
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।














आचार्य प्रशांत: सामने वाला भी देख कर बात करता है, उसे भी पता है कौन फँस जाएगा, उसी से बात करता है। बाज़ार में निकलो और बेचने वाले खड़े होते हैं, वो अच्छे से जानते हैं किस पर आक्रमण करना है। पूरा परिवार आगे निकल जाएगा, उसके बाद, 'बहनजी'। कभी


आचार्य प्रशांत: दुनिया बहुत मूल्य देती है ताकत को और प्रसिद्धि को। दुनिया इन उपकरणों को मूल्य तो देती है पर उनका इस्तेमाल करना नहीं जानती। उनका वो इस्तेमाल करती है मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं, मंजिल से और दूर जाने के लिए। पैसा दुनिया भी कमाती है; मैं

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। परिवार से ये फिर आता है कि हमने जो तुम पर इतने सारे पैसे इंवेस्ट (निवेश) किये, उसका क्या मतलब? अब वो तुम

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे अभी थोड़े ही समय पहले तक इसी बात पर चर्चा हो रही थी कि कैसे जो छोटे कस्बे हैं या शहर हैं हिन्दुस्तान में, उसमें क्योंकि लोगों के पास ठीक काम नहीं है करने को, तो अपने समय बर्बाद करने को वो वही सारे ऐबों में

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में पैसा कितना ज़रूरी है?

प्रश्नकर्ता: आज आचार्य जी आपने दो चीज़ें समझायीं, साथी और काम के बारे में, साथी कैसा चुनें और काम कैसा चुनें। साथी के बारे में तो काफ़ी कुछ समझ में आ गया, काम को लेकर इतनी स्पष्टता नहीं हुई। क्योंकि हर काम कहीं-न-कहीं अन्त में पैसे से जुड़ता है और

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप हमेशा बोलते हैं कि हमारे रिश्तों की बुनियाद अध्यात्म ही होना चाहिए, प्राकृतिक प्रेम की बुनियाद पर हमारे रिश्ते नहीं बनने चाहिए।

आचार्य प्रशांत: जो ग़ुलामी की रोटी खा रहा हो, उसे परममुक्ति की बातें शोभा ही नहीं देतीं। परमात्मा भी मुस्कराकर पूछेगा कि रोटी तक तो तू ग़ुलामी की खाता है और बातें करता है मुक्ति की।


प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आज सुबह से थोड़ा मैं परेशान था इसलिए मैं चाहता था मैं आपसे थोड़ा बात करूँ इस विषय में। मेरा एक दोस्त है उसका मुझे सुबह फ़ोन आया था और सुबह जो उसका फ़ोन आया था उसके पीछे थोड़ा





प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप हमेशा बोलते हैं कि हमारे रिश्तों की बुनियाद अध्यात्म ही होना चाहिए, प्राकृतिक प्रेम की बुनियाद पर हमारे रिश्ते नहीं बनने चाहिए। मैं आज अपनी ज़िंदगी में रिश्ते देखती हूँ अभिभावकों के साथ या मेरे भाइयों के साथ या मेरे प्रोफ़ेशनल लाइफ़ (व्यावसायिक जीवन) में, तो…

लड़का पच्चीस साल का, तीस साल का है और कुल एक भाई एक बहन है। अकसर माँ-बाप कार्यरत रहे थे, दोनों ही कमाते थे तो बचत है घर में। मकान अपना है। लड़का अगर पच्चीस-तीस साल का है तो माँ-बाप कितने साल के हैं?

