दुनिया भी चाहिए, श्रीकृष्ण भी चाहिए? ये सौदा वहाँ नहीं चलता

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
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आचार्य प्रशांत: कई बातें कह रहे हैं श्रीकृष्ण यहाँ पर — श्रीमद्भगवद्गीता, चौथा अध्याय, 42वाँ श्लोक, और कई बातों में एक बात ये है कि संशय को काटो। और रोचक बात ये है कि जब कई बातें होती हैं, तो संशय हो जाता है। कई बातें कह रहे हैं श्रीकृष्ण। कई बातों में एक बात है कि संशय को काटो। लेकिन अगर संशय को काटने के लिए भी कई बातें कही जाएँगी, तो संशय हो जाएगा।
तो जो धर्म का क्षेत्र है, वो जाने-अनजाने इस तरह के संशयों का भी बहुत शिकार हुआ है। कैसे संशय? कि संशय को काटने के लिए बहुत सारी बातें कह दी गईं। उन बहुत सारी बातों से ही संशय हो गया। बहुत सारी बातें क्यों कह क्यों दी गईं? क्योंकि संशय को काटना बहुत ज़रूरी था। क्योंकि संशय को काटने के बाद जो शेष रहता है, वो प्यारा इतना होता है कि आप संशय को काटने के लिए हर दिशा से प्रयत्न करते हो। कुछ बात इधर से कहते हो, कुछ उधर से कहते हो, कुछ कहीं से, कुछ कहीं से।
दर्जनों तरह की तो समाधियाँ हैं। नए-पुराने मिलाकर के 50 से ज़्यादा प्रकार के योग हो रहे हैं, और ऐसा नहीं कि समाधि की या योग की — ज्ञान के भी बहुत प्रकार हो गए। प्रेम के न जाने कितने प्रकारों का उल्लेख आ जाता है आध्यात्मिक साहित्य में। और ऐसा नहीं कि वो सब बातें इसलिए कही गईं ताकि आप उलझ जाएँ और आपको संशय हो जाए। उन सब बातों का कहा जाना वैसा ही है जैसे कोई वैश्विक महामारी हो, तो उससे निपटने के लिए छोटे-बड़े सब देश, सब प्रयोगशालाएँ, सब प्रांत, सब शहर अपने-अपने स्तर पर प्रयोग कर रहे हों।









