सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
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प्रश्नकर्ता: आपका स्वागत है, आचार्य जी, पंजाब में हमारी तरफ़ से और बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। तो मैं पहले ही माफ़ी माँग रहा हूँ कि मैं थोड़ा डेकोरम ख़राब कर रहा हूँ, उन्होंने कहा कि सत्र से संबंधित सवाल लेना है। तो सबसे पहली बात तो यह कि जब आप एंटर हुए न, तो अलग-अलग लोगों के अलग-अलग भाव थे। किसी ने आपको प्रेम से कह दिया कि तुम हमारे श्रीकृष्ण हो। तो आपने रोक दिया कि नहीं, ऐसा नहीं है।
तो कई बार यह होता है कि जो आप हमें बंधनों से दूर कर रहे हो, तो कई बार आपसे ही बंधन स्थापित हो जाता है। तो मैं बाहर खड़ा-खड़ा सोच रहा था कि अच्छा, तो यह एक व्यक्ति है, एक आइडेंटिटी है, तो इससे मेरा क्या रिश्ता है? तो मैं क्योंकि लिटरेचर का स्टूडेंट भी हूँ, एक सिख भी हूँ तो गुरबाणी पढ़ता हूँ। तो उसके अनुसार मेरे दिमाग में जो बात आई कि एक मित्र की परिभाषा गुरबाणी के अनुसार, जो गुरु साहब ने, जो पाँचवें गुरु ने गुरु ग्रंथ साहब में लिखी है, वो कहते हैं कि जो सबसे अच्छा मित्र है तुम्हारा, जो तुम्हारा सबसे अच्छा सखा है, वो है: “जिन्ना दसंदड़िआ दुर्मति वजे, मित्र असाड़े सेई हटि गए। जगु सवाइआ जन नानका, विरले केई। ”
कि जो मैं हिंदी में बोलता हूँ कि जो हमारे मित्र हैं, असल में वो हैं जिनसे मिलकर तुम्हारी दुरमत, जो तुम्हारे अंदर बैठा है, बुरा है, जो अहंकार है वो दूर हो जाता है, और मैंने बहुत दुनिया देखी है और ऐसे बहुत कम लोग हैं। तो मेरे




