
प्रश्नकर्ता: आपका स्वागत है, आचार्य जी, पंजाब में हमारी तरफ़ से और बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। तो मैं पहले ही माफ़ी माँग रहा हूँ कि मैं थोड़ा डेकोरम ख़राब कर रहा हूँ, उन्होंने कहा कि सत्र से संबंधित सवाल लेना है। तो सबसे पहली बात तो यह कि जब आप एंटर हुए न, तो अलग-अलग लोगों के अलग-अलग भाव थे। किसी ने आपको प्रेम से कह दिया कि तुम हमारे श्रीकृष्ण हो। तो आपने रोक दिया कि नहीं, ऐसा नहीं है।
तो कई बार यह होता है कि जो आप हमें बंधनों से दूर कर रहे हो, तो कई बार आपसे ही बंधन स्थापित हो जाता है। तो मैं बाहर खड़ा-खड़ा सोच रहा था कि अच्छा, तो यह एक व्यक्ति है, एक आइडेंटिटी है, तो इससे मेरा क्या रिश्ता है? तो मैं क्योंकि लिटरेचर का स्टूडेंट भी हूँ, एक सिख भी हूँ तो गुरबाणी पढ़ता हूँ। तो उसके अनुसार मेरे दिमाग में जो बात आई कि एक मित्र की परिभाषा गुरबाणी के अनुसार, जो गुरु साहब ने, जो पाँचवें गुरु ने गुरु ग्रंथ साहब में लिखी है, वो कहते हैं कि जो सबसे अच्छा मित्र है तुम्हारा, जो तुम्हारा सबसे अच्छा सखा है, वो है: “जिन्ना दसंदड़िआ दुर्मति वजे, मित्र असाड़े सेई हटि गए। जगु सवाइआ जन नानका, विरले केई। ”
कि जो मैं हिंदी में बोलता हूँ कि जो हमारे मित्र हैं, असल में वो हैं जिनसे मिलकर तुम्हारी दुरमत, जो तुम्हारे अंदर बैठा है, बुरा है, जो अहंकार है वो दूर हो जाता है, और मैंने बहुत दुनिया देखी है और ऐसे बहुत कम लोग हैं। तो मेरे माइंड में यह एक तस्वीर बनी। तो मुझे अपने आप में यह सवाल हुआ कि कहीं यह जो मैंने एक मित्रत्व का भाव आपसे बनाया है, इसके पीछे भी कहीं कोई अहंकार या कहीं कुछ बैठा न हो, जो छुप के बैठा हो। तो इसे कैसे पकड़ा जा सकता है कि नहीं, ये ग़लत है या ये सही केंद्र से आ रहा है, सही भाव से आ रहा है?
और इस सवाल के साथ एक रिक्वेस्ट भी है, शायद दोबारा मौक़ा ना मिले कहने का। वो ये है कि जब मैं देखता हूँ कि जितने भी कम्युनिटी से लोग जुड़े हुए हैं, जो मेरे दोस्त हैं, मैं उतना नहीं कर पाता। ये मेरी कमी है। तो जब वो बुक्स वग़ैरह या स्टॉल या लोगों से जाकर मिलते हैं, तो पंजाब में एक ख़ास प्रॉब्लम है कि जितना भी लिटरेचर है वो ट्रांसलेट नहीं हुआ पंजाबी में। तो वो एक गैप रह जा रहा है। तो मुझे लगता है अगर वो गैप फ़िल हो जाए तो बहुत अच्छा हो सकेगा। ये इससे अलग था। आप सवाल के ऊपर ज़्यादा फ़ोकस करें, ये एक विनती थी। थैंक यू।
आचार्य प्रशांत: देखिए, दो बातें होती हैं। एक ये है कि मैं जिसको मित्र मानता हूँ, ठीक है? उससे ही पूछूँ कि तू मुझे बता, मुझे सुझा, मेरा मार्गदर्शक बन या सलाह दे मुझे। ठीक है? ये आपने क्या करा? ये आपने मित्र को चित्र की तरह इस्तेमाल किया है। वो चित्र जो है, वह बनाया किसने है? आपने ख़ुद ही। ठीक है? और आप कह रहे हो यह मित्र है, जबकि वह चित्र है जो आपने ही रचा है। और एक दूसरी बात होती है जहाँ आप दर्पण को मित्र घोषित कर दो, गुरु साहब वो बात कर रहे हैं। दर्पण चित्र नहीं है, जिसे तुम रचो, खींचो, रंगो। दर्पण में और चित्र में क्या अंतर होता है जानते हो न?
