का है — बहुत ऊँचा है, पर आपके काम का नहीं है। जिस क्षण उस श्लोक का "मैं" से रिश्ता बैठ गया, वो श्लोक अब आपके लिए कुछ हुआ। श्लोक में "मैं" सुनाई दे रहा है कि नहीं सुनाई दे रहा है? और "मैं" नहीं है, तो फिर "ऐं।" "मैं” है तो आपके लिए कुछ अर्थ है। और नहीं, तो फिर होगी बहुत ऊँची बात, "आत्म, आत्म, आत्म... मैं, मैं!" रिश्ता यहाँ से बैठना चाहिए। कोई बाहरी सिद्धांतों का खेल नहीं है ना अध्यात्म — कि "ऐसा हो जाए तो वैसा हो जाता है," फिर "ऐसा हो जाए।"