
आप एनडीटीवी पर चले जाइए, आप रैडिफ़ पर चले जाइए – मैं इनकी वेबसाइट की बात कर रहा हूँ। स्क्रोल करेंगे तो ४ खबरें होंगी और ४ खबरों के बाद कुछ नहीं होगा सिर्फ़ नंगी स्त्री देह की नुमाइश होगी। स्त्री देह का ऑब्जेक्टिफिकेशन (वस्तुकरण) लिबरल मीडिया (उदारवादी मीडिया) से ज़्यादा कौन कर रहा है? और इस लिबरल मीडिया की ये हिमाक़त कि ये कह रहे हैं कि 'कन्यादान खराब है क्योंकि उसमें स्त्री को ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है।' तुमने कोई कसर छोड़ी है महिलाओं को वस्तु में बदलने में?
छोटी-छोटी बच्चियों के मन में तुमने यह भावना बैठा दी है कि वह सर्वप्रथम देह मात्र हैं; उनकी मासूमियत छीन ली तुमने, उनको इंसान ही नहीं रहने दिया, उनको जिस्म बना डाला। यही प्रोपेगेंडा (प्रचार) कर-करके कि जिस्म दिखाना तो बड़ी लिबरल बात है।
खबरों से ज़्यादा स्त्री की नंगी देह का इस्तेमाल होता है पाठकों को अपनी ओर खींचने के लिए, अपनी दूकान और धंधा चमकाने के लिए।
हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।

इसका कोई इलाज़ नहीं है न। अगर तुम जानवर ही हो तो इसका कोई इलाज़ नहीं है। इसका इलाज़ तो सिर्फ़ तभी है, जब ऊँची चेतना के इंसान बन पाओ। और उसके लिए तुमको आना होगा वेदान्त की ओर, उपनिषदों की ओर और कोई तरीका नहीं है। वरना ये जो बात है चकाचौंध में फसने की, हीन भावना में फसने की, ईर्ष्या में फसने की, ये सब तो एक छोटे बच्चे में भी होती है।

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केचुए की तरह थोड़े ही है कि किसी भी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, ऑंखों में ताक़त झलकनी चाहिए! कुछ बोलो तो उसमें साहस हो और संकल्प हो! आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए…