गुरु बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है

Acharya Prashant

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गुरु बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है
गुरु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं होता; तुम जो ऊँचे से ऊँचे हो सकते हो, तुम्हारी उस अप्राप्त संभावना का नाम है — गुरु। गुरु के साथ रहने का अर्थ होता है — अपनी उच्चतम संभावना के साथ रहना। उसके साथ होने का मतलब होता है उसको समर्पित हो जाना। वो पीछे से आदेश देता रहता है और तुम काम कर रहे होते हो। गुरु का विचार नहीं किया जाता, जब गुरु साथ होता है तो समस्त विचारों में गुरुता आ जाती है। गुरु का विचार नहीं करो, गुरु द्वारा प्रेरित जीवन जियो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: क्या अर्थ होता है गुरु के साथ रहने का? गुरु के साथ रहने का अर्थ होता है, अपनी उच्चतम संभावना के साथ रहना। गुरु कोई बाहरी व्यक्ति थोड़ी ही होता है, गुरु कोई बाहरी प्रभाव थोड़ी ही होता है। तुम जो सुंदर से सुंदर हो सकते हो, तुम जो ऊँचे से ऊँचे हो सकते हो, तुम जो निर्मल से निर्मल हो सकते हो — तुम्हारी उस अप्राप्त, अव्यक्त संभावना का नाम है, गुरु।

वो संभावना अप्राप्त भले ही है, अव्यक्त भले ही है, लेकिन मृत नहीं है। वो तुमको बुलाती है, मूक हो गई है तो मौन में बुलाती है। आवाज़ नहीं है उसके पास, पर तुमको आवाज़ देने के हज़ार तरीक़े हैं उसके पास।

तुम पाताल में रहो, ज़मीन पर रहो, छोटे से किसी पर्वत को ही तुम अपनी अधिकतम ऊँचाई मान लो, तुम कहीं भी रहो वो जो तुम हो सकते हो और वो जो होना तुम्हारी नियति है, और वो जो तुम मूलतः हो ही — वो तुम्हें सदा पुकारता रहता है। इसीलिए आदमी का चित्त चैन नहीं पाता। अपनी अप्रतिम और अपरिमित संभावना की तलाश है तुम्हें, इसीलिए आदमी छटपटाता रहता है। जो ऊँचे से ऊँचा तुम हो सकते हो, जब तक वो हो नहीं जाओगे, तुम तड़पते ही रहोगे।

जो तुम्हें बुला रहा है, जिसके कारण तुम व्याकुल रहते हो, वो कोई बाहरी नहीं, वो कोई दूसरा नहीं — वो तुम्हारा अपना ही हृदय है, तुम्हारा ही केंद्र है, तुम्हारी ही नियति है। तुम्हें वहाँ पहुँचना है, वहाँ नहीं पहुँचोगे तो मरे-मरे से जियोगे। बात समझ में आ रही है?

कौन है गुरु?

वो जो तुम हो, लेकिन होकर भी नहीं हो। वो जिसे तुम्हारी संभावना भी नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि वो तुम्हारा सत्य है — पर ऐसा सत्य जो धूल के, राख के, प्रभावों के, प्रकृति के, माया के, अविद्या के नीचे ढक गया है। वो सत्य देह लेकर, मूर्त रूप लेकर तुम्हारे सामने खड़ा हो जाता है, उसको कहते हैं देही, शरीरी गुरु। इसीलिए तो वो तुम्हें आकर्षित करता है, इसीलिए वो तुम्हें खींचता है, क्योंकि वो तुम्हें कुछ ऐसा दे रहा है जो तुम्हारा ही है। इसीलिए उसकी बातें अजीब होते हुए भी जानी-पहचानी लगती हैं। इसीलिए उसके वक्तव्य विरोधाभासी होते हुए भी सरल लगते हैं। इसीलिए वो बहुत कहीं दूर का प्रतीत होते हुए भी बिल्कुल अपना-सा लगता है, क्योंकि उसमें और तुममें कोई भेद नहीं है, तुम उसे जानते हो। अजीब है तुम्हारी हालत, तुम उसे जानते भी हो और तुम उससे नितांत अपरिचित भी हो। पर अपरिचय झूठा है, परिचय सच्चा है।

