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जब लगे कि नाइंसाफ़ी हुई है आपके साथ || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि मेरे साथ कोई नाइंसाफ़ी हुई है, इनजस्टिस (अन्याय)। तो मैं ये समझना चाहती हूँ कि क्या ये नाइंसाफ़ी का भाव भी अहंकार के क्षेत्र में ही है कि देयर इज़ समथिंग लाइक इनजस्टिस इन रियलिटी ? (वास्तव में अन्याय जैसा कुछ है भी)

और अगर सच्ची में नाइंसाफ़ी वैलिड (वैध) है तो क्या बदला सही होगा? जैसे हम इंग्लिश में बोलते हैं कि रिडेम्प्शन वर्सेज रिवेंज (मुक्ति बनाम बदला)।

आचार्य प्रशांत: देखिए, कहानी बहुत पीछे से शुरू होती है न। जिसकी जो पात्रता हो उसे वो न मिले, इसको हम ‘अन्याय’ बोलते हैं। न्याय ‘नय्’ धातु से आता है और ‘नय्’ का अर्थ होता है सम्यक स्थान पर स्थापित करना। जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए उसका वहाँ होना ही न्याय है, बस यही न्याय है।

अब अहंकार का जन्म ही अहंकार के साथ अन्याय है। अहंकार का जन्म ही उसके साथ अन्याय है क्योंकि अहंकार को होना कहाँ चाहिए? शान्त होना चाहिए, आत्मा की गोद में होना चाहिए, पूर्ण होना चाहिए या शून्य, लुप्त, विलीन, मुक्त होना चाहिए। पर वो तो बेचारा बड़ी बिलबिलाती हालत में है और जन्म से ही ऐसा है, तो पहला अन्याय, इनजस्टिस तो जन्म ही है।

पहला अन्याय तो जन्म ही है। तो न्याय भी फिर एक ही हो सकता है कि जिसका जन्म हुआ है उसको उसके लक्ष्य तक, उसकी पूर्णता तक पहुँचा दो, सिर्फ़ यही न्याय है। बाक़ी जो हम न्यायालयों में देखते हैं वो बस एक ऐसे ही है, ऊपर-ऊपर का खेल है, बहुत सतही बात है। व्यवहार में उसकी कुछ उपयोगिता हो सकती है, उसकी कोई आत्यन्तिक या पारमार्थिक उपयोगिता नहीं है।

मूल अन्याय देहधारण है। जिस दिन आपने देह धारी थी, आपके साथ अन्याय हो गया था। न्याय का अगर अर्थ है कि जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए वहीं रहे, तो अहंकार तो होना ही नहीं चाहिए न? या अहंकार अगर होना चाहिए तो कहाँ होना चाहिए? कहते हैं, आत्मा की गोद में या आकाश में लीन, ये अहंकार की न्यायपूर्ण जगहें हैं, पर वहाँ तो होता नहीं। तो अहंकार ही पहला अन्याय है और उसको हटाने के अलावा कोई दूसरा न्याय होता नहीं।

कोई न्याय नहीं होता। अब उस स्थिति को ले लीजिए जिसकी आप बात कर रही हैं। कोई आकर आपको कुछ बोल गया, आपको लगा नाइंसाफ़ी हुई है। नाइंसाफ़ी इसमें है कि वो बोल गया, या नाइंसाफ़ी इसमें है कि आप अहंकार जहाँ है उसे वहीं रखकर के उसकी चोट को वैधता दे रही हैं? मूल बात याद रखिएगा, एक ही इंसाफ़ है, अहंकार को हटाना, एक ही इंसाफ़ है। और अगर आप चोट खा रहे हो तो आप अहंकार को हटा रहे हो कि बढ़ा रहे हो?

प्र: बढ़ा रहे हैं।

आचार्य: तो अपने ख़िलाफ़ सबसे बड़ी नाइंसाफ़ी तो यही है कि चोट खा गये। अगर इंसाफ़ है चोट को हटाना, जो चोट खा सकता है, जो चोटिल हो सकता है, अहंकार, उसको हटाना अगर इंसाफ़ है तो चोट खाना क्या है फिर? अपने ही विरुद्ध अन्याय हो गया न। तो नाइंसाफ़ी किसी और ने नहीं करी है — पता नहीं कोई और है भी कि नहीं नाइंसाफ़ी करने के लिए, हम ये सब नहीं जानते।

हमें तो महात्मा बुद्ध बोल गये हैं कि बाहर जितने घूम रहे हैं पुतले हैं, प्रक्रियाओं के पुतले हैं। और श्रीकृष्ण बोल गये हैं कि बाहर जितने घूम रहे हैं ये सब गुणों की नदियाँ हैं। यहाँ कोई केन्द्रीय इकाई, कोई व्यक्ति तो है ही नहीं, तो कौन आपके साथ नाइंसाफ़ी करेगा? लेकिन नाइंसाफ़ी तो हुई है। नाइंसाफ़ी इसमें नहीं है कि कोई कुछ कर गया, नाइंसाफ़ी इसमें है कि आप चोट खा गये। चोट खाकर के आपने अहंकार को और बली कर दिया। जिसकी बलि होनी चाहिए थी वो बली हो गया, ये नाइंसाफ़ी है।

अब ये बात आप किसी लॉ चेम्बर (क़ानून कक्ष) में बोलेंगे तो वहाँ चलेगी नहीं ये बात, पर हम ज़रा आगे की बात कर रहे हैं। जिनमें अपने प्रति सम्मान होता है वो पहला काम ये करते हैं कि चोट नहीं खाते। उनके शरीर पर घाव लग सकता है, उनकी प्रतिष्ठा में टूट-फूट हो सकती है, उनकी तिजोरी तोड़ी जा सकती है और पचास तरीक़े के बाहरी काम उनके साथ हो सकते हैं, पर वो भीतर से घाव नहीं खाते।

शरीर पर घाव खा सकते हैं, वो भीतर फिर भी हरे और लहलहाते रहते हैं क्योंकि भीतर वो उस जगह बैठे हैं जहाँ बाहर की कोई गोली, कोई बन्दूक, कोई गाली पहुँच नहीं सकती, तो चोट कैसे लगेगी! बाहर से गोली आये चाहे गाली आए, यहाँ (शरीर को) तो लग सकती है। गाली कहाँ लग गयी? यहाँ (कान में) लग गयी। गोली कहाँ लग गयी? यहाँ (शरीर में)। बाहरी है न ये दोनों?

अगर आप बाहर बैठ जाओगे, यहाँ बैठकर क्या बोलते हो आप? मैं कौन हूँ? देह हूँ। आप यहाँ बैठे हो तो जो गोली शरीर को लगेगी वो गोली शरीर को नहीं लगी आपको लग गयी, क्योंकि आपने क्या तादात्म्य कर रखा था? मैं शरीर हूँ। तो शरीर को गोली लगी तो मुझे लग गयी। यहाँ (हाथ में) लग सकती है, यहाँ (कान में) लग सकती है, हमें नहीं लग सकती।

हम वहाँ बैठे हैं जहाँ — इसके लिए श्रीकृष्ण का क्या श्लोक है, बताएगा।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।। ~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २.२३

हम वहाँ बैठे हैं जहाँ आग, पानी, हवा, गोली, गाली कुछ नहीं पहुँचते, हम वहाँ बैठे हैं। तो वहाँ बैठिए यही इंसाफ़ है, न्याय इसके अलावा कुछ नहीं है। न्याय इसके अलावा कुछ भी नहीं है। और आपके साथ कोई दूसरा नाइंसाफ़ी नहीं कर सकता अगर आपने स्वयं न कर रखी हो अपने साथ।

किसी दूसरे को ये अधिकार ही नहीं है, दूसरे में ये सामर्थ्य ही नहीं है कि वो आपके साथ अन्याय कर पाये। जो बिलकुल भीतर अपने जाकर बैठ गये होते हैं न — जगत पर, देह पर आश्रित नहीं रह गये होते हैं — उनको चोट पहुँचाने के लिए तो जगत बिलकुल बौराया घूमता है कि किसी तरीक़े से बस मुझे एक प्रमाण मिल जाए कि मैं इस व्यक्ति को आहत कर पाया। ऐसों को जगत बहुत चोट देता है कि किसी तरीक़े से उनसे एक प्रतिक्रिया मिल जाए। वो जो एक प्रतिक्रिया होगी वो अनात्मा का प्रमाण होगी, वो जो एक प्रतिक्रिया होगी वो जगत की जीत का प्रमाण होगी। प्रतिक्रिया आती ही नहीं क्योंकि प्रतिक्रिया देने वाला भीतर कोई है ही नहीं। ऐसों को जगत बहुत कोंचता है, बहुत कोंचता है।

अल हल्लाज मंसूर को जब यातना दी जा रही थी, तो उसका जो पूरा मार्मिक विवरण है वो पढ़िएगा। इसी तरीक़े से जीसस से भी अगर रंजिश थी तो एक झटके में काम तमाम कर सकते थे, ये सब क्या है कि कीलें ठोंक देंगे और काँटों का सिर पर ताज पहना देंगे और कहेंगे, ‘ क्रॉस को लेकर के अब चढ़ो, बढ़ो, ये सब करो’, ये सब क्या है, आपने सोचा नहीं कभी?

