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ये शांति झूठी है - इससे बेहतर है दौड़ो, दहाड़ो, विद्रोह करो! || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपने अभी बताया कि जिसका अनुभव हो वह द्वैत है और अद्वैत का कोई अनुभव नहीं होता। अगर मौन का भी अगर अनुभव है तो वो मौन नहीं है। और असली अनुभव जब होता है तो अनुभोक्ता नहीं होता। आचार्य जी जीवन के इतने समय में बहुत सारे मेडिटेशन सेंटर गये ‘डायमंड, रोज़, कॉस्मिक।’ यहाँ मुम्बई में एक मन्दिर है वहाँ पर एक धूप जला देते हैं, उसमें घड़ा औंधाकर के, उसमें धुँआ लाकर के उसको सूँघने का बोलते हैं। तो वो सब किया, खूब कीर्तन करवा दिया और फिर एकदम से बिठा दिया।

तो इन सब चीज़ों से जो एक शान्ति अनुभव हुई, वो कह रहे हैं कि यही अद्वैत का थोड़ा सा स्वाद है, इसी को करो तो और आ जाएगा। अब आपने कहा, अब वो शान्ति तो अनुभव हो ही गयी न। तो आपने जो कहा तो मतलब मेरा तो दिमाग ही हिलता जा रहा है इतनी सारी शान्ति महसूस की थी घड़ा सूँघ-सूँघकर। (श्रोतागण हँसते हैं)

उन्होंने कहा देवी आ जाएँगी। अब वो उन्होंने धूप में धुँआ भर लिया घड़े में उसको सूँघा, तो वो जो सूँघा और सूँघ-सूँघकर के जो शरीर में पूरी झुनझुनी आ गयी और फिर एकदम से उन्होंने बिठा दिया और एक शान्ति लगने लगी। अब वो तो अनुभव हो गयी, तो बड़ी उथल-पुथल मच गयी। और एक दूसरी बात इसमें और आ गयी कि बहुत सारे अभी ऐसे हैं जो अभी हैं वो बोल रहे हैं कि जब यही करते-करते हम बैठे तो छः दिन तक बैठे ही रहे, दो दिन तक बैठे ही रहे, तेरह दिन तक बैठे ही रहे। और जब हमारी आँख खुली तो हमको पता ही नहीं चला कि हम दस दिन तक बैठे थे या तेरह दिन बैठे रहे।

तो क्या उनको पता नहीं चला तेरह दिन वो बैठे थे? तो मतलब तेरह दिन उनको पता नहीं चला मतलब उन्होंने अनुभव भी नहीं किया? तो क्या उनको अद्वैत का अनुभव हो गया होगा? या ऐसे मेडिटेशन कर-करके ही क्या अद्वैत को अनुभव कर लें? और यहाँ तो हमने बोल दिया कि जो अनुभव हो गया वो अद्वैत ही नहीं है।

आचार्य प्रशांत: देखिए वो जो चीज़ है न वो हमें बहुत गहराई से, बड़ी सिद्दत से और पूरी चाहिए होती है और मिलती है इतनी सी। तो उस समय बड़ा आसान लगता है चूँकि उसकी प्यास बहुत सारी है, दावा कर दो कि इतनी मिल गयी है क्योंकि चाहिए तो इतनी है न, चाहिए इतनी है और मिली है इतनी। तो बड़ा मन करता है कि कम-से-कम इतने का तो दावा कर ही दो क्योंकि प्यास तो इतने की थी। सौ में से एक नम्बर मिला है। अब मानना भी है कि फेल हुए तो इतना तो बोलोगे कि पच्चीस आया था, वो वाला है।

शान्ति दो तरह की होती है द्वैतात्मक और अद्वैतात्मक। द्वैतात्मक शान्ति क्या होती है? द्वैतात्मक शान्ति ये होती है कि आप यहाँ बैठे हुए हैं और मान लीजिए आज बिना खाये आ गये थे यहाँ पर। बहुत भूख लग रही है, बहुत भूख लग रही हैऔर फिर नौ बजे जाकर के सत्र ख़त्म हुआ और दस बजे जाकर के कुछ खाया तो राहत मिली, ये है द्वैतात्मक शान्ति। ये शान्ति बस एक अनुभव है, ऐसा अनुभव जो अपने विपरीत अनुभव पर आश्रित रहता है, ऐसा अनुभव जो अपने विपरीत अनुभव पर आश्रित (रहता है)। अगर आपको दिनभर भूखा नहीं रखा गया होता, तो दस बजे आपको उतनी शान्ति भी नहीं मिलती खाने से। आप चूँकि पहले भूखे रखे गये, इसलिए दस बजे बड़ी शान्ति मिली, ये द्वैतात्मक शान्ति कहलाती है।

