गुरु से प्रेम, सत्य से प्रेम || आचार्य प्रशांत, गुरु कबीर पर (2013)

आचार्य प्रशांत:
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सर पटकता है। हमन गुरनाम साचा है, हमन दुनिया से यारी क्या?
~ कबीर साहब
कबीर साहब का एक बड़ा एब्यूज़्ड सा (ग़लत प्रयुक्त) दोहा है —
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
उसका अर्थ क्या है?
श्रोता: वो जो स्कूल में मैम पढ़ाती थी न तो मुझे लगता था ये टीचर मतलब भगवान से बड़ी हैं। मैं सोचता था, ऐसे कैसे हो सकता है।
आचार्य: इसका अर्थ क्या है? इस दोहे के साथ बड़ा अन्याय होता है। इसका अर्थ क्या है? "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय", ठीक है यहाँ तक बात। दो खड़े हैं, दो दिख रहे हैं। अभी दो दिख रहे हैं। किसके पास जाऊँ, कहाँ नमन करूँ?






