
हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।






आचार्य प्रशांत: उदय रावत हैं, चौंतीस वर्षीय, नैनीताल से, पूछ रहे हैं कि आजकल हर कोई अपनी नज़र में शोषित या विक्टिम क्यों है? जैसे हर किसी ने अपनी पहचान ही बना ली है दमित होने की, दबे कुचले होने की, शोषित, पीड़ित होने की और अगर उनकी सुनें तो


आचार्य प्रशांत: भारत का अपराध यह रहा है कि भारत ने जीवन की कुछ सच्चाइयाँ जानी हैं। जो उन सच्चाइयों को जान ले वह खतरनाक हो जाता है, उसको दबाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। जानते हो भारत ने कौन सी सच्चाई जानी है? भारत ने जान लिया है कि

आचार्य प्रशांत: भारत इतना मूरख कभी नहीं था। कंचन-कामिनी, दोनों का यथार्थ भारत ने इतना समझा, इतना समझा कि जैसे यहाँ की मिट्टी को ही अकल आ गयी हो। यहाँ का जैसे कोई बिल्कुल आम, औसत आदमी भी, गाँव का एक किसान भी, इतनी बुद्धिमानी रखता था कि कंचन-कामिनी पर


प्रश्नकर्ता:(प्रश्नकर्ता को हकलाने की समस्या है) गुरूजी को सादर प्रणाम। शुरू से लोगों से बात करने पर बहुत ज़्यादा डर लगता है। जब मैं किसी ज़्यादा पढ़े-लिखे से बात करता हूँ। तब जुबान लड़खड़ाने लगती है।देश, समाज, संस्कृति, को देखकर बहुत कुछ करना चाहता हूँ। बचपन से देश के


आचार्य प्रशांत: आप गुड़गाँव जाइए, आप बम्बई जाइए, वहाँ एक बड़ी इमारत है पचास मंज़िली, सत्तर मज़िली। आप उसके नीचे खड़े हो। आपको दिख नहीं रहा कि वो इमारत आप पर चढ़ी आ रही है? भीतर ये सतर्कता रहे — जैसे ही दिखे कोई चढ़ा आ रहा है तुरन्त क्या


अजीब सी स्थिति यह है कि एक साधारण दिखने वाली लड़की से शायद ज़्यादा मुश्किल है एक सुंदर लड़की की ज़िंदगी, क्योंकि उसके खरीददार बहुत ज़्यादा हैं और उसे बहुत कुछ मिल जाएगा। और यह जो तुमको मिल जाएगा न अपनी सुंदरता के कारण, यही नर्क है तुम्हारा। तुमको लगेगा,

नकली चीज़ों का बाज़ार देखो, कई बार असली वस्तु से ज़्यादा गर्म होता है। और जो ख़रीदने वाले हैं वह जानते हैं कि मामला नकली है पर ख़रीदते हैं। भारत में रे-बैन के असली चश्मे कितने बिकते हैं, मुझे नहीं पता, नकली घर-घर में हैं। और ऐसा थोड़े-ही है कि…

आजकल चलती है ‘*पाउटिंग*’!
डैडी डार्लिंग यूँ थुथुन निकालेंगे – पाऊट माने थुथुन, जैसे सुअर का होता है – तो डैडी डार्लिंग यूँ निकालेंगे और कैटी डार्लिंग निकालेंगी, “ऊँ!” और कैटी डार्लिंग अभी हैं कुल डेढ़ साल की, और फिर दोनों थुथुन से थुथुन मिलाएँगे।
और कांटेस्ट (प्रतिस्पर्धा) होगा! “*हू

कहते हैं, “हमारे घर में बहुत खुला हुआ माहौल है। मैं तो अपने चौदह साल के लड़के के साथ बैठ कर ड्रिंक करता हूँ। बहुत लिबरल माहौल है हमारे घर का।“

जो आप अपने साथ ज़िन्दगी में घटिया-से-घटिया काम कर सकते हैं वो ये है कि आप अपने शारीरिक सौंदर्य की रोटी खाना शुरू कर दें। “लड़की बहुत सुंदर है, इसको तो बहुत अच्छा लड़का मिला है। बड़े डॉक्टर ने इसको पसंद किया है।“ अगर इस वजह से पसंद किया है…

कार खरीद कर और फर्नीचर खरीद कर ज़िंदगी नहीं बन जाती है। सुख के नाम पर क्या है? एक गाड़ी है, एक ईएमआई पर घर खरीद लिया है, एक घर पहले से था, फिर बीवी है जो बुढ़ा रही है, दो बच्चे हैं जो खून पीने को तैयार हो रहे

यह लाज की, धिक्कार की बात है कि एक छोटे से सुख से ही खरीद लिया गया। अगर मैं छोटा आदमी होऊँगा ज़रूर जो इस छोटे से सुख से बिलकुल लार टपका दी मैंने। सवाल पूछते हैं फिर अपने-आप से कि, “तू इतना गिर गया? इतनी बड़ी चीज़ हो गई