चित्र आपका ग़ुलाम होता है। हमारे मित्र भी हमारे ग़ुलाम होते हैं, उन्हें पता होता है कौन-सी बात बोलेंगे तो मित्रता टूट जाएगी। तो मित्र नहीं है वो चित्र है, इसीलिए मित्रता विचित्र है। सारे मित्र जानते हैं कि कौन-से मित्र से कौन-सी बात करनी है। ठीक है? कोई भी आपका रिश्ता हो, बाप-बेटे का, दोस्त-यार, पति-पत्नी, वहाँ यह पता होता है न कौन-सी बात नहीं करनी है। पता होता है न, “चेंज द टॉपिक, लेट्स गेट टू समथिंग एल्स।” ये सब पता होता है न। तो मित्र नहीं है वो, क्या है? वो चित्र हैं, वो पोर्ट्रेट्स हैं। आपने ही करा और आप उसको देख रहे हो, हाँ, ये बढ़िया है क्योंकि मेरे अनुसार है, क्योंकि मैंने इसे अपनी इच्छा से खींचा है, स्केच किया है, रंगा है।
वो कुछ नहीं होता है। दर्पण होता है जो आज़ाद होता है आपसे, वो आपकी नहीं सुनेगा। आप यहाँ पर ऐसे कालिख पोत के आए हो, तो नहीं दिखाएगा कि तुमने चूना मल रखा है। तुमने कोयला पोता है तो कोयले को कोयला दिखाएगा, चूना नहीं बोलेगा तो नहीं बोलेगा।
उसको बोलते हैं मित्र, जो दर्पण की तरह होता है। उसका कोई स्वार्थ नहीं है आपको कुछ और दिखाने में। आप बस जैसे हो, आपको वो वैसे का वैसा दिखा देता है। प्रतिबिंबित कर देता है, रिफ़्लेक्ट कर देता है। वो आपसे असलियत नहीं छुपाता, किसी भी तरह की।
और वह आपसे कुछ इसलिए नहीं छुपाता, क्योंकि उसके पास अपनी कोई स्थिर, दृढ़, जमी हुई, फ़्रोजन पहचान या आइडेंटिटी होती नहीं है। चित्र जो होता है एक पोर्ट्रेट, वो एक स्टेबल चीज़ होती है, एक फ़्रोजन चीज़ होती है न। जैसा बन गया तो बन गया, उसकी आइडेंटिटी है वो। आप जाकर के मोनालिसा को सोनालिसा बना देंगे, तो वह एक करोड़ से एक पैसे की नहीं बचेगी। वह एक करोड़ की तभी तक है, जब तक वह क्या है? वो मोनालिसा है। मोनालिसा को जाकर आपने थोड़ा कुछ यहाँ पर कुछ कर दिया, घाघरा पहना दिया, नथ पहना दी और कह दिया अब ये साहब हमारी सोनालिसा है। वो एक करोड़ से ₹1 की हो जाएगी।
यह चित्र है। चित्र को वैसा ही बने रहना है जैसा वो है, क्योंकि वैसे ही बने रहने में उसका मूल्य है। आपको चित्र नहीं चाहिए अपने जीवन में, भले ही वह ₹1 करोड़ के हों। भूलना नहीं कि वो एक करोड़ के तभी तक हैं, जब तक वो जैसे दिख रहे हैं बिल्कुल वैसे ही हैं, वही उनकी क़ैद है। उससे वो ज़रा भी बदल गए तो एक रुपए के नहीं रह जाएँगे। इसीलिए वो कभी आपको सच्चाई नहीं दिखाएँगे। वो ख़ुद झूठ में जी रहे हों, आपको सच्चाई क्या दिखाएँगे।
आपको जीवन में वो चाहिए जिसके पास अपने कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं हैं। जिसके पास अपने स्वार्थ हैं, जो ख़ुद से झूठ बोल रहा है, वो आपसे सच थोड़ी बोलेगा। कि बोलेगा? जिसको आपसे कुछ चाहिए, वह कभी आपसे सच नहीं बोल सकता, कभी नहीं बोल सकता। आपको क्या लगता है कि विक्रेता, सेल्समैन ये सब बाज़ार में होते हैं, दुकानों में होते हैं? नहीं साहब, ज़िंदगी में होते हैं। हर आदमी एक चलती-फिरती दुकान है, हर आदमी ख़ुद अपने माल का विक्रेता है; हम सब सेल्समैन हैं, हम सब ख़ुद को बेचने ही तो निकले हैं दुनिया के बाज़ार में। और जो ऐसा है, वह कभी दर्पण नहीं बनेगा। वह क्या बनेगा? वो एक चित्र बनेगा, वह एक पोट्रेट बनेगा, एक पेंटिंग बनेगा, स्केच बनेगा, कुछ भी बनेगा, आईना नहीं बनेगा, मिरर नहीं बनेगा।
बात आ रही है समझ में यह?
और चित्र में पसंद होते हैं क्योंकि हमें पसंद होते हैं। मेरी पसंद का है न? मेरी पसंद का है, इसीलिए अपनी ज़िंदगी में रखूँगा। अपने-अपने घर में, अपने ड्राइंग रूम में किस-किस ने चित्र लगा रखे हैं या घरों में। और क्या आप किसी ऐसी जगह जाना पसंद करेंगे जिसमें चारों तरफ़ दीवारों पर मिरर्स ही मिरर हों? फँस जाओगे, बुरा लगेगा। क्रोध से तमतमाता चेहरा और इधर भी मिरर, इधर भी मिरर; इनफ़ाइनाइट नंबर ऑफ़ रिफ्लेक्शंस। अब क्या करोगे? वासना में डूबा हुआ चेहरा, डर में कुम्हलाया हुआ चेहरा, झूठी मुस्कान पोते हुए चेहरा, “हीं…हीं…जी सिंह साहब, जी।” अच्छा लगेगा कि सामने आईना है? मन करे तोड़ ही दें इसको, तोड़ ही दें। अच्छा लगेगा?
इसीलिए अच्छे दोस्त पाए नहीं जाते, क्योंकि अच्छे दोस्तों को तुम सहोगे नहीं, तोड़ दोगे। गुरु साहब ने बोला कि अच्छे दोस्त बिरले मिलते हैं। बिरले से भी बिरले होते हैं क्योंकि वो बिरला भी जब तुम्हें मिलता है तो तुम उसको तोड़ देते हो, जैसे आईना बर्दाश्त नहीं होता। इसीलिए वो बेचारे जो अच्छे दोस्त होने के क़ाबिल होते हैं, वो तुमसे छुप के रहते हैं। आ गए सामने तो तुम पत्थर फेंक के मारोगे, स्मैश द मिरर। वो सच्चाई दिखा देगा। और हम क्या चाहते हैं? बात आ रही है समझ में?
