
ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।




आचार्य प्रशांत: गलत-सही का निर्धारण बस एक चीज़ से होता है — आप आंतरिक तौर पर हल्का अनुभव कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं। इसी से समझ लीजिए न (पानी का गिलास उठाकर)। अगर इसकी आदत है अपने में जोड़ते ही रहने की, चिपकते ही रहने की, तो










प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। थोड़ा-सा पहली बार आया हूँ तो थोड़ा-सा बता दूँ कि कैसे आप तक पहुँचा। बहुत ज़ोर से भाग रहा था,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो ‘इच्छा’ होती है वो मुझे आज तक पता ही नहीं चला कि मेरी आखिर इच्छा है क्या। जैसे कि मैट्रिक पास किया और सब दोस्त आईएससी किए, हम भी कर लिए। फिर सब इंजीनियरिंग का तैयारी करना शुरू किए हम भी किए साथ में। इच्छा नहीं…


आचार्य प्रशांत: अर्चना है देवबंध से, दूसरे अध्याय का छठा श्लोक उद्धृत करा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कोई भी अपने विचार हमपर थोप देता है, उसी विचार को हम फिर अपना बना लेते हैं और उसी के अनुसार जीने लगते हैं। दूसरों के विचारों को अपने ऊपर आने से कैसे रोकें?
आचार्य प्रशांत: क्या ये सवाल भी दूसरों ने कहा है पूछने को?




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ज्ञान के सम्बन्ध में कुछ सूत्र हैं; ‘ज्ञानं बन्धः’ – ज्ञान बंधन है। तो इस पर बहुत विचार किया था तो पता चला कि जो जानते हैं हम उसकी वजह से ही दुख में हैं। तो फिर बात ये उठी कि यहाँ पर भी तो हम

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! पहले तो मैं आपको धन्यवाद देना चाहूँगी, आपने मेरे जीवन को सही दिशा दी है। मुझे पता चला आपसे मिलकर कि मुझे अपने जीवन में क्या करना है।

प्रश्नकर्ता: जैसे हम साँस ले रहे हैं, तो हम सोचते हैं कि हम ही कर रहे हैं। जबकि सहज हो रही है ये चीज़ें; हमारा कोई अपना

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, एक्चुअली (दरअसल) एक बैड एक्सपीरियंस (बुरा अनुभव) है पास्ट रिलेशनशिप (अतीत का रिश्ता)। तो उसमें ऐसे था कि मुझे उसके साथ रहना नहीं था। लेकिन मुझे उसके पीछे के रीज़न्स (कारण) नहीं पता है, क्यों नहीं रहना है। बस मुझे इतना ही पता था कि नहीं रहना…

प्रश्नकर्ता: कोई एक्शन (कर्म) लेता हूँ तो कभी-कभी ऐसा होता है कि पता नहीं चलता है, कोई कारण है या फिर

आचार्य प्रशांत: जब भी कभी मन में यह प्रश्न आये कि आचार्य जी क्या करूँ, किसी भी सन्दर्भ में यह प्रश्न आये — वह किस्सा कुछ भी हो सकता है। वह यह भी हो सकता है कि पुरानी गाड़ी हटा कर अब एक नयी गाड़ी लेनी है। वह यह भी

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कबीर बार-बार कहते हैं–


ना ब्रह्म से मतलब, ना गीता से मतलब, ना उपनिषदों से मतलब। अंधविश्वासों से मतलब है, कुट्टू के आटे से मतलब है।
"क्या चबा रही हो भाभी?" कहेंगी, "ये फलाहारी लड्डू हैं।" ये फलाहारी लड्डू कौन-से होते हैं? अब यह धार्मिकता का प्रमाण दिया जा रहा है कि, "हम फलाहारी…

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,

हर आदमी अपनी नज़र में नाकाम आशिक़ बन कर घूम रहा है। बहुतों का तो ब्रेकअप तब हो जाता है जब उनका कोई अफ़ेयर भी नहीं था। कहो, “क्यों इतने उदास हो?” “ब्रेकअप हो गया है!” तेरा अफ़ेयर कब था भाई? पर ब्रेकअप में जो रुहानी आनंद है वो तो …