जैसे आप यहाँ आ गये, बैठ गये। अब आपने अब आपने पैन्ट पहन रखी है और वो टाइट है बहुत। सुबह पहन ली थी कि भाई चलो पहन लो और कुछ मिल नहीं रहा है जल्दी से चलना है। और वो टाइट पैन्ट है उसको पहनकर के यहाँ बैठ गये हैं। अब दिनभर यहाँ बैठे हैं, बैठे हैं, बैठे हैं, बैठे, बैठे हैं और बैठे-बैठे तकलीफ़ तो हो रही है पर किसी चीज़ को बहुत समय तक बर्दाश्त कर लो तो उसकी थोड़ी आदत पड़ जाती है। तो बैठे हैं और बैठे-बैठे भूल भी गये कि इससे मुझे तकलीफ़ हो रही है। फिर वापस गये अपने होटल के कमरे में और पैन्ट उतारी, उतारते ही अचानक बड़ी राहत मिली कि ‘ये क्या हो गया’, ये द्वैतात्मक शान्ति है। जहाँ शान्ति का होना ही इस बात पर आश्रित है कि आप पहले परेशान कितने हो। किसी को गहरी शान्ति का अनुभव देना है, तो उसे पहले खूब परेशान कर दो और फिर वो इतना शान्त अनुभव करेगा कि वाह-वाह-वाह क्या बात है।

समझ रहे हैं बात को?

फ़्लाइट छूट रही थी और दो घंटे तक भाग-भागकर के, भाग-भागकर के किसी तरीक़े से फ़्लाइट को पकड़ा है और फ़्लाइट जिस क्षण आपको बोर्डिंग पास मिला तो ऐसा लगा जैसे स्वर्ग मिल गया है। अब मिला क्या है कुल एक बोर्डिंग पास, पर अनुभव ऐसा हुआ जैसे पता नहीं क्या दुनिया की सबसे बड़ी चीज़ मिल गयी है, ये द्वैतात्मक शान्ति है। ये आपको राहत या स्वर्ग इसीलिए मिला क्यों कि आप दो घंटा तनाव में गुज़ारकर आये हो।

भागे आ रहे, भागे आ रहे गाड़ी भगा रहे ट्रैफ़िक में, उसके बाद चेक इन में भागे हैं ज़ोर-ज़ोर से किसी के हाथ-पाँव जोड़े हैं कि लाइन में आगे आने दो। ये सब करा है तमाम तरह के उपद्रव करने के बाद किसी तरीक़े से बोर्डिंग हुई है, बड़ा अच्छा लगता है, ये द्वैतात्मक शान्ति है, ये सस्ती शान्ति है, ये सस्ती शान्ति है, ये अगले तनाव का कारण बनेगी। पता चल गया कि इतनी देर से आकर के भी बोर्डिंग तो हो ही जाती है, अगली बार पाँच मिनट और देर से आओगे और इस बार बोर्डिंग नहीं मिलेगी। पता चल गया कि बिना देखे, समझे भी कपड़े पहनने पर काम तो चल ही जाता है, अपना बैठे रहे; अगली बार और बिना देखे समझे पहनोगे। और इस बार तो किसी तरीक़े से वो पैन्ट को टाँगे रहे, अगली बार वो फटेगी। ये द्वैतात्मक शान्ति होती है। इसमें शान्ति उतनी ही होती है जितना शान्ति से पहले परेशानी होती है, तनाव होता है, अशान्ति होती है। इसमें शान्ति का होना अशान्ति पर आश्रित होता है। इसमें अशान्ति को घटाने के लिए शान्ति का सहारा लिया जाता है। इसी को ऐसे भी कह देते हैं कि घटी हुई अशान्ति को ही शान्ति कहते हैं, द्वैतात्मक शान्ति में।

अशान्ति बहुत थी, वो कम हो गयी तो हम कह देते हैं मैं शान्त हो गया, मैं शान्त हो गया। शान्त नहीं हुए हो सिर्फ़ अशान्ति कम हो गयी है। हो अभी उसी आयाम में, अशान्ति के ही डाइमेंशन में हो, बस अशान्ति दस यूनिट से चार यूनिट हो गयी है तो कहते हो शान्त हो गये। आयाम, डाइमेंशन अभी वही है, उसी एक्सिस पर हो।

समझ में आ रही है बात?