ये औरंगजेब गुरु साहब के साथ क्या कर रहे हैं, उनके सुपुत्रों के साथ क्या कर रहे हैं? मारना था एक झटके में मार देते न, ये क्या करा? ये फ़रियाद है यातना देने वाले की कि एक बार, बस एक बार अपने चेहरे पर वो भाव ला दो जिससे हमें भरोसा हो जाए कि तुम्हें चोट लगी है। और उनके चेहरे पर ये भाव आ ही नहीं रहा। जब भाव नहीं आ रहा तो और ज़ोर की चोट दी जाती है कि एक बार तो तेरे चेहरे पर दर्द दिख जाए, एक पल की शिकन दिख जाए और दिख ही नहीं रही। जब नहीं दिख रही तो और कहते हैं, ‘अब इसके कील ठोंक दो, इसकी ज़बान काटो, इसकी टाँग काटो।’ और उसकी टाँग भी काट रहे हैं तो वो ऐसा है जैसे किसी और की टाँग कट रही हो।

इसका मतलब ये नहीं कि उसको दर्द नहीं हो रहा है, दर्द हो रहा है और दर्द उसके चेहरे पर दिखाई भी देता होगा, पर ये भी दिखाई देता है कि वो दर्द बस शरीर का दर्द है। बस शरीर का दर्द है। उसकी हस्ती को दर्द नहीं दे पा रहा ज़माना। और ज़माना इस बात से बहुत हिंसक हो जाता है क्योंकि आप समाज में रह ही तभी सकते हो जब आपने समाज को हक़ दिया हो आपको चोट देने का।

सोचिएगा, जिसको आप सोशल कॉन्ट्रैक्ट (सामाजिक अनुबंध) बोलते हो वो और क्या होता है? एक बार विचार करिएगा और लिखिएगा, ‘क्या सोशल कॉन्ट्रैक्ट का यही अर्थ नहीं है कि मैं समाज को अपने ऊपर अधिकार दे रहा हूँ?’ और जो ऐसा हो जाए व्यक्ति कि अब उसकी हस्ती पर समाज का कोई अधिकार नहीं रहा, समाज उसको तरह-तरह की चोट देगा बस इस उम्मीद में कि कोई प्रतिक्रिया दिख जाए; 'बस एक बार कोई प्रतिक्रिया दिखा दो, एक बार प्रतिक्रिया दिखा दो हम तुम्हें छोड़ देंगे।'

सुकरात से भी तो यही बोला था, कोई बड़ी भारी शर्त थोड़े ही थी, ‘नगर से चले जाना’। अब सुकरात को जो बोलना था बोल चुके थे, उनकी चढ़ी उम्र थी। अगर उनको ज़िन्दा भी छोड़ दिया जाता तो दो-चार साल और जीकर मर जाते शायद। ‘एक बार झुक जाओ न हमारा दिल रखने के लिए, एक बार दिखा दो कि अहंकार है अनात्मा है। एक बार।’ सुकरात ने कहा, ‘कैसे दिखा दें! हमारे वश में होता तो दिखा देते। हमारे पास है ही नहीं, हम कैसे दिखा दें! हम मजबूर हैं भाई, नहीं दिखा सकते।’

‘नहीं दिखा सकते तो मर।’ वो ज़्यादा नहीं चाहते आपसे, बस ये चाहते हैं कि आप दिखा दो कि आप उन्हीं के जैसे हो। एकबार दिखा दो उनके जैसे हो, वो आपको छोड़ देंगे।

समझ में आ रही है बात?

लेकिन जैसे ही आपने दिखा दिया कि आप उन्हीं के जैसे हो, नाइंसाफ़ी हो गयी। इंसाफ़ यही है, मैं अपने जैसा हूँ तुम्हारे जैसा नहीं। क्या बोलते हैं अष्टावक्र? “त्वं प्रकृतेः परः”, यही इंसाफ़ है।

श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भो: । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृते: पर: ।। ~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १५.८

‘तुम पराये हो। हम हम हैं, हम तुम नहीं हो सकते।’

समझ में आ रही है बात?

तुम्हारा हमारा प्रेम का, करुणा का रिश्ता तो हो सकता है, दर्द और चोट का कोई रिश्ता नहीं हो सकता। प्रेम में हम तुम्हारे सामने झुक भी सकते हैं, बिलकुल झुकेंगे, लेकिन चोटें कितनी भी मार लो चोटिल नहीं हो पाएँगे हम। तुम्हारा दिल रखने के लिए कई बार हम चाहते भी हैं कि चोटिल हो जाएँ, हम नाटक कर लेते हैं तब, हम दिखाते हैं, ‘ओ! लग गयी!’

जैसे कोई छोटा बच्चा हो, वो घूँसे-ही-घूँसे बरसा रहा है और रो रहा है ज़ोर-ज़ोर से, क्यों? क्योंकि वो चाहता है आपको चोट लगे, चोट लग नहीं रही है। और ये छुटके होते बड़े नालायक़, उनको जो चाहिए न मिले तो भाय-भाय करके रोएँगे। अब घूसा भी मार रहा है और रो भी रहा है। तो फिर आप क्या करते हो? आप ऐसे करते हो, ‘ओ! अरे! बहुत मार दिया। अरे! सूज गया!’ (चोटिल होने का अभिनय करते हुए) इतना भी कर सकते हो, इतना तक चलेगा लेकिन सचमुच चोट नहीं लगती। नहीं लगती तो नहीं लगती, ज़बरदस्ती कैसे लगवा लें! जिसको चोट लगती थी वो कब का विदा हो गया, चोट खाएँ कैसे!

उसकी विदाई ही इंसाफ़ है और ये इंसाफ़ सिर्फ़ आप अपने साथ कर सकते हो कोई और नहीं कर सकता। अगर किसी दूसरे ने आकर आपको घाव दे दिया तो नाइंसाफ़ी तो हुई है, पर वो नाइंसाफ़ी उस दूसरे ने नहीं करी है। कहिए (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए)

प्र: अपनेआप करी है।

आचार्य: वो नाइंसाफ़ी आपने अपने साथ करी है। कोई आकर के आपको हर्ट (दुखी) कर जाए तो अपनेआप से पूछिए, ‘मैंने ये हक़ कैसे दे दिया इसको? ये ग़लती मैंने करी है, ये ग़लती मैंने कैसे कर दी?’

बात उसकी नहीं है कि वो कुछ कर गया और मैं चोटिल हो गयी, बात ये है कि मैंने अपने भीतर वो शेष कैसे छोड़ दिया जो चोट खाता है, ग़लती मेरी है। नाइंसाफ़ी तो हुई है पर वो नाइंसाफ़ी ख़ुद हमने करी है अपने ख़िलाफ़।

प्र: आचार्य जी, जब रोर्क कोर्ट में जाकर बहुत अपनी लम्बी एक स्पीच देता है तो वो उसकी प्रतिक्रिया नहीं है, वो एक सन्देश है?