आपने बिल्कुल ठीक बोला। मैं आया, कोई बोल रहा है बुद्ध हो, श्रीकृष्ण हूँ। बात यह नहीं है कि मैं कहूँ कि मैं बुद्ध नहीं हूँ, कृष्ण नहीं हूँ। समस्या वो नहीं है, समस्या उससे आगे की है, समस्या आगे की ये है कि तुम मुझे अपना बुद्ध बनाना चाहते हो। समस्या ये है कि तुम मुझे अपना श्रीकृष्ण बनाना चाहते हो। अपना श्रीकृष्ण माने क्या? श्रीकृष्ण तो तुम्हें पता है ही नहीं। गीता सर तो तुम सुनते नहीं। तो तुम्हें श्रीकृष्ण का क्या पता? जिसे गीता नहीं पता, उसे श्रीकृष्ण क्या पता? श्रीकृष्ण की कहानियों में श्रीकृष्ण थोड़ी बसते हैं। वो कहानियाँ भी तुमने पढ़ी नहीं हैं। कहानियाँ भी तुमने ऐसी हवाओं में उड़ते-उड़ते कुछ सुन ली हैं।
ख़ैर, कहानियाँ तुमने पढ़ी भी हों, तो श्रीकृष्ण कहानियों से कहीं ज़्यादा कहाँ मिलते हैं? गीता में मिलते हैं। गीता तो आपने पढ़ी है नहीं। गीता पढ़ी नहीं, तो श्रीकृष्ण से कोई परिचय नहीं। जब श्रीकृष्ण से कोई परिचय नहीं, तो मुझे क्या बोल रहे हो कि आचार्य जी, आप मेरे श्रीकृष्ण हो। मेरे कान खड़े जाते थे, अरे भागो, ख़तरा है! ये पता नहीं क्या समझ रहा है मुझको, थोड़ी देर में कहेगा मक्खन खिलाओ! इसके लिए श्रीकृष्ण का यही मतलब है।
आधों के घरों में जाओ तो वहाँ पर श्रीकृष्ण के नाम पर यही होता है, मटकी होती है, दही होती है, मक्खन होता है। उनसे पूछो, गीता? वो कहें, “क्या पपीता? खाने-पीने की कोई चीज़ हो तो बताओ, दही, मक्खन, दूध, दही, लस्सी, पपीता, फल कुछ हो तो बताओ।” उन्हें श्रीकृष्ण से क्या लेना-देना। बात आ रही है समझ में?
मित्रता अच्छी चीज़ है; काहे के लिए ये सब करना कि तुम मेरे वो हो, तुम मेरे वो हो। ये सब कोई मतलब नहीं है इन बातों का। दोस्त हूँ, फिर बोल रहा हूँ, मंच से इसीलिए बोलता हूँ सिर्फ़ कि अब आप इतने लोग हो जाते हो तो दूर तक दिखाई दो मुझको, और कोई बात नहीं है। खड़ा भी इसीलिए होता हूँ और अच्छे से पास आकर देख पाता हूँ। पंद्रह साल पहले के आप कोई वीडियो देखोगे, तो आपको मिलेंगे जहाँ नीचे उतर के चला जाता था। वहाँ बीच में आकर खड़ा हो जाता था, मैं ये तक चाहता था कि जाके छूँ। कोई सो रहा होता था, उसको चाहता था धीरे से जाऊँ और।
ऊँचाई वग़ैरह की ज़रूरत नहीं है, जानते हो न अहंकार किसी को ऊँचाई पर क्यों भेज देता है, ताकि वो दूर हो जाए। और कोई बात नहीं होती। वो सम्मान नहीं है, वो परायापन है। ऊँचा बना दो किसी को, ताकि उसका हाथ अब तुम तक पहुँच ही न पाए, आसमान पर बैठा दो ताकि तुम अब ज़मीन पर अपने झूठ के साथ सुरक्षित हो जाओ। और मैं इस चाल से वाक़िफ़ हूँ, मैं कहीं नहीं जाने वाला।
ये बिल्कुल बता रहा हूँ, आप जितना मुझे झाड़ पर चढ़ाओगे, मैं उतना और ज़मीन पे लोटूँगा। और जहाँ मैं देखता हूँ मेरी ज़्यादा इज़्ज़त हो रही है, वहाँ मैं और ऐसे काम कर देता हूँ कि बेइज़्ज़त करो मुझे, जानबूझकर करता हूँ। जहाँ मुझे लगता है कि ये मिस्टिकल ऑरा वग़ैरह अब करेंगे और कहेंगे, "ये देखो, ऐसा है, वैसा है ज़रूर ये…।" वहाँ मैं ऐसे खुजाना शुरू कर दूँगा, या कहूँगा, "केला लाओ।" केला खाऊँगा, बंदर की तरह केला, या छिलका सर पे रख लूँगा। कुछ करूँगा, क्योंकि वही सच्चाई है भाई।
आप इंसान हो, मैं भी इंसान हूँ, तो काहे के लिए वहाँ पर मैं चढ़ जाऊँ और कुछ बनूँ कि कुछ और है, वैसा है, वैसा है? और हारने का मुझे शौक़ नहीं है। मैं यहाँ आया हूँ आपको छूने। छूँगा नहीं, तो हाथ में हाथ कैसे लूँगा? उठाऊँगा कैसे? और आप चाहते हो कि मैं क्या बन जाऊँ? वहाँ शिखर पर बैठा हुआ, दूरस्थ, अस्पृश्य कोई। यह लगभग छुआछूत जैसा है। "आचार्य जी, आप इतने ऊँचे हो जाओ कि हम आपको छू ही न पाएँ।" बच गए तुम। तुम ही बड़े होशियार हो न, जैसे मैं तुम्हारी चाल जानता नहीं कि क्यों उतना ऊपर बैठा रहे हो। मैं जाऊँगा ही नहीं ऊपर। तुम महान वग़ैरह घोषित करोगे, मैं और झुन्नूलाल जैसी हरकत करूँगा। कोई आ रही है बात समझ में? या पंजाबी में बोलूँ? बहुत टूटी-फूटी है।
श्रोता: हमारी हिंदी टूटी-फूटी है। वेलकम, वेलकम।
आचार्य प्रशांत: तुस्सीं सोचदे सी कि बाबा आवेगा, और मैं किया, 'यार, बाबा नहीं, यार आया है।'
श्रोता: छा गए, यार।
आचार्य प्रशांत: तुस्सीं सोचदे सी कि मंत्र देवेगा, और मैं किया, 'यार, मंत्र नहीं मिरर लाया।'"
कितनी ठीक थी?
