
शादी और रिश्तों के सामाजिक दबाव में अपने शरीर और गरिमा का सौदा करना बंद करना ज़रूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल जोड़ी बनाना या यौन सुख पाना नहीं है। प्रेम वह है जो व्यक्ति को भीतर से ऊँचा और मुक्त करे, न कि उसे वस्तु बना दे। इसलिए पहले स्वयं को गढ़ें, ज्ञान और कौशल बढ़ाएँ, जीवन को सार्थक बनाएँ और अपने भीतर पूर्णता विकसित करें; सही व्यक्ति मिले तो स्वागत है, न मिले तो भी जीवन अधूरा नहीं है।



जब आप न स्वयं को जानते, न ज़िंदगी को जानते, तो ये आप क्या करने जा रहे हो? आपकी ज़िंदगी में कोई अजनबी आएगा और अब वो उम्र भर आपके साथ रहेगा। ये आपकी ज़िंदगी का सेंटर बन जाना है। ज़िंदगी इसी काम के लिए है? बेहोशी में, अनजाने में रिश्ता बना लो और फिर उम्र भर उसकी खिदमत करो। मैं कह रहा हूँ, इंसान बेहतर हो जाएगा तो उसके सारे कर्म बेहतर हो जाएँगे, सारे संबंध बेहतर हो जाएँगे, जिसमें शादी भी सम्मिलित है। उसके बाद तुम जो भी निर्णय करो, अच्छा है। करनी है शादी, शौक से करो, मौज में करो।



जो व्यक्ति अपने इतने निजी निर्णय दूसरों के दबाव में ले रहा हो, दूसरों से प्रभावित होकर ले रहा हो, वो तो पग-पग पर दूसरों का दबाव ही झेलेगा। और इसको हम कहते भी हैं न, "दूसरों के दबाव में आ जाना।" वो वास्तव में दूसरों का दबाव नहीं होता, वो अपने भीतर की कमजोरी होती है। तुम्हारे भीतर कमजोरी न हो, तो कोई दूसरा तुम्हें कैसे दबा लेगा।








प्रश्नकर्ता: पिछले तीन साल से आपको सुन रहा हूँ और अब कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने हैं — नौकरी चुननी है और विवाह संबंधित कुछ फैसले लेने हैं। और आप कहते हैं कि शादी और नौकरी, ये किसी की ज़िंदगी या तो बना सकते हैं या बिगाड़ सकते हैं। आपने एक

प्रश्नकर्ता: एक जानकार हैं, स्कूल टीचर हैं। तो आपसे इस तरीक़े से वार्तालाप होगी, मैंने उनको बताया था तो मैंने कहा कुछ परेशानी है? बताऍं। तो उन्होंने कहा— मैं स्कूल टीचर हूँ और स्कूल टीचर से कोई शादी नहीं करना चाहता। मेरी शादी कब होगी? क्षमा चाहती हूँ उनके सवाल

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो ‘इच्छा’ होती है वो मुझे आज तक पता ही नहीं चला कि मेरी आखिर इच्छा है क्या। जैसे कि मैट्रिक पास किया और सब दोस्त आईएससी किए, हम भी कर लिए। फिर सब इंजीनियरिंग का तैयारी करना शुरू किए हम भी किए साथ में। इच्छा नहीं…

प्रश्नकर्ता: मैं एक आध्यात्मिक संस्था से छः सालों से जुड़ा हुआ हूँ और आध्यात्मिक साधना का अभ्यास कर रहा हूँ। तीन साल तक ये साधना अच्छी चली लेकिन तीन साल पहले मेरी शादी होने के बाद मेरा ध्यान भटकने लगा।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। जो मन की गन्दगियाँ हैं उनको साफ़ करना ही धर्म है। पर मुश्किल हो रही है कि मन की गन्दगियाँ दिखती नहीं हैं जब तक कि हम किसी ऐसी परिस्थिति में होते हैं या किसी से सम्बन्ध बनाते हैं या कोई हमारे जीवन में होता है।…

प्रश्नकर्ता: नमस्कारम आचार्य जी, पन्द्रह साल की उम्र है, पुरुषों के प्रति काफ़ी आकर्षित रहता हूँ। मुझे पता है कि समलैंगिकता एक विकार है। इस विकार का कैसे विगलन हो? कृपया इस पर मार्गदर्शन करें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मेरा प्रश्न ये है कि हम लोग अपनी फ़ैमिली, जहाँ से हम बोलना, सीखना, सब कुछ, बचपन से शुरू करते हैं, उनके खिलाफ़ अगर खड़ा होना पड़े, क्योंकि वो कुछ समझ ही नहीं रहें हैं। कितना भी समझाओ, उनको पता भी है कि वो ग़लत कर

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हम झारखण्ड से हैं और अभी जस्ट(अभी-अभी) मेरा बी.टेक कंप्लीट(पूरा) हुआ है दो महीने पहले। आपको सुन 2018 से रहे हैं, कुछ-कुछ चीज़ सीखे हैं, जो इम्प्लिमेंट(लागू) भी किये है और बहुत कुछ अभी सीखना भी है।

आचार्य प्रशांत: जाओ किसी भी आम लड़के से पूछ लो वह किसलिए विवाह करता है। सम्मानजनक काम करने के लिए तो वह विवाह करता नहीं। वह काम सारे ऐसे ही करता है जो अगर वह विवाह के बिना कर दे तो तुम कहोगे — जलील, लुच्चे, लफंगे गायब हो जा


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग

प्रश्नकर्ता: हमारी एक कल्चर्ड (संस्कारी) और एजुकेटेड फैमिली है विथ अ स्पिरिचुअल बेंट

प्रश्नकर्ता: हैलो सर, मेरा प्रश्न इंटरनेट पॉर्नोग्राफ़ी (अश्लील विषयवस्तु) से सम्बन्धित है, अभी कुछ दिनों पहले

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। घरों में और समाज में डराया जाता है कि अगर आप अभी नहीं करोगे, अभी आपको लग रहा है कि क्योंकि जवानी में तो हर कोई आक्रोश दिखाता है, मना ही करता है। मगर ये बोलकर डराया जाता है कि अभी नहीं कर रहे हो, बाद

आचार्य प्रशांत: लड़का भले ही कितना बेअदब, बदतमीज़ रहा हो, जीवन भर उसने माँ-बाप की सुनी न हो, माँ को मुँह पर गरियाया हो, बाप को जूता मारा हो। लेकिन जब विवाह का समय आता है, तो कहता है 'माँ का दिल कैसे तोड़ सकता हूँ? अरे! माँ की आज्ञा

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कहा था कि किसी को बचाने से पहले ख़ुद पहले योग्यता अर्जित करो। तो विवाह के लिए क्या योग्यता अर्जित करें और कब माने कि कोई विवाह के योग्य भी है।





प्रश्नकर्ता: कॉलेज में फर्स्ट टाइम (पहली बार) मैं आपसे मिली थी एंड सात साल हो गये हैं, कॉलेज के थर्ड ईयर में मिले थे आप, जब मैं बी-टेक कर रही थी।

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी। जिनसे शादी हुई है, तो थोड़ा-सा, बड़े शांत स्वभाव की लगती थीं और थोड़ा


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! समाज में ये जो विवाह की व्यवस्था है, ये आख़िर होनी क्यों चाहिए? क्योंकि ये तो केवल सिक्योरिटी (सुरक्षा) के लिए है कि एक कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) साइन (हस्ताक्षर) कर दिया, अब जीवनभर के लिए

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मैं आपको दो-ढाई साल से सुन रही हूँ। पहले तो मुझे आपकी बातें थोड़ी कम समझ में आती थीं, पर अभी धीरे-धीरे क्योंकि जैसे कहते हैं कि तीस साल के बन्धन हैं या जो मन हमने सोसायटी (समाज) से लिया है, हर चीज़ सोसाइटी से मिली…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कभी दहेज जैसी कुप्रथा के ऊपर कुछ क्यों नहीं बोलते?