तुम्हारा उससे परिचय भी है और अपरिचय भी। सतह-सतह पर देखते हो तो तुम कहते हो, “इसको हम जानते नहीं, इसकी बातों को हम समझते नहीं।” लेकिन अपने मन की गहराइयों में जाते हो तो कहते हो, “इसको हम खूब जानते हैं, इसका हमारा बड़ा पुराना नाता है। जब हम भी नहीं थे तब ये था और जब तक हम हैं तब तक ये रहेगा, और हमें तो ऐसा लगता है जब हम नहीं भी रहेंगे तब भी ये रहेगा।”

गुरु के साथ होने का अर्थ हुआ — अपने दिल के साथ होना, अपनी सच्चाई के साथ होना।

दोहरा रहा हूँ, किसी बाहर वाले के साथ होने को, किसी दूजे के साथ होने को गुरु का सामीप्य नहीं कहते। जब तुम वो हो, जो तुम्हारी श्रेष्ठतम संभावना है, तब तुम बिना हिचक के, बिना ख़ौफ़ के बेशक कह देना, “मैं गुरु के साथ हूँ।” भले गुरु दिखाई देता हो या न दिखाई देता हो, भले उसका ख़याल आता हो या न आता हो। बात आ रही है समझ में?

तो जब मैं कह रहा हूँ कि दिन भर आप घूमते रहे, मुझे साथ रखा क्या? तो हम आपसे ये पूछ रहे हैं कि दिन भर आप जहाँ घूम रहे थे, वहाँ क्या आप वही थे जो आपको होना चाहिए, या आप उससे नीचे गिर गए थे? मैं आपसे पूछ रहा हूँ, कि क्या आपको वो याद था दिन भर जो आपको याद होना चाहिए, या आपने उसे भुला दिया और पचास अन्य चीज़ों को याद कर लिया? ये मेरा प्रश्न है। फिर पूछ रहा हूँ, बोलो, दिन भर मेरे साथ थे या नहीं?

श्रोता: 75%

आचार्य प्रशांत: 75%! छात्र हो, प्रतिशत ही घूमते रहते हैं दिमाग़ में। मैं हूँ तो पर तुम्हारे साथ हूँ या नहीं, ये तुम पर निर्भर करता है। मैं हूँ तो, पर तुम्हारे साथ हूँ या नहीं हूँ, ये तुम्हारी इच्छा पर है। चाहो तो साथ लेकर चलो, और चाहो तो कह दो कि हम स्वयं ही काफ़ी हैं, हमें ज़रूरत ही नहीं। तो वो सब तुमने ही देखा, या मुझे भी दिखाया? दृष्टा कौन था? कैसा था तब जब मैं साथ था, और कैसा था तब जब आप अकेले थे और अकेले होने के कारण आपने ज़माने का साथ कर लिया था?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप से मिलने की वजह से अब मेरी दृष्टि साफ़ होती जा रही है। मैं धन्य हूँ!

आचार्य प्रशांत: हम एक नहीं होते, हम निचली से निचली और ऊँची से ऊँची संभावना के बीच का पूरा विस्तार होते हैं। हम धरती से लेकर आसमान तक की सारी संभावनाएँ होते हैं। हम शून्य से लेकर सौ तक की सारी गिनतियाँ होते हैं। हम कुछ भी हो सकते हैं।

ये आदमी का परम सौभाग्य भी है और बड़े से बड़ा दुर्भाग्य भी है। परम सौभाग्य इसलिए, क्योंकि आसमान पर बैठ जाने की इजाज़त हमें है, सामर्थ्य हममें है। और दुर्भाग्य इसलिए कि आसमान तक जाएँगे या नहीं जाएँगे, ये चुनाव करने का अधिकार भी हमें है। और अगर हम अपने चारों ओर नज़र फिराएँ तो देखने में यही आता है कि अधिकांशतः हम ये चुनाव नहीं करते कि हम आकाश में उड़ेंगे, कि हम अपनी उच्चतम संभावना को प्राप्त करेंगे। अधिकांशतः हम यही चुनाव करते हैं कि हम नीचे के किसी पाताल में लिप्त रहे आएँगे, कैद रहे आएँगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने ग़ौर किया कि जब मैं अपनी सुख-सुविधाओं की फ़िक्र करने लग रहा था, तो मैं आपको भूल जा रहा था। ऐसा क्यों?