श्रोता: जो भी थी, दिल के पास थी। ऑसम!
आचार्य प्रशांत: यारी अच्छी है। ये मत करना मेरे साथ (हाथ से ऊपर बिठाने का इशारा करते हैं)। मैं वैसा हूँ भी नहीं, वो असहज जगह है मेरे लिए। वहाँ रखोगे, गिर विर ही जाऊँगा। क्यों टूट-फूट करनी है, ठीक है मिरर ठीक है; वो मेरा काम। यहाँ खड़ा हो जाता हूँ और कहता हूँ, "मुँह देखो अपना।" ये मैं खड़ा हूँ। क्या करना है? मुँह देखो अपना। बात आ रही है समझ में? कहाँ था वो प्रश्न? कहाँ से आया था? ठीक है, मामला आ गया। कुछ और?
श्रोता: पग पहनाना चाहते हैं आपको।
आचार्य प्रशांत: अभी से, ये वाला प्रश्न पूरा कर लो न, बिल्कुल पहनेंगे इस प्रश्न के बाद।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। आचार्य जी, जैसे ये है कि हम दर्पण देख रहे हैं, तो अब दर्पण तो मैं ही देख रहा हूँ न?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल, बिल्कुल ठीक। इसीलिए एक जगह पर आकर बाहर वाला कोई भी बेबस हो जाता है। कोई भी नाम दे लो ऊँचे से ऊँचा, बड़े से बड़ा गुरु बोल लो, दर्पण बोल लो, श्रीकृष्ण, बुद्ध, आप जितने भी ऊँचे नाम दे सकते हैं, आप दे लीजिए ऊँचे से ऊँचा नाम, वो सब के सब बेचारे बेबस हैं, हारे हुए हैं। इतने मसीह, इतने अवतार, इतने गुरु, इतने ऋषि आए, चले गए, आज भी सड़क पर जो आम आदमी चल रहा है, वो नालायक है। हाँ या ना? आज भी सड़क का आम आदमी नालायक है। अपनी सब ऊँचाइयों के बावजूद इतने ऊँचे-ऊँचे लोग आए और उन्होंने जान लगा दी अपनी ईमानदारी से, जान लगाई नहीं दी, जान कई बार तो दे भी दी, तो भी सड़क का आम आदमी आज भी नालायक है। क्योंकि काम तो आपको ही करना है, काम तो आपको ही करना है।
इसीलिए उसी में आगे मैं यह भी जोड़ूँगा कि मैं कुछ नहीं हूँ, जो करोगे आप ही करोगे। आपके पास इंद्रियाँ हैं, आपके पास विकल्प है, चुनाव की शक्ति है। खड़ा है ऐसे दर्पण, आप ऐसे कर लो, मुँह मोड़ लो। और नहीं, तो तोड़ दो; और नहीं, तो उसको ही रंग दो। दर्पण पर ही पोर्ट्रेट बना दो न, वह भी तो कर सकते हो। तो इसीलिए व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी से तो कोई छुटकारा कभी है ही नहीं। ले-देकर के मैं आपको यही बोलने आया हूँ कि मैं कुछ नहीं कर सकता, सॉरी। जो करोगे आप ही करोगे, जो करना है आपको करना है। मेरा काम अधिक-से-अधिक डायग्नोसिस तक जा सकता है। और वह काम भी मैं तभी कर पा रहा हूँ, जब आप यहाँ पर आए हो रजिस्ट्रेशन करा करके। आप वो भी न करते तो मैं उतना भी न कर पाता। तो करना तो जो है वो मनुष्य को स्वयं ही करना है, यह आपने बिल्कुल ठीक पकड़ा।
इसीलिए किसी क़िस्म की ज़िम्मेदारी किसी दूसरे पर मत डालिए। हाँ, दूसरे से कभी कुछ लाभ मिल जाता है, तो अनुग्रह ज़रूर रखिए। अनुग्रह रखिए, बोनस की तरह मिल गया है, एंटाइटलमेंट की तरह नहीं मिला है, सैलरी की तरह नहीं मिला है, बोनस की तरह मिला है। गुरु से अगर आपको कुछ मिल भी रहा है, तो वो इसलिए नहीं मिल रहा है कि गुरु का कर्तव्य है कि सबको अपने साथ लेकर के चले, कि अब गुरु हैं तो करेंगे न, उनको करना पड़ेगा। ये उनकी ड्यूटी है। नहीं, नहीं, नहीं, उन्होंने आपको अगर कुछ दे दिया, तो सर झुका दीजिए, बस सर झुका दीजिए। उनकी ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वो आपको कुछ दे दें, उनकी करुणा थी, उनकी करुणा थी। उनके ऊपर किसी ने ऑब्लिगेशन नहीं रखी थी कि तुम्हें जगत का कल्याण करना है। आ रही है बात समझ में?
ज़िम्मेदारी उनकी कभी नहीं हो सकती, ज़िम्मेदारी तो हमेशा…। और यदि इंसान अपनी ज़िम्मेदारी नहीं स्वीकार कर रहा है, तो दूसरा कोई व्यक्ति जान लगा दे, जान दे दे, हम तब भी नहीं सुधरेंगे। कोई कुछ भी कर दे आपके लिए, हम नहीं सुधरेंगे। यहाँ हम अब इतने लोग बैठते हैं, कहते हैं, "गीता, गीता।" अरे, जब गीता प्रवाहित हो रही थी उस समय पर क्या कर रहे थे? दुर्योधन छोड़ो, शकुनि छोड़ो, भीष्म और धर्मराज जैसे धर्मविद भी क्या कर रहे थे? क्या आ रहे थे? कौतूहल के नाते भी क्या कह रहे थे कि, "अरे, श्रीकृष्ण और इनका कुछ गहन संवाद चल रहा है। क्या बात हो रही है? कुछ पता तो चले।" कुछ कह रहे थे क्या?