जब सड़क पर निकलो न तो अपनी कमियाँ पता चलती हैं। जो व्यक्ति घर में ही बैठ गया वो बड़ा दम्भी, घमंडी, अहंकारी हो जाता है क्योंकि उसे अपनी कमियों का पता भी नहीं होता। अकसर गृहिणियों की अकड़ बिलकुल लाजवाब होती है। “मैं ही बेग़म हूँ, मैं ही रानी


ना किसी पैसे के प्रदर्शन के आगे दबो, झुको, ना किसी की ताक़त के आगे दबो, झुको। और किसी की अंग्रेज़ियत के आगे तो बिलकुल दबना, झुकना नहीं है। और किसी के सौंदर्य के आगे भी दबना, झुकना नहीं है। कि सुंदर लड़की आ गई या हैंडसम लड़का आ गया



दुनिया अगर ताक़त की भाषा समझती है तो ताक़त अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हाँ, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया।

पैसा ख़ुद कमाना पड़ता है न तो ज़िम्मेदारी अपने-आप आ जाती है। अधिकांश मामलों में जहाँ पर आज हम महिला को शोषक के तौर पर देख रहे हैं, वहाँ बात यह है कि ख़ुद वो कमा नहीं रही है।




प्रश्नकर्ता: गुरुदेव, मैं पूछना चाहता हूँ कि कुछ महापुरुष ध्यान साधना करके मुक्ति पाना चाहते हैं, और कुछ आत्मज्ञान होने के बाद भी बार-बार धरती पर आना चाहते हैं दुनिया के सुधार के लिए, ताकि दुनिया उनका अनुसरण कर सके और सुधार हो सके। तो, दोनों में से कौन-सा ठीक

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैंने अपने जीवन में असफलताओं की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लिया है। मेरे सातवें सशस्त्र सीमा बल के साक्षात्कार में असफल होने के बाद अब जीवन काली स्याही हो गया है। अतः मेरे मन में कई बार आत्महत्या के भी ख्याल आए पर इतनी हिम्मत नहीं




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अभी जॉब कर रहा हूँ और घर वालों के हिसाब से, समाज के हिसाब से नौकरी की जो स्थिति है, वो ठीक है, पैसे ठीक-ठाक मिल रहे हैं। पर मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही उससे। संतुष्टि काम के मामले में नहीं क्योंकि मैनें देखा है कि

एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…
शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।
आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।
वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।
शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।
दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।
अपने साथ जो चले — जानने वालों ने उसको बस एक नाम दिया है। बोले तुम्हारे साथ जो चले वो वो भी नहीं हो सकता जो तुम्हारे बगल में खड़ा हो। जो तुम्हारे साथ हमेशा चले वो सेल्फ होता है — तुम ही सिर्फ़ अपने साथ चल सकते हो। तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।
ये रुपए पैसे का खेल ये आदमी द्वारा आदमी का शोषण। ये एक आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो अमीर हूँ और दूसरे आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो गरीब हूँ। तुम्हें ये सारा खेल समझ में आएगा कि ये कैसे चल रहा है। खेल के शिकार मत बनो, खेल के खिलाड़ी मत बनो। थोड़ा सा बाहर निकलो और इस खेल के दृष्टा बनो। ये खेल ऐसा है कि जो इसे खेलने लग जाते हैं उन्हें ये खेल कभी समझ में नहीं आता। ये खेल उन्हें खा जाता है, इस खेल को वही समझ सकता है जो इस खेल से थोड़ा बाहर आ गया है।
गरीब वह, जिसे अभी और चाहिए, जो मांगे ही जा रहा है। ज़रूरतें बहुत थोड़ी होती हैं, और पैसों का, चाहतों का, कामनाओं का कोई अंत नहीं होता। अगर तुम्हें कोई ऐसा दिखे, जिसके जीवन में आनंद है, पूर्णता है, जो बंटा हुआ नहीं रहता, खुलकर हँस सकता है, हर समय चिंता में नहीं रहता, तो समझ लेना कि जीवन को इसी ने जिया है; यह अमीर है भले ही इसके पास पैसा कम हो।
अध्यात्म पैसे का विरोधी नहीं है। अध्यात्म कहता है कि पैसा न अच्छा है, न बुरा; मुक्ति अच्छी है। मुक्ति के लिए जितना पैसा चाहिए, उतना अर्जित करो, पर अतिरिक्त धन बंधन बनता है। पैसा बोझ नहीं बनना चाहिए। दुर्भाग्य की बात ये है कि निर्धन धन की कमी का बोझ उठाता है—कि पैसा नहीं है, कम है। धनवान अधिक धन का बोझ उठाता है—कि इसे सुरक्षित रखना है। पैसे की कमी या अधिकता अगर बेचैनी लाए, तो दोनों ही गड़बड़ हैं।
मूलभूत शिक्षा लेनी ज़रूरी होती है। कुछ बातें हैं दुनिया की, जो नहीं पता होंगी तो पूरे इंसान भी नहीं बन पाओगे। विद्या-अविद्या दोनों चाहिए। अविद्या माने सांसारिक भौतिक शिक्षा और विद्या माने आध्यात्मिक शिक्षा। उपनिषद् कहते हैं, जिनके पास विद्या नहीं होती, वो गहरे कुएँ में गिरते हैं। लेकिन जिनके पास सांसारिक ज्ञान नहीं होता वो और ज़्यादा गहरे कुएँ में गिरते हैं। और जिनके पास दोनों हैं, वो मृत्यु को पार करके अमर हो जाते हैं।
श्रोता १: वास्तविक में कुछ नया नहीं है। लेकिन हम उसे नया बनाना चाह रहें हैं। जैसे कि मैं आज आया हूँ यहाँ पर, वैसे काफ़ी समय बाद आया हूँ। और कहीं-न-कहीं मैं ये चाह रहा था कि आज मैं जाऊँ। क्योंकि आज न्यू ईयर वाला है दिन और मैं…
यस्यामिमे घण्नरदेव दस्यव: सार्थ विलुम्पन्ति कुनायकं बलातू। गोमायवो यत्न हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं बवृका:।।
अर्थ: महाराज, उस जंगल में छ: डाकू हैं। इस वणिक समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। उसके नेतृत्व में जब यह समाज वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात उसे लूट लेते हैं।
~ परमहंस गीता…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। तो आचार्य जी, मेरा जो सवाल है वो शिक्षा से सम्बन्धित है। मैं जानना चाहती हूँ कि सच्ची शिक्षा क्या है? जैसे कि शिक्षा के प्रति हमारी विचारधारा क्या होनी चाहिए? जैसे कि हम स्कूल, कॉलेजेज, यूनिवर्सिटीज में जाते हैं तो जो जितने प्रसिद्ध इन्स्टिट्यूशन (संस्थान)…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शुभम है। मैं एक-डेढ़ साल से सुन रहा हूँ आपको। मैं कॉर्पोरेट नौकरी में हूँ, इंजीनियरिंग जॉब भी है तो मेरा सवाल ये था कि किसी भी काम में जाते हैं शुरुआत में तो वो नया होता है, उसके बाद वो दिनचर्या बन जाता…
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: कुल मिलाकर के आप…
