सिख धर्म का मतलब ही यही है — जो कुछ भी उचित लगता है, फ़र्क नहीं पड़ता किसने कहा और कब कहा — मैं उसको सुनूँगा और उसके सामने सिर झुकाऊँगा। सिख होने का मतलब है कि मैं लगातार सीख रहा हूँ, मैं शिष्य हूँ। दुनिया में कोई धर्म नहीं कहता कि शिष्य बनो, हर धर्म अनुयायी चाहता है। सिख धर्म शिष्यत्व चाहता है। बहुत-बहुत अनूठा है — न तो अवतार है, न पैग़म्बर, सिर्फ़ गुरु ग्रन्थ साहिब है जो शाश्वत गुरु है।
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आचार्य प्रशांत: सिख धर्म का मतलब ही यही है कि पूरा फैलाव जिसमें जो कुछ भी उचित लगता है — फ़र्क ही नहीं पड़ता कि किसने कहा और कब कहा — मैं उसको सुनूँगा और उसके सामने सिर झुकाऊँगा, समादर दूँगा उसको। गुरुओं ने कभी ये नहीं कहा कि हम अवतार हैं, उन्होंने बस इतना ही कहा कि हम टीचर हैं, गुरु हैं। सही बात तो ये है कि गुरु ग्रंथ साहिब कहता है कि अगर गुरुओं की मूर्ति लगाकर उसकी वैसी ही पूजा कर दी जैसी ये देवताओं की हिन्दू लोग करते हैं, तो बड़ा बुरा होगा तुम्हारे साथ।
बड़ी ह्यूमिलिटी(विनम्रता) है, देख रहे हैं? पहली बात तो ये कि कोई आदमी ये नहीं कह रहा कि मेरी कही बात बिल्कुल ठीक है, वो दूसरे और प्रचलित धर्मों, सम्प्रदायों, मान्यताओं के लोगों को भी ला रहा है और उनको शामिल कर रहा है। दूसरी बात, वो ख़ुद निषेध कर रहा है कि मुझे किसी भी तरीक़े से ये तो छोड़ ही दो कि भगवान मान लिया, मुझे भगवान का पैग़म्बर भी मत मान लेना, मैं बस एक गुरु हूँ, टीचर हूँ।
तो बहुत-बहुत अनूठा है सिख धर्म इस मामले में, जिसमें न कोई अवतार है और न कोई पैग़म्बर है। न तो अवतार है, न तो पैग़म्बर है, सिर्फ़ गुरु है। और जब गुरु गोविन्द सिंह जी ने ये कहा कि अब मैं ख़त्म कर रहा हूँ — शारीरिक रूप से अब कोई और गुरु नहीं होगा — शारीरिक रूप से गुरुओं की जो पूरी शृंखला है मैं उसको ख़त्म कर रहा हूँ, तो उन्होंने यही कहा कि अब लगातार जो गुरु रहेगा वो ग्रंथ साहिब ही है, अब वो







