इसका कोई इलाज़ नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज़ नहीं है। इसका इलाज़ तो सिर्फ़ तभी है, जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौंध में फसने की, हीन भावना में फसने की, ईर्ष्या में फसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप की सारी बातें सुनी, पहले भी सुनी हैं ये, बुक्स भी बहुत पढ़ीं, काफ़ी टाइम (समय) से पढ़ रहा हूँ। तो मेरे जीवन में तथ्य ये है कि जब ऐसे लोग सामने आ जाते हैं न, कहीं न कहीं आप इन्फीरियर फ़ील(हीनभाव) करते हो। जैसे मैं एक उदाहरण देता हूँ। मेरे एक कज़िन (चचेरा भाई) हैं, वो एक वकील हैं। तो जब एक फैमिली फंक्शन में आए तो उनके पास अच्छा खासा पोर्श (महंगा कार मॉडल) गाड़ी है। मुझे पता है गलत तरीके से कमाया है, इतने कम समय में नहीं कमा सकते, बाकी कुछ पुश्तैनी भी है। तो लगके सारे लोग उनके आस-पास इकट्ठे हो जाते हैं, उनका अच्छा लाइफस्टाइल देखकर। आपने एलोन मस्क की बात की, इतना तो नहीं पता। फिर भी हमारे आस-पास देखें तो, इस तरह के जो भोगवादी किस्म के लोग होते हैं, इनके आगे... ये बात सही है आपकी सारी बात मन को जँचती है कि ये गलत है, फिर भी कहीं अन्दर जो जानवर बैठा है, वो इन्फीरियर (हीन) फील करता है कि काश! ये सब एक बार चाहे दिखाने के लिए कि दुनिया मिल जाए तो क्या है, एक बार हो तो।
आचार्य: इसका कोई इलाज़ नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज़ नहीं है। इसका इलाज़ तो सिर्फ़ तभी है, जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौंध में फसने की, हीन भावना में फसने की, ईर्ष्या में फसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।