उसे शान्ति बोलना नहीं चाहिए, वो ऐसे ही है बस कुछ एक थोड़ी देर के लिए एक राहत की बात है उसमें और कुछ नहीं रखा है। अब अद्वैत शान्ति क्या होती है? अद्वैत शान्ति होती है जब जो अशान्त था उसने अपनी अशान्ति के मूल कारण को ही समझ लिया। और उसकी अशान्ति का मूल कारण ये था कि वो उस अशान्ति में शान्ति खोज रहा था। अशान्ति कहाँ है? प्रकृति में, प्रकृति में गतियाँ चल रही हैं, चल ही हैं। वो उसमे जाकर के खोज रहा था कि यहाँ मुझे शान्ति मिल जाएगी। तो जो अशान्त है उसने अपनेआप को इस पूरी गति से अलग कर दिया। वो कह रहा है ‘बाहर जो भी अशान्ति चल रही है चले, सारी अशान्ति के भीतर बीचों-बीच मैं शान्त बैठा रहूँगा।’ ये नॉन डुअल पीस होती है। इसमें आपको अशान्ति कम नहीं करनी पड़ती शान्ति के लिए, इसमें आप अशान्ति के बीचों-बीच शान्त रहते हो। आपकी अवस्था बता पानी मुश्किल हो जाती है ऐसा लगेगा कि बाहर तो अशान्ति है, बाहर तो बड़ी अशान्ति है, अशान्ति। ‘अरे ये देखो!’ लेकिन उस अशान्ति के बीच में आप बहुत शान्त हो।

देखने वाले को सिर्फ़ क्या दिखाई देगी? अशान्ति। उसको पता नहीं चलेगा कि भीतर कितनी शान्ति है। उसकी तुलना की गयी है आइ ऑफ़ द साइकलोन से कि जो चक्रवात होता है, चक्रवात का जो केन्द्र होता है, चक्रवात में बाहर-बाहर ज़बरदस्त हवाएँ चल रही होती हैं और केन्द्र पर क्या होता है? एकदम कुछ भी कोई हवा नहीं चल रही होती है, बिलकुल स्थिरता होती है, आइ ऑफ़ द साइक्लोन। तो नॉन डुअल पीस वैसी होती है कि बाहर-बाहर गति भी है, अशान्ति भी चल रही है, क्रोध भी चल रहा है, बेचैनी भी चल रही है, भागम-भाग लगी पड़ी है जो भी है जैसा भी है। जीवन के सब रंग हैं, जो बाहर-बाहर दिखाई दे रहे हैं और केन्द्र में कुछ नहीं, कुछ नहीं।

आप केन्द्र में शान्त हैं या नहीं उसकी एक पहचान बता देते हैं क्योंकि बाहर-बाहर तो सभी अशान्त रहते हैं। अब पता कैसे चले कि कौन बाहर-बाहर ही अशान्त है और कौन बाहर के साथ-साथ भीतर भी अशान्त है, उसका तरीक़ा बताये देते हैं। बाहर की अशान्ति के बीच अगर आप खटाक से रुककर यूँ किसी की ओर देखकर के मुस्कुरा सकते हैं किसी को पता नहीं चला, पर आप रुक गये, बस आधे क्षण को रुके मुस्कुराए और दोबारा अशान्त हो गये तो समझ लीजिए कि आप भीतर से शान्त हैं।

जैसे आप किसी को बस जता रहे हो कि आप गुस्सा हो, तो आप क्या करोगे? यहाँ चार लोग खड़ा कर दिये हैं और आप उनको बस दिखाना है कि आप क्रोधित हो और इधर आपका एक दोस्त खड़ा है आप उसको ये भी बताना चाहते हो कि मैं तो सिर्फ़ अभिनय कर रहा हूँ। तो आप क्या करोगे? तो आप जो सामने खड़े हैं उन पर तो गुस्सा दिखा रहे हो, गुस्सा दिखा रहे हो अचानक धीरे से मुड़ोगे दोस्त को आँख मार दोगे और ये आँख मारते ही वो क्या समझ जाएगा? कि ये शान्त है बस ऊपर-ऊपर दिखा रहे हैं गुस्सा कर रहे। तो अगर आप ये कर सकते हो तो समझ लीजिए कि आपकी शान्ति अद्वैत शान्ति है कि आपकी किसी से मार-पिटाई भी चल रही है और मार-पिटाई के बीच अचानक, अचानक से रुक जाओ जैसे इमरजेंसी ब्रेक लग गया हो और ऐसे मुस्कराओ इधर-उधर और फिर चिल्लाने लग जाओ। अगर आप ये कर सकते हो तो इसका मतलब आप अभी प्रकृति के बस में नहीं हो। प्रकृति बाहर-बाहर है भीतर आपका अपना बस चल रहा है। आपने जब चाहा अपनेआप को वो जो प्रकृति की धारा थी उससे खींच लिया, खींच लिया और फिर कहा, ‘चलो वापस चलते हैं। ये क्रोध का खेल, ये अशान्ति का खेल खेलते हैं, उसकी कुछ आवश्यकता है अभी, खेलते हैं। लेकिन है खेल ही।’

