प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में गाने चलते रहते हैं, वैसे ही मन में ये सब लोग भी चलते रहते हैं, कभी ओशो, कभी कृष्णमूर्ति, कभी मैं। इन लोगों में कुछ विशेष नहीं है, आप ये देखें कि इनके माध्यम से आपका मन पाना क्या चाहता है।
जो कुछ भी आपका मन पाना चाहता हो, वो सहज है, सरल है, उसे माध्यम इत्यादि की विशेष ज़रूरत भी नहीं है। उस तक सीधे नहीं पहुँचेंगे तो वो कोई-न-कोई ज़रिया ढ़ूँढ़ता रहेगा।
याद रखिएगा कि ज़रिया अगर टिका ही रह गया समय में, तो फिर वो ज़रिया नहीं अवरोध बन जाता है।
आप एक गाड़ी पर बैठे हैं कहीं पहुँचने के लिए, आप गाड़ी पर टिके ही रह गये तो अब वो गाड़ी वाहन नहीं है, वो क्या है, वो बाधा है। बैठे थे इसलिए कि पहुँच जाएँ, इसलिए नहीं बैठे थे कि बैठे ही रह जाएँ।
मन का भी ऐसा ही है, मन माध्यम तलाशता है चैन पाने के लिए। चैन आसान है, माध्यम मुश्किल है। जहाँ तक हो सके चैन को बिना माध्यम के ही पाएँ।
जब बिलकुल लगे कि फँस ही गये हैं, हो ही नहीं रहा, तब माध्यम अपनाएँ और माध्यम को जब अपनाएँ तो छोड़ने के लिए अपनाएँ, इसलिए नहीं कि माध्यम पर ही अटक गये।




