
ये जीने का एक नया तरीक़ा है, क्योंकि हम तो हासिलियत की ही भाषा और ज़िंदगी जानते हैं न। हम कहते हैं, कहीं गए हैं, तो वहाँ से कुछ प्राप्ति हो जाए। यहाँ खेल प्राप्ति का है ही नहीं। यहाँ से भी उठ के जाओ तो ये मत कहना, कि ये प्राप्ति हो गई, ये जान लिया, ये समझ लिया। तुम थे, वो ज़रूरी है, तुम्हारा होना क़ीमती है, वही निष्कर्ष है।



देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां हसड्भादजस्त्र परिवर्तते धियः। वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्धवेत्तावदसौ भवोद्धव: ।।




प्रश्नकर्ता: आप कहते हैं, “जब सोचने वाला ही गन्दा है, तो सोच साफ़ कैसे रहेगी!” कृपया इसका अर्थ समझाएँ।

प्रश्नकर्ता: अर्जुन को कृष्ण मिल गये, हमें क्यों नहीं मिलते? ये बात हमारे कर्मफल और बुरे प्रारम्भ की है?



प्रश्नकर्ता: कहीं-न-कहीं आज के समय में आम आदमी के मन में ये बात बहुत गहरे बैठ गयी है कि शायद बिना आसन जमाए, बिना कुछ ऐसा करे कि कुछ मन्त्र का जाप करे, कुछ भी करे बात नहीं बनेगी तो बहुत बार होता है कि लोग बोलते है कि आचार्य

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कोई भी अपने विचार हमपर थोप देता है, उसी विचार को हम फिर अपना बना लेते हैं और उसी के अनुसार जीने लगते हैं। दूसरों के विचारों को अपने ऊपर आने से कैसे रोकें?
आचार्य प्रशांत: क्या ये सवाल भी दूसरों ने कहा है पूछने को?

आचार्य प्रशांत: (लिखित प्रश्न पढ़ते हुए) हर्ष हैं मुंबई से। कैसे हो हर्ष? आचार्य जी प्रणाम, आशीर्वाद। ईर्ष्या और द्वेष के विचार मन में क्यों आते हैं? क्योंकि ईर्ष्या और द्वेष ही मन है, हर्ष! मन जब बना था न और मन जब बनता रहता है, तो उसको बनाने की

आचार्य प्रशांत: देखो ये, बादल है। और अभी बादलों को देखकर के ये भ्रम हो जाता है कि जैसे कोई आकृति हो। पर वो भ्रम भी इसीलिए हो पा रहा है क्योंकि उनके पीछे सूरज है। है न?
तो अगर कोई भ्रमित भी है, अगर कोई इल्यूज़न में भी है,…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं आपकी काफ़ी सारी यूट्यूब लेक्चर्स देखे या सेशन (सत्र) देखे। तो जो आप चेतना की जो बात करते हो, अगर जो आपकी इच्छा या आपकी कोशिश है, मुझे पता नहीं कोशिश है कि नहीं। अगर एक कामना करते हैं या एक हाइपॉथेटिकल सिचुएशन (काल्पनिक स्थिति)…

प्रश्नकर्ता: मैं अपने अतीत से बहुत परेशान हूँ, मैं इससे बाहर कैसे निकलूॅं?

प्रश्नकर्ता: किसी व्यक्ति के बनावटीपन को कैसे जानें?
आचार्य प्रशांत: क्यों जानना है किसी के बनावटीपन को? क्या करोगे? नीम लड्डू तैयार करवा रहे हो और कुछ नहीं। (सब हँसते हैं)। क्या करना है? अपना काम करो! अपनेआप पता चल जाता है। आप एक सीधी बात बोल रहे हो, उधर…

प्रश्न: जो कुछ भी बाहरी है उसको हम व्यर्थ, कचड़ा, धूल क्यों कहते हैं?


