प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ‘परमात्मा तत्व’ का मतलब क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: कोई उसका मतलब होता नहीं, उसका मतलब नहीं पूछना चाहिए। हम जिन मतलबों में घिरे रहते हैं, उनकी सच्चाई जाननी चाहिए। ‘परमात्मा तत्व’ कोई साधारण, सामान्य तत्व नहीं है, वो कोई तत्व ही नहीं है। तो उसके विषय में आप जब भी जिज्ञासा करेंगे तो उत्तर यही मिलेगा कि आप जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं और जिन चीज़ों में लिप्त हैं उसकी खोजबीन करिए, उस पर ध्यान दीजिए।
सत्य या परमात्मा, इनका पता चलना कोई आवश्यक नहीं है। मैं और दो-टूक कहूँ तो सम्भव ही नहीं है, आवश्यक तो दूर की बात होती है। सम्भव और आवश्यक दोनों क्या है? जो बने बैठे हैं, जैसे जी रहे हैं, उस पर ईमानदारी से ग़ौर करना। ‘परमात्मा तत्व’ इत्यादि की ज़्यादा बात करेंगे तो कल्पना करना शुरू कर देंगे। ऐसा होता है, वैसा होता है, बहुत सारी बातचीत, क़िस्से-कहानियाँ। कहानियाँ तो कहानियाँ हैं। आप अगर कहानियाँ ही बनाना चाहते हैं तो कितनी भी बना सकते हैं। हम कहानियाँ बनायें या जैसा जीवन जी रहे हैं उसकी हक़ीक़त का सामना करें? कहानियाँ चाहिए या सच्चाई, कहिए?
और ख़ेद की बात ये है कि बहुत बार तो परमात्मा इत्यादि की बात की ही इसलिए जाती है ताकि जीवन की सच्चाई का सामना न करना पड़े। जीवन जैसा है, किसके लिए? हमारे लिए, वैसा नहीं जैसा किसी किताब में लिखा है, वैसा नहीं जैसा किसी विद्वान ने परिभाषित कर दिया है। जीवन कैसा है हमारे लिए? और कोई जीवन जानते हो? एक ही जीवन तो हम जानते हैं न, जैसा हम जी रहे हैं, जैसा हमने अनुभव करा है। अगर आप दूसरों के भी जीवन की बात करते हो, तो बात आपकी है। दूसरों के जीवन की बात भी आपके मन से निकल रही है। तो ले-देकर के आप तो एक ही बात जानते हो, जो बात आप जानते हो — आपका मन, आपका जीवन। उसमें जाना है।
फिर कहने वालों ने कह दिया कि उसमें अगर ईमानदारी से जाओगे, पूरी गहराई से पता करोगे, तो कचरा-कूड़ा है मन का और जीवन का, वो सब साफ़ हो जाता है। जो एकमात्र शुद्ध चीज़ बचती है, उसको ‘परमात्व तत्व’ कह देते हैं। लेकिन वो तो बहुत दूर की बात है न, उतनी दूर की बात करने से क्या फ़ायदा!