प्रश्न: 'मेरी गर्लफ्रेंड दूसरी जाति की है, घर वाले शादी के लिए नहीं मान रहे। कृपया इंटरकास्ट मैरिज (अन्तर्जाती विवाह) के बारे में कुछ कहें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जैसे आप मध्य भारत की बात कर रहे थे, तो वहाँ पर हमारे समाज में ये होता है कि लड़कियों की शादी अठारह साल में आपको करना ही करना है, इतने साल में बच्चे होने चाहिए, फिर इतने साल में ये-ये, वो हमने तय किया है।…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! सर मेरा सवाल था रिलेशनशिप (रिश्ते) को लेकर। आप कहते हैं कि जो साथी चुनने का मुद्दा है वो बहुत इम्पॉर्टन्ट (महत्वपूर्ण) है, तो जैसे उसको मैं


प्रश्नकर्ता: गुड आफ़्टरनून सर, बहुत ही गंभीर चर्चा थी। इस एन.आर.आई. ड्रीम के ही बारे में कुछ प्रश्न है, पर थोड़ा अलग है। जैसा कि अभी शादियों का मौसम चल ही रहा है, तो मैं किसी शादी में गई हुई थी, और अचानक मैं स्तब्ध रह गई कि जो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मेरा प्रश्न ये है कि शादी की उम्र हो रही है और रिश्ते जो आ रहे हैं वह पसंद नहीं आ रहे। तो आगे फिर क्या करना चाहिए ये नहीं समझ में आ रहा है।
सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
जीवन के बड़े निर्णय, जैसे करियर और विवाह, तभी सार्थक होते हैं जब वे समझ और जागरूकता से लिए जाएँ, न कि सामाजिक दबाव या आदत के कारण। अधिकांश लोग बिना स्वयं को समझे जीवन के महत्वपूर्ण चुनाव कर लेते हैं और फिर उनके परिणामों से जूझते हैं। वास्तविक परिपक्वता अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने, स्वयं को जानने और बाहरी अपेक्षाओं के बजाय स्पष्टता और विवेक के आधार पर निर्णय लेने में है।
"वो मुझे याद आती है। उसकी छुप-छुप के तस्वीरें देखता हूँ।" ये गुलाबी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है। ज़िंदगी इसलिए नहीं होती है कि आपको बहुत सुख देगी; ज़िंदगी तो ज़ख़्म ही देती है। अच्छे काम में ज़िंदगी में डूबने का यही फ़ायदा होता है। यादें भी आती रहेंगी, जीना दुश्वार होता रहेगा, डट के काम करो, खूब थक जाओ, सो जाओ। और काम के बाद भी ऊर्जा मिली है, तो रैकेट उठा के जाकर के फोड़-फाड़ दो। कोर्ट को भी, नेट को भी, एकदम टूट जाओ, जाकर सो जाओ।
प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें। पहले रिश्ता चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं, और जब लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं, सब अपने रिश्ते तोड़ लें। गलती हो गई है तो उसका सुधार करो। सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत की, रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता, तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर।
दो चीज़ें होती हैं, जिसमें इंसान फँसता है। एक — बहुत बड़ा मकान, और दूसरा — लाखों-करोड़ों की शादी, जिसमें विलासिता का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। इन दोनों के लिए बहुत पैसा चाहिए, जिसकी ख़ातिर आप ज़िंदगी भर ग़ुलामी करते हो। अध्यात्म इन मोटे खर्चों से बचने का नाम है। अगर ये मोटे खर्चे न हों, तो आप जितना कमाते हो, ज़िंदगी उससे आधे में भी चल जाए, क्योंकि वे खर्चे जो ज़िंदगी को बिल्कुल मस्त और आनंदमय बनाते हैं, वो बहुत बड़े नहीं होते।