आचार्य: ('द फाउंटनहेड' पुस्तक से हावर्ड रोर्क का वक्तव्य पढ़ते हुए) ‘समझा रहा हूँ, समझा रहा हूँ। मुझे तुमसे डर लगता होता — ये जितने इंसाफ़ के तुम ठेकेदार बैठे हो — तो मैं माफ़ी माँग लेता। मुझे तुम पर क्रोध होता तो मेरी स्पीच में घृणा इत्यादि दिखाई देते। मैं तो बता रहा हूँ, मैं समझा रहा हूँ, मैं सच तुम्हारे सामने ला रहा हूँ। और जो मैं तुमको बता रहा हूँ मुझे ये भी पता है वो तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा, ज़्यादा सम्भावना यही है कि मेरी बात सुनकर तुम और आग बबूला हो जाओगे। तो जब मैं तुमसे बात करूँगा भी तो अपनी शर्तों पर करूँगा। इसीलिए नहीं कि तुमने कुछ करा और उसके कारण विवश होकर मैंने प्रतिक्रिया कर दी। न-न-न, मैं तुमसे बात करूँगा पर अपनी शर्तों पर जब ठीक लगेगा, जब ज़रूरत होगी तब करूँगा। तुम मुझे मजबूर नहीं कर सकते तुमसे बात करने के लिए भी, और तुम मुझे मजबूर नहीं कर सकते बात न करने के लिए भी। मुझे जब नहीं बोलना, तुम कुछ भी कर लो, नहीं बोलूँगा और मुझे जब बोलना है, तुम कुछ भी कर लो मैं तो बोलूँगा।’

प्र: बहुत-बहुत धन्यवाद आपका, आचार्य जी।

प्र२: प्रणाम, आचार्य जी। प्रश्न ये है कि यदि हमें चोट लग जाए और उस प्रक्रिया को हम समझ लें कि उसके केन्द्र में अहंकार है, पर क्या फिर भी बदला लेने की सम्भावना कहीं-न-कहीं रह जाती है? ऐसा मतलब मैंने महसूस किया है कि रह जाती है। ऐसा है और है तो क्यों ऐसा होता है?

आचार्य: सीधे-सीधे ये क्यों नहीं बोलते कि नहीं समझे थे, ये मानने में क्या तकलीफ़ है? नॉटी (शरारती)! कैसे मुस्करा रहे हैं देखो (श्रोताओं सम्बोधित करते हुए)। सीधे बोल दो न नहीं समझे थे। इतना तो समझाया, ये रखा (अहम्), ये रखा (चोट), इन दोनों में सम्बन्ध ही कौन बनाता है? अहम्, माने नासमझी। जब नासमझी मिट गयी तो इसका इससे कोई नाता नहीं रह गया न। वो चोट जो आपको बदला लेने को प्रेरित न कर रही हो, वो चोट बड़ी हल्की चोट हो गयी है, बड़ी बाहरी चोट हो गयी है।

मैं बार-बार कहा करता हूँ, ‘दर्द और दुख में अन्तर हमें सीखना होगा।’ दर्द तक ठीक है, पंचभूत, मिट्टी का शरीर है, दर्द तो करेगा-ही-करेगा। दुख नहीं होना चाहिए। दर्द स्थूल है, दुख सूक्ष्म है। दर्द रहे ये समझ में आता है, दर्द दुख न बने। वूंड (घाव) रहे समझ में आता है, वूंड हर्ट (चोट) न बने। वूंड को कौन रोक सकता है? अन्तर समझ रहे हैं न, वूंड कहाँ होता है? शरीर पर। हर्ट कहाँ होती है, (पुनः ज़ोर देकर कहते हुए) हर्ट कहाँ होती है? दिल में। यहाँ (हृदय की ओर संकेत करते हुए) वूंड लग सकता है, यहाँ हर्ट नहीं हो सकती। यहाँ (शरीर पर) दर्द आ सकता है, यहाँ (हृदय की ओर संकेत करते हुए) दुख नहीं आ सकता, ये अध्यात्म का लाभ है।

बहुत ख़राब हालत हो शरीर की, कोई पूछे, ‘कैसे हो?’ तो झूठ क्यों बोलें, बोलेंगे, ‘शरीर से बहुत ख़राब।’ ‘कैसे हो?’ ‘शरीर से बहुत ख़राब।’ बस इतने में आपने दिखा दिया कि आप स्वस्थ हो, क्योंकि आपने एक उपाधि, एक क्वालीफायर जोड़ दिया है। आपने ये नहीं कहा, ‘बहुत ख़राब', आपने कहा, ‘शरीर से बहुत ख़राब’, बस ठीक है।

जैसे ही आपने स्पष्ट कर दिया कि शरीर से तो ख़राब हैं, वैसे ही आपने साथ-साथ ये भी स्पष्ट कर दिया कि, ‘है कुछ ऐसा भी जो ख़राब नहीं है’, बस ठीक है। अब ठीक है। झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं है कि ऑल इज़ वेल (सब ठीक है) और ये सब, बहुत बढ़िया हैं, चंगे हैं। इस सब की ज़रूरत नहीं है। दर्द है तो है भाई, वो एक तथ्य है, उसको कैसे नकार सकते हो! मशीन में दिख जाएगा। तुम नकार दोगे, कोई आकर के ले गया, बोलेगा, ‘देखो, इनका ये भी नीचे है, ये ऊपर है, ये ऐसा है, दायें-बायें।' काहे को झूठ बोलना! तो शरीर से तो बहुत ख़राब, बस।

बाक़ी आत्मा के बारे में कुछ कहा जा नहीं सकता तो ये भी काहे कहें कि अन्दर से बहुत अच्छे। ‘कैसे हो?’ ‘बड़ी दुर्दशा है, बाहर से।’ बड़ी दुर्दशा है बाहर से। ठीक। इसी तरह से, ‘कैसे हो?’ ‘अरे, बड़ा सुख है बाहर-बाहर!’ सब अच्छा भी चल रहा होता है भाई, सुख भी आता है जीवन में। बड़ी मौज है, कहाँ? बाहर-बाहर। ‘कैसे हो?’ ‘बाहर-बाहर तो बड़ी मौज है, बस ठीक है।’ इतने में आपने जता दिया कि आप होश में हो।

प्र२: आचार्य जी, एक फॉलोअप क्वेशन था कि जैसे कोई व्यक्ति हमें बहुत कष्ट दे रहा हो तो हम उस व्यक्ति से कटु वचन न बोलकर अगर हम उससे दूरी बना लें तो क्या यहाँ भी अहंकार कहीं-न-कहीं आ रहा है?

आचार्य: ये वाली दूरी बनानी है न (ऊपर उठने वाली दूरी), ये दूरी बनानी है। नहीं तो आप यहाँ से जाकर अमेरिका बैठ जाओ, मन में तो वहीं घूम रहा है, ‘दुश्मन है, मिटा दूँगा तुझे’। तो क्या फ़र्क पड़ गया? हमारी जो बदले वगैरह की तकलीफ़ होती है वो घुटने में थोड़े ही होती है, वो कहाँ होती है? मन में। और मन यहाँ छोड़कर जाओगे या अमेरिका साथ लेकर जाओगे?

प्र२: यहाँ छोड़कर जाएँगे।

आचार्य: तो मन में ही गड़बड़ है तो अमेरिका जाकर बैठ जाओ, तन को अमेरिका ले जाने से क्या हो जाएगा? तो दूरी तो बनानी होती है। जब भी कभी ऐसी स्थिति में रहो, जहाँ पाओ कि भीतर से घायल हुए जा रहे हैं तो दूरी बनानी है, पर कैसी दूरी? ऐसी (क्षैतिज) दूरी नहीं। अगर ये (मेज़) पृथ्वी की सतह है — मान लो किसी तरह चपटी करके दर्शा दें — तो ये रहा भारत, तो अमेरिका कहाँ है? यहाँ है (मेज़ की सतह पर ही कुछ दूर)। तो ये (समान तल) वाली दूरी नहीं बनानी है, कौन सी दूरी बनानी है? ये (ऊपर उठने वाली) दूरी।

चोट तो एक तरह का सूचना पत्र मात्र होती है कि आप भीतर से ठीक नहीं हो, तभी तो चोट लग रही है। हर्ट लग ही नहीं सकती थी अगर आप भीतर से स्वस्थ होते। हमारे भीतर एक बिन्दु होता है जिसकी पहचान ये होती है कि वो नॉन रिएक्टिव और इम्यून होता है, ये उसके दो गुण हैं। निर्गुण है वो, पर नकार में तो निर्गुण के भी गुण बताए जा सकते हैं न, नकार में। तो नेति-नेति की भाषा में ये उसके दो गुण होते हैं, क्या? नॉन रिएक्टिव , इम्यून , इनर्ट , उसको कुछ भी कर लो उसे कुछ नहीं होता। वो बिन्दु जिसके भीतर है वो तो चैन से जी पाएगा, जिसके भीतर वो बिन्दु नहीं है वो सिर्फ़ घाव का, चोट का एक पिंड बनकर घूमता रहेगा और जहाँ जाएगा वहाँ एक नयी चोट पाएगा।

समझ में आ रही है बात?

