जब लगे कि नाइंसाफ़ी हुई है आपके साथ || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि मेरे साथ कोई नाइंसाफ़ी हुई है, इनजस्टिस (अन्याय)। तो मैं ये समझना चाहती हूँ कि क्या ये नाइंसाफ़ी का भाव भी अहंकार के क्षेत्र में ही है कि देयर इज़ समथिंग लाइक इनजस्टिस इन रियलिटी? (वास्तव में अन्याय जैसा कुछ है भी)
और अगर सच्ची में नाइंसाफ़ी वैलिड (वैध) है तो क्या बदला सही होगा? जैसे हम इंग्लिश में बोलते हैं कि रिडेम्प्शन वर्सेज रिवेंज (मुक्ति बनाम बदला)।
आचार्य प्रशांत: देखिए, कहानी बहुत पीछे से शुरू होती है न। जिसकी जो पात्रता हो उसे वो न मिले, इसको हम ‘अन्याय’ बोलते हैं। न्याय ‘नय्’ धातु से आता है और ‘नय्’ का अर्थ होता है सम्यक स्थान पर स्थापित करना। जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए उसका वहाँ होना ही न्याय है, बस यही न्याय है।
अब अहंकार का जन्म ही अहंकार के साथ अन्याय है। अहंकार का जन्म ही उसके साथ अन्याय है क्योंकि अहंकार को होना कहाँ चाहिए? शान्त होना चाहिए, आत्मा की गोद में होना चाहिए, पूर्ण होना चाहिए या शून्य, लुप्त, विलीन, मुक्त होना चाहिए। पर वो तो बेचारा बड़ी बिलबिलाती हालत में है और जन्म से ही ऐसा है, तो पहला अन्याय, इनजस्टिस तो जन्म ही है।
पहला अन्याय तो जन्म ही है। तो न्याय भी फिर एक ही हो सकता है कि जिसका जन्म हुआ है उसको उसके लक्ष्य तक, उसकी पूर्णता तक पहुँचा दो, सिर्फ़ यही न्याय है। बाक़ी जो हम न्यायालयों में देखते हैं वो बस एक ऐसे ही है, ऊपर-ऊपर का खेल है, बहुत सतही बात है। व्यवहार में उसकी कुछ उपयोगिता हो सकती है, उसकी कोई आत्यन्तिक या पारमार्थिक उपयोगिता नहीं है।