आचार्य प्रशांत: तो एक बात देखिए यहाँ पर, जब प्रसन्नता का, उत्तेजना का, भोग का, विलास का मौक़ा हो, उस समय गुरु की याद असुविधा दे देती है। जैसा इन्होंने कहा, झटका लग जाता है।

पर्यटक बनकर घूम रहे हैं, रोमांच मिल रहा है, अनुभव मिल रहा है, प्रसन्नता मिल रही है, अपने ही जैसे दूसरे सैलानी दिख रहे हैं। दृश्य नयनाभिराम हैं, आहा! मौसम सुहाना है, प्रकृति के रंग हैं, नर-नारियाँ हैं, संसार अपनी सुंदर छटा के साथ चहुँ ओर बिखरा हुआ है। कुछ आँखों को खींच रहा है, कुछ कानों को खींच रहा है, ठंडी बयार त्वचा को छू रही है, सहला रही है। पर तभी याद कौन आ गया? कबाब में हड्डी! “क्या नज़ारे थे!

वो बादल, वो सूरज, वो नर, वो नारी, बीच में ये किसने भाँजी मारी? कहाँ से याद आ गई गुरुदेव तुम्हारी! अब सारा रस फीका हो गया, जो कुछ सलोना और आकर्षक लगता था, रसहीन हो गया।” असुविधा हो गई न?

अब समझ रहे हो कि क्यों चित्त अपने आप नहीं भागता है सत्य की ओर? क्यों साधना करनी पड़ती है? तुम्हें मिठाई की ओर ले जाने में तो कोई साधना नहीं करनी पड़ती न, पर तुम्हें दवाई की ओर ले जाने में ज़रा दिक़्क़त होती है। तुमने कभी अचरज नहीं किया? किसी को भी संसार की ओर ले जाने के लिए नहीं कहना पड़ता कि “तू पहले तपस्या कर, तब तुझे संसार उपलब्ध होगा।” संसार की ओर तो मन स्वतः ही भाग लेता है। हाँ, किसी को सत्य की ओर ले जाना हो तो कहना पड़ता है, “भाई, बड़ा भारी काम है। ढलान के विरुद्ध चढ़ना है, तुझे साधना करनी पड़ेगी।” अब वो लगा है साधना करने में।

क्योंकि हम ऐसे हैं। इससे तुम्हें मन के बारे में, जीवन के बारे में बड़ी महत्त्वपूर्ण और रोचक बात पता चलेगी। आँखें बाहर को देखती हैं, कान बाहर का सुनते हैं, मन संसार की स्मृतियों से घिरा रहता है। तुम्हारी ये पूरी व्यवस्था ही संसार के संसर्ग हेतु निर्मित है, इसीलिए ये बड़ी आसानी से चल देती है संसार की ओर। सत्य की ओर ले जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।

जैसे कोई चट्टान हो, उसको पहाड़ से ढुलका देना कोई मेहनत का काम नहीं है। तुम्हें ज़रा-सा उसको इशारा देना है, फिर वो अपने आप ढुलकती चली जाएगी, ढुलकती चली जाएगी, और जितना ढुलकेगी उतना वो और गतिबल, गतिवेग हासिल करती चली जाएगी। लेकिन उसी चट्टान को अगर तुम्हें पहाड़ के शिखर पर ले जाना हो तो बड़ी मेहनत पड़ती है। तो मनुष्य का निर्माण ऐसा हुआ है कि वो ढुलकता रहे, ढलान से नीचे आता रहे। इसी कारण तो आदमी का जन्म, मैंने कहा, कि जितने सौभाग्य की बात है शायद उससे ज़्यादा दुर्भाग्य की बात है। पहाड़ों का शिखर हमारे लिए संभावना मात्र बनकर रह जाता है, और नीचे की खाइयाँ हमारी किस्मत बन जाती हैं।