और है खेल ही उसका प्रमाण क्या है? जब आप सचमुच गुस्सा होते तो ये कर पाओगे क्या? जब आप वास्तव में जल रहे होते तो क्रोध से कर पाओगे कि अचानक बीच में रुक गये। गीत की एक पंक्ति गुनगुनायी और फिर बोले, ‘हा!’ (क्रोधित चेहरा बनाते हुए) ये कर पाओगे क्या? अगर आप ये कर पा रहे तो इसका क्या मतलब होगा? आपका गुस्सा आपके नियन्त्रण में है, आपका गुस्सा आपका अभिनय मात्र है, आप प्रकृति में बह नहीं गये हो, आप प्रकृति में तैर रहे हो। आपकी गति आपके नियन्त्रण में है, आप क्रोध दर्शा रहे हो आप क्रोधित हो नहीं गये हो। तो फिर बाहर-बाहर-बाहर-बाहर पचास चीज़ें चलती रहती हैं, भीतर आप स्थिर बैठे रहते हो। बाहर सब चल रहा है, सारे खेल चल रहे हैं आप स्थिर बैठे हो, ये अद्वैत शान्ति होती है।

समझ में आ रही है बात?

तो तमाम वो जो सब तरीक़े थे घड़ा, मटकी जो भी सब है, उससे आपको कुछ देर की शान्ति का अनुभव कराया जा सकता है, वो बिलकुल भी मुश्किल काम नहीं है। देखिए हम इतने तनाव में रहने वाले लोग हैं कि बहुत साधारण है किसी को शान्ति का कुछ अनुभव करा देना। अभी यहाँ पर लगा दिया जाए कुछ मेडिटेशन, म्यूज़िक वगैरह या कुछ और आपको तत्क्षण ऐसा लगेगा कि जैसे किसी ने आकर के कुछ मलहम सा लगा दिया है। अरे ये छोड़ो तुम ये तो फिर भी बहुत सूक्ष्म बात हो गयी कि संगीत लगाना पड़ेगा। आप यहीं लेट जाइए, आपकी बढ़िया मालिश कर दी जाए और देखिए क्या शान्ति मिलती है। कोई है जो मालिश से मिलने वाली शान्ति से इनकार कर सके? नींद आ जाती है एकदम। लीजिए मिल गयी। लेकिन वो कौनसी शान्ति है? वो द्वैत शान्ति है।

आप जितना थके हुए होगे मालिश से आपको उतनी ज़्यादा शान्ति मिलेगी। उसमें बहुत कुछ रखा नहीं है, हाँ वो ठीक है। मतलब काम-चलाऊ है भाई थके हो, करा लो मालिश, पर उसको कोई आध्यात्मिक अर्थ मत दो। दिक्क़त ये नहीं है कि इन सब केन्द्रों में ये जो भी तरीक़े के मेडिटेशन हो रहे हैं, उनमें आपको शान्त करा जा रहा है बिलकुल दिक्क़त की बात नहीं है। आदमी इतने तनाव में है कि जिस भी तरीक़े से उसको शान्त कर सको करा जाना चाहिए, दिक्क़त ये है कि वहाँ कह दिया जाता है कि ये चीज़ आध्यात्मिक है,ये आध्यात्मिक नहीं है। ये तो ऐसा ही है काम चलाऊ है, प्राकृतिक है।

तो अगर कोई कहता है कि मैं वहाँ गया था और वहाँ ऐसा संगीत चल रहा था या ऐसी वहाँ पर कोई क्रिया हो रही थी या कुछ और हो रहा था या धुआँ छोड़ रहे थे और उससे मुझे शान्ति मिली, तो वो झूठ नहीं बोल रहा है, वो सच बोल रहा है, उसे शान्ति मिली होगी। बस बात इतनी सी है कि जो शान्ति मिली है वो, वो द्वैत शान्ति है। अभी मिली है, अभी चली भी जाएगी। तुम्हें वो नहीं मिला है जो तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा, तुम्हें ऐसा कुछ नहीं मिला है। जितनी देर वो संगीत चल रहा है, उतनी देर तुम ऐसे मदमस्त रहोगे, बट द म्यूज़िक विल स्टॉप (लेकिन संगीत बन्द हो जाएगा)।

प्र १: धन्यवाद आचार्य जी। जीवन के संघर्ष में एक स्थायी शान्ति आपने बता दी, बहुत संतुष्टि हो गयी आचार्य जी।

आचार्य: शान्ति वही है जो संघर्ष के बीच रहे। मालिश की वाली शान्ति जब कोई संघर्ष नहीं है, पड़े हुए वो मालिश की जा रही है, उसमें शान्त हो गये, दो कौड़ी की शान्ति है। हम नहीं कह रहे, ‘वो शान्ति नहीं है’, वो भी शान्ति है। पर वो बहुत निचले तल की शान्ति है। वो असली शान्ति नहीं है। असली शान्ति तो तब है न जब सारी अशान्तियों के वार भी बर्दाश्त कर ले वो और आप कहो कि मैं भीतर से इतना शान्त हूँ कि मैं हर प्रकार की शान्ति में कूद सकता हूँ, छपाक! मुझे भरोसा है अपनी शान्ति पर, मेरी शान्ति भंग नहीं होगी, बताओ अशान्ति का कौनसा काम करना है। सारे काम करूँगा। मुझे अपनी शान्ति पर भरोसा है। भंग होने ही नहीं वाली।

