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गुरु से प्रेम, सत्य से प्रेम || आचार्य प्रशांत, गुरु कबीर पर (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत:

खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सर पटकता है। हमन गुरनाम साचा है, हमन दुनिया से यारी क्या?

~ कबीर साहब

कबीर साहब का एक बड़ा एब्यूज़्ड सा (ग़लत प्रयुक्त) दोहा है —

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

उसका अर्थ क्या है?

श्रोता: वो जो स्कूल में मैम पढ़ाती थी न तो मुझे लगता था ये टीचर मतलब भगवान से बड़ी हैं। मैं सोचता था, ऐसे कैसे हो सकता है।

आचार्य: इसका अर्थ क्या है? इस दोहे के साथ बड़ा अन्याय होता है। इसका अर्थ क्या है? "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय", ठीक है यहाँ तक बात। दो खड़े हैं, दो दिख रहे हैं। अभी दो दिख रहे हैं। किसके पास जाऊँ, कहाँ नमन करूँ?

गुरु ने क्या किया? निश्चित रूप से आप गोविंद को तो जानते नहीं। गोविंद तो निराकार है। वो आपके सामने आता भी नहीं ऐसे। गोविंद को आप जानते नहीं। शरीर रूप में तो आप गुरु को ही जानते हैं।

तो सामने दोनों खड़े हैं तो आप किसकी ओर देखोगे? गुरु की ओर ही देखोगे। और गुरु क्या कह रहा है? "बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।" वो गोविंद की ओर इशारा कर रहा है कि उधर जाओ, उधर नमन कर। वो ये नहीं कह रहा है कि आकर मेरे पाँव छू लो।

गुरु का अर्थ है 'रास्ता',जो गोविन्द तक जाता है। वही यहाँ पर है, ठीक बात। और गुरु वही है जो अपनेआप को बस रास्ता ही समझे। जिस गुरु को ये लगने लग गया कि मैं ही तीर्थस्थान हूँ, आओ, वो फिर गुरु नहीं है। वो अब शोषण कर रहा है। या कि ये कहो कि वो ख़ुद ही नासमझ हो गया है। उसकी अपनी ही बुद्धि ख़राब हो गई है। इस दोहे में कहीं से ये नहीं है कि जाकर गुरु के पाँव पहले छुओ।

"बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।" हाँ, आप गुरु को जानते हो, आप गुरु की ओर जाओगे। आप जैसे ही गुरु के पास पहुँचे, तो गुरु ने कहा, 'मैं नहीं, उधर जा।' हाँ, फिर ठीक है। आप ये कह सकते हो उसकी ओर जाने के लिए भी पहले आपकी ओर ही आना पड़ा, तो पहले तो आप ही हो। ये कह सकते हो लेकिन गुरु नहीं कह रहा है कि आकर मेरा नमन करो।

तो जब कहा जा रहा है "हमन गुरनाम साचा है" तो यहाँ पर एम्फेसिस (महत्व) गुरु पर नहीं है। बिलकुल भी नहीं है। ये बात बिलकुल ठीक रखना कि एम्फेसिस गुरु पर नहीं है। कोई भी वास्तविक गुरु कभी अपने पर इम्फेसिस रखेगा ही नहीं क्योंकि उसको पता है कि उसमें और तुममें कोई अंतर नहीं है। दोनों एक हो, शरीर रूप में तो दोनों एक ही हो। और आत्मा रूप में भी एक हो। तो अंतर कैसा है?

कोई भी गुरु तुमसे घूम-फिरकर के यही कहेगा कि वास्तविक गुरु तुम ख़ुद हो अपने। वास्तविक गुरु तुम्हारे ही भीतर बैठा है। तो ये गुरनाम का मतलब, यहाँ पर किसी और का नाम नहीं है कि बाबाजी का नाम।

प्रश्नकर्ता: तो वैसे कबीर साहब तो सीधी-सीधी बात करते हैं। घुमा फिरा कर बात करते नहीं हैं। लेकिन इसमें फिर इतना कन्फुजिंग (भ्रामक)?

आचार्य: बिलकुल कबीर ने नहीं घुमाया है। तुम मुझे बताओ "बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए" इसमें क्या कनफ्यूजन है? हमें अर्थ का अनर्थ करना है न। कबीर के बाद बड़े गुरु हुए, जिनको ज़रूरी था कि दुकान चलाए तो उन्होंने उसके तुमको दूसरे अर्थ दे दिए। वही कक्षा छह में मैडम ने बता दिया कि कबीर बोल रहे हैं कि जाकर गुरु के पाँव पहले छूना। कबीर नहीं कह रहे गुरु के पाँव पहले छूना।

कबीर भी जानते हैं कि सत्य तो एक ही है, गोविंद। गोविंद का मतलब सत्य, परम। यहाँ पर भी जब कहा जा रहा है कि गुरुनाम, तो गुरुनाम से अर्थ यही है अपना नाम, आत्मदर्शन।

किसी और गुरु का नाम नहीं है ये कि फ़लाने महाराज श्री श्री एक हज़ार आठ अखंड प्रताप। किसी का नाम नहीं है यह। किसी देवी-देवता का नाम नहीं है, ये किसी ईश्वर-अल्लाह का नाम नहीं है। ये बस एक नाम है — अनाम। वही सत्य है।

और फिर आगे जब कहा जा रहा है "हमन दुनिया से यारी क्या" तो उसका ये अर्थ नहीं है कि दुनिया छोड़ देनी है। उसका अर्थ ये है कि परम यार तो एक ही है। और जो बाक़ी सब हैं, उनसे यारी इस कारण है कि वो उसके रूप हैं। उनकी अपनेआप में अन्यथा कोई सत्ता नहीं।

शरीर से तुम किसी की यारी कब तक करते हो? जिस क्षण तक वो ज़िंदा है। मैं अभी यहाँ बैठा हूँ। मेरी बात सुन रहे हो। अभी मैं मरकर गिर जाऊँ, तुम बोलोगे डेड बॉडी (मृत शरीर) को क्लियर करो (हटाओ)। तो अभी तुम्हें ये शरीर कीमती है क्योंकि ये शरीर अभी प्राणवान है। उस प्राण को समझो। वही केंद्र में है, वही जान है। वही असली है। वरना इस शरीर से क्या प्यार है तुमको?