जिसे नहीं चाहिए, उसे नहीं मिलेगा। अब इसी को पलट भी दो। अगर तुम्हें नहीं मिला है, तो उसका एक ही मतलब है, तुम्हें चाहिए नहीं था। किसी और को दोष कभी भी मत देना। कभी नहीं, कभी नहीं। "आचार्य जी, आठ महीने हो गए, पर गीता समझ में नहीं आ रही है।" समझना चाहते भी थे? वहाँ ऐसा कुछ जटिल नहीं लिखा हुआ है कि तुम्हें समझ में न आए। दर्पण के सामने जटिलता क्या होती है? दर्पण के सामने तो जो होता है, वो त्वरित होता है, तत्क्षण होता है। इंस्टेंटेनियस होता है। तुरंत दिखता है न, सीइंग ऐट द स्पीड ऑफ़ लाइट। ऐसे दिखा, "हाँ, ये गंदा है।" उसमें समझना क्या है कि गंदा है? गंदा है तो है।
समझने का मतलब तो डिस्टॉर्शन होता है। समझने का मतलब तो डिलिबरेट मिसइंटरप्रिटेशन होता है। समझना क्या है उसमें? समझने जैसा कुछ नहीं है। समझे तो गढ़ और जटिल सिद्धांत जाते हैं, गीता में सिद्धांत तो है ही नहीं। गीता तो आपके जीवन की बात है, जो आपको प्रत्यक्ष होनी ही चाहिए। कोई बाहर का सिद्धांत तो वहाँ दिया नहीं जा रहा है। तो आपको समझ में क्या नहीं आ रहा है?
लोग कहते हैं, "नहीं-नहीं धर्मग्रंथों में जो बातें होती हैं न, घुमावदार होती हैं, वो सिर्फ़ ज्ञानी ही समझा सकते हैं।" ऐसी बात है कि मिरर में जो दिख रहा होता है न, वो कॉम्प्लेक्स होता है, वो कोई साइंटिस्ट ही समझा सकता है। ये कैसी बात है? ठीक है? जो करना है, स्वयं को ही करना है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।
प्रश्नकर्ता: सर, लुधियाना, आपका स्वागत है। सर, दो चीज़ें। एक तो मेरे कुछ ऑब्ज़र्वेशन हैं, जो आज ही मैंने... कुछ थोड़ा रिलेटेड है। मैंने कहा, आपसे मैं शेयर करना चाहूँगा। और उसके बाद मेरा एक क्वेश्चन है, जिस पर थोड़ा-सा मैं आपकी तरफ़ से सुनना चाहूँगा। एक चीज़ मुझे बड़ी अटपटी-सी लग रही थी कि आप आ रहे हैं, तो उनके स्वागत के लिए जाइए। वो ठीक है, हर कोई जाना चाहता है। मुझे पता है, ऐट द एंड तो आपने यहीं पर आना है, आपके पास हमने बैठ आना है। और सिमिलर इंस्टेंस, उसके बाद आपके बस थोड़ी देर आने से पहले ही कोई दो लड़के और भी थे। तो उनके साथ भी मैं दूर से देख रहा था कि ऐसी ही चीज़ हो रही है। यार, मैंने नहीं जाना, कि मैं इधर ठीक हूँ, बाहर जिसने जाना, जाए। हम यहाँ खड़े हैं, ठीक है। हम लाइन में जब लगे, तो मैंने...
आचार्य प्रशांत: देखिए, ये दिलों की बातें होती हैं। ये दिलों की बातें होती हैं, किसी का दिल है, उसे प्यार है वो आगे आके कर रहा है रिसीव, तो कर रहा है। आपको नहीं आना, आप यहाँ बैठिए।
दूसरे के प्यार पर उँगली नहीं उठानी चाहिए, अपनी ज़िंदगी को टटोलो। अपने आप से पूछो कि भीतर कुछ हरा भी है या बस बंजर है।
आरोप नहीं लगा रहा हूँ, प्रश्न पूछ रहा हूँ। और अक्सर, जब अपने भीतर कुछ नहीं होता है, तो जिनके भीतर होता है उनको देख के बुरा-सा लगता है। आप क्या बोल रहे हो कि वहाँ बाहर जो लोग आ रहे हैं, जिनसे मेरा कुछ नाता है और जिनसे प्यार का नाता है, वह सब व्यर्थ ही आ रहे हैं? अगर वह मुझसे बाहर मिलने व्यर्थ आ रहे हैं, तो मैं दिल्ली से उठकर यहाँ उनके लिए व्यर्थ ही आया हूँ। सबसे बड़ा पाखंडी तो मैं हूँ फिर। अगर बात इतनी-सी है कि मैं यहाँ बैठ जाता हूँ, उनको देख ही लूँगा मंच पर, तो आप तो मुझे स्क्रीन पर भी देख सकते हो, यहाँ भी व्यर्थ ही आए आप। और स्क्रीन पर भी देखने की क्या ज़रूरत है? किताब उठाओ। उसमें शब्द हैं, शब्द पढ़ लो। यहाँ क्यों आए हो?
मैं ढोंग को, पाखंड को और झूठ प्रेम-प्रदर्शन को प्रोत्साहित नहीं कर रहा हूँ। पर मैं ख़ुद जानता हूँ कि मैं आपके पास ख़ुद गाड़ी छह घंटे चला करके क्यों आया हूँ। अब कोई मुझसे बोले अगर कि ये इन लोगों से मिलने जाना इतना क्यों ज़रूरी था, तो मैं उसको क्या जवाब देता? क्या जवाब देता? क्यों ज़रूरी था?