ये आपका आपके प्रति दायित्व है, जब चोट लगे तो कहिए, ‘सूचना आयी है, अभी भीतर गड़बड़ बाक़ी है तभी तो चोट खा गये’, उठना है, उठना है, उठना है। कुछ-कुछ भले मानस ऐसे भी होते हैं — उनको मूर्ख काहे को बोलें, भले ही बोल देते हैं — जो कहते हैं कि ‘अगर कोई आपको हर्ट नहीं कर सकता तो फिर रिश्ते में भी तो कुछ नहीं है न।’ नहीं सुना है? ‘जब मेरी किसी बात का तुम पर कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता तो हमारे रिश्ते में क्या रखा है! जाओ जाकर गीता पढ़ो।’ मूर्खता का वक्तव्य है। अरे दीदी, अगर वो हर्ट खाएगा तो फिर हर्ट खिलाएगा भी तो। तू चाह रही है कि तेरे कर्मों से वो हर्ट हो जाए, पर अगर वो हर्ट हुआ तो? वो हर्ट होगा तो तुझे हर्ट करेगा, तो ये चाहती क्या है!

ये कौनसा रिश्ता है, मैं तुझे थप्पड़ मारूँ तू मुझे थप्पड़ मार और इसको हम बोलेंगे, डांस चल रहा है हमारा, थप्पड़ डांस ! एकदम रिदम में थप्पड़ बज रहे हैं। ज़्यादातर रिश्ते ऐसे ही होते हैं, ‘देखा, हमारा एक-दूसरे पर हक़ है, मैं तुझे हर्ट करता हूँ तू मुझे हर्ट करता है।’ ये नहीं! ये बहुत खच्चर रिश्ता है। ये (ऊँचाई) भी एक रिश्ता होता है, ‘हम उठे हैं, तेरे प्रति क्षमा रखेंगे, तुझे भी ऊपर उठाएँगे। और अगर ऊपर नहीं उठा सकते तो कम-से-कम प्रतिक्रिया करके तुझे घाव तो नहीं देंगे, भाई! करुणा अगर नहीं दर्शा सकते तो कम-से-कम क्षमा तो दिखाएँगे। तुझे ऊपर नहीं उठा सकते तो कम-से-कम तुझ पर आक्रमण तो नहीं ही करेंगे इतना तो पक्का है।’ एक ये भी रिश्ता होता है।

वो सब में मत पड़ जाइएगा, वो जो पॉप विज़डम चलती है। 'यू नो ही लव्स यू इफ़ यू कैन सी हर्ट इन हिज़ आइज़’ (अगर उसकी आँखों में तुम्हें चोट दिखे तो वो तुमसे प्रेम करता है)। अठारह मिलियन व्यू और छः मिलियन लाइक्स। 'अरे! ग़ज़ब बात बोली।' जो चोट खा सकता है उसके पास तो सेल्फ़ लव (स्व प्रेम) ही नहीं है, वो तुम्हें कैसे प्यार करेगा दीदी? जो ख़ुद को ही नहीं प्यार करता वो तुम्हें कैसे करेगा? लेकिन हम बहुत घबराते हैं ऐसे लोगों से जिन्हें चोट नहीं लगती, क्योंकि अगर उसे चोट नहीं लगती तो फिर वो किसी का ग़ुलाम भी नहीं बनता।

ग़ुलाम कैसे बनाया जाता है किसी को? उसे चोट की धमकी बताकर। जिसको चोट नहीं लग सकती वो ग़ुलाम भी नहीं बन सकता। ऐसों से हम रिश्ता बनाना ही नहीं चाहते क्योंकि अब वो ग़ुलाम नहीं बनेगा न, हमारे रिश्ते तो सब ग़ुलामी के होते हैं। और अगर आप पहले ऐसे थे जो चोट खूब खाते थे और धीरे-धीरे ऐसे हो जाओ कि चोट नहीं खाते तो रिश्ते चरमराने लगते हैं। सामने वाला कहता है, ‘मेरा हक़ चला गया, मेरा अधिकार चला गया, अब मैं इसको चोटिल ही नहीं कर पा रहा।’

लोग तड़पते हैं आपकी आँखों में थोड़ी सी वल्नरेबिलिटी (असुरक्षा का भाव) देखने के लिए। और आपकी आँखों में वो आये न सबूत दुख का, आहत होने का तो सामने वाला बड़ा अपमान मानता है, कहता है, ‘बड़ा अपमान हो गया हमारा, हमने इतना कुछ करा और तुम्हारी आँखों में ज़रा भी सबूत नहीं कि तुम पर कोई फ़र्क पड़ा। ये हमारे लिए बड़े अपमान की बात है।’

और जो आपको दर्द देने आया है, सोचो उसकी कितनी बड़ी सफलता है कि उसने आपको चार बातें बोलीं और आपका मुँह बिलकुल केले के छिलके की तरह उतर गया। केला होता है, ऐसे तना खड़ा था केला और छिलका जब उतर जाता है तो छिलके कैसे ढुलमुल नीचे पड़े हुए हैं, ज़्यादातर लोगों का यही होता है न? उनसे दो-चार बातें कुछ बोल दो या कुछ कर दो तो मुँह कैसा हो जाता है? जैसे यहाँ गाल से दो डम्बल बाँध दिये गए हों, तो पूरा सब लटक गया मामला नीचे।

फिर जो आपको दर्द देने आया था वो एकदम सफल हो जाता है, खुश हो जाता है। कहता है, ‘देखा, आइ डू हैव पॉवर ओवर यू’ (मेरा तुम्हारे ऊपर हक़ है)। और ये बात बड़ा सुख देती है, ‘मेरा इसके ऊपर हक़ है, अधिकार है। इसके ऊपर मेरी ताक़त है।’ कोई आपके सामने दहाड़े मारकर रो रहा हो, आप शान्त रहें बस। देखिए, उसको कितना बुरा लगेगा! उसका रोना बन्द हो जाएगा इतना बुरा लगेगा उसको। अभी तो वो रो रहा था कि कोई आकर उसको पीट गया — मान लो कोई आता है आपके सामने और छाती पीट-पीट रोने लगता है कि फ़लाना आया और मुझे पीट गया — और आप उसके सामने बिलकुल निस्पृह बैठे रहें, अनछुए, उसका रोना बन्द हो जाएगा। वो आपको पीटने लगेगा, बोलेगा, ‘पाषाण हृदय, पत्थर दिल, शुष्क मनुष्य, मरुस्थल की पैदाइश, रेत की औलाद! ले पिट।’ आप कहोगे, ‘पर अभी-अभी तो आप रो रहे थे?’ बोले, ‘रोना छोटी बात है, पर आप रो रहे हो और कोई प्रतिक्रिया न दे वो ज़्यादा बड़ी बात है।’ कई बार तो रोया ही इसीलिए जाता है, ज़्यादातर रोया ही इसीलिए जाता है कि किसी से प्रतिक्रिया मिले। तो जिनको अपनी जान बचानी होती है वो कोई प्रतिक्रिया उनको नहीं भी आ रही होती है वो तो भी प्रतिकिया दिखा देते हैं, ‘आह! बड़ा बुरा हुआ तुम्हारे साथ।’ ये रिश्ते हैं।

जहाँ भोग की कामना होती है न, कहाँ गये वत्स? (ऑनलाइन प्रश्न पूछ रहे प्रश्नकर्ता के स्क्रीन पर न दिखने पर) जहाँ भोग की कामना होती है न, वहीं चोट ज़्यादा लगती है, सोचकर देखना। मैं अगर इतना भी बोल दूँ कि जहाँ उम्मीदें होती हैं वहीं चोट होती है, तो भी बच जाते हो। कहते हो, ‘रिश्तों में उम्मीदें तो रखनी होती हैं।’ तो मैं उम्मीद भी नहीं कह रहा, मैं कह रहा हूँ, ‘भोग।’ हमारी कोई बड़ी सरल, सीधी, सात्विक उम्मीद नहीं होती है दूसरे से, हमारी उम्मीद होती है सामने वाले को भोग मारने की, वहीं चोट लगती है। तो कोई अगर आपको चोट दे गया है तो उस पर इल्ज़ाम मत दे देना, आप ही भीतर हसरतें पाले बैठे थे कि इससे किसी तरीक़े का लाभ पाऊँगा, लाभ की जगह जूता चल गया! “बड़े बेआबरू होकर उनके कूचे से हम निकले, बहुत निकले मेरे अरमाँ फिर भी कम निकले।” अब बहुत सारे जब अरमान लेकर उनके कूचे में जाओगे तो बहुत बेआबरू होकर ही बाहर आओगे, वरना कोई वजह है कि बेआबरू हो जाओ!