सोचो तुम किसी शॉपिंग-मॉल में हो और वहाँ कबीर साहब का भजन बजने लग जाए; बिक्री आधी रह जाएगी बता रहा हूँ। इसलिए बाज़ार का अध्यात्म से छत्तीस का आँकड़ा है। बाज़ार कभी नहीं चाहेगा कि अध्यात्म सफल हो और बाज़ार हर तरह की साज़िशें करेगा अध्यात्म को गिराने की।…

तुम ग़लत राहों को ठुकरा कर तो देखो, सही राह खुलती है कि नहीं खुलती। और यह घटिया और झूठा तर्क बिलकुल मत दे दो कि, “मुझे सही राह मिली नहीं मैं इसलिए ग़लत राह चल पड़ा।“ बात यह नहीं है, सही राह हमेशा खुली होती है और उपलब्ध होती

बहुत मोटी मार पड़ती है ठीक तब जब तुम्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं होता कि मार खाने वाले हो। माया भी कोई छोटी-मोटी खिलाड़न थोड़े ही है। बेहोशों को छोड़ देती है, वह कहती है, “यह तो पहले ही गिरा हुआ है इसको क्या गिराएँ? शू!” वह भी पसंद करती

जिस स्तर के तुम आदमी हो, जिस औकात की तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारी प्रेम कथा भी उसी स्तर, उसी औकात की होगी। तो ये हिमाक़त तो करना ही मत कि ज़िंदगी है दो फुट की औकात की और दुनिया को बताते घूम रहे हो कि, “मेरी आशिक़ी का आसमानी अफ़साना

दुनिया की ताक़तों से, और घरवालों से, और पचास लोगों से डरते हो इस बात से भी तो डरो कि, ‘जन्म ही व्यर्थ हो गया तो?’
जीवन से छोटे-मोटे डर सब हटाने हों तो बड़ा डर ले आओ। और बड़ा डर यही है – कल्पना में तो खोए ही रहते…

अकसर जो नंगा होता जाता है उसको हम लिख देते हैं, “ये तो बोल्ड (निर्भीक) कपड़ों में आया है।“ उसमें बोल्डनेस (निर्भीकता) क्या है? फिर तो सबसे बोल्ड


पुरुषों ने खूब बहती गंगा में हाथ धोए हैं। स्त्री वैसे ही आतुर रहती है कि कोई ज़रा तारीफ़ कर दे, तो उन्होंने कहा “इसको फँसाने का तो बढ़िया तरीका है, ज़रा-सी तारीफ़ कर दो।”

जो लोग ग़लत राह पर चल रहे हों, और सफल आदि होते दिखाई देते हों, समृद्ध होते दिखाई देते हों, मौज मारते दिखाई देते हों, उनको देख कर कभी मन छोटा मत कीजिएगा। उनकी सफलता, उनकी समृद्धि, उनकी मौज बहुत सतही है। अंदर-ही-अंदर महा दुःख है उनमें। उनके लिए प्रार्थना…




