चाँद से चाँदनी लो, धब्बे नहीं || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2023)

प्रश्नकर्ता नमस्ते सर, आज की बातचीत थोड़ी कॉन्ट्रोवर्शियल (विवादित) होने वाली है
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं होती रहती है कॉन्ट्रोवर्शी।
प्र: मैं आपसे गुरुओं के ऊपर बात करना चाहता हूँ और इस पूरी बात की शुरुआत आज से दस या बारह साल पहले से होती है।
आचार्य: क्या हुआ था तब?
प्र: तब मैं और मेरे कुछ साथी आपके पास नये-नये आये थे। उस वक़्त आप हमें दुनियाभर से जो आध्यात्मिक साहित्य है और गुरुओं की सीख है वो हमें दिया करते थे पढ़ने के लिए। और तब हम यह देखा करते थे कि उन सभी के प्रति आपके मन में बहुत आदर है, सम्मान है और उसी के साथ आप हमें सिखाते भी थे, पढ़ाते भी थे। तो हमारे भीतर भी उनके प्रति एक सम्मान जागने लगा। पर एक दिन आपने हमारी ज़िंदगी में धमाका कर दिया।
आचार्य: क्या?
प्र: आपने हमें एक किताब दी जिसमें उन्हीं सब गुरुओं के बारे में, ऋषियों के बारे में कुछ ऐसी बातें लिखी थीं जिन्हें मैं अगर अभी कहूँ तो सीधे गंदी बातें थीं, स्कैंडलस बातें थीं और उनको पढ़ कर मन ख़राब हो गया, दिल टूट सा गया था।