तुम्हारे जो सबसे प्यारे लोग होते हैं, तुम ख़ुद उनको जला कर आते हो, कि पड़ोसी आता है जलाने? तो ये बोतल बड़ी प्यारी है। ये बोतल इसलिए प्यारी है क्योंकि इस बोतल का प्राण वो एक है। दुनिया को ऐसे देखना है।

ये आसमान बहुत प्यारा है इसलिए नहीं कि इसका रंग नीला है कि एंटरटेनिंग (मनोरंजक) है या ऐसा कुछ। ये आसमान बहुत प्यारा है क्योंकि इस आसमान का भी प्राण वो एक है। (सामने बैठे श्रोता को संबोधित करते हुए) ये व्यक्ति बहुत प्यारा है। क्या प्यारा है? अभी ये गिर जाए, अभी इसको हम ही आग लगाएँगे। शाम तक ये अमन भस्म। और अमन भी नही बोलेंगे उसको। कोई नही बोलेगा अमन जल रहा है। बॉडी जल रही है तो उसको जानो जो वास्तविक अमन है। और उसी तरीक़े से पूरी दुनिया को देखो।

ये दीवार बहुत प्यारी है, इसलिए नहीं कि इसका रंग-वंग आकर्षक है। ये दीवार प्यारी है क्योंकि इस दीवार में भी तो वही बैठा है न। दुनिया से यारी नहीं है। दुनिया में वो जो एक दिखाई दे रहा है उससे यारी है। इस कारण दुनिया प्यारी है। दुनिया में अपनेआप में कुछ नहीं रखा है। दुनिया तो अपनेआप में फ़ालतू है। दुनिया तो अपनेआप में वही बॉडी है जिसको तुम आग लगा दोगे।

जो बॉडी के भीतर बैठा है, वो प्यारा है, उसको जानो। और वो इस बॉडी के भीतर ही नहीं बैठा है, वो पत्थर में भी बैठा है, नदी में बैठा है, पहाड़ में बैठा है। वो दृष्टि विकसित करो जो उसको बहते पानी में देख पाए। जो उसको जानवरों में देख पाए। हमारे पास वो आँख नहीं है जो चिड़िया में भी उसको देख पाए। हमारे पास वो आँख नहीं है न जो मुर्गे और बकरे में भी उसको देख पाए। इसी कारण तो तुम उसे काट देते हो।

प्र२: आचार्य जी, सत्य को जानने के लिए कितना व्याकुल हुआ जा सकता है?

आचार्य: जितने तुम हो। जितना नहीं जानोगे, ठीक उतने ही व्याकुल तो रहोगे ही। तो उसमें कोई लिमिट (सीमा) नहीं है। वहाँ पर तो पूरा जो नियम है, वो काम कर ही रहा है। नियम सीधा-सीधा यही है, मन जितना अंधेरे में रहेगा उतना ही रोशनी के लिए तड़पेगा। यही नियम है।

प्र३: आचार्य जी, यहाँ कबीर जी का दोहा सटीक बैठता है कि

लूट सको तो लूट लो, राम नाम की लूट। पीछे फिर पछताओगे, जब प्राण जाएँगे छूट।।

आचार्य: यहाँ कबीर इसको ही व्यक्त कर रहे हैं। कबीर की अभिव्यक्ति दोहे के माध्यम से है। तुम्हारी अभिव्यक्ति दूसरे माध्यमों से होती है। कबीर थोड़े होशियार हैं तो इसलिए साफ़-साफ़ इन शब्दों में कह पाए। तुम दूसरे शब्दों में कहते हो।

तुम्हारे शब्द जानते हो क्या हैं? तुम्हारे शब्द ये हैं, 'आज संडे है, फ्राइडे को नई रिलीज कौन-सी हुई है? चलो-चलो जल्दी से चलो, देखकर आते हैं।' ये तुम ठीक वही कर रहे हो जो कबीर की व्याकुलता है। 'यार, विंटर कलेक्शन अब आ गया होगा, बढ़िया वाला, नया वाला। ये क्या ये ग्रे (स्लेटी) सा पहन रखा है, फ़ालतू। चलो देखकर आते हैं, वाट्स हॉट दिस सीजन। ' तुम बिलकुल मीरा हो अभी। पर मीरा को समझ में आ गया था कि उसे कृष्ण चाहिए। तुम कृष्ण को स्वेटर में ढूँढ़ रहे हो। कुछ और नहीं कर रहे हो।

आज लोग कहते हैं न कंज्यूमरिज्म (उपभोगतावाद) बहुत बढ़ गया है। ये कंज्यूमरिज्म नहीं है, ये भक्ति है। ये भक्ति है जो जानती भी नहीं कि भक्ति है। ये कंज्यूमरिज्म वग़ैरह नहीं है। तुम्हें भी वही चाहिए। वही तो व्याकुलता है।

तुम पूछ रहे हो, कितना व्याकुल हुआ जा सकता है? तुम देखो न लोग व्याकुल तो हैं ही। जिसको देखो वही कटोरा लेकर घूम रहा है, 'थोड़ा-सा और कुछ दे दो, थोड़ा-सा और कुछ दे दो।' ये व्याकुलता नहीं है? और व्याकुलता एक ही है। भूलना नहीं, हमने क्या बोला था?

