प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जहाँ से मैं आती हूँ उस समाज में जनमानस के बीच ऐसी धारणा हैं कि एक स्त्री को पुरुष की अधीनता में रहकर जीना चाहिए। स्त्री के अस्तित्व को पूरे तरीक़े से एक कोने में रख दिया जाता है। यह समझा जाता है कि जैसे वह कुछ है ही नहीं, कोई महत्व ही नहीं है उसका। मेरे मन में ये सवाल उठता है कि स्त्री को लेकर यह सब लिखा कहाँ है। फिर देखती हूँ कि धार्मिक प्रवचनों में तो ऐसा ही बताया जाता है कि स्त्री को जब तक मातृत्व प्राप्त न हो तब तक वो संपूर्ण नहीं है।
मैं भगवद्गीता पढ़ती हूँ, परंतु उसमें तो ऐसा कहीं नहीं लिखा है। हो सकता है किन्हीं अन्य शास्त्रों में ऐसा कुछ लिखा हो, मुझे उनसब की उतनी जानकारी नहीं है। तो मैं यही जानना चाहती हूँ कि कहाँ से यह चीज़ धार्मिक प्रवचनों में आ गई। किसी भी शास्त्र में ऐसा कैसे लिखा हो सकता है? हमारे ऋषि-मुनि कैसे ऐसी बात कह सकते हैं स्त्री के बारे में? क्योंकि एक स्त्री भी तो वैसा ही सामान्य जीवन जीना चाहती है जैसे कोई पुरुष। और अगर ऐसा कहीं लिखा नहीं है तो कैसे ये चीज़ें इतने लंबे समय से चली आ रही हैं?
आचार्य प्रशांत: सनातन धर्मी हैं आप, जिनको आम भाषा में हिंदू कहा जाता है। सनातन धर्म वैदिक मूल का है इसीलिए हिंदू-धर्म को वैदिक-धर्म भी कहा जाता है। आस्तिक का मतलब ही होता है जो वेदों में आस्था रखता हो। आस्तिक माने कौन? जो वेदों में आस्था रखता हो।
भारत में धर्म की, दर्शन की कुछ ऐसी शाखाएँ भी निकली, जो वेदों में आस्था नहीं रखती थी। उन्होंने भी धर्म को बड़ा योगदान दिया। पर अधिकांशतः बहुसंख्यक हिंदू वही हैं जो वेदों में आस्था रखते हैं। तो श्रुति माने क्या? वेद और मात्र वेद। वेदों का शिखर है वेदांत। वेदांत वेदों से अलग नहीं है। वेदों के ही उत्कृष्टतम, स्वर्णिम शिखर को, अंत को, ऊँचाई को वेदांत कहा जाता है, और वेदांत माने उपनिषद्।
आपने कहा कि आपने बहुत शास्त्र पढ़े नहीं हैं; बहुत शास्त्र पढ़ने की ज़रूरत भी होती नहीं है। भगवद्गीता का नाम आपने लिया ही। उसके अतिरिक्त ग्यारह प्रमुख उपनिषद् और कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपनिषद् अगर आपने पढ़े हैं, तो आप सब जान गईं वैदिक धर्म के बारे में। उससे ज़्यादा कुछ जानना ही नहीं है। ऋषियों ने बड़े संक्षेप में सूत्र दे दिए हैं। लंबी-चौड़ी कोई पढ़ाई करनी ही नहीं है। मोटे-मोटे ग्रंथों को देखकर के आतंकित होने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। उपनिषद् अति लघु आकार के होते हैं — बीस श्लोक, चालीस श्लोक, अस्सी-सौ श्लोक। दो पन्ने, चार पन्ने, दस पन्ने, बीस पन्ने इससे ज़्यादा नहीं; बहुत ज़्यादा हुआ तो पचास-सौ पृष्ठ। बहुत सारे उपनिषद् हैं जो पाँच पृष्ठों से भी कम के हैं और उन्हीं में धर्म का सार निहित है।