संभावना तो ये थी कि शिखर पर राज करते, पर ज़िंदगी बीती अँधेरी खाइयों में। जहाँ सूरज की रोशनी तक नहीं पहुँचती, जैसे हांडी खोह हो। देख के आया कोई? तो सोचो जो निम्नतम बिंदु था ज़िंदगी वहाँ बीत रही है, उतना नीचे। और संभावना क्या थी? सामर्थ्य क्या लेकर पैदा हुए थे? कि सतपुड़ा ही नहीं, हिमालय के उच्चतम शिखर पर विराजो तुम। पर वो संभावना, संभावना ही रह गई। ज़िंदगी तो किसी गर्हित पाताल में ही बीती है।

संभावना को हम गर्भ में ले ही मर गए। जो हो सकते थे, जो होना चाहिए था, वो कभी हुए ही नहीं।

बात आ रही है समझ? अब चुन लो तुम। तुम्हारी व्यवस्था का जो प्राकृतिक वेग है, वो तुम्हें ले जा रहा है?

श्रोता: खाई की ओर।

आचार्य प्रशांत: और गुरु तुमको पुकार रहा है?

श्रोता: शिखर से।

आचार्य प्रशांत: शिखर से। पर गुरु की ओर जाना असुविधाजनक है। खाई की ओर जाने में जानते हो क्या मिलता है? जब तुम खाई की ओर चलते हो तो रास्ते में क्या मिलता है? जल्दी बताओ। प्रसन्नता, रोमांच। क्या-क्या मिल रहा था आज पर्यटक बनके? उत्तेजना, उत्सुकता, दुनिया का साथ, रंगीनियाँ, इंद्रियगत सुख — ये सब कुछ मिलते हैं जब तुम जा रहे होते हो खाई की ओर।

और जब तुम्हारा आरोहण हो रहा होता है, जब तुम उठ रहे होते हो, तब क्या मिलता है? नीचे की ओर जाने में अगर सुख मिल रहा है, तो ऊपर की ओर जाने में क्या मिलेगा? असुविधा मिलती है, तकलीफ़ होती है। अब समझ में आया कि 1000 में से 999 लोग खाइयों में ही क्यों पाए जाते हैं? क्यों पाए जाते हैं? क्योंकि खाइयों की तरफ़ जाने वाला रास्ता सुख से, प्रसन्नता से, समाज की अनुशंसा से पटा हुआ है। सरल रास्ता है।

ये बड़ी अजीब बात है, जहाँ तुम्हें होना नहीं चाहिए, वहाँ को जाने वाला रास्ता सरल। और जहाँ तुम्हें होना चाहिए, वहाँ को जाने वाला रास्ता कठिन। ये बनाने वाले ने क्या अन्याय कर दिया इंसान के साथ? और ऐसा ही है। इसीलिए जिन्होंने जाना है उन्होंने ये भी कहा है, कि जन्म लेना ही सज़ा है। उन्होंने ये भी कहा है, कि सज़ा भुगतने के लिए ही जीव जन्म लेता है। क्योंकि जीव है ही ऐसा, जिधर नहीं जाना चाहिए उधर को उसकी आँखें ले जाएँगी। और जिधर को जाना चाहिए, उस दिशा को मन कभी देख ही नहीं सकता, क्योंकि वो दिशा कल्पनातीत है, वो दिशा अचिंत्य है, उस दिशा का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

तो भाई, टेढ़ी खीर है। अब बताओ, गुरु को साथ रखना है कि नहीं रखना है?

श्रोता: रखना है।

आचार्य प्रशांत: अरे, आज तो रख नहीं पाए एक दिन।

श्रोता: हम दिन भर रखे, ये साक्षी है।

आचार्य प्रशांत: तुम्हारा साक्षी तुमसे बाहर बैठता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे नहीं मालूम मैं सही हूँ कि नहीं, पर ये ऐसा मुझे लगता है, गुरु को साथ रखने का मतलब ख़ुद के अंदर की गहराइयों को देखना, ख़ुद के अंदर की कमियों को देखना।

आचार्य प्रशांत: अरे, शाबाश!

प्रश्नकर्ता: उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?