भारत दुनिया के सबसे बीमार देशों में है, सबसे कुपोषित देशों में है। और कोई देश शादी, व्याह पर पर उतना नहीं खर्च करता, जितना भारत करता है, वेडिंग इंडस्ट्री कहीं उतनी बड़ी नहीं है, जितनी भारत में है। हमें सीधा-सीधा संबंध नहीं दिखाई दे रहा, हमारी दुर्दशा में और हमारे फ़िजूल खर्चों में? छोटा-मोटा फ़िजूल खर्चा नहीं है ये कि बस एक जाकर के कहीं से आप एक शर्ट खरीद लाए जिसकी आपको ज़रूरत नहीं थी। ये दुनिया में कोई नहीं करता। और ये हमें करने के लिए मजबूर किया जा रहा है ― पैसे के भौंडे प्रदर्शनों के द्वारा, ग्लैमर (ठाठ-बाट) दिखा-दिखाकर के और अरमान जगा-जगाकर के हमें मजबूर किया जाता है।
लड़की को पढ़ाई के लिए दो-सौ किलोमीटर दूर भेजना हो तो यही माँ-बाप और भाई कन्नी काट जाते हैं, और ब्याह कर वो दो-हज़ार किलोमीटर दूर जा रही हो इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। और पढ़ाई के लिए जाएगी तो किसी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहेगी, सुरक्षा में रहेगी, हॉस्टल…
जो प्रेम का वास्तविक अर्थ नहीं समझते, वो विवाह चाहे घरवालों के कहने पर करे या फिर अपनी मर्ज़ी से करे, उसने ले-देकर चुनी तो माया ही है। हम प्रेम समझने को तैयार नहीं होते, प्रेम-विवाह करने को बड़े उतावले रहते हैं। ये जो पूरी विवाह की व्यवस्था को रच रहा है, वो कौन है? वो भीतर बैठा मन है। उस मन को हम समझते हैं क्या? उसको नहीं समझा तो उसके द्वारा रची गई व्यवस्था पर भरोसा कैसे कर लिया?
कोई नहीं कहता कि बहन को पढ़ाना है, लिखाना है। ‘आचार्य जी, भाई हूँ, धर्म निभाना है, बहन को स्वावलम्बी बनाना है। बहन अपने पैरों पर खड़ी हो, आज़ाद हो जाए’, कोई आता ही नहीं। क्या समस्या है? ‘बहन की शादी।’ अरे! बहन से पूछ तो लो, शादी वगैरह ये उसका निजी मसला है। निजी कुछ समझते हो? *प्राइवेट*, *पर्सनल* (व्यक्तिगत) *मैटर* (मसला) है ये। या तुम ज़बरदस्ती उसको कहोगे कि ले इसके साथ बाँध रहा हूँ, अब एक कमरे में घुस जा, सुहागरात मना?
भारतीयों में आनंद की कमी अक्सर देखी जाती है। जो पैसा आनंद और विकास में खर्च होना चाहिए, वो कभी खर्च नहीं होता। बचत की आदत से भड़ास बिग इंडियन फैट वेडिंग में निकलती है। पच्चीस साल तक ज़िंदगी में कुछ नहीं रहता, तो सारी भड़ास एक रात में निकल जाती है। शादियों में जो पैसा खर्च करते हो, उसका आधा भी लड़की की ज़िंदगी, मन, व्यक्तित्व बनाने में लगा दो, तो लड़की भी तर जाएगी, आप भी तर जाओगे।
तुम्हें अपनी पसन्द नहीं अपनी कमज़ोरियाँ देखनी होगी, ये स्वीकार करना होगा कि भीतर एक बन्धन है जिसको सुधार की ज़रूरत है और फिर जिससे रिश्ता बनाने जा रहे हो, उसकी ओर देखो और पूछो ‘क्या इस इंसान में वो क्षमता है, ताकत है कि वो मेरे भीतर की दुर्बलताओं को, अँधेरे को, अज्ञान को ठीक कर पाये?' शादी भी आन्तरिक प्रगति और एक बेहतर इंसान बनने के लिए ही करो |
