प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब आप बोलते हो कि शुरुआत होगी तथ्य से, तो तथ्यों को देखना हैं, अब हर समय ऐसे तथ्यों को दूर ही से नहीं देखा जाता। जैसे अतीत है तो अतीत में भी उन तथ्यों के पास जाकर क्योंकि वो वहाँ लगातार हो रहे हैं तो उससे पता चल जाता है कि क्या मन में पहले से ही चलता आ रहा है। तो रिस्पॉन्सिबिलिटी लेनी है उस चीज़ की कि घिनौने-से-घिनौने तथ्य हैं मन के, बुरे-से-बुरे तथ्य हैं। तो उनके पास जाने में और उनकी रिस्पॉन्सिबिलिटी लेना मन की खुजली सा है या फिर वो सही है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो अच्छी बात है कि तुम्हें रिस्पॉन्सिबिलिटी लेनी है पर इसका, रिस्पॉन्सिबिलिटी का अर्थ क्या है तुम्हारे लिए? किस तुम कर्तव्य की बात कर रहे हो?
प्र: कि उसको जानकर जैसे मन ने...
आचार्य: उसके बाद कुछ नहीं और होता। उसको जानकर कुछ और नहीं करना है, बस जानना बहुत होता है। ये सूक्ष्म बात है इसको समझ लो। कुछ होगा भीतर घिनौना, बस उसे जानना है। और ये मुश्किल है, मैं बोल दूँ 'जानकर के उसका दमन करना है', वो आसान हो जाएगा तुम्हारे लिए क्योंकि दमन कर के तुम अपनेआप को हरी झंडी दे दोगे कि मैं तो अच्छा आदमी हूंँ, मेरे भीतर कोई घिनौनी चीज़ थी, मैंने तत्काल उसे घिनौना घोषित कर दिया। नहीं, ये तुम बहुत सस्ते में बच निकलना चाहते हो, खुद घोषित कर दिया या आचार्य जी के पास आ गये, 'आचार्य जी, आज न मैंने बहुत बुरी बात सोची’, क्या? ‘मैंने आपका गला काट दिया।’ ये तो तुम बहुत सस्ते में बच निकले, तुम्हें लग रहा है कि तुमने मुझे आकर के बता दिया, तुम्हारा काम हो गया। नहीं, उससे नहीं हो गया। तुम्हें जानकर के रुक जाना है, मैं छुपाने की बात नहीं कर रहा हूंँ।
चीज़ सूक्ष्म है, समझना पड़ेगा तुमको। तुम्हें जानकर के रुक जाना है। जिस चीज़ को जाना उसकी प्रतिक्रिया में अगर तुमने करा तो तुमने उसी चीज़ को बढ़ा दिया। किसी भी चीज़ की प्रतिक्रिया, किसी भी चीज़ के प्रति क्रिया, उस चीज़ के प्रति क्रिया, उस चीज़ को ही बढ़ा देती है। मैं आन्तरिक जगत की बात कर रहा हूंँ, ये जान लेना है।