हम सब उसी प्रतीक्षा में खड़े हुए हैं। उसी की प्रतीक्षा में खड़े हैं। वही व्याकुलता है। पर पता भी नहीं है कि किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं इसलिए कुछ और करने लग जाते हैं। वो प्यार, जो पूरी सृष्टि में बरसना चाहिए वो हम कपड़ों में बरसाना शुरू कर देते हैं। 'मेरे कपड़े बड़े अच्छे रहें।'

प्र४: आचार्य जी, जिसको ये समझ में आ गया कि वही चाहिए (परमात्मा), उसे तो मिल ही गया न?

आचार्य: उसे मिल ही गया, बहुत बढ़िया। आख़िरी क़दम पर पहुँच गया वह। एक क़दम और लेगा और उड़ेगा। जिसको ही समझ में आ गया न, सारी तलाश एक की ही तलाश है। अब समझ लो बिलकुल निन्यानबे क़दम ले लिए हैं, सौवे पर बैठा हुआ है, अब तैयार है उड़ने को वह। अभी उड़ा नहीं है। एक क़दम अभी और लेना पड़ेगा, पर अब तैयार है।

जब भी देखो कि बहुत किसी भी चीज़ की डिजायर (कामना) उठ रही है, कहीं भी अट्रैक्ट (आकर्षित) हो रहे हो तो समझ लेना कि बस उसी की डिज़ायर है, उसी की डिजायर है। भारत में इस बात को बहुत समझा गया है, इसलिए हर चीज़ को यहाँ प्रणाम कराया गया है। कुछ नहीं है ऐसा जिसको प्रणाम न कराया गया हो।

इसको आप पैंथीजम मत समझिएगा। इसको जो पश्चिमी मन है समझ नहीं पाता, तो कहता है कि भारतीय लोग हर चीज़ को गॉड (भगवान) कहते हैं। इनके इतने करोड़ देवी-देवता हैं। नहीं, बात ये नहीं है। बात एक संख्या की नहीं है। बात छियासठ करोड़, तैतीस करोड़ की नहीं है। बात इसकी है कि असंख्य है, असीमित है, अनेक है। अनेक हैं नहीं; जब आप कहते हैं अनेक ईश्वर हैं तो आप बिलकुल दूसरी बात कह रहे हैं।

अनेक है नहीं, अनेक है। है एक, पर है अनेक। एक ही है, पर अनेक है। और ये अनेक होना उसकी एकता का हिस्सा है।

इस्लाम में इसी बात को शिर्क बोला जाता है। टू बिलीव इन अ गॉड अदर दैन अल्लाह। और इस्लाम की सनातन धर्म से एक बड़ी शिक़ायत ही यही है कि तुम बहुत सारे ईश्वरों में यकीन करते हो। बहुत सारे कैसे हो सकते हैं? बहुत सारों में यकीन नहीं किया जा रहा है, एक में ही किया जा रहा है। पर वो जो एक है, वो अनेक है। वो कण-कण में है। वो हर जगह है। बहुत सारों में नहीं कोई कर रहा है, एक ही है। और जो कहता हो कि बहुत सारे हैं, वो पगला है।

आपको मिल जाएँगे लोग जो कहते हैं, बहुत सारे हैं; एक लक्ष्मी मईया हैं, एक फ़लाने बप्पा हैं, एक ये हैं, एक ढमाका हैं। वो कुछ नहीं समझ रहे। वो पागल हैं। वो नहीं जान रहे। अनेक नहीं है। एक है जो अनेक है।

प्र: मतलब, वो तात्विक दृष्टि से बोला गया है। वो अनेक रूपों में मेनिफेस्ट हो रहा है लेकिन जो मुख्य है जो उसका तत्व है, वो एक ही है।

आचार्य: एक ही है। वो एक ही है। वेदान्त की नज़र से एक है। बुद्ध की नज़र से शून्य है। उन्होंने कह दिया एक भी कहना ठीक नहीं, शून्य बोलो। जो भी डिजायर उठे, अनेक की, अनेक की जो भी डिजाइर उठे, उसमें एक को देखिए। फिर मज़ा आएगा। सामने आपके बर्गर रखा हुआ है, किंग साइज बर्गर। और उसमें अगर आपको एक क्षण को ये कौंध भी जाए ये बात कि ब्रह्म है। तो जानिए कि कुछ ख़ास होने लग गया अब। मज़ेदार होने लग गया है। जो जानता है, वो पूरे जगत के साथ प्रेम में होता है। और वो पूरे जगत को प्रणाम करता है; पूरे जगत को प्रणाम करता है लगातार। वो क्लास रूम में जाएगा तो अपने स्टूडेंट्स के सामने झुकेगा। स्टूडेंट थोड़ी बैठे हैं ये, कौन बैठा है?

