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और गुरुजी अपने शरीर से बाहर कूद गए || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: तुम सोचते नहीं, कुछ विचार ही नहीं करते न? देखती तो आँखें हैं; आँख अगर झपका भी दो तो कुछ दिखाई नहीं देगा। तुम कह रहे हो — तुम शरीर से बाहर निकल गए तो देख कौन रहा है फिर? तुम कह रहे हो, ‘मैंने बाहर निकल के शरीर को देखा’, देखने का काम किसका है? शरीर का। शरीर से तो तुम बाहर निकल गए तो अब देख कौन रहा है?

ये तो छोड़ दो की आँखें होने भर से देख लोगे, आँखें अगर बंद भी हो जाएँ तो दिखाई नहीं देता न? और यहाँ तुम कह रहे की तुम तो आँखों वाले शरीर से ही बाहर निकल गए, अगर आँखों वाले शरीर से बाहर निकल गए तो आँखें तो पीछे छोड़ आये। आँखों वाले शरीर से तुम बाहर निकल गए, अब आँखें कहाँ हैं?

शरीर में। और तुम तो बाहर निकल आये तो अब तुम्हें कुछ दिखाई कैसे दे रहा है? या ऐसा भी है कि आँखों के बिना भी देख रहे हो संसार को? या ऐसा है की बिना आँखों के तुम अपनी आँखों को देख रहे हो? बिना आँखों के तुम अब अपनी आँखों को भी देख रहे हो?

पर किसी ने इस तरह के दावे किये नहीं और तुम बिलकुल भक्ति भाव में खड़े हो जाते हो करबद्ध होके, ‘आ-हा-हा! क्या बात बोली है। और सुनाएँ, एक और सुनाइए, इरशाद।‘ बेचारे और चढ़ जाते हैं — तुम ही तो पाप कराते हो उन-सब से ये।

जहाँ कोई इस तरह की बात करनी शुरू करे, तुम वहीं उसको डांट दो कि, ‘देखों गुरु बहुत हो गया, ध्यान-ज्ञान की बातों तक ठीक था, ये आउट-ऑफ-बॉडी पे मत जाओ, परमात्मा नहीं हो। सीमाओं का अपना कुछ ख्याल करो।‘ तो वो बेचारा रुक जाए सहम करके।

तुम ही तो हो जो गुरुओं से सब पाप कराते हो। जहाँ उन्होंने दो-चार बहकी हुई बातें बोली नहीं, तहाँ तुमने उनको और अतिशय आदर-सम्मान दे दिया; लगे बोलने ‘इरशाद–इरशाद और एक सुनाइए’।

उपनिषदों में कहीं-कहीं पर ऋषियों को कवि कहकर भी संबोधित किया गया है । तो ऋषि में भी एक कवि बैठा होता है और कवि को जानते हो न क्या चाहिए?

‘वाह-वाह-वाह।’

और तुमने जहाँ ऋषि बहादुर को वाह-वाह-वाह देना शुरू किया तहाँ वो आउट-ऑफ-बॉडी क्या आउट-ऑफ-मिल्किवे (आकाशगंगा से बाहर), यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) सब सुना देंगे कि मैं एक बार किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में होकर के आया, वहाँ ब्रह्मा-विष्णु सब खड़े थे ऑटोग्राफ (साक्षातार) लेने के लिए, मैंने उनको भाव नहीं दिया किसी को।

(श्रोतागण हँसते हुए)

गुरु सत्य का प्रतिनिधि होता है, वो तभी तक सम्मान्न्य है जबतक वो प्रतिनिधित्व कर रहा है। जब वो अपनी ही उड़ाने लगे, अपना ही गुणगान और अपना ही महिमा मंडन करने लगे, अपना ही पर्सनालिटी (व्यतित्व) कल्ट (पंथ) चलाने लगे तो जान लेना कि अब ये सत्य का प्रतिनिधि नहीं है, अब ये अपने अहंकार का पुतला बन गया है — बहुत बड़ा पुतला, रावण जितना बड़ा पुतला, दशहरा के रावण जितना बड़ा।

पर दशहरा का रावण कितना भी बड़ा हो जाए, सत्य थोड़ी ही हो जाता है? थोड़ी देर में क्या होता है? ‘फट-फट-फट-फट-फट।‘ तो ठीक है, कहा गया है — “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए”।

बलिहारी गुरु जबतक गोविंद से मिला रहें हैं, तो ये पूछना मत भूला करो — गोविंद से मिला भी रहें हैं? और गोविंद से मिलाने की जगह तुमको आउट-ऑफ-बॉडी एक्सपीरियंस सुना रहें हैं तो कहो ‘भक्क, नीचे उतरो स्टेज (मंच) से, बहुत हो गया। हमने वाह-वाह क्या कर दी दो-चार बार, तुम तो लगे ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ सुनाने।‘

ये हमेशा देखा करो कि गुरु गोविंद से मिला रहा है, तुम्हें सत्य से मिला रहा है या अपने व्यक्तित्व के तले दबा रहा है? कहीं उल्टी गंगा ना बह रही हो, कहीं ये ना हो रहा हो की वो तुम्हें तुम्हारे अहंकार से मुक्त करने की जगह अपने अहंकार तले दबा रहा हो। गए तो थे गुरु के पास इसलिए कि अपना अहंकार बहुत भारी पड़ता था, और उसने क्या करा? उसने कहा, ‘अच्छा! तुम्हें तुम्हारे अहंकार का बड़ा बोझ है, तो ऐसा करो तुम मेरा अहंकार भी ले लो, और दब जाओ।‘ और अधिकांश शिष्यों के साथ यही होता है, वो अपने गुरु के अहंकार तले खूब दबे होते हैं, मुक्ति तो दूर की बात है, और फँस गए।

इसलिए सवाल-जवाब ज़रूरी होता है, इसलिए मैं अपने ऊपर ये अनुशासन रखता हूँ कि अगर तुम मुझे कुछ लिख के भी दे दो तो भी मैं कोशिश करता हूँ कि सीधी-सीधी बात करूँ। इसलिए जब तुम सवाल पूछना बंद भी कर देते हो, तब मैं तुमको कोचता रहता हूँ — और पूछो, और पूछो, जिज्ञासा करो। गुरु पर लगातार सवाल करते रहना बहुत ज़रूरी है और और ज़्यादा ज़रूरी है उत्तर को यूँही स्वीकार ना कर लेना। तो उत्तर मिला, नहीं समझ में आई बात, संतुष्ठी नहीं हुई, प्रति प्रश्न करो।

ये संवाद बहुत ज़रूरी हैं, ये संवाद विवाद बन जाए तो भी चलता रहना चाहिए, रुकना नहीं चाहिए। हम यहाँ इसलिए नहीं इकट्ठा होते हैं कि तुम मेरी बात सुनो, हम यहाँ इसलिए इकट्ठा होते हैं ताकि तुम अपने भीतर के संदेहों से मुक्त हो सको।

इतना तो साफ़ है न?

हम यहाँ इसलिए नहीं आए हैं कि मैं कुछ ख़ास बोलने जा रहा हूँ जो आप बैठ के सुनेंगे; हम यहाँ इसलिए आये हैं क्योंकि हमारे भीतर कुछ जाले लगे हुए हैं, कुछ भ्रम हैं और हम उन भ्रमों को काटना चाहते हैं, तो ये उद्देश्य साफ़ होना चाहिए।

मैं यहाँ अपना गौरव-गीत सुनाने लगूं तो इसमें आपको क्या मिल रहा है?

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