प्रश्नकर्ता: दो शिविर पहले मैं जब नोएडा आश्रम आया था तो वहाँ भजन का जो सेशन

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि ये मन क्या होता है, किसी भी अज्ञात परिस्थिति को मन नकारात्मक दृष्टि से क्यों देख लेता है? उदाहरण के तौर पर किसी ने मुझ से कुछ पैसे उधार लिये और जब मैं पैसे माँगने के लिए उससे सम्पर्क करने



भई! गर्मी का मौसम हो, तुम शरीर खुला रखो बात समझ में आती है। तुम कहीं नदी में, स्विमिंग पूल (तरणताल) में नहाने जा रहे हो, तुम कपड़े उतार दो, बात समझ में आती है। या तुम सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए कम कपड़े पहनो तो भी बात समझ में


छोटे आदमी की सज़ा ये कि उसकी ज़िंदगी में सब छोटे-छोटे मुद्दे होंगे। यही मुद्दा होगा कि इतने से इतने बजे तक पानी आता है, पोछा लगाया कि नहीं लगाया, भैंस का दूध लेना है कि गाय का दूध लेना है, नौकरी में फलाने को नीचा कैसे दिखाना है, ऊपर

तुम्हें बर्बाद करने में एक चीज़ का सबसे बड़ा योगदान रहा है तो वो है – फिल्में और *टीवी*।



आचार्य प्रशांत: अभी हालत ये है, खासतौर पर जो वर्तमान पीढ़ी है उसकी, कि उसमे ज़्यादातर लड़के लड़कियों को अपने ही नाम का मतलब नहीं पता होता। अगर हमें इस बात से असुविधा हो रही होती कि हम कोई चीज़ नहीं जानते हैं तो हमें सबसे पहले किस चीज़ से…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, थोड़े समय के लिए हम लोग पूरी तत्परता के साथ और ईमानदारी के साथ कुछ कर रहे होते हैं, और साथ-साथ ये भी होता है कि ज्ञान भी कम होता है और क्षमता भी कम होती है, तो प्रक्रिया धीमी होती है और फिर ऐसा भी

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार! पिछले दो दिन से उपनिषद समागम के दौरान जो मन में प्रश्न उठ रहे थे वो एकदम सामान्य प्रश्न थे जो आम ज़िन्दगी से संबंधित होते हैं। एक तरह से वे बनावटी प्रश्न थे। उन प्रश्नों पर गौर से ध्यान देने भर से वे भंग हो…





प्रश्नकर्ता: जब मेरे दिमाग में कोई भी विचार आता है, थॉट आता है, मुझे खुद भी नहीं पता होता कि मैं क्यों सोच रहा हूँ यह सब। जब भी मैं कोई काम करने जा रहा होता हूँ या पढ़ रहा होता हूँ, वह मेरे को फ़ोकस नहीं करने देता, कंसंट्रेशन

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।

प्रश्न: आचार्य जी, हमसे कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। लेकिन सारे शैतान तो भरे दिमाग में ही घूमते रहते हैं। और यह ‘खाली दिमाग’ होता भी कैसे है? क्या किसी ने कभी ‘खाली दिमाग’ का अनुभव किया भी होगा? क्या साधक ऐसा करते हैं?


प्रश्न: आचार्य जी, सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं?


श्रोता: आपने अभी कहा कि प्रपात को देख कर हमें ‘उसकी’ याद आ जाती है। पर किसी चीज़ की याद आने से पहले ज़रूरी है कि वो चीज़ हमें पहले से ही पता हो। तो क्या हमें पता है पहले से ही सत्य के बारे में? हमें तो अभी



प्रश्न: सर, ये बात तो पक्की ही है कि हम दूसरों की इसलिए सुनते हैं, 100 आदमियों की इसलिए सुनते हैं क्यूँकी हम ख़ुद जान नहीं पाते। हम जानने से मना कर देते हैं, हम जान नहीं पाते। तो कैसे हम किसी भी चीज़ को जाने?
वक्ता: कुछ भी कैसे…

श्री प्रशान्त: विचार बाहर से आते हैं। निर्णय बाहर से आते हैं। और अंतर्भाव भी बाहर से ही आते हैं। हाँ, विचार सचेत होता है, दिखाई पड़ता है। पर अंतर्भाव का हमें पता ही नहीं चलता कि वो कहाँ से आ रहा है। तो हमें ऐसा लगता है कि शायद…