श्रोता: साक्षात ब्रह्म।

आचार्य: शुरुआत में था कि सनातन धर्म में तंत्र जो एक यहाँ पर धारा विकसित हुई, वो कहती है कि जब आदमी और औरत मिलें, जब स्त्री और पुरुष मिलें, प्रेम के क्षण में, और शारीरिक रूप से मिलने जा रहे हों तो पहले एक दूसरे को प्रणाम करें। नोचना-खसोटना न शुरू कर दें। पहले प्रणाम करिए। और उसको भी बड़े नमन के भाव से, बड़ी श्रद्धा के भाव से, ठीक वैसे ही आरती उतारिए जैसे ईश्वर की उतारी जाती है। उसके बाद ही स्पर्श कीजिए एक-दूसरे को। तो संभोग भी फिर दैवीय है। फिर उसमें भी वो कुछ नहीं है कि "अरे, डिजायर में बह गए, तुम साले पापी हो।" कुछ नहीं, ऐसा कुछ नहीं।

ये भी डिवाइन एक्ट (दैवीय कृत) है। बट देन यू हैव टू एंटर इंटू इट एस इफ इट इस डिवाइन। यू हैव टू लुक एट द डिविनिटी ऑफ इट। ओनली देन। (लेकिन तब आपको इसको एक पवित्र कर्म मानना होगा) ऐसे नहीं कि उसमें फिर चोरी-चकारी चल रही है और धीरे से हाथ डाल दिया। ये सब नहीं। जैसे मंदिर में घुसा जाता है कि मंदिर जाने से पहले नहाते हो, तैयार होते हो, मन साफ़ रखते हो, और एक नमन के भाव के साथ मंदिर में प्रवेश करते हो। ठीक वैसे ही।

प्र: देयर इज ए वीडियो बाइ ओशो। ही सेस दैट यू शुड हैव ए सेपरेट रूम फॉर दीस थिंग्स। एंड ही सेस दैट यू शुड कीप इट एस सेक्रेड एस यू कीप योर मेडिटेटिंग रूम फॉर मेडिटेशन। (ओशो का एक वीडियो है। जिसमें वो कहते हैं कि आपके पास इसके लिए एक पृथक ही कमरा होना चाहिए। और जैसे आप अपने ध्यान के कमरे को पवित्र रखते हैं वैसे ही इसे पवित्र रखना चाहिए।)

आचार्य: दिस एक्ट एंड दिस होल लाइफ, द एंटायरिटी ऑफ लाइफ, एवरीथिंग इस सेक्रेड। नथिंग इस डिस्पीकेबल। यू आर वाकिंग, दैट इस ए सेक्रेड एक्ट। हाउ डेयर वी थिंक दैट वाकिंग इस समथिंग कॉमन प्लेस। एंड हाउ डेयर वी से एनीथिंग एस कॉमन प्लेस। एवरीथिंग इस एब्सोल्यूटली डिवाइन बट देन व्हेन यू से दैट, दैट गोस अगेंस्ट द होल कांसेप्ट ऑफ मॉडर्न लिविंग व्हिच डिवाइड्स लाइफ इंटू द इंपोर्टेंट एंड द अनइंपोर्टेंट।

(संभोग की क्रिया भी और साथ ही साथ हर एक क्रिया, पूरा जीवन ही पवित्र है। कुछ भी निंदनीय नहीं है। आप चल रहे हैं, वो एक पवित्र काम है। हम ये कैसे कह सकते हैं कि चलना एक मामूली काम है। हम किसी भी काम को मामूली कैसे कह सकते हैं। लेकिन जब आप ऐसा कहते हैं तो ये आधुनिक मान्यता के विपरीत जाता है जो जीवन को महत्वपूर्ण और गैर महत्वपूर्ण में बाँटता है।)

जैसे ही आपने कहा कि पूरा जगत दैवीय है, अब वैसे ही आप गोल्स (लक्ष्य) नहीं बना सकते न। टारगेट ख़त्म। जब सबकुछ दैवीय है तो कोई ख़ास टारगेट कहाँ से हो सकता है? अब दिक्क़त यहाँ पर आती है। आपको अगर एक लक्ष्य बनाना है, आपको अगर भविष्य में ध्यान केंद्रित करना है तो आपको ये मानना ही पड़ेगा कि कुछ ऐसा है जो छोटा है और कुछ ऐसा है जो बड़ा है। और जो बड़ा है, वो मुझे पाना है। अगर आपको दिखने लग गया कि सब कुछ परम बड़ा है, बड़ा ही नहीं है, परम बड़ा है तो आपको फिर वर्तमान में जीना ही पड़ेगा। यही अर्थ है वर्तमान में जीने का। सब कुछ तो वही है और छोड़ कर जाऊँगा कहाँ इसको? सब कुछ वही है। उस एक के अलावा और है क्या?

प्र५: हमारे पास तो इनफिनाइट पॉसिबिलिटी (अनंत संभावना) है काम करने की, उस पॉसिबिलिटी का क्या करेंगे?

आचार्य: फिर तुम जो भी करो उससे फ़र्क नहीं पड़ता। अब वो परम फ्रीडम है कि हम जो भी करें "की फ़र्क पहंदा है।" जो मन में आए करो। जो ही उचित है, जो ही, जिधर को ही। ये मन के साथ गहरी मित्रता है कि अब तू जिधर को जाता है, चल हम तेरे साथ हैं। अरे अपना ही बाग है, उस (बाएँ) फूल की तरफ़ जाएगा तो भी ठीक है। उस (दाएँ) फूल की तरफ़ जाएगा तो भी ठीक है। और कहीं नहीं जाना, यहीं लेट कर सो गए तो भी ठीक है। कुछ भी ग़लत है ही नहीं।

प्र६: बिकॉज़ माइंड कैटिगराइज करता है कि इंपोर्टेंट, अनइम्पोर्टेंट ?