अरमानों का पूरा टोकरा लेकर रात में घुसे थे उनके कूचे में, तो किये गए बेआबरू फिर। बेआबरू माने बेइज़्ज़त। वो अरमानों का टोकरा न होता तो बेआबरू भी न किये जाते। कहीं बेइज़्ज़ती हुई है तो उसके पीछे उम्मीदों का टोकरा ज़रूर होगा, प्रकट नहीं होगा तो छिपा हुआ होगा, पर होगा ज़रूर। और ये तो कह ही मत देना कि इंसान हूँ तो उम्मीद तो करूँगा ही। उम्मीद आप करते नहीं हो, उम्मीद तो एक रासायनिक प्रक्रिया है। आप कामना का तम्बू गाड़कर बैठे हो इससे ये नहीं साबित होता कि आप इंसान हो, इससे बस यही साबित होता है कि आप रसायनों का पिंड हो एक, मास ऑफ़ केमिकल्स।

देखा नहीं है सब रसायन एक-दूसरे से कामना करते रहते हैं? और वही जो कामना है उनका रिश्ता बन जाता है। आठवी-नौवी में पढ़ा होगा इलेक्ट्रो वैलेंड बॉन्ड , उसमें क्या होता है? ‘ए दो न, ए दो न', तो उसके पास ज़्यादा था एक तो उसने दे दिया, तो ये क्या कहला गया? इलेक्ट्रो वैलेंड। और दूसरा वाला क्या होता है? ‘ए दो न’, तो बोला, ‘ऐसे थोड़े ही, शेयर करके, थोड़ा तुम थोड़ा हम, थोड़ा तुम थोड़ा हम। थोड़ा सा तुम दोगे थोड़ा सा हम देंगे।’ ये फिर रिश्ता बन गया एक और, कोवैलेंट (सहसंयोजक)।

तो इस प्रकार की कामनाबाज़ी तो कैमिकल्स करते हैं, एटम्स करते हैं, कामना से आपके इंसान होने का प्रमाण नहीं मिल जाता। और बहुत लोगों की ये बड़ी फोक विजडम (लोक बुद्धि) होती है। वो आते हैं, ‘देखो, उम्मीदों से ही तो इंसान होता है। जिसकी उम्मीदें मर गयीं, हम तुम्हें बता रहे हैं' — ऐसी बड़ी गुरू गम्भीर वाणी में बोली जाती है इस तरह की बातें। जो जितनी मूर्खता भरी बात होगी वो उतनी भारी टोन (आवाज़) के साथ बोली जाएगी और बैकग्राउंड म्यूजिक होगा। उसमें ऐसा जैसा लगे कि एकदम बिलकुल दिव्य आकाशवाणी उतर रही है, ‘देखो, उम्मीदों से ही तो रिश्ते चलते हैं।’ फिर वही, क्या? अठारह मिलियन व्यूज , छः मिलियन लाइक्स और पीढ़ी पूरी हुई तबाह यही सब सुन-सुनकर, मूर्खता।

चलें वत्स, विदा हों। (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए)

प्र३: आचार्य जी, सादर नमन।

आचार्य: जी।

प्र३: सर, सादर चरण-स्पर्श आपको।

आचार्य: अरे महाराज (हाथ जोड़कर सिर झुकाते हुए), बताइए।

प्र३: सर, गाँधी जी को अंग्रेजों ने ट्रेन के कंपार्टमेंट से बाहर फेंका था, तो उन्होंने एक आम आदमी की तरह न तो पत्थर चलाया न ही कोई अपशब्द का प्रयोग करा, अपना मानसिक स्तर नहीं गिराया। लेकिन उन्होंने शान्तिपूर्ण तरीक़े से अहिंसा को अपनाते हुए आज़ादी के लिए लड़ाई करा, क्या ये सही था सर?

आचार्य: आप देखो, सही-ग़लत इन चक्करों में नहीं पड़ा जाता इतनी आसानी से। आप देखो कि हुआ क्या। उस पर हम जजमेंट वगैरह नहीं करेंगे, हम समझेंगे हुआ क्या। क्या हुआ है? आम आदमी क्या करेगा? ‘तूने मुझे ट्रेन से बाहर फेंका तो मैं तुझे ट्रक से बाहर फेंक दूँगा।’ और गाँधी जी पढ़े-लिखे थे, बैरिस्टर थे, रुपया-पैसा खूब था उनके पास और वहाँ उनका रसूख भी बहुत था। दक्षिण अफ्रीका के रुतबेदार लोगों में थे, उनके वहाँ सम्बन्ध थे, वो भी कुछ कर सकते थे। और कुछ नहीं करते तो एकदम बौरा करके, भाड़े के गुंडे लाकर के कर सकते थे कि ये जो दो अंग्रेज थे जिन्होंने फिंकवाया है, इनको कहीं से फिंकवा दो। क्यों नहीं हो सकता?

ये प्रतिक्रिया होती, ये बदला होता। पर उन्होंने व्यक्तिगत को व्यक्तिगत नहीं रखा, उन्होंने देखा कि ये पूरी बात क्या चल रही है। ये मेरे साथ नहीं चल रही है, ये सब के साथ चल रही है। और ये जो हो रहा है ये सभी के लिए बुरा है, तो उन्होंने फिर एक जन आन्दोलन खड़ा करा। वो ये भी तो कर सकते थे कि न्यायालय के पास जाते और एक छोटी सी बात कहते, कहते, ‘ये जो दो-चार लोग हैं जिन्होंने मेरे पास टिकिट भी था, सबकुछ था, तब भी बाहर फेंक दिया। ये न्यायविरुद्ध काम हुआ है।’ और ये न्याय विरुद्ध काम था, अगर वो न्यायालय के पास जाते तो अंग्रेजों को दंड हो जाता कुछ। मान लो जेल नहीं भी होती तो कुछ अर्थ दंड हो जाता।

बिलकुल कर सकते थे, क्योंकि गाँधी जी ऐसे नहीं चढ़ गये थे, उनके पास टिकिट वगैरह सबकुछ था। तो उनको जो बाहर फेंका गया वो चीज़ इललीगल (गैरक़ानूनी) थी, तो वो जा सकते थे और एक लीगल रिड्रेसल भी माँग सकते थे, उन्होंने वो नहीं करा। वो कुछ और भी कर सकते थे, थोड़ा सा व्यक्तिगत से आगे बढ़कर वो ये भी कह सकते थे कि आने वाले समय में ट्रेनों में किसी तरह का दुर्व्यवहार न हो, इसके लिए जैसे भारत में आरपीएफ होती है न, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (रेलवे सुरक्षा बल), इस तरह की एक अश्वेत प्रोटेक्शन फोर्स वहाँ होनी चाहिए, सीपीपीएफ़ , कलर्ड पीपल प्रोटेक्शन फोर्स। वो ये कर सकते थे, वो भी एक माइक्रो (छोटी) बात होती है कि सिर्फ़ ट्रेन की बात कर रहे हो भाई।

सबसे जो छोटी बात होती वो होती है सिर्फ़ अपनी बात कर रहे हो, आप न्याय लेने चले गये अपने लिए। उससे आगे की बात होती है कि बस आप ट्रेन की बात कर रहे हो, रेलवे विभाग की बात कर रहे हो। उन्होंने सबसे बड़ी बात देखी, उन्होंने कहा, ‘ये मुद्दा न मेरा है, न उन दो अंग्रेजों का है, न रेल यात्रा का है, ये मुद्दा कुछ और है।’ उन्होंने जितना उनको दिखाई दे सकता था उतना उन्होंने सीधे-सीधे मुद्दे की जड़ पर प्रहार करा। जितनी ऊँचाई से वो देख सकते थे उतनी ऊँचाई से उन्होंने मुद्दे की व्यापकता को देखा, ये रिएक्टिवनेस नहीं है। ये अपनी समझ से दिया गया किसी स्थिति को सही प्रतिसाद है।

अंग्रेजी में ये ज़्यादा अच्छे से अभिव्यक्त होता है जब आप कहते हो, ‘ रिएक्टिवनेस नहीं, रिस्पोंस है।’ आप सोचो न आम आदमी क्या करेगा, उसके पास टिकिट वगैरह सबकुछ हो? टिकिट है, पैसा दिया हुआ है, भला आदमी है, इज़्ज़तदार आदमी है और उसको आप उठाकर ट्रेन से बाहर फेंक रहे हो, तो पहले तो वो घूसेबाज़ी करेगा, आसानी से फिंकेगा नहीं। और फिंक गया तो वो प्रतिशोध के बहुत सारे तरीक़े सोचेगा। वो सारे तरीक़े बिलकुल व्यक्तिगत और क्षुद्र होंगे, उन्होंने कहा, ‘कुछ नहीं।’

वो जिन अंग्रेजों ने बाहर फिंकवाया था उनका उल्लेख कभी आगे आपको इतिहास में गाँधी जी की जीवनी में मिलता है? नाम भी पता है उनका? गाँधी जी ने उनको भुला दिया, क्षमा कर दिया, बोले, ‘तुम कौन हो फ़र्क नहीं पड़ता, क्योंकि तुमने मुझे बाहर फेंका ही नहीं, मुझे एक व्यवस्था ने बाहर फेंका है। और ये जो व्यवस्था है ये मानव मात्र के लिए अहितकारी है, मैं ये व्यवस्था बदलूँगा।’

प्र३: सर, मेरा मतलब ये था कि ये बदला ही था लेकिन बदले का स्तर अलग था।

आचार्य: आप इसको बदला कहने में उत्सुक हो तो आप कह सकते हैं। ये बदला नहीं है।

प्र३: रिस्पॉन्स है?

