आचार्य प्रशांत: किसी मुर्दे को आज तक बीमार पड़ते देखा है तो इसका क्या अर्थ है? बीमारी कहाँ से उठती हैं? प्राणों से उठती है। बीमारी प्राण का सन्देश है तुम्हें, कुछ गलत हो रहा है। बीमारी प्राण का सन्देश है कि करीब आओ, मेरे पास रहो, मेरे जैसे हो जाओ, नित स्वभाव में जियो।
बीमारी के करीब जाओ, उसका तिरस्कार मत करो, उसको गलत मत मानो, उसको भ्रम मत बोलो, उसको मिथ्या मत बोलो, उसे झूठ मत बोलो, उसे नहीं है मत बोलो। उसके पास जाओ। वो तुम्हें कहीं को ले जाना चाहती है।
श्रोता: मुझे लगता है कि जैसे जितनी भी चीज़ें हो गयीं जैसे, गुस्सा, ईर्ष्या या सेक्शुअलिटी (कामुकता)। इन सब चीज़ों को जब हमें कन्डिशनिंग (संस्कार) के द्वारा पता चलता है कि ये ऐसी हैं, हमें एक विशेष व्यवहार बता दिया जाता है कि ऐसे व्यवहार करना है, विरोध करना है जो करना है।
तो कहीं-न-कहीं मन में हो जाता है कि हम उन्हें जानते हैं। हमें पता है कि ये ए-टू-बी फ़ॉर्मूला है, इसके तहत इन पर काम करना है। और ये जब हमें लगता है कि हम उन्हें जानते हैं तब हम उनसे खेल नहीं पाते हैं। उनसे एक बातचीत नहीं कर पाते हैं, मतलब एक बात नहीं कर पाते हैं। और वो बहुत फ़ियरफ़ुल (भयभीत करने वाला) हो जाता है एक तरीके से।
आचार्य: कब तक नहीं जाओगे उसके पास, कब तक डरे हुए ही रहोगे। जब तक ये मानोगे कि दुनिया में कोई वैकल्पिक सत्ता चल रही है। एक बार ये बात गहरे बैठ जाए कि एक ही सत्ता है जो चल रही है। तो उसके बाद अब डरने की ज़रुरत किससे है? ये बता दो।
श्रोता १:







