आचार्य प्रशांत: इमेज की परवाह करने का मतलब होता है कि ये जो आस-पास के लोग हैं, ये बड़े महत्त्वपूर्ण हैं मेरे लिए। कि ये क्या कहेंगे मेरे बारे में, वो बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है।
आदमी छोटी बातों में तो दूसरों से ज्ञान ले सकता है क्योंकि ज्ञान किसी का भी पूरा नहीं होता। मैं नहीं जानता हूँ कि तुम्हारे कॉलेज में कौन सा डिपार्टमेंट किधर है, कौन सी लैब किधर है। तो मैं तुम्हारे कॉलेज आया हूँ, तो मुझे तुमसे ही ज्ञान लेना पड़ेगा न कि मुझे बता दो लाइब्रेरी किधर है। ये सब छोटी बातें हैं, इसमें ज्ञान लिया जा सकता है दूसरों से। मैं तुमसे पूछूँ कि बता दो लाइब्रेरी किधर है, चलेगा। मुझे तुम्हारी बात माननी पड़ेगी, तुम्हारी बात का सम्मान करना पड़ेगा क्योंकि तुम ज़्यादा जानते हो।
मैं तुमसे पूछूँ कि मेरे कुर्ते का रंग क्या है, तो भी चल जाएगा। हो सकता है कि मेरी आँखों में कोई बीमारी आ गई हो, मैं रंगों को साफ़-साफ़ न पहचान पा रहा हूँ, तो भी चल जाएगा। तुम यह नहीं कहोगे, यह आदमी पागल है। पहला सवाल मैंने पूछा, “लाइब्रेरी कहाँ है कॉलेज में?” उसमें कोई दिक़्क़त ही नहीं थी, तुम बता दोगे। फिर मैं पूछूँगा, “मेरे कुर्ते का रंग क्या है?” तुम्हें थोड़ा सा अजीब लगेगा लेकिन फिर भी तुम बता दोगे। तुम कहोगे, “हो सकता है यह आदमी कलर-ब्लाइंड हो, न जान पा रहा हो।“
लेकिन अगर मैं तुमसे पूछने लग जाऊँ कि मैं कौन हूँ भैया, तो तुम बहुत ज़ोर से भागोगे। तुम कहोगे, यह आदमी ख़तरनाक पागल है, यह कुछ भी कर सकता है। जो आदमी यह सवाल पूछ रहा हो औरों से कि मैं कौन हूँ, वो बड़े ही ज़बरदस्त किस्म का पागल है।
छोटे मामलों में बाहर वालों के ओपिनियन (राय) को तवज्जो दी जा सकती है। मैं कौन हूँ? मेरी जगह क्या है? मेरी हसियत क्या है? — इस बात के लिए दूसरों का मुँह नहीं देखा जाता। तुम वही गलती कर रहे हो। तुम ऐसी बात में दूसरों के मत की परवाह कर रहे हो जहाँ दूसरों के लिए कोई स्थान होना ही नहीं चाहिए।