आचार्य: हाँ, ये रिस्पॉन्स है। ये रिस्पॉन्स है। आप मुझसे कुछ कह रहे हैं, मैं आपसे कुछ कह रहा हूँ, ये मैं बदला ले रहा हूँ क्या?

प्र३: एक्शन हुआ है।

आचार्य: एक्शन विथ हाई डिग्री ऑफ़ कॉन्सियसनेस (ऊँची चेतना से हुआ कर्म)। रिएक्शन क्या होता है कि मैंने इसको (माइक को) धक्का दिया ये गिर गया, क्योंकि इसके पास गिरने के अलावा कोई चारा नहीं था, ये रिएक्शन है। मैं यहाँ से जाकर इसको धक्का दे दूँ ये गिर जाएगा, ये रिएक्शन है। मैं इस पर चोट मारूँ, जितनी चोट इसको मारी उतनी ही चोट इसने मेरे हाथ पर मार दी, ये रिएक्शन है।

रिस्पॉन्स दूसरी चीज़ होती है। रिस्पॉन्स में जो हुआ है उसको समझा जाता है। और समझने के बाद फिर जो कर्म होता है वो स्वतः हो जाता है।

प्र३: क्या, आपने एक लाइन बोली थी सर, ये पूरा जीवन बदले की ही प्रक्रिया है?

आचार्य: हाँ।

प्र३: ये बहुत हिलाने वाली लाइन हो गयी है।

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल हमारा तो ऐसा ही है।

प्र३: हम जो भी कर रहे हैं सब एक्शन-रिएक्शन और वही सब चल रहा है?

आचार्य: आप अगर हिल भी जाएँ तो समझिए एक्शन-रिएक्शन से थोड़ा सा बाहर आ गये। ज़्यादातर लोग उस एक्शन-रिएक्शन में इतने मृतवत् फँसे होते हैं कि उनको ये बात कचोटती भी नहीं है कि वो बिलकुल एक पूर्वनियोजित तरीक़े से, स्वचालित तरीक़े से बस ऐसे हो रहे हैं जैसे इसको (माइक) हिला दिया तो हिल गया।

कोई पूछे, ‘क्यों हिले हुए हो आज?’ तो हमारे पास एक ही जवाब होता है, ‘कोई हिला गया तो हिल गये।’ कोई हिला गया तो हिल गये। और जो हिला हुआ होता है वो फिर दूसरों को हिलाता है, तो पूरा जीवन बस वही बदले की एक प्रक्रिया है। बदला माने रिएक्शन , बदला माने प्रतिक्रिया, बदला माने जो हुआ है उसको समझा नहीं बस प्रतिक्रिया कर दी।

रिएक्शन को लेकर हमें जो न्यूटन का नियम है वो एकदम तुरन्त याद आ जाता है न, रिएक्शन। है न? मैं यहाँ दीवार पर रबड़ की गेंद मारूँ तो बाहर फेंक देगा वो वापस। मैं सोने की गेंद मारूँ, वो फिर जितना वहाँ पर — इलास्टिसिटी वगैरह से जो भी आप करोगे तुलना पर वो जो नियम है अपनी जगह रहेगा, प्रतिक्रिया फिर से हो जाएगी।

मैं एकदम कचड़े की गेंद बना दूँ तो भी वही प्रतिक्रिया हो जाएगी। वो समझेगा थोड़े ही, वो ये थोड़े ही कहेगा कि ‘अरे! सोना आया है, स्वागत करो।’ वो ये थोड़े ही कहेगा, ‘कचड़ा आया है दूर से झाड़ दो।’ प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है, वहाँ समझ नहीं होती, वहाँ कुछ भी होता रहे, ‘सब धान एक पसेरी।’

कुछ पता नहीं, जो भी है सब चलने दो, सब हर चीज़ को “अन्धेर नगरी चौपट राजा”, ये प्रतिक्रिया होती है। “सवा सेर भाजी और सवा सेर खाजा”, जैसे न्यूटन्स लॉ, जैसे ग्रैविटी का सिद्धान्त कि बड़ा भारी पत्थर भी ऊपर से फेंको नीचे, तो जिस समय नीचे गिरेगा ठीक उसी समय छोटा सा कंकड़ भी ऊपर से फेंका तो नीचे गिरेगा, फ़र्क ही नहीं पड़ता क्या है, ये मृत होने की निशानी है।

और श्रीमद्धभगवद्गीता की एक प्रति हो आपके पास, वो भी आप ऊपर से नीचे फेंके और मान लीजिए एयर रजिस्टेंस (वायु प्रतिरोध) नहीं है, तो वो भी उसी समय नीचे गिरेगी जिस समय आपने वहाँ से पत्थर फेंका और नीचे गिरेगा। प्रकृति में चेतना नहीं है और हम भी ऐसे ही चलते हैं। फ़र्क नहीं पड़ता क्या हो रहा है हमारे साथ, हम तो बेहोश ही हैं न? अच्छा, आप सो रहे थे, कोई आकर आपकी तारीफ़ कर गया, आपको कितनी खुशी हो गयी? आप सो रहे थे, कोई आपको गाली दे गया, आपको कितना दुख हो गया?

हमें कुछ पता नहीं है क्या हो रहा है, हम सो रहे हैं। कुछ होता रहे हम सो रहे हैं, कुछ भी हमें जगा नहीं पाता। और किसी वजह से, किसी अनुकम्पा से अगर हमारी आँखें थोड़ा खुलने लगती हैं तो माया है, एक अजीब सा सुलाने वाला संगीत फ़िज़ाओं में तैरने लगता है, जैसे कोई कॉस्मिक लोरी। पूरे ब्रह्माण्ड में जैसे एक लोरी तैर रही है, आप जैसे ही जगने लगते हो, कोई आपको थपकी देकर फिर सुला देता है। बिरले होते हैं वो जो इन सब चीज़ों के बाद भी जग जाते हैं।

प्र३: सर, हमारी सीख का आज का जो विषय है, वो है कि चोट से ही हम हटना चाह रहे हैं। मतलब जो आपने बेसिक बात जो कही कि तो हम इस बात पर आ गये, रिएक्शन पर, रिस्पॉन्स पर, तो इसमें ये बात है कि फिर इस तरह से गाँधी जी को चोट लगनी ही नहीं चाहिए थी?

आचार्य: आपको कैसे पता वो चोट ही लगी है? प्रतिक्रिया चोट से आती है रिस्पोंस चोट से नहीं आता। मैं उदाहरण देता हूँ, बिलकुल सम्भव था कि जो हो रहा था वो किसी और के साथ होता, गाँधीजी मात्र उसके द्रष्टा होते, तब भी उन्होंने जन आन्दोलन खड़ा कर दिया होता। उसमें गाँधी जी को व्यक्तिगत चोट क्या लगी होती? किसी और को फेंका गया ट्रेन से, बहुत सम्भव था कि तब भी आन्दोलन खड़ा हो जाता।

चौरी-चौरा में क्या हुआ था, गाँधी जी मारे गये थे क्या? उन्होंने स्थगित कर दिया आन्दोलन। जब किसी और के मारे जाने पर आन्दोलन स्थगित हो सकता है, तो किसी और को फेंके जाने पर आन्दोलन शुरू भी तो हो सकता है। बात व्यक्तिगत चोट की नहीं है कि मुझे चोट लग गयी है, मुझे चोट लग गयी है तो इसीलिए अब मैं — ये काम तो तानाशाह वगैरह करा करते हैं। ये काम तानाशाहों का होता है कि खिलजी को व्यक्तिगत रूप से पद्मिनी पसन्द आ गयी तो पूरे राज्य पर आक्रमण कर दूँगा, अब ये प्रतिक्रिया है।

आपके एक व्यक्तिगत केन्द्र पर चोट पड़ी है, आप चाह रहे थे कि वहाँ पर रानी से आपकी कामना पूरी हो जाए, कामना पूरी नहीं हुई, आपको क्रोध आ गया, तो आपने जाकर वहाँ आक्रमण, हिंसा ये सब शुरू कर दिया।

समझ में आ रही है बात ये?

