आचार्य प्रशांत: उदय रावत हैं, चौंतीस वर्षीय, नैनीताल से, पूछ रहे हैं कि आजकल हर कोई अपनी नज़र में शोषित या विक्टिम क्यों है? जैसे हर किसी ने अपनी पहचान ही बना ली है दमित होने की, दबे कुचले होने की, शोषित, पीड़ित होने की और अगर उनकी सुनें तो उनके पास उनकी कमज़ोरी और लाचारी का एक वाजिब कारण भी होता है। लोग अपने ऊपर या अपने समुदाय के ऊपर या अपने पुरखों के ऊपर हुए अत्याचारों की कहानियाँ सुनाते रहते हैं। कोई कहता है कि उसका जात-पात के आधार पर शोषण हुआ है, महिलाएँ कहती हैं उनका लिंग के आधार पर बरसों से शोषण हुआ है और कोई रंग या रेस (जाति) के आधार पर अपने शोषण की बात करता है। मैं इसमें थोड़ा भ्रमित हूँ। अगर सब शोषित ही हैं तो शोषक कौन है? पूछ रहे हैं उदय कि अगर सब ओप्प्रेस्सड ही हैं तो ओप्प्रेसर कौन है? सबको पीड़ा है तो पीड़ित करने वाला कौन है?
समझना होगा थोड़ा, उदय।
इसमें तो कोई दो राय ही नहीं कि न तो इतिहास न्याय पर चलता है, न प्रकृति न्याय पर चलती है। इतिहास में और प्रकृति में दोनों में ताकत का खेल चलता है। बहुत हद तक 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली बात है। प्रकृति में तो फिर भी एक अन्दरूनी सन्तुलन होता है, ‘नैसर्गिक।‘ जिसके कारण मारने वाला और मरने वाला हमेशा एक निश्चित अनुपात में ही रहते हैं। कभी ऐसा नहीं होता कि मारने वाले सिंह ने मरने वाले हिरणों की प्रजाति ही पूरी साफ़ कर दी। पर जहाँ तक आदमी के इतिहास की बात है, उसमें तो जो बली है उसकी चलती है और इस कारण अन्याय खूब होते हैं, शोषण खूब हुआ है, कोई इसमें दो राय नहीं। लेकिन ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आदमी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, मनुष्य के साथ, वो किसी एक वर्ग या समूह या दल या वर्ण के लोगों द्वारा किया गया अत्याचार नहीं है, बहुत ज़रूरी है।
आदमी पीड़ा से गुज़रता है। हर मनुष्य तमाम तरह के दर्द झेलता है और हम चाहते हैं कि किसी तरह हमें ये समझ में आ जाए कि हमें ये पीड़ा देने वाला, दर्द देने वाला, है कौन। ऐसे में बहुत आसान रहता है ये मान लेना, ये सोच बैठना कि मुझे परेशान करने वाला ज़रूर उधर, उस तरफ़ का, सीमा के उस पार का वो दूसरा व्यक्ति, दल या समूह है। ऐसा मान लेने से हमें लगता है कि जैसे हमने खुद को समझा लिया, जैसे हमें बात स्पष्ट हो गयी, जैसे हम जान गये कि हमारे दुखों का कारण कौन है। इसमें चिन्तनीय बात ये है कि जो दल सीमा के उस पर बैठा है, वो सीमा किसी भी चीज़ से सम्बन्धित हो सकती है — लिंग से, वर्ण से, जाति से, राष्ट्रीयता से, रंग से, भाषा से, तो जो कोई सीमा के उस पार बैठा है, दुख उसको भी बराबर के हैं और उससे पूछा जाए तुम्हारे दुखों का कारण कौन है तो वो कहेगा, सीमा के इस तरफ़ जो लोग हैं, इन्होंने हमारे साथ ज़्यादती की है, अत्याचार किए हैं इसलिए हम दुखी हैं।