आचार्य प्रशांत: तुम्हारी अल्हड़पने की, छात्रों की भाषा में बोलूँ तो गुरु को साथ रखने का अर्थ होता है — “बीइंग योर बेस्ट।” जो तुम श्रेष्ठतम हो सकते हो, जब तुम वो हो तो समझ लो कि गुरु तुम्हारे साथ है। और जब तुम अपने श्रेष्ठतम से, अपने बेस्ट से ज़रा भी नीचे हो, तो समझ लो कि गुरु को तुम कहीं छोड़ आए और अपनी अकड़ में अकेले घूम रहे हो। कह रहे हो, “हम अकेले ही बहुत ठीक हैं, वो नहीं चाहिए, बहुत परेशान करता है।”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अवलोकन लिखने से मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

आचार्य प्रशांत: मन पर प्रभाव नहीं पढ़ता। रिफ़्लेक्शन लिखना, अवलोकन लिखना, मन के सामने आईना रखने जैसा है। तुम आईने को देखते हो, तुम पर क्या प्रभाव पड़ता है? तुम्हें पता चल जाता है तुम कौन हो, कैसे हो, बस। तो तुम्हारी जो सच्चाई है, यथार्थ, वो तुम्हारे सामने ज़ाहिर हो जाता है जब तुम लिखते हो। न लिखो तो वो बातें भीतर गोल-गोल घूमती हैं, उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं, पर कोई ठोस शक्ल नहीं ले पातीं। तुम्हें ही चैतन्य रूप से पता नहीं चल जाता कि तुममें क्या चल रहा है। लिख देते हो तो ऐसा ही है जैसे सामने आईना ला दिया और तुम्हें दिख जाए कि यहाँ कालिख लगी है, बाल ज़रा बिखरे हुए हैं, आँख ज़रा लाल है।

आईना चेहरे का हाल बता देता है, और जब तुम बैठकर अपने अवलोकन लिखते हो तो मन का हाल पता चल जाता है।

इसीलिए जो लोग अपने मन का हाल जानना ही नहीं चाहते, वो अवलोकन लिखेंगे ही नहीं। वो नहीं लिखेंगे अवलोकन क्योंकि अपने मन का हाल नहीं जानना चाहते। वो अपने मन का हाल इसलिए नहीं जानना चाहते क्योंकि वे भली-भाँति जानते हैं कि मन का हाल क्या है। भली-भाँति जानते हैं कि मन का हाल क्या है, पर अपने से ही चोरी कर रहे हैं, ख़ुद को ही बताना नहीं चाहते मन में क्या चल रहा है, तो वो अवलोकन लिखेंगे ही नहीं। क्योंकि लिख दिया तो बात ज़ाहिर हो जाएगी। अभी तक छुपी हुई है, फिर राज फ़ाश हो जाएगा।

किन्होंने कोई बात नहीं करी है दो दिनों में, वो बोलेंगे। चुप-चुप बैठे हो, ज़रूर कोई बात है (श्रोता की ओर देखते हुए)।

श्रोता: आचार्य जी, एक प्रश्न है।

आचार्य प्रशांत: मैं कह रहा हूँ, अपने दिल का हाल बताओ, तो ये प्रश्न मुझसे पूछ रहे हैं। अपना परिचय दो पहले, फिर प्रश्न पूछना। अपना हाल बताओ?

श्रोता: हाल।

आचार्य प्रशांत: बताना भी नहीं आता, छुपाना भी नहीं आता। मैं क्यों दूँ तुम्हारे प्रश्न का जवाब? तुम पहले मुझे समझाओ कि मैं किसी भी सवाल का जवाब क्यों दूँ?

सवाल पूछने से नहीं होगा बेटा। सवाल पूछना तो तरीक़ा होता है मेलजोल बढ़ाने का। कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें। फिर आगे क्या होता है? खामोशी को खामोशी से बात करने दो। संवाद होना चाहिए ना, सिर्फ़ प्रश्न थोड़ी दागे जाते हैं। डायलॉग होना चाहिए।

कौन बोलेगा?

