छल कपट वाले व्यवसाय में काम करने की मजबूरी || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिस व्यवसाय में हूँ, मैं जानता हूँ कि इस व्यवसाय में छलकपट, झूठ बड़ी आम बात है। परंतु ये जानने के बावज़ूद भी जो बेहतर से बेहतर मैं कर पा रहा हूँ वो ये है कि मैं इस काम को पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ।
चालीस वर्षीय उम्र के इस दौर में क्या मैं कोई काम कर नहीं सकता या फिर ये मेरा अतीत है जो मुझे इसी काम को तोड़-मरोड़ कर ठीक से करने पर मजबूर कर रहा है। क्या मुझे इस स्थिति में इसी कार्य को बेहतर से बेहतर तरीके से करते रहना चाहिए? या फिर मूलभूत रूप से रास्ता ही बदल देना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: ये ऐसा-सा है जैसे कि आप मुझसे पूछें कि आचार्य जी, क्या क ख से बड़ा है? इज़ एक्स ग्रेटर दैन वाई? आचार्य जी, बताइए। इज़ एक्स ग्रेटर दैन वाई? मैं कहूँगा मुझे क्या पता? एक्स भी तुम्हारा और वाई भी तुम्हारा—किनका है, भाई एक्स वाई ये? मैं कैसे बता दूँ? अब एक तरफ़ आपका संकल्प है कि नया जीवन चाहिए, ऐसा काम नहीं करना जिसमें छल-कपट करना है। और दूसरी तरफ़ सुविधाएँ हैं, धारणाएँ है, एक आलस है, एक प्रमाद है और संशय है, और भय है।
तो एक तरफ़ क है, एक तरफ ख है। इन दोनों में से जो वजनी होगा वो जीत जाएगा। आचार्य जी क्या बताएँगे? हाँ, वो इतना बता सकते हैं कि किसको जीतना चाहिए धर्म की दृष्टि में। मैं ये बिलकुल नहीं बता पाऊँगा कि क बड़ा है या ख? लेकिन मैं ये ज़रूर बता सकता हूँ कि दोनों में से कौन बड़ा होगा तो आप आनंदित रहेंगे? ‘कौन बड़ा है’ वो तो आप जानिए। क्योंकि दोनों किसके हैं? आपके हैं।
एक्स भी आपका है और वाई भी आपका है। मुक्ति का संकल्प भी आपका है और बंधन भी सब जो हैं वो आपके हैं। अब आपकी मुक्ति के संकल्प में कितनी जान है, वो आपको तय करना है। और आपने जो बंधन पकड़ रखे हैं उनसे आपकी कितनी आसक्ति है, वो भी आपको तय करना है।