प्र १: धन्यवाद आचार्य जी। बहुत धन्यवाद, नहीं तो मैंने न जाने कितनों को घड़े सुँघा दिये और।

प्र २: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, अभी आपने जो शान्ति के सन्दर्भ में बोला कि अगर आप अन्दर से शान्त हैं मगर बाहर से आप अशान्ति दिखा रहे हैं, मगर आप बीच में रोक सकते हैं अपनेआप को तो वो आप सही में शान्ति है। तो मगर ऐसी स्थिति में कई बार अशान्ति क्यों दर्शाएगा?

आचार्य: अभिनय है कई बार चाहिए होता है। कृष्ण रथ का पहिया उठाकर के भीष्म की ओर भागे हैं तो गीता भूल गये थे क्या? ज़रूरी है अर्जुन लड़ने से इनकार कर रहे हैं। इतने दिन बीत गये, जो युद्ध के शुरू के कुछ दिन थे न बहुत लोगों ने उसे प्रच्छन्न युद्ध कहा है। अर्जुन धीरे-धीरे बाण चलाते थे, कहते थे, ‘चलो इन्होंने अठारह दिन की गीता सुना दी कोई बात नहीं, अठारह अध्याय। लेकिन मैं मारूँगा नहीं, पितामह हैं।’ तो वो उनको पूरे ज़ोर से आक्रमण ही नहीं करते थे पितामह पर। कुछ करवाना अगर अर्जुन से तो थोड़ा अभिनय करना पड़ेगा न और जब एक शान्त पुरुष अभिनय करता है तो उसके पास कोई शर्त नहीं होती अभिनय के विरुद्ध। वो ये नहीं कहता कि अभिनय एक सीमा से आगे नहीं करूँगा। उसके पास कोई बचाने के लिए सीमा है नहीं न।

भई जो आम अभिनेता होता है, वो एक सीमा से आगे का नहीं करेगा वो कहेगा, ‘उस सीमा से आगे तो मैं हूँ, तो मुझे अपनेआप को भी तो बचाना है।’ उदाहरण के लिए बहुत सारे ऐसे अभिनेता होंगे जो निगेटिव रोल नहीं लेते। वो कहते, ‘मुझे अपनेआप को भी तो बचाना है न।’ लेकिन जब एक कृष्ण अभिनय करते हैं तो उनके पास बचाने के लिए कुछ होता नहीं है क्योंकि उनके पास बचाने वाली चीज़ है ही नहीं, तो वो अभिनय पूरा करते हैं। उनका अभिनय ऐसा हो जाता है जैसे असल हो। वो पूरा ही अभिनय में उतर जाते हैं। वो अभिनय क्या होता है? वो अभिनय धर्म होता है, धर्म की माँग होता है। अर्जुन को लड़वाना ज़रूरी है न? तो इसी तरीक़े के और भी बहुत सारे अभिनय होते हैं, उनको पूरे तरीक़े से व्यक्ति जीवन में करता जाता है।

अभिनय मैं किस अर्थ में कह रहा हूँ? अभिनय इस अर्थ में कह रहा हूँ कि अभिनेता में ये सामर्थ्य बची रहती है कि वो किसी क्षण पर अभिनय को समाप्त कर दे। जिसको समाप्त करने की आपमें सामर्थ्य नहीं बची, वो आपका अभिनय नहीं रहा, वो आपकी विवशता हो गयी। अभिनय तभी तक है जब कोई बोले ‘कट’ , भीतर से आवाज़ आये ‘कट’ और आप कहें ‘अब नहीं कर रहे।’

पर ऐसा क्रोध में होता है क्या? कि भीतर से आवाज़ आये ‘रुको’ और आपका यहाँ रुक गये ठंडे हैं। ऐसा होता है? वहाँ तो जब चढ़ता है तो छः घंटे तक चढ़ा रहता है। कई बार हफ़्तों तक उसकी?