मैं यहाँ समय भी लगाकर आया हूँ, संस्था के संसाधन भी लगाकर आया हूँ। मैं क्यों आया हूँ? और अगर मैं वहाँ से यहाँ 400 किलोमीटर आ सकता हूँ, तो यहाँ से बाहर उठकर के अगर कोई 40 मीटर चला गया, तो मैं क्या उसको पाखंडी बोलूँ? पूछ रहा हूँ। ये तो अपने दिल की बात है। मोहब्बत है तो है, नहीं है, तो...। और नहीं है, तो ये कोई इल्ज़ाम नहीं है, साहब, नहीं है तो नहीं है। आप किसी को मजबूर थोड़ी कर सकते हो प्यार करने के लिए। बस हो गया।
देखो, मुझे मालूम है न उनसे मेरा क्या नाता है, मैं जानता हूँ। और मैं जानता हूँ कि कम नहीं हज़ारों-लाखों लोग हैं जिनके लिए मैं उनकी ज़िंदगी से, उनसे, परिवार से ज़्यादा अहमियत रखता हूँ। और इस बात को मैं बहुत-बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी की तरह लेता हूँ। ये इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि अगर मुझे कभी यह भी लगता है कि हो गया न ख़त्म करो, तो मैं कहता हूँ, "नहीं, अभी चलाओ, संस्था को भी चलाओ, ज़िंदगी को भी चलाओ।" क्योंकि लोग हैं जिनसे कुछ नाता है, उन्हीं के लिए है। मैं प्यार जानता हूँ, मुझे यह भी पता है कि ये हाथ जो छूना है इस हाथ का मतलब क्या होता है। ठीक है?
हाँ, ढोंग पाखंड मैं बिल्कुल नहीं पसंद करता हूँ। लेकिन मुझे यह भी पता है कि ये कोई यूनिवर्सिटी का लेक्चर नहीं है, जहाँ पर आकर आप ऐसे सीट लेकर बैठ जाओगे और कहोगे, "हाँ, ठीक है। यस, यस, यस, आई गेट द पॉइंट।" यहाँ पर एक ही पॉइंट है, द पॉइंट इन द हार्ट। और बाहर भी जो आते हैं, अगर वो व्यर्थ का प्रदर्शन करते हैं, डेमॉन्स्ट्रेशन करते हैं, अगर वो अफेक्शन को भी परफ़ॉर्मेंस बना लेते हैं, तो मैं उन्हें पकड़ लेता हूँ। और एक-दो बार तो मैंने भरी भीड़ के बीच उनको कहा है कि, "यार, क्यों ज़बरदस्ती कर रहे हो? कोई ज़रूरत नहीं है।" लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि कुछ लोग झूठ-मूठ का स्वाँग करते हैं, जिनके दिलों में सचमुच प्यार है उनकी बेइज़्ज़ती मत करिए।
मेरी भी ज़िंदगी में वो सब हुए जिन्हें आमतौर पर कहते हैं अफेयर्स। पर उनको लेकर मुझ पर उतनी तोहमतें कभी नहीं लगीं, जितनी आपसे अफेयर को लेकर लगती हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं मैं इससे (पग) संबंधित ही कुछ कहना चाहूँगा। फिर जाता हूँ, बुला रहे हैं। कह रहे हैं कि गड़बड़ है, तो वो ठीक कर देंगे। बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। इसका मतलब जानते हैं क्या होता है? इसका मतलब होता है कि ये (सिर) झुकना नहीं चाहिए, अब वाहेगुरु के अलावा कहीं नहीं झुकेगा। सच है, सच। सच के आगे झुकेंगे, फ़रेब के आगे नहीं। प्यार के आगे झुक सकते हैं कामना के आगे नहीं। बात आ रही है न समझ में? कपड़ा नहीं है, परंपरा ही नहीं है, कि सब पहनते हैं तो हमने भी धारण कर ली। बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। बात समझ रहे हो?
और जितने भी धार्मिक प्रतीक होते हैं, वो सब ज़िम्मेदारियों के तौर पर ही आप धारण करते हो। बस यह है कि हम उनका अर्थ हटाकर उनको सिर्फ़ रिवाज़ बना देते हैं। चाहे फिर वह माला हो, चाहे कड़ा हो, चाहे यज्ञोपवीत हो। वो सब के सब आपको निरंतर कुछ याद दिलाने के लिए होते हैं, सुमिरन। क्योंकि इंद्रियों का क्या काम होता है? दुनिया को देखना और ख़ुद को बिल्कुल न देखना।
ये (पग की ओर इंगित करते हुए) आपको याद दिलाने के लिए होते हैं कि यह सब, जो तुम्हें दिखाई दे रहा है, अनुभव में आ रहा है, छू रहे हो, देख-सुन रहे हो, इसमें ही फँस के मत रह जाना। इसमें फँसने का मतलब है अपने ही दुख, अपनी ही ग़ुलामी को बढ़ाना, और कुछ नहीं। तो चाहे आप पगड़ी धारण करते हों या कोई भी अन्य प्रतीक धारण करते हों। कुछ न कुछ तो सभी धारण कर ही लेते हैं। केश भी प्रतीक ही हैं, उनको बस यूँ ही मत ले लीजिएगा कि साहब, रस्म-रिवाज़ निभा दिया। नहीं।
गुरु साहब ने यह जो इंस्टिट्यूशन था, वो शुरू भी किसलिए किया था, पता है न? कि सिख छुप ही न पाए, उन्होंने कहा, "तुम यह नहीं कर सकते कि गुरु के भी हो और डर के भी हो।" और सिखों की तादाद बड़ी कम थी, और उस समय पर आक्रांताओं का, दिल्ली से मुग़लों का ज़ुल्म बहुत ज़्यादा था। तो मनुष्य की अहंकारिक वृत्ति फिर होती है कि अपनी पहचान को छुपा ले। अहंकार यही करता है, कभी वो अपनी पहचान से लाभ लेता है और जहाँ पर पहचान अनुकूल नहीं पड़ती, वहाँ वो उसको छुपाना चाहता है या ढकना चाहता है, या कुछ और करेगा, रंग-रोगन।
उन्होंने कहा, "मैं तुम्हें ऐसा कर दूँगा कि तुम छुप ही नहीं सकते, अब दूर से ही दिखाई पड़ोगे। अब संघर्ष के अलावा तुम्हारे पास कोई मैंने तरीका ही नहीं छोड़ा। अब तुम पीठ नहीं दिखा सकते, बुज़दिली अब तुम्हारे लिए संभव ही नहीं रहेगी। उतरो मैदान में, लड़ो।" बात आ रही है समझ में?
