कहीं कोई अकेला, और उसकी अकेली लड़ाई || आचार्य प्रशांत, जे. कृष्णमूर्ति पर (2023)

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा हूँ, 'सर्वप्रथम आंतरिक है', कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, 'मात्र आंतरिक है।' ठीक है? एकदम शुद्धतम बात उन्हीं की है, वो स्वीकार करिए। वो ठीक है, क्योंकि अगर अन्दर वाला सुनने को राज़ी हो गया तो दीवारें भी बोलती हैं, फिर पत्थर भी सिखाते हैं, फिर चिड़ियों का गीत भी गीता हो जाता है। तो बात तो अपनी रज़ामंदी की है, अपनी परिपक्वता कितनी है। उसके बाद सबकुछ सिखाने-ही-सिखाने लग जाएगा। फिर क्या हम किसी विशिष्ट सज्जन या विशिष्ट गुरु की तलाश करेंगे!
प्र: कृष्णमूर्ति साहब कहते हैं, “न तो ग्रन्थों की ज़रूरत है और न बाहर वाले गुरु की ज़रूरत है”, तो वो क्या चीज़ है?
आचार्य: वो चाह रहे हैं सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लें आप। देखिए, वो जो कर रहे हैं वो काम थोड़ा मनोवैज्ञानिक है और वो करना ज़रूरी भी होता है। वो ये कह रहे हैं कि अगर थोड़ा भी यह कह दिया न कि बाहर वाला तुम्हारे काम आ जाएगा तो तुम जाकर उसकी पीठ पर चढ़ जाते हो। और पीठ पर चढ़ने में भी कोई बुराई नहीं थी अगर वो तुम्हें अपनी पीठ पर लादकर के अमरपुर पहुँचा सकता तो। कोई तुम्हें पीठ पर लादकर अमरपुर नहीं पहुँचा सकता। होगा बाहर वाला बहुत यशस्वी, जैसे साक्षात् कृष्ण खड़े हों, पर कृष्ण भी अर्जुन को अधिक-से-अधिक क्या कर पा रहे हैं?
प्र: बोल ही रहे हैं।