श्रोता: कसक रहती है।

आचार्य: हाँ, जो कसक और कसैलापन है वो बाक़ी रह जाता है। जिसने अपने ऊपर सिद्धी पकड़ी होगी, उसका एक प्रमाण ये होगा कि आप उसको देखकर के हैरत में पड़ जाएँगे वो किसी क्षण अगर कुपित है तो बहुत कुपित है और आप कहोगे, अभी बहुत कुपित था। और आप पाओगे कि दो मिनट-चार मिनट के अन्दर-अन्दर हँस रहा है। उसके लिए कट बोलना सम्भव हो जाता है। आप उसका बड़ा अपमान कर दें चार मिनट बाद वो आपके साथ चाय पी रहा होगा क्योंकि उसने वास्तव में अपना अपमान माना ही नहीं है। अपमानित होने का भी वो अधिक-से-अधिक अभिनय ही कर सकता है। उसके पास वो चीज़ नहीं बची है जो अपमानित होती थी, ‘अहम्’।

प्र २: थैंक यू।

प्र ३: प्रणाम आचार्य जी, बाबा बुल्लेशाह कह रहे हैं कि वो कुछ और हो गये हैं और वो हर जगह अद्वैत का अनुभव कर पा रहे हैं और देख पा रहे हैं। सवाल यह है कि बाबा अद्वैत को कैसे अनुभव कर रहे हैं जबकि आपने कहा कि अद्वैत का हम अनुभव नहीं कर सकते हैं। और एक सवाल है कि जब हम अद्वैत को अनुभव नहीं कर सकते हैं तो हमें इस ओर क्यों बढ़ना चाहिए।

आचार्य: जो दूसरा सवाल है उसी में पहले का उत्तर है। द्वैत के अनुभव में तुम्हें मिलता क्या है?

प्र ३: दुख।

आचार्य: बस यही है। अद्वैत का कोई अनुभव नहीं होता। द्वैत के अनुभव में दुख है, ये स्पष्टतया देख लेना ही अद्वैत है। अद्वैत माने आत्मा। आत्मा कुछ होती है क्या कि उसका अनुभव करोगे?

प्र ३: नहीं।

आचार्य: तो उसका कुछ नहीं है लेकिन जो कुछ तुम्हारे लिए है वो ठीक नहीं है, ये देख लेना ही काफ़ी है। तो कोई बोले अद्वैत का अनुभव हुआ है, जाँचना है तो बस ये देख लो कि द्वैत में उसको रस कितना बचा है। द्वैत की पोल खोल देना ही द्वैत का अनुभव है अन्यथा अद्वैत कुछ नहीं होता, कहाँ से अनुभव कर लोगे? अनुभव के लिए तो दो होने चाहिए न, एक अनुभव करने वाला एक अनुभव की चीज़। अद्वैत माने ‘दो हैं ही नहीं’ तो अनुभव कहाँ से हो जाएगा? बात आत्मा की, अद्वैत की कम-से-कम होनी चाहिए। ये सारी जितनी कयावत चल रही है दो दिन से ये किसकी सेहत के लिए चल रही है? अहम् की, बात उसकी होनी चाहिए वो कहाँ जी रहा है।

बहुत ये आकर्षक लगता है लुभाऊ लगता है कि यहाँ बैठकर के सीधे चाँद-सितारों की बात की जाए। कौनसे चाँद-सितारे?

श्रोता: आत्मा।

आचार्य: हाँ, निर्वाण, मोक्ष, आत्मा, निर्विकल्पता, समाधि। भूलो नहीं कि ये सारी बात हमारे लिए है और हमारा दिन-प्रतिदिन का अनुभव द्वैत का है। द्वैत के अनुभव में इधर (सिर की ओर इशारा करते हुए) बैठा हुआ है एक पगला जो कि अपने अनुभवों से ही निर्मित है। उसपर जिस-जिस तरह के प्रभाव पड़ते गये, उस तरीक़े से वो बनता गया। बना वो प्रभावों से है और बोलता है अपनेआप को ‘मैं’।

जैसे यहाँ पर इस मेज़ पर एक के बाद एक धूल की परतें पड़ती जाएँ बहुत सालों तक इवोल्यूशन , बहुत सालों तक इस पर धूल की परतें पड़ती जाएँ। अन्ततः उन परतों पर कुछ बैक्टीरिया की भी एक परत पर जाए और ये सारी परतें मिलकर के क्या बोलें? ‘मैं’ ‘मैं’। तो वो जो अनुभोक्ता होता है, एक्सपीरियंसर वो ऐसा ही होता है वो बताओ कहाँ से आया? कहाँ से आया? आपको एक चीज़ अच्छी लगती है, एक ही घटना पर आपको अच्छाई का अनुभव होता है, वो वहाँ बैठा है उसको बुराई का अनुभव होता है। आपका जो एक्सपीरियंस है वो कहाँ से आया? आपके अतीत से आया, उसका उसके अतीत से आया। दोनों ने ही इसमें कुछ ख़ुद करके नहीं दिखाया है। जैसा अतीत रहा है, उस तरीक़े से आपका अनुभोक्ता तैयार हो गया है, ठीक है? और फिर सामने कोई चीज़ आती है आप उसका अनुभव करने लग जाते हो और आप कहते हो अरे, बढ़िया चीज़ है! ख़राब चीज़ है, अच्छा हो गया, बुरा हो गया और ऐसे करके इसी भ्रम के चक्कर में पड़े रहते हो। ये है द्वैतात्मक जीवन। सारा द्वैतात्मक अनुभव का खेल।