और यही समूचे अध्यात्म का संदेश है। पीठ दिखाने को पैदा नहीं हुए हो, सर झुकाने को पैदा नहीं हुए हो। रेंगने को पैदा नहीं हुए हो। यह रीढ़ वैसे ही तनी रहे, जैसे आकाश की ओर जाता हुआ तीर। गगन की ओर निशाना है।
यह रीढ़ जो है, यह मेरुदंड, ये सीधे ऐसा होना चाहिए कि आकाश को भेदेगा। ऐसे नहीं कि पृथ्वी की ओर निशाना लगा रहा है। "इस विषय को पाना है, तो चलो उसको लक्ष्य कर लें।" वो झुकी हुई रीढ़ होती है, ये रीढ़ झुकनी नहीं। रीढ़ से मतलब समझ रहे हैं न? यह न करिएगा कि हम सोने ही नहीं गए पलंग पर, "रीढ़ झुकानी नहीं है।" मैं साइकोलॉजिकल रीढ़ की बात कर रहा हूँ, द इनर स्पाइन। वो झुकनी नहीं चाहिए। पैदा किसलिए हुए हो? मुक्ति के लिए। मुक्ति के लिए पैदा हुए हो। छौङ वास्ते, नहीं जौंण वास्ते।
“गते गते पारगते स्वाहा।” मैं जो बना बैठा हूँ, मुझे उससे हट जाना है, यही इस जन्म का उद्देश्य है। और हटने के बाद क्या होता है? उसे बोलते हैं जीवन-मुक्ति। उसे कहते हैं आज़ादी में जीना, पूर्ण आज़ादी में जीना। वही जीवन है, वो जीवन नहीं है, तो कुछ नहीं है। यह मुकुट है, यह आपको याद दिलाने के लिए है कि बादशाह हो आप, ग़ुलामी कभी स्वीकार मत करना। कैसे भी धारण किया, नहीं आता ठीक से धारण करना, जैसे भी किया मुकुट तो मुकुट है न।
धरती का तो पता नहीं, पर गुरुओं से मेरा बहुत-बहुत गहरा नाता है, बहुत गहरा नाता है।
श्रोता: यह मेरा पहला सेशन है लाइव। छह महीने से मैं गीता सेशन सुन रही हूँ। और जो आपने मेरी ज़िंदगी को दिया है, वो ऋण उतारने के लिए मैं हूँ ही नहीं। मेरे पास शब्द ही नहीं हैं, उस चीज़ के लिए धन्यवाद करने के लिए, आपने जो हमें दिया। यदि संस्था और आप हमें यहाँ तक खींच के न लाते, तो हम रजिस्ट्रेशन भी नहीं कर पाते। तो यह आपकी और संस्था की ही देन है कि आज हम यहाँ पर हैं।
आचार्य प्रशांत: मैं दो मिनट हैं, एक आख़िरी बात इस पर बोल दूँ। नहीं, ये लोग मुझे बार-बार, बार-बार खींच रहे हैं, इशारे कर रहे हैं। "उतरो, उतरो, उतरो।" मुझे पता है, समय हो रहा है, उतरना तो पड़ेगा। देखिए, आपने जो बात कही वो प्यार की है, उसे मैं बहुत दिल से स्वीकार करता हूँ। ठीक है। अब मैं अभी कुछ थोड़ा-सा बोलूँगा, मैं यहाँ किसी पर कोई ऋण चढ़ाने के लिए नहीं हूँ। आपके ऊपर कोई ऋण, कोई कर्ज़, कोई डेब्ट नहीं है; मेरा काम है आपको सब ऋणों से मुक्त करना। मैं आपके ऊपर एक कर्ज़ा और चढ़ा दूँ, तो आपका तो बोझ चढ़ गया न। डेब्ट, ऑब्लिगेशन चढ़ गई, लायबिलिटी चढ़ गई। लायबिलिटीज़ तो आप न जाने कितनी लेकर घूम रहे हो, एक और मैं नहीं चढ़ाने वाला। कितने कर्तव्य, व्यर्थ की ज़िम्मेदारियाँ, रिस्पॉन्सिबिलिटीज़, ड्यूटीज़ आपने पाल रखी हैं। मुझे नहीं चढ़ानी है।
और मुझे सच बोल रहा हूँ, कोई इसलिए नहीं कि यहाँ कैमरा, ये-वो, मुझे नहीं चाहिए कुछ। आपकी बात मैं समझ रहा हूँ, क्योंकि आपकी बात सबकी बात है। तो लगभग वैसी ही बात है, जैसे पहले सुनी है। पर थोड़ा-सा यह बात सुन लीजिए, आख़िरी कुछ मिनट बचे हैं। आपकी अगर कोई ज़िम्मेदारी है, तो अपने लिए है, मेरे प्रति नहीं है। अधिक-से-अधिक आप यह कह सकते हैं, खींचतान कर ये कह सकते हैं कि मेरे माध्यम से अपने प्रति है। मैं वह ज़रिया बन सकता हूँ जिससे आपको आपके प्रति जो ज़िम्मेदारी है, वह याद आ जाए। लेकिन ले-देकर ज़िम्मेदारी आपको अपने लिए ही निभानी है।
मुझे आपसे कुछ नहीं मिल सकता। और न, सच पूछो तो आपको मुझसे कुछ मिल सकता है। आप जब भी करोगे न, आत्मदान ही करोगे, आपको जो भी मिलेगा आपके द्वारा ही मिलेगा, आप ख़ुद को ही देने वाले हो। अभी हम अष्टावक्र मुनि की बात कर रहे थे न। पहले के अध्यायों में जानते हो क्या बोलते हैं, ख़तरनाक बात? बोलते हैं, कर्तव्य वह आग है, जो हर इंसान को जीते-जी जलाए दे रही है, जीते-जी जलाए दे रही है। बोल रहे हैं, कर्तव्यों की आग में इंसान जले बिना वैसे ही नहीं रह सकता है जैसे कि जब जंगल में आग लगी हो तो एक पेड़ हरा नहीं रह सकता है।
