“आज्ञा मानना बंधन है। भय बंधन है।”
~निरालंब उपनिषद्
आचार्य प्रशांत: आज्ञा का अर्थ है– विशेषाधिकार किसी का, किसी के पीछे सुनना, किसी को बहुत ऊँचा स्थान दे देना, किसी को प्रथम मान लेना। आत्मा और आज्ञा साथ-साथ नहीं चलते। आत्मा किसी की नहीं सुनती। आत्मा किसी की आज्ञा पर नहीं चलती तो आज्ञा कभी आखिरी बात नहीं हो सकती। हाँ, इतना अवश्य है कि जो आज्ञा, मन को आत्मा तक ले जाए, वो आज्ञा मन के लिए शुभ हो सकती है। पर कोई आज्ञा अपनेआप में आत्मिक नहीं होती तो (इसलिए) आज्ञा आखिरी बात नहीं है।
हाँ, आज्ञा अगर आपको आखिरी बात तक ले जाए तो अच्छी है। जब तक वो आपको आखिरी बात की ओर ले जा रही हो, उसका पालन करते रहिएगा। पर कोई अगर यह कह दे कि मेरा धर्म ही है आज्ञा का अनुसरण करना, किसी की भी आज्ञा हो वो भले ही, (कहे) कि मेरा धर्म ही है आज्ञा का अनुसरण करना, तो बात गलत हो गयी।
बात इसलिए नहीं ग़लत हो गयी कि आज्ञा बुरी है, बात इसलिए ग़लत हो गयी क्योंकि आपने केन्द्र, आज्ञा को बनाया है, सत्य को नहीं बनाया। आज्ञा का अनुसरण करना बहुत अच्छा हो सकता है अगर वो सत्य की ओर ले जाती है। माने प्रथम क्या है? महत्त्वपूर्ण क्या है? आवश्यक क्या है? सत्य आवश्यक है।
आज्ञा बहुत भली बात हो सकती है। आज्ञाकारी होना बहुत अच्छा हो सकता है अगर आपने पहले यह भली-भाँति जाँच-परख लिया हो कि वो जो आज्ञा है, वो आपको ले किधर को जा रही है। अगर आप ये ध्यान ही नहीं दे रहे कि आज्ञा आपको किधर ले जा रही है और आप की रुचि या आपका झुकाव, आपने जो मूल्य दे रखा है, वो बस आज्ञा का अनुकरण करने में है, तो भूल हो जाएगी। ये दो अलग-अलग बातें हैं। एक जैसी लगती हैं।