अद्वैत का मतलब इतना ही है कि इसकी असलियत जान ली, इसकी पोल खोल दी बस। पोल खोलने के बाद भी ये चलता तो रहेगा ही, क्यों नहीं चलेगा? अब ये आँखें हैं ये कंडीशंड हैं एक वेब लेंग्थ से दूसरी वेबलेंथ तक ही देखने के लिए। मैं जान भी लूँगा कि ये कंडीशंड हैं तो ऐसा थोड़े ही होगा कि ये बारह-हज़ार-एमस्ट्रॉंग देखना शुरू कर देंगी। ये आठ हज़ार से ऊपर नहीं जा सकती हैं आँखें, तो नहीं जा सकती तो नहीं जा सकती। तो मुक्ति क्या है? मुक्ति ये है कि आठ हज़ार के अस्सी हज़ार पहुँच पहुच गये? नहीं मुक्ति ये है कि तुम जान गये कि ये सारा खेल सीमित है। सीमाओं को जान लेना ही असीमित को पा लेना है, बस इतना ही है और कुछ नहीं।

सीमाओं को जानने से मतलब क्या है? सीमा को जानने से मतलब है कि अगर मुझे कुछ दिख रहा है तो वो सच नहीं हो गया। मुझे तो पूरे स्पेक्ट्र्म का इतना पिद्दू सा हिस्सा दिखाई देता है। चार-हज़ार से आठ-हज़ार-एमस्ट्रॉंग और पूरा जो स्पेक्ट्रम है वो अनन्त है, मुझे इतना सा दिखाई देता है। तो मुझे जो दिखाई दे रहा है वो सच कहाँ से हो गया, मुझे जो सुनाई देता है वो सच कहाँ से हो गया। मैं जो अर्थ कर रहा हूँ वो अर्थ सच कहाँ से हो गया। ये जान लेना ही असीमित है, सीमित में प्रवेश, बस।

प्र ३: धन्यवाद आचार्य जी।

प्र ४: आचार्य जी एक प्रश्न और है। मैं चार साल का था और हवाईजहाज़ में बैठा था माता-पिता के साथ तो खिड़की से बाहर एक दूसरा हवाईजहाज़ दिखा तो मैंने शोर मचा दिया, ‘मुझे एरोप्लेन में बैठना है’ और मैंने जिद लगा दी कि ‘ एरोप्लेन में बैठना है एरोप्लेन में बैठना है’ और मैं एरोप्लेन में ही बैठा था। मैंने परेशान कर दिया माता-पिता को भी, आसपास बैठे लोगों को भी, तो एयरहोस्टेस ने पकड़कर के ऐरोप्लेन से नीचे उतारा और कहा, ‘ये देखो, ये ऐरोप्लेन है, तुम पहले से ही एरोप्लेन में हो’ तो फिर वो दोबारा अन्दर लेकर के गयी और फिर मैं शान्त हो गया कि हाँ अब मैं एरोप्लेन में हूँ। तो पहले तो ये मेरे लिए बस एक मज़ाक था कि ये है, अब मुझे ऐसा लग रहा है कि इससे कुछ सीख ली जा सकती है।

आचार्य: ज़िन्दगी आपकी, प्लेन आपका, अनुभव आपका और मैं उसमें सीख क्या बताऊँ? सीख बस यही है कि ऐसी एयरहोस्टेस हमेशा नहीं मिलती जो उतारकर के कि जो उतार भी दे और फिर वापस चढ़ा भी दे। (श्रोतागण हँसते हैं) ठीक है? बच्चे थे फ़ायदा मिल गया, बड़े होकर के इतना शोर मचाओगे तो इजेक्ट (बाहर) हो जाओगे। ये बड़े सौभाग्य की बात होती है कि आप बहुत शोर मचायें कि जाना है, जाना है, जाना है, असली चीज़ बाहर है, असली चीज़ बाहर है, असली चीज़ बाहर है। तो किसी में इतनी करुणा हो कि आपको पहले बाहर निकाल दे कि तुम्हें पता चले कि असली चीज़ बाहर नहीं है, असली चीज़ भीतर ही थी कि पहले तुम्हें बाहर भी निकाल दे और फिर तुमको दरवाज़ा खोलकर भीतर भी बुला ले। ये मौक़ा हमेशा नहीं मिलेगा। ज़िन्दगी इतनी कृपालु नहीं होती है। ज़िन्दगी में ज़्यादातर यही होता है कि शोर बहुत मचाओगे ‘बाहर जाना है’ तो दरवाज़ा खुल जाएगा, ‘जाओ बाहर।’ और फिर बाहर चले जाओ फ़्लाइट टेक ऑफ़ कर जाएगी खड़े रहो। दूसरे का टिकट है नहीं। दूसरी फ़्लाइट का जो दिख रही थी बहुत कि वो बड़ा अच्छा प्लेन है, बड़ा अच्छा प्लेन है। जाओ चढ़ जाओ, बड़ा अच्छा है तो वहाँ तुम्हें चढ़ने कौन देगा?

