मेले, उत्सव, पार्टियाँ - इनमें एक खास चीज़ देखी कि नहीं? || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर पल-पल अपनेआप को देख रही थी कि मैं किस चीज़ से आकर्षित हो रही हूँ, क्या चीज़ें मुझे दिख रही हैं। लेकिन कभी भी ये प्रतीत नहीं हो पाता कि ये सब झूठ है। अगर जैसे देह में दर्द हो रहा है, तो उस वक्त तो सत्य वही बन जाती है कि वो दर्द ही सत्य बन जाता है।
तो ये बार-बार बार कहना कि माया झूठ है, और क्षण-भंगुर है, हमारी स्थिति जो भी हो सब झूठ है, ये सुनने में जितना आसान लगता है; प्रतिदिन के व्यवहार में बिलकुल भी नहीं लगता क्योंकि जिस माहौल में हम होते हैं इन्द्रियाँ उसी माहौल में बहुत आसानी से बह जाती हैं। और बहने के हिसाब से ही वो उसी चीज़ को पूरा सत्य मान लेती हैं। फिर लगता है कि हाँ, माया तो झूठ है लेकिन उस पल में नहीं लग पा रहा है ये कि वो झूठ है। तो मुझे ये समझ ही नहीं आ पा रहा है शायद आज तक भी कि माया को झूठ कहना, ये झूठ वास्तव में होता है क्या है?
आचार्य प्रशांत: मेले में आपने कुछ खिलाया भी होगा बच्चों को? मेले में बिक रहा था तो दिखने में अच्छा लग रहा होगा वो?
प्र: हाँ जी, हाँ जी।
आचार्य: उसका बच्चों की सेहत पर असर क्या पड़ेगा?
प्र: कुछ ख़ास नहीं। मतलब ख़राब।





