गुरु गोविंद दोऊ खड़े || आचार्य प्रशांत, संत कबीरदास पर (2018)

गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गोविंद और गुरु किसे कहा गया है समझ नहीं आ रहा?
आचार्य प्रशांत: गोविंद जब तुम्हारे सामने खड़ा होता है तो उसे गुरु बोलते हैं। निराकार है तो गोविंद, साकार है तो गुरु। दोनों तरीक़े से कह सकते हो कि गोविंद साकार हो गया तो गुरु हो गया और गुरु निराकार हो गया तो गोविंद हो गया। कबीर जिस अर्थ में बात कर रहे हैं उस अर्थ में गुरु तुम्हारे सापेक्ष है, सम्मुख है, शरीरी है। और गोविंद? निराकार है, निर्गुण है, अशरीरी है।
तो तुलना की कोई बात नहीं है। ये नहीं कि दोनों का पारस्परिक महत्त्व नापा जा रहा है कि दोनों में से ज़्यादा बड़ा कौन है। न, बेकार की बात। एक ही है। तो फिर तुलना कैसी? दो की तुलना होती है। दो भिन्न हों तो उन्हें तुला के दो पलड़ों में रखो भी। एक ही है, तो नापने की बात नहीं है।
तो फिर कबीर ने ऐसा क्यों कहा? कबीर ने तुम्हें समझाया कि चूँकि तुम साकार से तादात्म्य रखते हो इसीलिए तुम्हारे काम साकार आएगा, उपयोगिता साकार की है। ऐसा नहीं कि साकार निराकार से श्रेष्ठ है। बात श्रेष्ठता की नहीं है बात उपयोगिता की है। तुम अपनेआप को क्या जानते हो, साकार कि निराकार?
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