आचार्य: यही तो बात है न कि बहुत सारी चीज़ें हैं जो वापस खींच-खींच कर लाती हैं। और ठीक है, उनको लाना भी चाहिए। वो हमारा दंड है। वो पैदा होने का टोल टैक्स है। पैदा हुए हो तो कुछ तो दंड भरना पड़ेगा न।

प्र७: प्रॉबब्ली जो होता है कि माइंड इज इंटू मच हर्री टू ड्रा कंक्लूजन। मुझे लगता है न कि माइंड की भी कोई ग़लती नहीं है। जिस समाज में बड़ा हुआ है। जिस समाज में उसने भरा है स्वयं को, वहाँ उसे सिखाया गया है कि हर चीज़ ऐसी होती है या तो बेनिफिशियल (लाभदायक) होती है या नॉन बेनिफिशल होती है। तुम चल रहे, उससे क्या फ़ायदा है?

आचार्य: फ़ायदा। तुम देखो न फ़ायदे और नुक़सान की सारी अवधारणा ही यही है कि कुछ है जो छोटा है और जहाँ तुम्हें घाटा है। और कुछ है, जहाँ फ़ायदा है। और वो तुम्हें तय करना है कि फ़ायदा कहाँ है। और उसके लिए दिमाग़ लगाओ, बुद्धि लगाओ, ख़ुराफ़ात करो, एनालिसिस (विश्लेषण) करो।

प्र: एंड द माइंड कम्स इंटू बींग्स (और इसीलिए मन अस्तित्व में आता है)।

आचार्य: ऑफकोर्स, इन दैट द माइंड इस एस इफ वी आर डूइंग समथिंग, एस वी आर समबडी (बिलकुल, फिर मन ऐसा करता है कि हमें लगता है कि हम कुछ कर रहे हैं)।

प्र: द माइंड थिंक्स देट इट इस टू बिजी। देट्स द ओनली वे ऑफ़ इट, प्लेइंग अराउंड विथ मी (मन सोचता है ये बहुत व्यस्त है और ये केवल अहम् के आसपास खेलता है)।

प्र२: आधुनिकता का पूरा दर्शन ही लाभ आधारित है कि कोई भी काम कर रहे हैं उसका कुछ न कुछ लाभ मिलना चाहिए। नहीं तो कार्य का कोई भी मूल्य नहीं है।

आचार्य: जीवन को ऐसे जिया जाए जैसे लगातार पूजा कर रहे हैं। जीवन को ऐसे जिया जाए जैसे एक अनवरत प्रार्थना है।

प्र८: लेकिन जो चीज़ हम रेगुलरली (नियमित) करते हैं तो फिर उसमें कोई इम्पोर्टेंस नही रह जाती। तो अगर प्रार्थना हमेशा ही कर रहे हैं तो प्रार्थना प्रार्थना नहीं रह जाती।

आचार्य: नहीं, वो प्रार्थना लगातार नहीं है। वो प्रार्थना बस है। वो प्रार्थना उतनी ही लगातार है जितना कि थियेटर का पर्दा, लगातार तो उस पर फ़िल्म चल रही है। प्रार्थना पीछे परदे की तरह, बस है। प्रार्थना आप लगातार कर नहीं रहे। प्रार्थना, वो पत्थर है जिसमें पूरा जीवन आश्रित रहे। वो बैकग्राउंड है जिस पर सारी फ़िल्म चलती रहे। तो ऐसे जीवन में हिंसा नहीं हो सकती। ऐसे जीवन में डर नहीं रहेगा। ऐसे जीवन की कुछ बात दूसरी होती है।

प्र९: सर, ये जो आप तांत्रिक फिलोसॉफी (दर्शन) की बात कर रहे थे तो ये थोड़ा कॉन्ट्रडिक्ट (विरोधाभास) लगा। और वो यूनिवर्सल सेट (सार्वभौम) वाला आर्गूमेंट (तर्क) एक तरह से प्रूव (मान्य) हो जाता है। जब हम कह रहे हैं कि यही धर्म जिसकी एक धारा तांत्रिक फिलोसॉफी है, वही धर्म एक ऐसी संस्कृति को जन्म देता है जिसमें सेक्स को नैतिकता से जोड़ा गया, प्योरली इमॉरल एक्ट , तो ये कैसे मतलब?

आचार्य: हज़ार लोग, हज़ार तरीक़े के मन, हज़ार बातें। उनका जो यूनिफाइंग प्रिंसिपल है, वो इतना गहरा है, वो इतना नीचे है कि बहुत खोदो तब दिखाई देगा। ऊपर-ऊपर तो तुमको सिर्फ़ विभिन्नताएँ दिखाई देंगी। और हम विभिन्नताओं को पकड़ कर बैठ जाते हैं। उन सबके नीचे निश्चित रूप से यूनिफाइंग प्रिंसिपल है। जैसे कि एक धारा बह रही हो ज़मीन के नीचे से और उससे सत्तर-अस्सी कुओं को पानी मिल रहा हो। जैसे ज़मीन में बहुत नीचे, बहुत गहरे एक धारा बह रही हो, एक्वीफर्स जानते ही हैं, और उनसे बहुत सारे कुएँ हैं जो रेप्लेनिश (भरना) हो रहे हैं। अब धारा इतनी गहरी है कि कौन खोजेगा उसको?