प्र३: यदि हमारे साथ कुछ हो और कोई प्रतिक्रिया न करें तो यह ज़रूरी नहीं है कि करुणावश या समझ के कारण न किया हो, यह कायरता भी तो हो सकती है?

आचार्य: देखिए, अन्धी प्रतिक्रिया में बहादुरी कौनसी है, बहादुरी दिखाने के लिए भी तो कोई होना चाहिए। कभी आपके ऊपर छिपकली गिरी है?

प्र३: जी, गिरी है।

आचार्य: तो तुरन्त क्या किया होगा?

प्र३: एकदम झटके से हटाया।

आचार्य: आपने जो किया वो उस छिपकली को बड़ा भारी पड़ा होगा क्योंकि कुछ ग्राम उसका वजन है और अपना हाथ देखिए, तो ये आपने बड़ी भारी वीरता दिखायी?

प्र३: नहीं, उसके साथ असहजता ही दिखायी, मतलब उसका तो कोई दोष ही नहीं था, गिर गयी बेचारी।

आचार्य: प्रतिक्रिया में बहादुरी क्या होती है! छिपकली गिरी और आपने, हू (छिपकली हटाने का अभिनय करते हुए) और उसमें उसको हो सकता है चोट भी लग गयी हो, न लगी हो, कुछ हुआ हो हमें नहीं मालूम, पर इसमें बहादुरी क्या है आपकी ओर से? इसमें क्या बहादुरी है? कुछ भी नहीं। क्योंकि आपने किया ही नहीं, आपसे हो गया, प्रतिक्रिया ऐसी होती है।

वहाँ कोई बहादुर ही नहीं है तो बहादुरी कहाँ से आएगी? वहाँ कोई है ही नहीं जिसने कुछ किया हो, किसको बोलोगे कि ये है वो बहादुर जिसने किया? जब आपके कन्धे पर छिपकली गिरी थी तो कौन था जिसने हाथ चला दिया? वो स्वतः चल गया, वो ऑटोमेटिक था, स्वचालित था। जब किसी ने करा नहीं तो उसमें किसकी बहादुरी? तो ये प्रतिक्रिया न करने को कायरता नहीं कहते। और दूसरी बात जो प्रतिक्रिया नहीं कर रहा वो ऐसा नहीं है कि कुछ नहीं कर रहा।

गाँधी जी ने अगर प्रतिक्रिया नहीं करी है उस प्लेटफार्म पर तो ऐसा थोड़े ही कुछ नहीं किया। हाँ, प्रतिक्रिया करी होती तो कोई बहुत छोटी सी चीज़ कर दी होती। अंग्रेजों पर थूक दिया होता या पीछे से पत्थर मार दिया होता ट्रेन पर, प्रतिक्रियाएँ तो ऐसी ही होती हैं, नहीं देखा है? आप जा रहे होते हो बरसात में सड़क पर और गड्ढों वाली सड़क हो बगल से गाड़ी निकल जाए और पूरा आपको स्नान करा जाए तो ऐसा थोड़े ही है कि आप प्रतिक्रिया नहीं करते, करते ही हो। क्या करते हो? कोई पीछे से जूता फेंककर मार देता है, कोई पत्थर फेंककर मारता है, कोई गाली देता है, कोई कुछ करता है।

गाँधीजी भी ये सब करके निवृत्त हो सकते थे। कल्पना करो न कि वो पड़े हुए हैं वहाँ पर, उठे और पत्थर मार रहे हैं जाती हुई ट्रेन पर, कर सकते थे। वो बहुत छोटी चीज़ होती है। जो प्रतिक्रिया नहीं करता वो बड़ी चीज़ करता है, उन्होंने बड़ी चीज़ करी। छोटी चीज़ करनी हो तो रिएक्ट कर देना कि ‘मैं हर्ट हुआ हूँ, मैं रिएक्ट करूँगा’, ये छोटी चीज़ होगी।

जो रिएक्शन से मुक्त हो जाता है वो अब बहुत बड़ा कुछ करने के लिए फ़्री , उपलब्ध हो जाता है, वो बड़ा काम करेगा। रिएक्शन छोटा होता है, बहुत छोटा है। हमें न्यूटन बाबा क्या बोल गये हैं? रिएक्शन उतना ही बड़ा होगा जितना बड़ा एक्शन , तो रिएक्शन में क्या दम है भाई! पर रिस्पोंस बहुत बड़ा भी हो सकता है। रिस्पोंस इतना बड़ा हो सकता है कि जिस ब्रितानवी सल्तनत में सूरज कभी नहीं डूबता था वो सल्तनत दहल जाए, इतना बड़ा रिस्पॉन्स हो सकता है।

रिएक्शन हमेशा छोटा होगा, गाली दे दी, पत्थर मार दिया, इसमें और क्या होता है रिएक्शन , इससे ज़्यादा क्या रिएक्शन होता है, बस। तो रिएक्ट करने में कोई वीरता नहीं है क्योंकि रिएक्ट करने में वीर नाम का कोई है ही नहीं। रिएक्ट करने में तो बस ये (हाथ झाड़ना) है और छिपकली है, बताओ ये वीरता का काम है, क्या दे आपको इसमें? क्या मिलना चाहिए? परमवीर चक्र कि आपके शारीरिक क्षेत्र का एक दुश्मन सरीसृप ने उल्लंघन किया, आपकी सीमा में घुस आया और उसके पुराने डायनासोरों से कोई बहुत क़रीब का रिश्ता था, इतने बड़े महान शत्रु को फिर आपने सिर्फ़ अपने हाथ के एक झटके से दूर भगा दिया, चलो इनको महावीर चक्र प्रदान किया जाए! ये क्या है, ये तो कोई भी करेगा।

और छिपकली कुत्ते पर गिर जाए तो कुत्ता भी यही करेगा, तो उसमें हमने क्या बड़ा काम कर दिया, कौनसी बहादुरी है? पर ज़िन्दगी हमारी वैसे ही बीतती है, एक के बाद एक बस प्रकृति के संयोग और उन संयोगों पर हमारी प्रतिक्रिया, संयोग-प्रतिक्रिया, संयोग-प्रतिक्रिया। बाहर से चोट खाते हैं बदला लेते हैं, चोट खाते हैं बदला लेते हैं, चोट खाते हैं बदला लेते हैं, यही ज़िन्दगी है।

जिस दिन आप स्वतन्त्र हो गये क्रिया से, क्रिया के प्रतिक्रिया करने से जिस दिन आप स्वतन्त्र हो गये उस दिन देखोगे कि घोर कर्म के दरवाज़े आपके लिए खुल जाते हैं, उसी को ‘निष्काम कर्म’ कहते हैं। निष्काम कर्म वो जो प्रतिक्रियात्मक न हो। तो ये भाव कभी भीतर मत आने दीजिएगा कि जो प्रतिक्रिया नहीं कर रहा है वो डरपोक है कि कायर है, वगैरह-वगैरह, कुछ नहीं वो महावीर है।

वो कह रहा है, ‘करूँगा तो ज़रूर, पर वो करूँगा जो उचित है। क्रिया के अधीन होकर, वशीभूत होकर प्रतिक्रिया नहीं करूँगा। करूँगा तो बहुत कुछ, पर वो करूँगा जिसकी गवाही मेरा होश देता है, मेरा बोध देता है वो करूँगा।’

हाँ, कहें।

प्र३: जो आप बात कह रहे थे कि बदला चोट का विपरीत नहीं चोट का विस्तार होता है।

आचार्य: बहुत बढ़िया।

प्र३: हम समझते है कि ख़त्म हुई बात, लेकिन हमने ख़त्म ही नहीं करी।

आचार्य: हाँ, तो और क्या!

प्र३: हम तो फँसे रहे गये उसमें, ये बहुत बड़ी मिस्टेक है?

आचार्य: और क्या! देखा नहीं है जब लोग कीचड़ मल रहे होते हैं एक-दूसरे को? आपके ऊपर आकर कोई थोड़ा कीचड़ मल गया, आप उसके पीछे भागते हो, ‘तूने मुझे कीचड़ लगाया तेरे कीचड़ लगाऊँगा’, थोड़े ही देर में आपकी हालत कैसी नज़र आती है? ऊपर से लेकर नीचे तक…, तो कीचड़ का बदला लेना कीचड़ का विपरीत था या कीचड़ का विस्तार था?