श्रोता: आचार्य जी, हम आज और सब लोग तो गए थे घूमने के लिए। हम और अनन्या यहीं आसपास वॉक कर रहे थे काफ़ी देर। फिर झील के किनारे जाकर बहुत देर बैठे रहे, और हम लोगों के पास किताबें थीं। तो मिस्टिक सॉन्ग्स ऑफ मीरा ये हम पढ़ रहे थे, और ये अपना कुछ पढ़ रही थी।

तो मेरे संग तो ये है कि मेरे तो बहुत विचार आते नहीं हैं, बहुत कुछ सोच-विचार वाली चीज़ होती नहीं है। बहुत देर बैठ के रहे, क़रीब डेढ़-दो घंटे हम थे। बुक पढ़ी, वैसे ही देखते रहे आसपास। बहुत कुछ विचारों का आना-जाना कुछ हुआ नहीं, कुछ ब्लैंक-सा। वही आपके सामने आने पर भी होता है कि मेरे पास बहुत कुछ प्रश्न होते नहीं हैं पूछने के लिए।

आचार्य प्रशांत: कर लो नकल कर लो, तुम भी यही बोल दो, मी टू। मेरे पास भी कोई सवाल नहीं होता (दूसरे श्रोता की ओर देखते हुए)। बोलो अच्छा, क्या बोल रहे हो?

श्रोता: जैसे घूमने गया था तो आपको ध्यान कर रहा था, तो अंदर से एक लग रहा था, जैसे कि कोई बोल रहा है कि “क्या बेवकूफ़ी चल रही है?”

आचार्य प्रशांत: सही तो बोल रहा था वो। अगर कोई वास्तव में तुम्हारे साथ होता है, तो क्या तुम्हें उसका ध्यान करना पड़ता है? तुम चल रहे हो और कोई था तुम्हारे साथ में। नाम बताओ एक-आध। आयुष। तो आयुष का ध्यान कर रहे थे बार-बार? वो चल रहा है बगल में तो ध्यान कर रहे हो? आयुष, आयुष, आयुष।

याद तो उसको ही किया जाता है, जिसको भूल चुके हो। तो ठीक ही था भीतर वाला जो कह रहा था, “क्या बेवकूफ़ी कर रहे हो।” वास्तव में भूले बैठे हो और क्रिया कर रहे हो ध्यान की।

समझना बात को, जब वास्तव में गुरु के साथ होते हैं तो गुरु मालिक हो जाता है, कर्ता हो जाता है। उसके साथ होने का मतलब होता है उसको समर्पित हो जाना, उसके हाथों में बागडोर सौंप देना। वो पीछे खड़ा हो जाता है और पीछे से आदेश देता रहता है और तुम आगे होते हो, तुम काम कर रहे होते हो। तुम नौकर हो जाते हो, वो मालिक हो जाता है।

और वो कहाँ खड़ा है? तुम्हारे पीछे। वो तुम्हारे पीछे खड़ा है, तुम उसके आगे खड़े हो, और तुम्हारे आगे है संसार। वो अब तुम्हें जैसा बताता है, वैसा तुम संसार में व्यवहार करते हो, वैसी तुम संसार में राह पकड़ते हो। वो तुम्हारे पीछे खड़ा है, और जब वो तुम्हारे पीछे खड़ा है तो तुम्हें वो दिखाई नहीं देता। दिखाई तुम्हें संसार ही देगा, पर वो पीछे से तुमको नियंत्रित करता है। जैसा हमने कहा, तुमने अपनी बागडोर उसको सौंप दी है। अब तुम कैसे उसकी शक्ल देखोगे? क्योंकि वो तो पीछे खड़ा है। अब तुम कैसे उसके बारे में कुछ भी कहोगे? क्योंकि वो तो पीछे खड़ा है। अब तुम कैसे उसका ध्यान करोगे? वो तो पीछे खड़ा है।

इस बात को दोनों तरीक़े से सुनना। तुम कैसे उसका ध्यान करोगे— वो तो पीछे खड़ा है। और तुम कैसे उसका ध्यान करोगे— वो तो पीछे खड़ा है।

जो पीछे ही खड़ा है, उसका ध्यान कैसे करोगे? और जो पीछे खड़ा है, उसका ध्यान कैसे करोगे? दोनों ही स्थितियों में उसका ध्यान संभव नहीं है। हाँ, तुम्हें अब उसके इशारों पर चलना होगा। और अगर तुम उसके इशारों पर चल रहे हो, तो फिर परोक्ष रूप से, इनडायरेक्टली, ये प्रमाणित हो जाता है कि तुम उसके साथ हो।