पर कुएँ अलग-अलग हैं और दूर-दूर हैं, ये तो दिखाई पड़ता है न। और हमने कुएँ बाँट लिए हैं। एक कुए का नाम आपने तंत्र रख दिया है। एक कुए का नाम आपने भक्ति रख दिया है। एक कुए का नाम आपने योग रख दिया है। और आप कहते हो कि ये सब अलग-अलग कुएँ हैं। और हम फ़लाने कुएँ के मानने वाले हैं। हम तो फ़लाने कुएँ का पानी पीते हैं।

हमको दिखाई नहीं पड़ता कि उन सबके नीचे एक यूनिफाइंग धारा है। और उसी से सब भरे जा रहे हैं। और वो धारा, ये नहीं कह रहा हूँ मैं कि सिर्फ़ जो सनातन धर्म के अलग-अलग कुएँ हैं उनको पानी दे रही है। उसी धारा से बुद्ध का कुआँ भी भरा है। उसी धारा से मोहम्मद का कुआँ और जीसस का कुआँ भी भरा है। वो एक ही धारा है, अलग धाराएँ होती नहीं न। कोई दुनिया में दो सत्य थोड़े ही है।

मीरा जिस धारा को पी रही हैं और फरीद जिस धारा को पी रहे हैं, वो कोई दो अलग-अलग धाराएँ थोड़े ही हैं। कोई दो अलग धारा थोड़े ही है। मैंने फेसबुक पर एक चीज़ शुरू करी थी। उसपर कुछ स्टूडेंट्स ने आगे बड़ा हल्ला करा तो उसको भी कहा कि नहीं कराऊँगा।

हममें से बहुत कम लोगों ने कुरान पढ़ी होगी। आपको इस ट्रिप पर एक पूरा लम्बा सेशन कुरान के आयतों पर रखूँगा और फिर आप मुझे बताइएगा कि ये धारा उपनिषद् की धारा से अलग कैसे है? मुझे समझाइएगा, मुझे तो नहीं समझ में आता है। हाँ, आपने मन पहले ही अगर बना रखा हो कि मुझे अंतर ही ढूँढने हैं, मुझे विरोध ही ढूँढने हैं तो अलग बात है। फिर आप लाख उसमें अंतर निकाल लोगे। पर थोड़ा-सा सहानुभूति के साथ पढ़ो, थोड़ा मन साफ़ करके पढ़ो तो अंतर कहाँ है? मुझे बताइएगा, मुझे तो नहीं दिखता।

जब करेंगे तब बताना। और देखो शब्दों पर नहीं जाना चाहिए क्योंकि जहाँ भी शब्द लिखे जाते हैं, बोले जाते हैं, वो अलग माहौल होते हैं, अलग लोग होते हैं, अलग लोगों से कहे जाते हैं। लाओत्सू ने एक माहौल में कहा है। कृष्ण ने एक माहौल में कहा है। मोहम्मद ने एक माहौल में कहा है। तो उस बात को फैक्टरिंग करना पड़ेगा कि ये बात किन लोगों से कही जा रही है? और उसके बाद देखना।

प्र१०: सर, फॉर एग्जामपल , आप यहाँ (शिविर) पर कुछ कह रहे हैं और स्टूडेंट्स के सामने कुछ कह रहे हैं। तो थोड़ा फ़र्क तो पड़ेगा न?

आचार्य: बहुत फ़र्क रहता है। बहुत फ़र्क है।

प्र११: सर मुझे एक एक्सपीरिएंस रहा था एक। एक बार मैं बहरीन गई थी। बहरीन में ओपन कल्चर है। बट व्हेन यू गो टू द नार्थ तो आपको पूरा लिबाज़ पहन के ही जाना पड़ता है। मुझे बड़ा अजीब लगा। मैंने पूछा, क्या ये कुरान में लिखा है। तो उन्होंने कहा कि हम सबको मानते हैं जो जीसस और उनके बाद आए लेकिन ओनली दैट व्हिच इस रिटन इन एरेबिक इस एक्चुअल , (जो अरबी में है वही सच है) बाक़ी सब झूठ है।

आचार्य: ये बात कुछ हद तक ठीक भी है। इसको अगर, इसकी बात को तत्व से समझो तो बात ठीक भी है। क्योंकि ट्रांसलेशन हमेशा जो मूल अर्थ है, उसको थोड़ा विकृत करता है। जिन्होंने ये बात बोली। उन्होंने बात ठीक बोली, पर अधूरी बोली।

उन्होंने कहा, 'जो अरबी में लिखा है, वो सच है अपेक्षा उसके जो अंग्रेजी में लिखा हो।' यहाँ तक उन्होंने ठीक कहा। अरबी जब अंग्रेजी बनेगी तो उसमें से कुछ हट जाएगा, कुछ पीछे छूट जाएगा। कुछ पीछे छूटेगा और कुछ जुड़ भी जाएगा। लेकिन एक चीज़ उसने नहीं बोली। वो ये कि जो सत्य कहा गया है वो अरबी भी नहीं है। अरबी, अंग्रेजी बनेगी तो सत्य विकृत होगा। लेकिन जो सत्य है वो अरबी भी नहीं है, वो अरबी के पीछे का मौन है। जो उस मौन को न समझ सके, उसको अरबी से भी कुछ नहीं मिलेगा। यही कारण है कि दुनिया कुरान पढ़ रही है और उसे कुरान से कुछ नहीं मिल रहा।