प्र३: विस्तार था।

आचार्य: पहले थोड़ा सा कीचड़ लगा था, आप बदला लेने गये, ऊपर से लेकर नीचे तक कीचड़-ही-कीचड़।

प्र३: होली का पूरा त्यौहार ऐसे ही मनाया जाता है।

आचार्य: होली हो, वर्ष के अन्य दिन हों, कीचड़ कई तरह का होता है न।

प्र४: जब भी मतलब पीछे मुड़कर अपग्रेड्स को या कॉन्वर्सेशन्स (बातचीत) को देखता हूँ, तो दिखता है कि शुरुआत तो ऐसे ही होती है कि मैं ज्ञान देना चाहता हूँ या कुछ अच्छा करना चाहता हूँ। लेकिन एक बिन्दु के बाद देखता हूँ कि करुणा नहीं दिखती उसमें तो...

आचार्य: जब भी किसी को ज्ञान दीजिएगा, अपने भीतर कुछ ऐसा मत छोड़िएगा जिस पर नज़र रखने की भी ज़रूरत बाक़ी है, तभी आप सामने वाले पर नज़र रख पाएँगे। अगर अपने ही अन्दर अभी कोई ऐसा बचा हुआ है जिस पर नज़र रखने की ज़रूरत है तो आप सामने वाले पर क्या नज़र रखोगे? आप तो गये थे ज्ञान देने, आहत होकर आ जाओगे।

वो जीत गया जिसको ज्ञान देने गये थे। और उसको बताने क्या गये थे? ‘देखो, आहत होना अहंकार की और कमज़ोरी की निशानी है।’ और उसने कहा, ‘भक्क’, और ख़ुद क्या हो गये? आहत और इतना सा मुँह लेकर आ गये। अभी अपने ही भीतर वो बचा हुआ है न जिसको उपचार की ज़रूरत है, जिस पर नज़र रखने की ज़रूरत है। उसको तुम ज्ञान दे रहे हो, वो प्रमाण देकर जीतेगा। वो शब्दों से नहीं जीतेगा, वो आपको आहत करके जीतेगा अब।

उम्मीद रखकर ज्ञान मत दे देना। और उम्मीद अगर रखना भी तो उसकी भलाई की रखना, अपनी सलामती की नहीं। उम्मीद पहली बात तो रखो मत, लेकिन चलो माटी के पुतले हैं इस नाते उम्मीद रखनी भी है तो उम्मीद उसके लिए रखो, अपने लिए नहीं। ये मत सोचना कि वो आपको धन्यवाद देगा या कुछ और। उम्मीद अधिक-से-अधिक इतनी हो सकती है कि ‘भाई समझा रहा हूँ तो समझने की कोशिश करना’, यही उम्मीद है।

दुनिया बहुत तोड़ती है उनको जिनको उम्मीदें होती हैं दुनिया से। आप करो उम्मीद, इतना तोड़े जाओगे, इतना तोड़े जाओगे, किसी का हसरत भरा चेहरा देखो तो ख़ुद ही चित्रित कर लो कि थोड़ी देर में इसके मुँह पर उँगलियाँ-ही-उँगलियाँ छपी होंगी, पूरा पंजा, यहाँ-यहाँ-यहाँ (चेहरे के हर हिस्से पर)।

उम्मीद माने अपमान। और उम्मीद माने अप्रेम। दो, माँगो मत। जितना है, जितना सम्भव है देते हैं; पाने की उम्मीद नहीं रखते। जिसने पाने की उम्मीद कर ली, अरे! रे! रे!, बड़ी दयनीय हो जाती है हालत, भिखारी। और ऐसा भिखारी जो भीख नहीं पाएगा अपमान पाएगा बस। जो साधारण सड़क वाला भिखारी होता है उसको अपमान तो मिलता है पर साथ में थोड़ी भीख भी मिल जाती है। पर जो उम्मीदों वाला भिखारी होता है उसको बस अपमान भर मिलता है, भीख भी नहीं मिलती।

देने का भाव रखो, ये भी तो रिश्ता हो सकता है न? क्या करते हैं रिश्ते में? देते हैं, लुटते हैं, जो कुछ है सब लुटा देते हैं अपना। हम रिश्ते में लुटने के लिए हैं भोगने के लिए नहीं हैं। जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी है, बरसाकर आ जाते हैं, उम्मीद नहीं। और बरसाने के बाद ये भी नहीं कहते, ‘देखो, इतना बरसाया है, थोड़ा हमें प्रशस्ति पत्र दे दो, एक थैंक्यू नोट मिलेगा क्या?’ “नेकी कर दरिया में डाल।” दिया और भूल गये, सचमुच भूल जाओ। स्वभाव होना चाहिए ‘दान’, देते हैं बस।

दाता हैं, हिसाब भी नहीं रखते देने का। कोई पूछे, ‘कितना दे दिया?’ तो अचकचा जाओ, क्योंकि हिसाब कभी रखा ही नहीं। हिसाब रखना भी एक तरह की उम्मीद है, हिसाब भी नहीं रखते। चोट नहीं लगेगी, अपमान भी नहीं होगा, दुख भी नहीं पाओगे, बादशाह की तरह जिओगे। हम ग़ुलामी के लिए पैदा होते हैं, इससे बड़ी बात नहीं हो सकती कि ये जो जेल है जिसमें हम पैदा होते हैं, ये जो कारावास है, जिसमें आप गर्भ से बाहर आते हो, उसमें आपकी क़िस्मत तो यही तय थी कि क़ैदी जैसे जियो, लेकिन आप जी गये बादशाह जैसे, ये होता है करिश्मा। ये करिश्मा ही करके दिखाना है कि पैदा तो हुए थे ग़ुलामी के लिए, जी गये बादशाह की तरह। और वही है, “जिनको कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह।”

जहाँ उम्मीद का कटोरा खोला, तहाँ बन गये भिखारी भी, लानतें भी पड़ेंगी, लातें भी पड़ेंगी, सब कूड़ा! सन्तों की वाणी हैं खोजकर लिखिएगा कि याचक से छोटा कोई नहीं होता और दाता से बड़ा कोई नहीं होता। सन्त रहीम का है, “वे नर मर गये”, “रहिमन वे नर मर गये जो कहीं माँगन जाएँ” — आगे और ज़ोर देते हैं — “उनसे पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।” दो, माँगो नहीं दो। ‘पर हमारे पास तो देने के लिए कुछ है नहीं, हम कैसे दें?’ ‘तुम्हारे पास देने के लिए इसीलिए कुछ नहीं है क्योंकि तुम देना चाहते नहीं।’

‘नहीं, हमारे पास सचमुच कुछ नहीं है।’ ‘तुम दो, आ जाएगा।’ जो देना शुरू करते हैं उनके पास देने के लिए आ जाता है। जो भोगना शुरू करते हैं उनको भोगने के लिए भी नहीं मिलता। ‘नहीं, कहाँ से आएगा?’ ‘वो आ जाएगा, अपनेआप आएगा।’ एक हमारा पुराना पोस्टर है, उसमें लिखा है, ‘ गिव एंड गिव फ्रॉम एमप्टी पॉकेट्स ' (दो और केवल दो, खाली जेब से भी दो)। जेब खाली हो, तुम देना शुरू करो, जेब में आ जाता है, पर उतना ही आता है जितना देना चाहते हो।

देने वाले का हाथ कभी खाली नहीं रहता, भोगने वाले का हाथ अक्सर खाली पाओगे। किसी का हाथ अगर हमेशा भरा देखो, देखो कि इसके पास हमेशा रहता है, तो जान लो उसके पास देने के लिए रहता है।

‘आप अतार्किक बात कर रहे हैं, एमप्टी पॉकेट से कोई कैसे देगा?’ एक काम करो, अपना तर्क है न उसी पॉकेट में डाल लो और कोई जवाब नहीं है। अपना तर्क रखो अपनी जेब में। हम कह रहे हैं, ‘प्रयोग करके देखो’, तुम विवाद कर रहे हो। विवाद कभी प्रयोग का स्थान ले सकता है? हम कह रहे हैं, आज़माकर तो देखो। “हाथ कंगन को आरसी क्या”, करके देखो होता है कि नहीं।

बहुत सीधा सा इसका विज्ञान है, ‘अहम् भोक्ता है, तो अहम् अगर दाता हो गया तो अहम् नहीं हो गया', बस ये बात है, इतनी सी। अहम् क्या है? भोक्ता। वो भोक्ता के विपरीत, विपरीत भी नहीं ऊपर, अगर दाता हो गया तो दाता तो वो हो ही नहीं सकता न। अहम् अगर है तो हमेशा क्या रहेगा? भोक्ता ही रहेगा। और दाता हो गया तो माने मिट गया।

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