पहली कुसंगति आंतरिक होती है। मन ऐसा कुसंगी है जिसे बाहर कुसंग नहीं खोजना पड़ता। मन को अगर मन का साथ मिल जाए तो इससे बड़ा कुसंग नहीं। बाहर का कुसंग हटाना आसान है, पर भीतर वाला कुसंग, जहाँ आदमी अपने ही विचारों में फँसा है, "मैं हूँ और मेरे विचार हैं" - इससे बड़ी कुसंगति क्या हो सकती है? आंतरिक कुसंगति न हो तो बाहर का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतना आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में…
श्री भगवान् उवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:। सत्त्वेननान्यतमौ हन्यात् सत्त्वेन चैव हि।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम — यह तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्त्व के द्वारा रज और तम — इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर…
प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गये। हो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टीशर्ट पहने हो, थोड़ी देर में उतार दोगे, तो हो गया परिवर्तन। परिवर्तन क्या है? दायें को अटके…
प्रश्नकर्ता: जैसे मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और हाॅस्पिटल, कुछ मेडिकल और कुछ सेवाएँ हैं जहाँ सेवा चलते रहती है और लाभ उठाने वाले जो लोग हैं, क्या उन सेवाओं से उन पर दुष्परिणाम हो रहा है? जहाँ से फ्री (मुफ़्त) में जो उठा रहे हैं सेवा का लाभ और क्या इन…
आचार्य प्रशांत: कर्मफल, प्रारब्ध कोई अपनेआप में वस्तुएँ नहीं होतीं। चेतना प्रमुख होती है। तुम्हें निर्णय करना होता है। निर्णय सब कर्मफलों को काट सकता है। कोई ऐसी विवशता नहीं होती…
प्रश्नकर्ता::आर्टिकल (लेख) इंग्लिश में पढ़ रहे हैं और सवाल हिन्दी में रखना चाहूँगा 'क्रिएटिंग अ न्यू ह्यूमैनिटी थ्रू इंटेलिजेंस स्प्रिचुअलिटी' ( बौद्धिक आध्यात्मिकता के माध्यम से मानवता का निर्माण) पढ़ा था। और बहुत अच्छी वार्तालाप हुई; सभी सदस्यों के साथ। उसमें मैं पढ़ता हूँ कि कहाँ पर थोड़ी…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।
मेरे दिमाग में जब कोई विचार आता है, आई फाइंड इट मोर डिफिकल्ट टू शेक इट ऑफ (मुझे उसे हटाना अधिक कठिन लगता है), इट्स वेरी स्टिकी (यह बहुत चिपचिपा है)। और कभी-कभी वह इतनी इंपॉर्टेंट (ज़रूरी) हो जाता है कि आई स्टार्ट थिंकिंग थाट इफ…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल्पनाशीलता अधिकांश समय मस्तिष्क पर हावी रहती है, क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी, कम से कम जवान आदमी की, ऐसी होनी चाहिए कि पूरा रगड़ दिया जाए। चैन की नींद सोओगे। सात घंटे से पहले उठने का नाम नहीं लोगे और गहरी नींद आएगी। ये जो…
"माया-माया सब कहे, माया लखे न कोय। जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय।"
~ कबीर साहब
तो आज वो पुस्तक…
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥ भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥ सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥ किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥ हुकमि रजाई चलणा नानक…
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…
ऐसा तो नहीं है कि दस-बारह साल के बच्चे को अगर आप रामकृष्ण की बोध कथाएँ पढ़ाएँगे तो उसे समझ में नहीं आने वाली। आएँगी न। आपके घरों में क्यों नहीं है रामकृष्ण परमहंस की सरल साधारण कथाओं की किताब? कृष्णमूर्ति साहब का साहित्य आता है ‘*कृष्णमूर्ति फॉर द यंग*’।…
तुलना तो तुम्हें करनी ही है; इनसे क्या तुलना कर रहे हो, अपने दफ़्तर के लोगों से तुलना करते हो, वो सब तुम्हारे ही जैसे हैं।