अब मैं यह और तक कर दूँ कि आपका मेरे प्रति भी कर्तव्य है, तो गड़बड़ हो जाएगी बात। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आपका कर्तव्य है नहीं, कर्तव्य तो है। पूरा-पूरा, पूरा-पूरा है। वो कर्तव्य आपका किसकी तरफ़ है? अपनी तरफ़ है, मैं यहाँ आपको याद दिलाने आया हूँ कि आप वो नहीं कर रहे हो जो आपके लिए ज़रूरी है। अधिक-से-अधिक फिर कह रहा हूँ, खींचतान कर, मैं उसका ज़रिया बन सकता हूँ। जैसे कि अपना मुँह साफ़ करने के लिए मिरर एक माध्यम बन सकता है। मिरर तो आगे मुँह नहीं साफ़ कर देगा न, दर्पण में दिख गया कि मुँह गंदा है तो ज़रिया बना। फिर आपने ख़ुद ही साफ़ करा। उस दर्पण के सामने भी आप ख़ुद ही गए थे; देखा भी ख़ुद ही, फ़ैसला भी ख़ुद ही किया, साफ़ भी ख़ुद ही किया। सब आप ही ने किया। आपको अपनी ज़िंदगी के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है।
डिवोशन ईगो की फ़ेवरेट टैक्टिक होती है। यह डिवोटेड वग़ैरह बहुत मत होने लग जाइएगा। आप क्या बन जाओगे? अहंकारिक भक्त। द इगोइक डिवोटी। और भारत में तो धर्म का मतलब ही भक्ति रहा है। यहाँ ज्ञान से कौन चलता है? और वो पूरा जो डिवोशन है, वो अहंकार के अलावा कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता। "थोड़ी भक्ति, बहुत अहंकारा। ऐसे भक्ता मिले अपारा। लोगन राम खिलौना जाना।"
मैं कौन हूँ? “मैं भक्त हूँ।” मैं कौन हूँ? “मैं डिवोटेड हूँ।* और कुछ देखिए, इसी संभावना की ओर हमारे मित्र हमें आगाह भी करना चाहते थे। उन्होंने वो सब जो था, उसमें कहीं कुछ सूँघा होगा तो वो। और वो होता है, मैं नहीं चाहता हमारे यहाँ हो। हमें प्यार चाहिए, हमें ज़िम्मेदारी चाहिए असली, शुद्ध। हमें यह भी नहीं करना है कि कह दें कि मुझमें प्यार ही नहीं है। पर हमें यह भी नहीं करना है कि प्यार के नाम पर हम अपनी ही ज़िम्मेदारी से विमुख हो जाएँ। ये दोनों ही जो सिरे होते हैं, बहुत ख़तरनाक होते हैं। हमें दोनों से ही बचना है।
एक तो यह होता है कि, साहब, आपके सामने यह इंसान आया है। “हाँ, ये होगा कोई। मुझे इससे क्या लेना-देना है। देयर कैन बी नो टीचर। मैं ख़ुद ही अपना देख लूँगा।" वो मूर्खतापूर्ण बात है। और उसमें इंग्रैटिट्यूड बहुत है। कितनी खुरदुरी, और रूखी, और बंजर बात है वो। वो नहीं करनी है। कुछ आ रही है बात समझ में? कि टीचर को आपने लेक्चरर बना दिया या नॉलेज प्रोवाइडर बना दिया। वो नहीं करना है।
आपसे क्या बोला था? क्या बोला था? मैं क्या यार?
दो तो कुल मैंने वाक्य बोले पंजाबी में, वह भी खींचतान के, पूरी जान लगा के। वो भी याद नहीं किसी को। यार हूँ, यार। ठीक है? तो मोहब्बत ख़त्म नहीं कर देनी है, यार है तो प्यार होगा। बिल्कुल होगा। एक वो चीज़ है, उससे बचना है, जो कहते हैं कि कोई रिश्ता ही नहीं होना चाहिए। कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए, क्योंकि टीचर ख़तरनाक होता है। वो तुम्हें साइकोलॉजिकली एनस्लेव कर लेगा। वहाँ बचना, वो बेकार बात है। और हमें उस दूसरे छोर से भी बचना है, जिस पर भारत सदियों तक क़ैद रहा। वो कौन-सा है? कि बाबा आया है और सब लोट गए। अंधभक्ति से भी बचना है और मरुस्थल, शुष्कता, बंजर, ड्राइनेस से भी बचना है।
न तो अंधभक्ति करनी है, ब्लाइंड डिवोशन, और न ही यह कर देना है कि, "हमें क्या रिश्ता है, इन्होंने स्टेज पर कुछ बोला और अपना बोल के चले गए। अब हमारी ज़िंदगी है, हम ख़ुद देखेंगे।" नहीं। प्यार नहीं होता, तो मैं भी यहाँ नहीं होता। मैं यहाँ काहे के लिए आया हूँ? बात आ रही है? प्यार होना चाहिए, पर झूठा प्यार नहीं होना चाहिए। बस इतनी-सी बात, ठीक।