तो ये बच्चा होने का फ़ायदा उठा ले गये आप और इतने बड़े लोग ज़िन्दगी में बार-बार नहीं मिलेंगे जिनके सामने आप हमेशा बच्चे ही बन पाओ। ये तो किसी सन्त की महिमा होती है, उसका दिल है, उसकी करुणा है कि वो आपको सज़ा दिखाकर सज़ा से बचा भी लाता है। प्लेन से बाहर निकाल दिया सज़ा दिखा दी, लेकिन आपको सज़ा भुगतने नहीं दी। सज़ा दिखा भी दी लेकिन फिर प्लेन में दोबारा वापस चढ़ा लिया कि अब अन्दर आ जाओ। ये काम गुरु कर देता है, ज़िन्दगी नहीं करती। ज़िन्दगी तो जब बाहर निकालती है तो बाहर ही निकाल देती है।

किसी ने पूछा था कि सिखाता सिखाने वाला भी है गुरु, दोस्त, यार, मित्र, हितैषी, कोई भी सिखाता सिखाने वाला भी और सिखाती ज़िन्दगी भी है, दोनों में अन्तर क्या है? दोनों में अन्तर ये है कि ज़िन्दगी में करुणा नहीं होती। ज़िन्दगी जब सिखाती है तो तोड़कर सिखाती है। ज़िन्दगी का सिखाने में कोई इरादा नहीं होता। ज़िन्दगी तो बस अनुभव देती है और ज़िन्दगी जब अनुभव देती है तो उसमें कोई रियायत नहीं करती। उसमें ये नहीं सोचती कि आपको दर्द कितना होगा, ज़िन्दगी में तो बस कर्मफल का सिद्धान्त चलता है। करुणा नहीं चलती, कर्मफल चलता है। कर्म करा है, फल भुगतो। कर्म करा है, फल भुगतो। तो ज़िन्दगी ऐसे सिखाती है फल दे-देकर, फल दे-देकर माने? डंडा दे-देकर।

गुरु जब सिखाता है तो वो थोड़ी रियायत के साथ, थोड़ी करुणा के साथ सिखाता है क्योंकि उसको पता है कि कभी वो भी आप ही के जैसा था और उसको पता है आप इंसान हैं, बहुत ज़ोर का डंडा मार दिया तो ख़त्म ही हो जाएँगे। ज़िन्दगी ये सब नहीं सोचती, वो इतनी ज़ोर का मारती है कि लोग ख़त्म ही हो जाते हैं। तो बहुत लोग होते हैं जो कहते हैं ‘लर्न फ्रॉम लाइफ़’ (ज़िन्दगी से सीखो)।’ लर्न फ्रॉम लाइफ़ में, लाइफ़ कोई गुरु नहीं है। लाइफ़ सिखाने के लिए नहीं प्रशिक्षित हैं। लाइफ़ का सिखाने का भी कोई इरादा नहीं है। ज़िन्दगी तो बस डंडा देती है और डंडे से ज़रूरी नहीं है कि आप सीख लें, डंडे से आप ख़त्म भी हो सकते हैं।

प्लेन में जो कोई बहुत शोर मचाता है इस तरह का, उसको क्या करती है ज़िन्दगी? उसको बाहर उतार देती है। बच्चे हो वो बेचारी सहृदय कोई एयरहोस्टेस रही होगी उसने इतना करा कि खोला दरवाज़ा, नीचे उतारा दिखाया, फिर अन्दर बैठाया। ये काम गुरु का होता है, ज़िन्दगी ये काम नहीं करती। तो सावधान रहना चाहिए।

प्र ३: तो मतलब शोर नहीं मचाना है?

आचार्य: मचा दिया न। जितनी जल्दी हो सके, जितनी तत्परता से हो सके, अपनी जितनी जान लगाकर के हो सके समझने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि ग़रज़ अपनी है, ग़रज़ सिखाने वाले की नहीं है। पर सिखाने वाला कई बार इतनी आतुरता से सिखाता है कि हमें लगता है उसकी कोई ग़रज़ होगी नहीं तो इतनी जान लगाकर हमें क्यों सिखाता? तो हमें शक हो आता है। जितना हो सके अपनी ओर से प्रयास करो।

“अवसर बार-बार नहीं आवे।”

वो एयरहोस्टेस एक बार मिल गयी, हो सकता है दोबारा न मिले।

प्र ३: धन्यवाद आचार्य जी।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=gaMB6fY14xY&t=22s

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