आचार्य प्रशांत: तुम सोचते नहीं, कुछ विचार ही नहीं करते न? देखती तो आँखें हैं; आँख अगर झपका भी दो तो कुछ दिखाई नहीं देगा। तुम कह रहे हो — तुम शरीर से बाहर निकल गए तो देख कौन रहा है फिर? तुम कह रहे हो, ‘मैंने बाहर निकल के शरीर को देखा’, देखने का काम किसका है? शरीर का। शरीर से तो तुम बाहर निकल गए तो अब देख कौन रहा है?
ये तो छोड़ दो की आँखें होने भर से देख लोगे, आँखें अगर बंद भी हो जाएँ तो दिखाई नहीं देता न? और यहाँ तुम कह रहे की तुम तो आँखों वाले शरीर से ही बाहर निकल गए, अगर आँखों वाले शरीर से बाहर निकल गए तो आँखें तो पीछे छोड़ आये। आँखों वाले शरीर से तुम बाहर निकल गए, अब आँखें कहाँ हैं?
शरीर में। और तुम तो बाहर निकल आये तो अब तुम्हें कुछ दिखाई कैसे दे रहा है? या ऐसा भी है कि आँखों के बिना भी देख रहे हो संसार को? या ऐसा है की बिना आँखों के तुम अपनी आँखों को देख रहे हो? बिना आँखों के तुम अब अपनी आँखों को भी देख रहे हो?
पर किसी ने इस तरह के दावे किये नहीं और तुम बिलकुल भक्ति भाव में खड़े हो जाते हो करबद्ध होके, ‘आ-हा-हा! क्या बात बोली है। और सुनाएँ, एक और सुनाइए, इरशाद।‘ बेचारे और चढ़ जाते हैं — तुम ही तो पाप कराते हो उन-सब से ये।
जहाँ कोई इस तरह की बात करनी शुरू करे, तुम वहीं उसको डांट दो कि, ‘देखों गुरु बहुत हो गया, ध्यान-ज्ञान की बातों तक ठीक था, ये आउट-ऑफ-बॉडी पे मत जाओ, परमात्मा नहीं हो। सीमाओं का अपना कुछ ख्याल करो।‘ तो वो बेचारा रुक जाए सहम करके।
तुम ही तो हो जो गुरुओं से सब पाप कराते हो। जहाँ उन्होंने दो-चार बहकी हुई बातें बोली नहीं, तहाँ तुमने उनको और अतिशय आदर-सम्मान दे दिया; लगे बोलने ‘इरशाद–इरशाद और एक सुनाइए’।