प्रश्नकर्ता: दुनिया में ताकतवर लोगों का ही क्यों बोलबाला है? कमज़ोर और गरीब को हर जगह दबाया क्यों जाता है? भगवान कमज़ोरों की मदद क्यों नहीं करते?
प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…
तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह है कि सही राह सामने होने पर भी तुम उस पर दो कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। तुम्हें केवल अंतिम मंज़िल की उत्सुकता होती है, और आलस तुम पर हावी रहता है। जो सही और उचित प्रतीत होता है, वहां तक होशपूर्वक चलो और उसके प्रति निष्ठा रखो। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, राह स्वयं खुलती जाएगी।
प्रश्नकर्ता: सर, मन शान्त नहीं है। सवाल तो है नितनेम से पर उन सवालों के जवाब ले पाऊँ, ऐसी मैं नहीं हूँ। सवाल लिखूँगी तो बेईमानी हो जाएगी। माफ़ करिएगा।
आचार्य प्रशांत: आदमी का कर्ता भाव बड़ा सघन होता है। ‘मैं’ सवाल लिख रही हूँ। ‘मैं’ जवाब सुनूँगी। ‘मैं’ जवाब…
बुद्ध निर्विकल्प जीवन जीने को कहते थे| निर्विकल्पता में आता है कि पात्र में जो दे दिया विधि ने, वहीं खा लेना है। अगर बुद्ध ने अपवाद खड़ा कर दिया होता, तो भिक्षु निर्विकल्पता का पालन करने से मुकर जाते| तो बुद्ध ने कहा, ‘नहीं, अब आ ही गया है माँस तो खा लो। वैसे भी इसको तुमने मारा नहीं’। पर ये समय सापेक्ष बात है | भूल होती है, जब कहते हैं ‘बाज़ार में जो माँस है, हमने तो मारा नहीं,तो हम उसे खाएँगे।’ ये मत कर लेना, ये केंद्रीय, कालातीत बात नहीं|
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! ये मेरा पहला सत्र है आपके साथ में, और पहली बार भी। बात करने का मौक़ा भी मिल गया। तो मैं बहुत खुश हूँ इस बात को ले के। सवाल इस प्रकार जब मैं आयी थी यहाँ पर तो मैं लेकर नहीं आई थी। मेरा एकमात्र…
प्रश्नकर्ता नमस्ते सर, आज की बातचीत थोड़ी कॉन्ट्रोवर्शियल (विवादित) होने वाली है
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं होती रहती है कॉन्ट्रोवर्शी।
प्र: मैं आपसे गुरुओं के ऊपर बात करना चाहता हूँ और इस पूरी बात की शुरुआत आज से दस या बारह साल पहले से होती है।
आचार्य: क्या हुआ…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मैं आपको लगभग छह महीने से मैं सुन रहा हूँ और मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है।
मैं आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूँ कि हमें हमेशा कुछ-न-कुछ चुनाव करना होता है कि ये करें या तो ये करें।…
आचार्य प्रशांत: पूछते हैं कि युवा हूँ और अपने जीवन में कई अलग-अलग पहलुओं को पाता हूँ। फिर इनके जीवन में वो अलग अलग पहलू क्या है, उसकी छोटी सी सूची दी है। तो एक पहलू है पढ़ाई और कैरियर का। अगला है गर्लफ्रेंड और प्रेम प्रसंगों का। फिर अगला…
आचार्य प्रशांत: जब भी कभी मन में ये प्रश्न आये कि आचार्य जी क्या करूँ, किसी भी सन्दर्भ में जब ये प्रश्न आये, ठीक है? वो किस्सा कुछ भी हो सकता है। वो ये भी हो सकता है कि पुरानी गाड़ी अब हटाकर नयी गाड़ी लेनी है। वो ये भी…
सर्वभावं न सन्देह : सर्वं नास्ति न संशय:। सर्वं तुच्छं न सन्देह : सर्वं माया न संशय:।।
All is thought. There is no doubt of this. All is not. And there is no doubt of this. All is trifling. And there is no doubt of this.All is illusion. And…
आचार्य प्रशांत: सेल्फ़ एस्टीम (आत्म सम्मान)। एस्टीमेशन (अनुमान लगाना) शब्द का क्या अर्थ होता है? एस्टीमेशन का क्या अर्थ होता है?
श्रोता: अनुमान।
आचार्य: अनुमान लगाना। है ना? अनुमान। बढ़िया है, अनुमान शब्द को ही पकड़ लो। तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता: आशा।
आचार्य: आशा। बैठो। ये नाम जानती हो…
एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सौभाग्य है कि उपनिषद् को इतनी सरलता से आपके साथ सुनने का अवसर मिला। मेरा प्रश्न है कि जब मैं अपने सम्बन्धों को देखता हूँ, मैं पाता हूँ कि मैं हमेशा ही उलझा रहता हूँ। समस्या को ढूँढने की भी कोशिश करता हूँ और मैं और…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न युग के बारे में है। जैसे हम पढ़ते हैं, चार युग होते हैं– सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। और जो एक युग होता है उसको लगभग लाखों वर्षों का मानते हैं। जबकि एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) के अनुसार जो स्टार्स (तारों) की पोजीशन (स्थिति) है,…
~श्रीमद्भगवदगीता, अध्याय २, श्लोक ६
(अर्थ: हम यह भी नहीं जानते कि हम लोगों के लिए युद्ध करना…
प्रश्नकर्ता सर, समाज में कुछ लोगों का दावा होता है कि वो समाज कल्याण के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन उसमें भी उनकी कामना छुपी हुई होती है। लेकिन कुछ लोग सचमुच ऐसा समझते हैं कि वो काम इसीलिए करना चाहते हैं क्योंकि वो वाक़ई समाज कल्याण करना चाहते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने से बहुत स्पष्टता बढ़ी है। लेकिन जीवन के व्यावहारिक स्तरों पर अपनी और कमज़ोरियाँ प्रकट होने लगी हैं, तो मैं फँस जाता हूँ। जैसे गन्तव्य तक जाने के लिए सड़क के मार्ग का चुनाव से लेकर जीवन के बड़े निर्णयों तक। तो इन सब में…
प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, कोटि-कोटि नमन! आचार्य जी, जब से मैं अभी आपको सुन रही हूँ, अभी मुझे बस छः महीने ही हुए हैं। लेकिन बहुत सारी बातें जीवन में स्पष्ट हो चुकी हैं। आपके दो सत्र अटेन्ड किए, उनसे मुझे मेरे बहुत सवालों के जवाब स्पष्ट हो गए हैं। लेकिन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बार-बार एक ही ग़लती होती है और फिर डर एवं ग्लानि, ये दो चीज़ें बार-बार आती हैं। यह लगता है कि एक चक्र जैसा बना हुआ है। कृपया समाधान बताने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: आप कह रही हैं कि बार-बार आपसे एक ही ग़लती होती है…
पर एक समस्या ये है कि मुझे दो साल हो गया आपको सुनते हुए, उसके पहले मैंने बहुत…
प्रश्नकर्ता: जय-हिन्द आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि हम जीवन में हाँ और ना के बीच उलझे रहते हैं। हमारे बीच एक जंग छिड़ी रहती है कि हाँ बोलें कि ना बोलें। मैं एक प्रसंग आपको बताना चाहूँगा। हमारे यहाँ पर हवन-पूजन की परंपरा चलती है, तो हम कलावा…
और फिर दोबारा कहते हैं–
जल थल सागर पूर रहया है, भटकत फिरे उदासी। कहे कबीर सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनाशी।। ~ कबीर साहब…
एक बेज़ुबान निरीह को पकड़ कर काट दिया, उसका माँस पका कर खा गए – इससे कौन-सी परम सत्ता आपको आशीर्वाद देने वाली है, बताइए ज़रा? इससे आसमानों से फूल बरसेंगे आप पर? क्या तुक है!
जब बात की जाती है पशु बलि की, तो वास्तव में कहा जाता है…
द एवरेज लाइफ़!
माया, वो चेहरा है जिसमें कुछ खास नहीं। तुम उसे याद ही नहीं रख सकते, इतना साधारण चेहरा है माया। माया जीवन के उन दिनों, उन घण्टों, उन हफ़्तों, उन पलों का नाम है जिनमें कुछ खास…
एक बात बताना, तुमने आज तक कितनी शायरी, कितनी कविताएँ, ग़ज़लें, नग़में पढ़ीं जिसमें स्त्री…
तुम्हें क्या लगता है नर्क वो जगह है जहाँ बड़े-बड़े कड़ाहों में तेल उबल रहा है और लोग उसमें पकौड़ो की तरह तले जा रहे हैं? ना! नर्क वो जगह है जहाँ सब खूब मेहनत करते हैं, कमाते हैं, खाते हैं और सो जाते हैं। नर्क बड़ी साफ़-सुथरी जगह है…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।
आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से…
प्रश्नकर्ता: मैंने जीवन में अभी तक लाभ-हानि देखकर ही निर्णय लिया लेकिन अभी मुझे जीवन में कोई सार नज़र नहीं आता। अब मैं आपके पास बैठकर बस देखना चाहता हूँ। अब मैं अध्यात्म की ओर ही आना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: अच्छा है। कहीं कोई दुविधा है?
प्र: आपके पास…
आचार्य प्रशांत: भगवान कमज़ोरों की मदद लगातार कर रहे हैं उनकी कमज़ोरी बन कर। तुम्हें जो कुछ भी मिला हुआ है वो भगवान…