ये क्या तुलना कर रहे हो कि, “मेरे पास आल्टो है, दूसरे के पास डिज़ायर है”, कि, “मेरे पास डिज़ायर है और दूसरे के…
अपने-आपको देखकर यह ना कहा करो, “आह, हा, हा! क्या बात है! मैं ही तो हूँ सरताज, सिकंदर!” और कोई तुम्हारे बारे में धोखे में रह जाए तो रह जाए, तुम अपने बारे में कैसे धोखे में हो? तुम अपनी हरक़तें नहीं जानते? तुम अपने विचार नहीं जानते? तुम नहीं…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सत्य/चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? कृपया समझाएं?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना, अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है- सत्य।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दोपहर में बुल्लेशाह जी की काफ़ियाँ गा रहे थें, और गाते-गाते हम बहुत रम गए, और मन बहुत शुद्ध होता सा महसूस हुआ; और जब से यहाँ पर हैं तब भी बहुत मन शुद्धता महसूस करता है। तो एक बात, जब अवलोकन लिख रहे थे, तो…
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥५॥
(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ५)
हिंदी अनुवाद: मन से जिसका मन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है, उसी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मानसिकता (मेंटालिटी) का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: मानसिकता का अर्थ होता है- सोचने का एक बंधा हुआ तरीका। मानसिकता का क्या अर्थ होता है? सोचने का एक बंधा हुआ तरीका। मानसिकता कोई भी हो गलत है क्योंकि मानसिकता का अर्थ है कि मन मुक्त नहीं है।…
(केनोपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 1)
जिसने भी ये सोच लिया कि वो जानता है, उसके लिए ये बात तय है कि वो नहीं जानता।
प्रश्नकर्ता: जैसे कहा गया था की मैं…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्तियों का ज़ोर दिखता है। क्या इनका दमन करके बदलना चाहिए, या देखना मात्र पर्याप्त है?
आचार्य प्रशांत: देखो, अगर बदल दोगे, तो आंशिक सुधार मिलेगा। क्योंकि बदलकर भी तुम कौन-सा विचार अपने ज़हन में लाओगे?
प्र: उसका विपरीत।
आचार्य:
तो तुम्हारा मन किसी दिशा में भाग…
आचार्य प्रशांत जी: अभी जो सवाल पूछ रहे हो, क्या ये सवाल भी गलत विचार से आ रहा है? अभी मेरे सामने बैठे हो, क्या ठीक इस वक़्त भी मन हावी है? ठीक अभी क्या मन…
प्रश्न: आचार्य जी, क्या सपनों में गुरुदर्शन का महत्त्व है?
आजकल कई बार ऐसा हो रहा है कि मेरे गुरुजी सपनों में आ रहे हैं। उनके द्वारा कही गयी बात सुनाई तो देती है, महसूस भी होती है, पर मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि वो कहना क्या…
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
– कबीर
वक्ता: मन से ज्यादा कहीं पहुँचने को कोई आतुर नहीं होता और मन से ज्यादा पहुँचने से कोई डरता नहीं है। बड़ी गहरी बेचैनी रहती है मन की, कि किसी…
वक्ता: नवनीत(श्रोता को इंगित करते हुए) पूछ रहे हैं कि हमारे कर्म हमारे विचारों से निकलते हैं। मुझे लगता है इस बात से तो हम सभी सहमत होंगे। सही है?
पर यह हम नहीं समझ पाते कि विचार आते कहाँ से हैं? विचार कहाँ से आते हैं, नवनीत?श्रोता…
वक्ता: (व्यंग्य कसते हुए) “मीठा-मीठा…
प्रश्न: निम्न विचार और उच्च विचार क्या हैं?
वक्ता: हम में से कितने लोगों को ये सवाल अपने सन्दर्भ में उचित लग रहा है? कितने लोगों को ये सवाल संबद्ध लग रहा है? कितने लोग उत्सुक हैं इसका उत्तर जानने को?
(सभी श्रोता हाथ उठाते हैं)
ठीक है। इसका मतलब…