आचार्य प्रशांत: अपनी हस्ती पर भरोसा करिए। आप अपनेआप को जितना जानते हैं, आप उससे कहीं ज़्यादा सामर्थ्यवान हैं। अपना आकलन आप बड़ी हीनता में करते हैं, अंडरएस्टिमेशन (कम आँकना)।
छोटे नहीं हैं आप, विश्वास करिए। उसी ऊँचे विश्वास को श्रद्धा भी कहते हैं। कि जाने दो जो जाता है, हम तब भी जी लेंगे और मौज में जिएँगे। और पक्का भरोसा है कि अगर किसी छोटी चीज़ को छोड़ेंगे तो कुछ ऊँचा, अच्छा और बड़ा ही मिलेगा। भरोसा पक्का है। बुरे-से-बुरा क्या हो सकता है? एक सही उपक्रम में शरीर को मौत आ जाएगी, यही होगा। वो भी बेहतर है एक क्षुद्र जीवन जीने से।
और हमसे अस्तित्व की दुश्मनी है क्या, कि ख़ासकर हमें ही मौत आ जाएगी? मौत अगर हमें आएगी भी तो सबको आनी है। ईमानदारी की ज़िन्दगी जीकर बुरे-से-बुरा ये होगा कि मर जाऊँगा। तो क्या जो बेईमान हैं, वो अमर बैठे हैं? मरना तो बेईमानों को भी है न, मरना तो सब कायरों को भी है न? या कायरता दिखाकर के अमर हो जाते हो?
‘आचार्य जी, हम मरने से नहीं डरते, हम तो कई तरीक़े के कष्टों से डरते हैं। और हम अपने ऊपर वाले कष्टों से भी नहीं डरते, आचार्य जी। हम बहुत अच्छे आदमी हैं। हमारे अपनों को कुछ नहीं होना चाहिए। अपने लिए तो मैं जीता ही नहीं। मैंने तो अपनी ज़िन्दगी ही दूसरों के नाम रखी हुई है। उन्हें कुछ नहीं होना चाहिए, आचार्य जी। इसलिए मैं झूठी ज़िन्दगी जीता हूँ।’
तुम जैसी ज़िन्दगी जी रहे हो, इसमें तुम्हारे अपनों को भी क्या मिल रहा है? तुम्हारे जितने भी तर्क हैं एक कमज़ोर, झूठा, खोखला जीवन जीने के समर्थन में, वो सारे तर्क कितने बेबुनियाद हैं। ये भी अगर कहते हो कि डरी हुई, कमज़ोर ज़िन्दगी जी रहा हूँ अपनों की ख़ातिर, तो मुझे बताओ न, अपनों को भी तुमने क्या दे दिया आज तक? अधिक-से-अधिक एक औसत जीवन।