गुरु का कभी सामना नहीं किया जाता, उसके सामने खड़े हो तो उसके विरोध में खड़े हो न। समझो बात को। उसका सामना अगर तुम कर रहे हो तो तुम उसके विरोध में हो। गुरु जिस दिशा देख रहा होता है, उस दिशा देखा जाता है। और जब तुम उस दिशा देख रहे हो, तो गुरु तुम्हारे सामने नहीं, तुम्हारे पीछे होगा। क्योंकि वो तुम्हारे पीछे है, इसीलिए तो तुम उस दिशा देख पा रहे हो जिस दिशा गुरु देख रहा है। गुरु का विचार नहीं किया जाता, जब गुरु साथ होता है तो समस्त विचारों में गुरुता आ जाती है, और इन दो बातों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

एक आदमी है जो बैठ के गुरु का विचार किए जा रहा है, गुरु इससे बहुत दूर है। और दूसरा आदमी है जो गुरु का विचार कर ही नहीं सकता क्योंकि उसे पता है कि गुरु अनिर्वचनीय है, विचारातीत है। उसका विचार कैसे करेंगे? तो गुरु का विचार नहीं करता, पर चूँकि वो गुरु के सानिध्य में है, गुरु को समर्पित है, तो उसके सारे विचारों में गुरु का रंग आ जाता है, उसके सारे विचारों में गुरु की सुगंध आ जाती है, उसके सारे विचारों में, मैंने कहा, गुरुता आ जाती है। समझ रहे हो?

जड़ मजबूत है या नहीं, इसका पता पत्तियों को देखकर लगता है। तुम गुरु के साथ हो या नहीं, इसका पता तुम्हारे जीवन को देखकर लगता है। जड़ मजबूत है या नहीं, ये पता करने के लिए तुम जड़ नहीं खोदने लग जाओगे। अपनी ज़िंदगी को देख लो, वहाँ तुम्हें पता चलेगा कि मैं तुम्हारे साथ था या नहीं था।

मैं तुम्हारे साथ था या नहीं था, वो इससे नहीं सिद्ध होता कि तुम मेरा विचार कर रहे थे या नहीं। तुम अगर मेरा विचार कर रहे हो, तो इससे तो यही साबित हो जाता है कि तुम्हारे साथ नहीं हूँ। मैं कब हूँ तुम्हारे साथ? जब तुम्हारे जीवन में, तुम्हारे आचरण में प्रेम है। जब तुम्हारे जीवन में, तुम्हारे आचरण में बोध है। जब तुम्हारे जीवन में, तुम्हारे आचरण में निर्भयता है। तब जान लेना मैं तुम्हारे साथ हूँ।

और तुम खाली कहीं बैठ गए हो, जो उचित कर्म है वो कर नहीं रहे, उसकी जगह बैठकर क्या कर रहे हो? गुरु का विचार! तो पूरा ही साबित हो जाता है कि गुरु से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। खाली ख़याल करना है तुमको।

गुरु का विचार नहीं करो, गुरु द्वारा प्रेरित जीवन जियो। गुरु द्वारा अनुप्राणित आचरण करो।

अब समझ में आ रहा है क्या अर्थ है इस बात का, कि गुरु को साथ लेकर चलो? जो ऊँचे से ऊँचा जीवन जी सकते हो, जियो। यही है गुरु को साथ लेकर चलना। और ऊँचा जीवन जी नहीं रहे और बैठ के गुरु के नाम की माला जप रहे हो, ये बात बिल्कुल व्यर्थ है।

तो अब बताओ, सुबह 11 बजे से रात 11 बजे तक क्या उच्चतम जीवन जिया? वैसे ही जिए जैसा जीना चाहिए था? अपनी उच्चतम संभावना को प्राप्त किया या झूठ और डर और संदेह और आलस के लिए तुम्हारे जीवन में जगह थी? इन 12 घंटों में आलस दिखाया है? इन 12 घंटों में आज्ञा का उल्लंघन किया है? इन 12 घंटों में पूरे तरीक़े से बोधवान रहे हो? अगर रहे हो तो मेरे साथ थे, और अगर नहीं रहे हो तो मेरे साथ नहीं थे।

पूर्णता का ही दूसरा नाम है — गुरु। गुरु इज़ अनदर नेम फॉर परफेक्शन। अगर पूर्ण जीवन जी रहे हो, ये 12 घंटे परफेक्ट जिए हो, तो मेरे साथ थे। और अगर नहीं जिए हो तो मेरे साथ नहीं थे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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