गुरु वो जो तुम्हारी भलाई में सहायक हो सके। जिस गुरु के साथ रह करके मन के भ्रम न कट रहे हों, उसको तुरंत त्यागो। किसी 'व्यक्ति' के प्रति निष्ठा मत रखने लग जाना। लक्ष्य तो सच्चाई है; व्यक्ति को थोड़े ही पूजना है। ‘व्यक्ति’ गुरु नहीं होता; गुरु संदेशवाहक है। गुरु ऊँचे-से-ऊँचा साधन भी हो सकता है और गुरु स्वयं बहुत बड़ी ग़ुलामी भी बन सकता है। अधिकांशतः गुरु के नाम पर ग़ुलामी ही मिलती है। लगातार जाँचते चलो — बंधन कट रहे हैं कि नहीं; अंधेरा हट रहा है कि नहीं।
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प्रश्नकर्ता: गुरु की पहचान क्या है?
आचार्य प्रशांत: गुरु की पहचान ही क्या है?
जो मुक्ति दिला दे, सो गुरु। अगर मुक्ति लक्ष्य नहीं है, तो आपको कैसे पता कि आप किस सद्गुरु की सेवा कर आए? बहुत सद्गुरु घूम रहे हैं। 'सद्गुरु' तो अब सस्ता शब्द हो गया है, जिसको देखो वही अपने नाम के साथ लगा रहा है। आपको पता कैसे चलेगा कि आप किसकी सेवा कर आए? सद्गुरु की पहचान ही कैसे करोगे? बोलो?
इरादा आपका नेक है कि “सद्गुरु की सेवा करो, मुक्ति अपने आप मिल जाएगी।” सुनने में बात अच्छी लगती है, लेकिन बात में पेंच है। इतने घूम रहे हैं सद्गुरु, तुम्हें कैसे पता लगेगा कि वो हैं भी सद्गुरु या ऐसे ही कोई फ़र्ज़ी अपनी दुकान खोल कर बैठा है? ये तो पता तभी लगेगा न कि जब पाओगे कि जीवन में बंधन कट रहे हैं, और मुक्ति के फूल खिल रहे हैं। तो लक्ष्य तो ‘मुक्ति’ को ही बनाना पड़ेगा।