प्र११: मुझे भाषा वाली बात ही बड़ी अजीब लगी। उन्होंने उसे दो तीन बार कहा।

आचार्य: बिलकुल ठीक बोला गया। मैं इस बात को सौ प्रतिशत मानता हूँ कि जिसने जो कुछ भी जिस भाषा में बोला है उसको उसी भाषा में पढ़ना चाहिए। आपको अगर ग्रंथ साहिब पढ़ना है तो आप पंजाबी के जितने क़रीब जाएँगे, आपको उतना फ़ायदा होगा। और आप कभी ग्रंथ साहिब का अंग्रेजी अनुवाद उठा लो या गीता का अंग्रेजी अनुवाद उठा लो…। मैं और ये महाशय संस्कृत क्यों बैठकर पढ़ते हैं क्योंकि अंग्रेजी में जैसे ही तुमने उसको बदला वो मामला ही कुछ और हो जाता है। बात ही कुछ और हो जाती है। तो वो ठीक है।

श्रोता: सर, रविंद्र नाथ टैगोर ने जब ट्रांसलेशन किया था, गीतांजलि का इंग्लिश में। तो यही बात की थी कि द सोल इज मिसिंग।

आचार्य: द सोल इस मिसिंग बट यू शुड अल्सो रिमेंबर दैट द सोल इस नॉट देयर इवेन इन द नेटिव लैंग्वेज। द सोल इस साइलेंस। द वर्डस दैट हैव कम, दे हैव नॉट कम सो दैट यू जस्ट कैच होल्ड्स ऑन द वर्ड्स। द वर्ड्स कम सो दैट वर्ड्स कैन ट्रांसपोर्ट यू टू द साइलेंस। द रियल थिंग्स इस दैट साइलेंस, दैट नथिंगनेस। दैट अब्सोल्युट फ्रीडम। वर्ड्स इसलिए आते हैं। (आत्मा गायब है। लेकिन तुम्हें ये भी याद रखना है कि आत्मा मूल भाषा में भी नहीं है। आत्मा तो मौन है। शब्द इसलिए नहीं हैं कि आप उनमें ही अटक जाएँ। शब्द इसलिए हैं कि वो आपको मौन तक ले जाएँ। असली तो वो मौन ही है, जो शून्य है, मुक्ति है।)

प्र११: रमण महर्षि का मुझे एक पुस्तक मिला। मैंने पढ़ना शुरू किया तो कुछ समझ में आया फिर एक दो चीज़ समझ में ही नहीं आया।

आचार्य: दोनों काम होने दीजिए। पहली बात तो ये कि जो जिस हद तक भी आपको पकड़ में आ रहा है उसको पकड़ना मत छोड़िए। उसमें हौसला छोड़ देने वाली कोई बात नहीं है। और दूसरी बात ये कि कभी अपनेआप को ये मत कहिए कि मैं सब समझ गई।

हम दोनों में से कोई एक काम करते हैं। या तो हम कहते हैं मुझे कुछ समझ में नहीं आया या हम कहते हैं कि समझ लिया अब पढ़ना बंद करो।

धर्मग्रंथ पढ़े नहीं जाते। उनका पाठ किया जाता है। और पाठ का अर्थ यही है कि उसको बार-बार, बार-बार, बार-बार पढ़ो और बार-बार पढ़ने का मतलब ही यही है कि एक बार में, दो बार में और तीन बार में वो समझ में नहीं आएँगे। नहीं आएँगे कहना भी ठीक नहीं है अभी, उनका जो अर्थ है वो उत्तरोत्तर स्पष्ट होता है, प्रोग्रेसिवली। आज भी एक अर्थ आपको दिखेगा। वो अर्थ झूठा नहीं है। आप जिस सीढ़ी पर खड़े हैं आपको वही अर्थ दिखेगा। और उस अर्थ को झूठा मत मानना। वो अर्थ आपके काम का है।

प्र११: सर, कुछ तो लगता है, कुछ मिसिंग है।

आचार्य: हाँ, वो लगने दीजिए। वो शुभ बात है अगर लग रहा है। इससे आप एरोगेंट नहीं होंगी। आप ये नहीं कहोगे कि मैंने रमण को पूरा जान लिया। कोई भी किताब जिसकी ज़रा भी क़ीमत होगी वो हमेशा के लिए होगी। आज आप उसको पढ़ोगे और आप आज से बीस साल बाद पढ़ोगे, आपको एक नई किताब पढ़ने को मिलेगी।

क्रिएटिविटी, टाइमलेस होती है। इसका यही अर्थ है। एवरी रिलीजियस डॉक्यूमेंट इस द हाइट ऑफ क्रिएटिविटी। एवरी रिलीजियस डॉक्यूमेंट इस द मोस्ट क्रिएटिव डॉक्यूमेंट बीकॉस इट इस टाइमलेस। इट हेस वन मीनिंग टुडे डिपेनडिंग अपॉन हू यू आर एंड व्हेयर यू स्टैंड एंड इट हैस अनादर मीनिंग टुमॉरो वेन यू रीड इट अगेन। दैट इस वाय यू मस्ट रीड इट डेली। दैट इस वाय यू मस्ट नेवर से दैट आई हैव रेड द गीता। यू हैव नेवर रेड इट। यू आर ऑलवेज इन द प्रोसेस ऑफ रीडिंग इट, एंड कीप रीडिंग इट।