प्र: आचार्य जी, सत्कार्य मतलब?
आचार्य: काम ऐसा होना चाहिए जो पैसा माँगे। अपने लिए तो पैसा उतना…
समझ रहीं हैं?
और मैं नहीं कह रहा हूँ कि पूँजीवादी हो जाओ, धन्नासेठ…
आचार्य प्रशांत: क्या होता है जब कोई कम्पनी किसी पद के लिए कुछ लोगों को नौकरी पर रखना चाहती है? क्या वो जाती है और ज़बरदस्ती लोगों को लेकर आती है? ये लोग जो हर शाम, हर रात, अपने दफ़्तरों से अपने घर जाते हैं, अगली सुबह क्या ये ज़ंजीरों…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कई मानसिक झंझटों से छूटने और पाँच वर्षों से चल रही रिलेशनशिप (सम्बन्ध) के टूटने के बाद मैंनें अपनी ग्यारह वर्षीय पुरानी सरकारी सेवा से त्यागपत्र इसी वर्ष मई में दे दिया। मैंने अपने जुनून को — जो कि पढ़ाना है — समय देना अधिक उचित…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अध्यात्म के बारे में या उपनिषद मैंने पढ़े नहीं हैं लेकिन जितना आपसे समझ आता है, उसको मैं अपने जीवन में लाने की कोशिश करता हूँ। मगर अब परेशानी ये है — पहली चीज़ पढ़ाई से संबंधित है, मैं किसी विषय में कुछ पढ़ने की कोशिश…
प्रश्नकर्ता: ऐसा देखा गया है कि जो व्यक्ति धनी है, सफ़ल है, बलशाली है सिर्फ़ वही बिना डरे जी पाता है, समाज में अपनी बात रख पाता है या समाज में किसी ग़लत काम का भी विरोध कर पाता है। तो समाज में एक असली मर्द की तरह जीने के…
साठ-पैंसठ।
अभी-अभी रिटायर (सेवानिवृत) हुए हैं,…
अच्छे-अच्छे लोग आप देखोगे, खूब कमा रहे होंगे, उनसे पूछो, “क्वालिटी ऑफ लाइफ? रिचनेस इंडेक्स? (जीवन की गुणवत्ता? समृधि सूचक?)” शून्य! “गाना आता है?” नहीं! “तैरना आता है?” नहीं! “संगीत सीखा कुछ?” नहीं! “कुछ और भाषाएँ सीखीं?” नहीं! “दिनभर करते क्या हो?” “कमाता हूँ, कमाता हूँ, कमाता हूँ!” अरे!…
ना किसी के पैसे के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, ना किसी के ताक़त के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, और किसी की अंग्रेजियत के आगे तो बिलकुल दबना-झुकना नहीं है। और किसी के सौंदर्य के आगे भी दबना-झुकना नहीं है कि सुंदर लड़की आ गयी कि हैंडसम लड़का आ गया और…
जितना तुम्हारी…
पैसा कमाने बाहर अगर निकलो, सड़क पर जाओ तो आटे-दाल का…
“उसमें कुछ नहीं?”
“बहुत है!“
“फिर?”
“नहीं, वो ए. टी. एम एक ही है, वह उनके पास रहता है।“
मैंने कहा, “ले!”
अपना खाता रखो, और ए. टी. एम का पासवर्ड पतिदेव…
प्रश्नकर्ता: सर, मैं भविष्य में नहीं जीता, वर्तमान में जीता हूँ। लेकिन मैं वर्तमान में देखता हूँ, क्या सफलता, सक्सेस सिर्फ़ पैसे से सम्बंधित है? इज़ सक्सेस रिलेटेड टु ऑनली मनी एंड नथिंग एल्स? क्योंकि मैं वर्तमान में यही देखता हूँ, जब भी किसी को सक्सेसफुल (सफल) होते हुए…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो आप कमाई की बात कर रहे हैं कि "जो समय बीत रहा है उसमें कमाई क्या करी?" तो, क्या इसका मतलब सिर्फ जो ये षडरिपु हैं, इनसे छुटकारा है?
आचार्य प्रशांत: बस यही, और कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। असल में, कमाई का और कोई…
आचार्य प्रशांत: नहीं, आमतौर पर हम, जिसे कैरियर कह रहे हैं, वो चुनते ही ऐसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! जी मेरा नाम सूरज है और मैं उत्तरांचल का रहने वाला हूँ। अभी मैं चार-पाँच साल से एक जॉब कर रहा हूँ। जो ब्लूटोकाई नाम की कंपनी है उसमें कॉफ़ी का काम होता है। उसमें सर्विंग का काम, होटल उद्योग ये सभी है। तो इसकेे साथ-साथ…
प्रश्नकर्ता: ऐसे जीवन में मौके आते हैं जैसे ग्रेजुएशन (स्नातक) के बाद आया था वैसे ही अभी भी चुनाव करने की स्थिति में हूँ। एक काम से सम्बंधित है कि कुछ काम करना है लेकिन बहुत ज़्यादा स्पष्ट नहीं है, एक आहट है हल्की सी, लेकिन और कोई मुझे ऑप्शन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हमें सिर्फ़ इतना कमाना चाहिए कि जिससे मात्र पेट भर सके? क्या इससे अतिरिक्त पैसा बंधन है?
आचार्य प्रशांत: तुमने कहा ज़्यादा कमाना नहीं; ज़्यादातर लोग ज़्यादा नहीं कमाते। पर वो ज़्यादा क्यों नहीं कमाते? क्या इसलिए कि वो संन्यस्थ हैं? या इसलिए कि तेजहीन हैं,…