प्रश्नकर्ता: मेरे पति एक ऐड इंडस्ट्री (विज्ञापन उद्योग) में काम करते हैं। तो उनका पूरा समय जवान और सुन्दर महिलाओं के साथ बीतता है। जिसके वजह से मैं बहुत स्ट्रेस (तनाव) में रहती हूँ, पजेसिव (अधिकारात्मक) हो जाती हूँ, इनसिक्योर (असुरक्षित) हो जाती हूँ। तो मैं सारे हथकंडे अपना चुकी…
मैंने शादी के जो सपने संजोए थे कि उच्चतम सुख…
आचार्य प्रशांत: समलैंगिकता विकार है, ऐसा तुम्हीं कह रहे हो। इस विकार का समाधान, मैं…
थोड़ा जिद्दू कृष्णमूर्ति को भी पढ़े हैं, थोड़ा…
प्रश्नकर्ता: नमन आचार्य श्री, मैं शादी करने जा रहा हूँ। मगर मैं समझ रहा हूँ कि ये अच्छा नहीं हो रहा। मगर दूसरी तरफ़ मुझसे ये अकेलेपन से भरी हुई ज़िन्दगी बर्दाश्त नहीं होती। कृपया मार्ग दिखाएँ।
आचार्य प्रशांत: अब तो मंज़िल ही मिल गई, मार्ग क्या दिखाऊँ?
(श्रोतागण हँसते…
आचार्य प्रशांत:देखो, अभी- अभी हमने बात करी कि जीवन में कोई भी निर्णय करना…
आचार्य प्रशांत: शादी की बात करी तुमने, शादी न अच्छी है न बुरी है। बिलकुल साफ़-साफ़ देखो शादी का मतलब क्या होता है। हटाओ शब्दों को, रस्मों को, रिवाजों को, मान्यताओं को। जीवन का अर्थ, मैंने कहा, वो है जो चौबीस घंटे तुम अनुभव कर रहे हो। तो शादी का…
प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं उन अविवाहित महिलाओं के बारे में कुछ चीज़ें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ जिन चुनौतियों का उन्हें सामान्यतया समाज में सामना करना पड़ता है। जैसे एक बहुत ही मौलिक चीज़ है कि अगर आप अपने लिए फ़्लैट भी ढूँढने जा रहे हो तो आपको किराये…
प्रश्नकर्ता: पुरुषों की तुलना में महिलाओं के अन्दर किसी के साथ रहने का भाव ज़्यादा रहता है, और साथ न हो तो डर सा लगता है।
आचार्य: क्या? क्या छिन जाएगा?
प्र: वो कंडीशनिंग (अनुकूलन) बहुत गहरी है।
आचार्य: छोड़ो न कंडीशनिंग को, सीधी बात बताओ, क्या छीन लेगा कोई?…
तो उसके बाद से मैं आपको सुन रही हूँ, ऑन एंड ऑफ़ (कभी-कभी)। बीच में ऐसे-ऐसे इनसीडेंट्स (घटनाएँ) आये…
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं विवाह के मूल में, ग़ौर से समझिएगा। जो पहली बात है वो दैहिक है, प्राकृतिक है। एक उम्र आते ही पुरुष को स्त्री के साथ और स्त्री को पुरुष के साथ रहने की इच्छा उठने लगती है। यह जो इच्छा है यह पूरे तरीक़े से…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! मेरा एक बचपन का बहुत अच्छा दोस्त है, हम पच्चीस-तीस सालों से साथ हैं। पिछले महीने मैं शिविर आया था, मैंने यही बात उसको बतायी, लेकिन उसने मेरी बात नहीं सुनी और कहा कि मैं ये सब नहीं सुन सकता। मैंने समझाने की कोशिश की मगर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी चरण स्पर्श। जब से आप बैंगलोर विश्रान्ति शिविर में आये हैं, मेरे जीवन में बहुत परिवर्तन हो रहे हैं। मेरा जीवन सुधर रहा है। अट्ठाईस साल का होने के ख़ातिर मुझे सभी की तरह शादी के बारे में सोचना पड़ रहा है। आपने एक वीडियो में कहा…
आचार्य प्रशांत: जब हम शादी करते हैं तो शायद ही होगा कोई जो कहेगा कि भाई जवानी छा रही है, शारीरिक माँगें हैं, इसके लिए हम विवाह करने जा रहे हैं। ख़ास तौर पर महिलाएँ तो बिलकुल नहीं मानेंगीं, वो कहेंगीं—"छी, छी! इतनी गंदी बात। हम बोल ही नहीं सकते…
आचार्य प्रशांत: शादी की उम्र हो रही है। हम, हम कौन…