(हर धार्मिक ग्रन्थ एक उच्च कोटि का सृजन है क्योंकि वो समयातीत है। आज आप जैसे हैं उसके अनुसार उसका एक अर्थ होगा और कल आप जैसे होंगे उसके अनुसार फिर कोई दूसरा अर्थ होगा। इसलिए ये अनिवार्य है कि उसका अध्ययन आप रोज़ करें। आप ये कभी नहीं कह सकते कि आपने गीता पूरी पढ़ ली। आप हमेशा गीता पढ़ने की प्रक्रिया में ही रहते हैं, इसीलिए पढ़ते रहिए।)

प्र१२: सर, इसमें अगर क्यूरोसिटी आ रहा है कि कल मैं पढूँगी एंड इट्स समथिंग न्यू। ये सही है कि रहने देना है।

आचार्य: नहीं, अगर कल का न्यू आपको अभी से अहसास हो रहा है तो आप अभी ही पढ़े जाओ। कल आपको क्या लगेगा।

प्र१२: नहीं, नेक्स्ट टाइम।

आचार्य: नेक्स्ट टाइम ही, आपको क्या लगेगा। आप उसके बारे में कुछ नहीं जान सकते।

प्र१२: पर एक विश्वास रहता है मैं पढूँगी ज़रूर। इसको ऐसे ही नहीं छोड़ूँगी। तो ये क्या चीज़ चल रही है?

आचार्य: नहीं, कुछ नहीं चल रहा है। इसमें क्लियर है कि अभी इसका जो आकर्षण है, वो ख़त्म नहीं हो गया, मिट नहीं गया। वो खींच रहा है। इस पर इतने सवाल करा मत करिए कि क्या चल रहा है? क्यों चल रहा है? जो चल रहा है अच्छा ही चल रहा है। इसमें क्या पूछना है कि क्या चल रहा है? क्योंकि आप एक शाब्दिक सवाल पूछोगे। उसका एक शाब्दिक जवाब आ जाएगा। उससे कोई विशेष लाभ नहीं होना।

आपको क्या लगता है यही सवाल कल पूछे जाएँ—अभी अगला संडे फिर यही सेशन हो जाए—तो क्या इसका एक रिपीट होगा, जो आज हुआ है? अरे, इनके अर्थ प्रोग्रेसिवली खुलते हैं। और उसका खुलना कभी रुकता नहीं है। अनंत रूप से खुलेगा वह। उसका कोई अंत नहीं है। आपके लिए कोई दिन ऐसा नहीं आएगा कि कह दोगे पूरा जान गए।

यहाँ पर लोग हैं जो चार-चार साल से बियोंड द ग्लॉस करा रहे हैं। और उनसे पूछिए कि बियोंड द ग्लास समझ में आ गयी क्या? बियोंड द ग्लास एक रिलीजियस एक्टिविटी है। वो आपको कभी पूरी तरह समझ में आ ही नहीं सकती। और आप आज से चालीस साल बाद भी कराओगे तो आप उसमें एक नया अर्थ पाओगे। आप चालीस साल बाद भी उसमें एक नया अर्थ पाओगे। इसमें कोई परेशान होने वाली बात नहीं है। ठीक है, अच्छी बात है, दिक्क़त क्या है? ये तो प्यार में होता है। यू आर डिस्कवरिंग द पर्सन न्यू एंड फ्रेश एवरीडे।

प्र१३: सर, एक दिन मैं पढ़ रहा था। साइंटिस्ट्स , जो लैब में काम करते हैं, इतने दावे पढ़ते हैं। वो सब करते हैं तब जाकर उन्हें साइंस का कुछ हिस्सा पता चलता है। यहाँ तो रिलीजन की बात हो रही है। मतलब इतना जल्दी समझ में आ जाए ऐसे एक्सपेक्ट करना ही नहीं चाहिए। थोड़ा समय तो लगेगा।

आचार्य: टाइम कभी पूरा नहीं पड़ेगा। थोड़ा टाइम लगेगा की बात नहीं है। और उसका मज़ा ही इसमें है कि उसकी धारा अनंत है। आप जितना भी पियो कभी पूरी नहीं होगी। ये बात अहंकार को अच्छी नहीं लगती। अहंकार कहता है 'मैं जान गया। हाँ, मुझसे आकर पूछो, मैं बताऊँगा।' उसका मज़ा ही इसी में है कि वो कभी पूरी नहीं होगी। आप जितना भी जानोगे, जानना शेष रह जाएगा।

प्र११: सर, रमण महर्षि का पुस्तक पढ़ते समय भी मुझे कई प्रश्न आ रहे थे लेकिन मैं प्रश्न को ही पकड़ नहीं पा रही थी।

आचार्य: नहीं पकड़ पा रहे हो तो मौज कीजिए। क्वेरी आ रही है लेकिन पकड़ में भी नहीं आ रही है, बहुत अच्छी बात है। तो ठीक है। वो तो आपको बेवकूफ़ बनाएगा ही। आप उसके सामने कभी होशियार नहीं हो पाओगे। अगर आप ये सोच रहे हो कि आप बैठ कर पढ़ रहे हो उपनिषद् और तब भी आप होशियार हो—उपनिषद् पढ़ने का मतलब यही है कि आपको लगेगा मैं कितनी फुद्दू हूँ। धर्मग्रंथ आपको आपकी होशियारी बताने के लिए नहीं होते हैं। यही बताने के लिए होते हैं कि आप कितने फुद्दू हो। अच्छी बात है जिनको होशियार रहना है, वो जाकर के मार्केटिंग और फाइनेंस पढ़ें। वहाँ आपको ये भ्रम हो जाएगा कि मैं बहुत होशियार हूँ।

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