आचार्य प्रशांत: ये इन सबको रीयल! (वास्तविक) क्योंकि अनरीयल (अवास्तविक) कैसे बोलोगे! भई, तुम जिसे अनरीयल बोलते हो, किस आधार पर बोलते हो? कुछ भी तुम अनरीयल कैसे बोलते हो?
प्रश्नकर्ता: जो इमैजिनेशन (कल्पना) है।
आचार्य प्रशांत: इमैजिनेशन का पैमाना क्या होता है? आप कह रहे हैं कि जो काल्पनिक है उसे आप अनरीयल, अवास्तविक बोल देते हैं। कल्पना कैसे जानते हो कि कल्पना है? क्या जब कल्पना में होते हो, तो कह पाते हो, ‘कल्पना है!’ तो कुछ काल्पनिक है ये भी तभी पता चलता है न जब कल्पना टूटती है। मतलब कल्पना की परिभाषा ही यही है कि वो सब कुछ काल्पनिक है जो खत्म हो जाये। तो ये (सामने पहाड़ की ओर इशारा करते हुए) भी फिर क्या है? काल्पनिक है! और तुम भी फिर क्या हो?
श्रोतागण: काल्पनिक।
आचार्य: तो या तो सब कुछ अवास्तविक बोलो, अनरीयल! या सब कुछ ही रीयल (वास्तविक) बोल दो। पर चूँकि तुम अपनेआप को क्या बोलते हो? रीयल! तो फिर ठीक है! हम यही कह देते हैं कि ये सब रीयल है। पर यदि ये सब रीयल है तो याद रखना कि तुम्हारी कल्पनाएँ भी....