सोचो तुम किसी शॉपिंग-मॉल में हो और वहाँ कबीर साहब का भजन बजने लग जाए; बिक्री आधी रह जाएगी बता रहा हूँ। इसलिए बाज़ार का अध्यात्म से छत्तीस का आँकड़ा है। बाज़ार कभी नहीं चाहेगा कि अध्यात्म सफल हो और बाज़ार हर तरह की साज़िशें करेगा अध्यात्म को गिराने की।…

वो कहानी याद है न कि दस जने उतरे हैं पीये हुए, किससे? एक नाव से उतरे हैं, ठीक है? अब वो गिनना चाहते हैं कि कोई एक रास्ते में टपक तो नहीं गया था नदी में। तो वो सब गिनना शुरू करते हैं, तो गिन रहे हैं कि भैया

देखते नहीं हो बहुत सारी जो एडल्ट ड्रेसेस (बड़ों के कपड़े) होती हैं, वो बिलकुल वैसी ही होती हैं जैसे एक साल, दो साल के बच्चों के झबले। एक साल, दो साल के बच्चों के कपड़े देखे हैं कैसे होते हैं? बहुत सारी

तुलना तो तुम्हें करनी ही है; इनसे क्या तुलना कर रहे हो, अपने दफ़्तर के लोगों से तुलना करते हो, वो सब तुम्हारे ही जैसे हैं।

आप एनडीटीवी पर चले जाइए, आप रैडिफ़ पर चले जाइए – मैं इनकी वेबसाइट की बात कर रहा हूँ। स्क्रोल करेंगे तो ४ खबरें होंगी और ४ खबरों के बाद कुछ नहीं होगा सिर्फ़ नंगी स्त्री देह की नुमाइश होगी। स्त्री देह का ऑब्जेक्टिफिकेशन (वस्तुकरण) लिबरल मीडिया (उदारवादी मीडिया) से…

कोई गर्मी का मौसम हो, तुम शरीर खुला रखो, बात समझ में आती है। तुम कहीं नदी में, स्विमिंग पूल (तरण ताल) में नहाने जा रहे हो, तुम कपड़े उतार दो, बात समझ में आती है। या तुम सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए कम कपड़े पहनो तो भी बात समझ

इज़रायल की टीनएज (किशोर) लड़कियाँ फ़ौज में जाती हैं, और शहीद हो चुकी हैं।
और मेरे देश की लड़कियाँ क्या कर रही हैं? वह टिक-टॉक पर और इंस्टाग्राम पर कूल्हे मटका रही हैं।
किसी ने मुझे तस्वीर भेजी जिसमें इज़राइल की बच्चियाँ खड़ी हुई हैं, उनके कंधों पर बंदूकें हैं

विवाह के दिन हर लड़का, चाहे वह कितना भी बड़ा... (मूर्ख हो), घोड़ी पर तो चढ़ लेता है न? नहीं तो ऐसे तो उसको टट्टू भी अनुमति ना दे। टट्टू भी बोलेगा, “मैं तुझ पर चढूँ वो ज़्यादा शोभा देगा!” विवाह के दिन, एक-से-एक मूर्खानंद घोड़ी चढ़ने को पा जाते

तुम्हें लगता है, “वाह! मज़ा आ गया। लाइन दे दी उसने।“

बहुत सारी लड़कियों को शादी का आकर्षण इसलिए रहता है कि, ‘उसके बाद किसी की आमदनी मेरी हो जाएगी। पति घर लाएगा और मेरे हाथ मैं तनख़्वाह रख देगा।‘ क्षमा माँगते हुए कह रहा हूँ, ये वैश्यावृति है।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी मैं हीनभावना से ग्रस्त होता हूँ और कभी श्रेष्ठता की भावना से, पर सहज नहीं रह पाता। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करने की कृपा करें।


प्रश्नकर्ता: मुझ से अतीत में अज्ञानवश कुछ ऐसे कर्म हुए हैं जो आज मुझे गलत लगते हैं व ग्लानि देते हैं। सकाम कर्म नहीं हुआ है इंडिरेक्टली (परोक्ष रूप से) हुआ है। मुझे इस ग्लानि से कैसे मुक्ति मिले? वो ग्लानि झूठ है ये तो अज्ञानी मन नहीं मानता। वो


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ग्लानि भाव को कैसे दूर करें?

श्रोता: सर, जैसा कि आपने कहा कि हमारी अनिवार्य ज़रूरतें तो प्राकृतिक रूप से पूरी हो ही जाती हैं, तो मैं ये जानना चाहती हूँ कि जब हम किसी भी महानगर में प्रवेश करते हैं, तो हमें बहुत से लोग दिखाई देते हैं, जो सड़कों पर भीख मांग रहे होते

वक्ता: सर, आपने जो कुछ भी बताया, जो कुछ भी हमने जाना, सीखा, उससे फायदा क्या हो गया? हासिल क्या हुआ? वाकई हासिल कुछ नहीं होगा, कुछ भी हासिल नहीं होगा। जो तुम्हारा शक है, वो बिल्कुल ठीक है, तुम्हें ठीक ही शक है कि कुछ हासिल नहीं होगा और

प्रश्नकर्ता: सर, कल मेरे साथ एक दुर्घटना हुई। उसके बाद एक सुरूर-सा छा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है?


आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।


अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।




इसका कोई इलाज़ नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज़ नहीं है। इसका इलाज़ तो सिर्फ़ तभी है, जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौंध में फसने की, हीन भावना में फसने की, ईर्ष्या में फसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।
दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केचुए की तरह थोड़े ही है कि किसी भी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, ऑंखों में ताक़त झलकनी चाहिए! कुछ बोलो तो उसमें साहस हो और संकल्प हो! आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं बचपन से एक धार्मिक परिवार में पला-बढ़ा हूँ। बचपन से पूजा-पाठ हमारे घर में चलता था। रामायण-महाभारत हमारे घर में चलता था। तो उन सब का देखा-देखी मैं भी सबसे रामायण-महाभारत साझा करता था। लोग खुश होते थे और मुझे भी एक तरह का प्रोत्साहन…
आचार्य प्रशांत: अपनी हस्ती पर भरोसा करिए। आप अपनेआप को जितना जानते हैं, आप उससे कहीं ज़्यादा सामर्थ्यवान हैं। अपना आकलन आप बड़ी हीनता में करते हैं, अंडरएस्टिमेशन (कम आँकना)।
छोटे नहीं हैं आप, विश्वास करिए। उसी ऊँचे विश्वास को श्रद्धा भी कहते हैं। कि जाने दो जो जाता है,…
आदमी छोटी बातों में तो दूसरों से ज्ञान ले सकता है क्योंकि ज्ञान किसी का…
आचार्य प्रशांत: मैं खुद को बहुत कम आँकती हूँ जिस कारण नकारात्मकता हमेशा मन पर छाई रहती है। इस कारण जीवन में एक लचरता आ गई है, संकल्पबल और विज़न की कमी है, एकाग्रता भी कम है, क्या करूँ?
मैं खुद को बहुत कम आँकती हूँ जिसके कारण मन पर…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि…
प्रश्नकर्ता: तलब एक हैप्पिनेस (खुशी) है सर, हैप्पिनेस को किस तरह कन्सिडर (मान) कर सकते हैं?...कि मतलब हमारी जो इच्छाएँ हैं वो पूरी हो जाएँ? या उसमें कोई दुख वगैरह उसको कन्सिडर करते हैं? सर एक लाइन (पंक्ति) है कि हर लाइफ़ (जीवन) की एक हैप्पी एंडिंग (सुखान्त) होती है,…
आचार्य प्रशांत: यश बर्मन हैं, कहते हैं, नई शिक्षा नीति, दो-हज़ार-बीस, न्यू एजुकेशन पॉलिसी घोषित हुई, उसमें पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा पर ज़ोर दिया गया। तो कई लोगों ने बड़ा विरोध किया है, कहा जा रहा है कि जब पूरा देश, सब छात्र और उनके अभिभावक…
ना किसी के पैसे के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, ना किसी के ताक़त के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, और किसी की अंग्रेजियत के आगे तो बिलकुल दबना-झुकना नहीं है। और किसी के सौंदर्य के आगे भी दबना-झुकना नहीं है कि सुंदर लड़की आ गयी कि हैंडसम लड़का आ गया और…
जब किसी को मृत्युदंड दिया जाता है जानते हो क्या लिखता है जज? “टू बी हैंगड टिल डेथ!"
अब यह लटकेगा जब तक मरेगा नहीं। हर कामुक…
ये लाज की, धिक्कार की बात है कि छोटे से सुख से ही खरीद लिया गया। अगर मैं छोटा आदमी होऊँगा ज़रूर, जो छोटे से सुख से बिलकुल लार टपका दी मैंने। फिर सवाल पूछते हैं अपने-आप से कि, “तू इतना गिर गया, इतनी बड़ी चीज़ हो गई तेरे लिए…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि आपने बताया कि विचार करो और विरोध करो। जो कुछ भी चेतना के तल पर नीचा है उसका विरोध करो लेकिन विरोध करने पर भी, जैसे सौ बार विरोध करना है तो उसमें जब नब्बे बार हार मिलने लगती है तो फिर इक्यानवे बार कोशिश…
आचार्य प्रशांत: क्या नाम है आपका?
प्र: उज्ज्वल
आचार्य: क्या करते हो?
प्र: अभी तो इंजीनियरिंग की है।
आचार्य: इसी साल?
प्र: २०१६ में।
आचार्य: कहाँ से?
प्र: आचार्य जी, सीतापुर से
आचार्य: लखनऊ में रहते हो?
प्र: अभी तो घर पर रहते हैं,…
या – “ज़रूर मेरी साइकिल में कुछ कमी थी, सौ की गति…
वक्ता: सूरा के मैदान में, कायर फसिया आए। ना भागे ना लड़ सके, मन ही मन पछताए॥
बाकि सब ठीक है, पर ये भाग नहीं सकता, ये क्यों कह रहे हैं कबीर? ‘ना भागे ना लड़ सके’, लड़ नहीं सकता, ठीक बात है। कायर है, लड़ेगा क्या? पर वो भाग…
एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।