मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।
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माया दो प्रकार की, जो जाने सो खाए। एक मिलावे राम से, दूजी नरक ले जाए।।
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: माया क्या है? जहाँ कहीं भी मन जाकर बैठ जाए, उसका नाम माया है। कुछ चीज़ों को बहुत स्पष्ट समझा करिए। उसमें जटिलता की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि बात बिल्कुल सीधी है, उसे लाग-लपेट के बिना बोलिए।
माया क्या? जो ही मन को आकर्षित करे, वो माया। वो किसी भी कारण आकर्षित कर सकती है। वो ऐसे भी आकर्षित कर सकती है कि लुभावनी लग रही है, और ऐसे भी आकर्षित कर सकती है कि डरावनी लग रही है। दोनों में आकर्षण है। लोभ में भी आकर्षण है और डर में भी आकर्षण है, मन जाकर बैठता है वहाँ बार-बार। आपको कुछ प्रिय लगता है, आप सोचोगे उसके बारे में और आपको कुछ भयाक्रान्त करता है, आप उसके बारे में भी सोचोगे। आप दोस्त के बारे में भी सोचोगे और दुश्मन के बारे में भी सोचोगे। दोनों क्या हुए?







