प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अभी आपने जो बताया, आपके पास आने से पहले, जो भी समझा, जो भी पढ़ा था तो उसमें ये था कि कामना की पूर्ति करते-करते मुक्ति तक पहुँच जाएँगे। लेकिन जब आप, आपके प्रकाश में ये पता चला कि कामना की पूर्ति ये जानकर कि हो नहीं सकती, छूट कर, तब पहुँचेंगे। लेकिन जो मन है वो उधर ही खींचता है कि जो पहला समझा था वो सही है पता नहीं कहाँ नये जा रहे हो?
आचार्य प्रशांत: कृष्ण क्या कहते हैं, मन से ऊपर कौन है? बुद्धि। तो मन तो खींचेगा ही कामना की ओर। प्राकृतिक उसका ये गुण है। पर बुद्धि तो अब बताएगी न। देखिए इधर पिछली एक-दो शताब्दियों में आध्यात्मिक क्षेत्र में एक नये और अद्भुत झूठ ने प्रवेश किया। ये पिछले क़रीब सौ सालों की ही बात है। और इस झूठ के प्रवेश करने में भारत के पश्चिम से सम्पर्क का बहुत बड़ा हाथ है। वो झूठ ये है कि कामना की पूर्ति करते-करते एक दिन तुम कामना के पार निकल जाओगे।
ये झूठ क्यों आया इसके पीछे कोई आध्यात्मिक कारण नहीं है, आर्थिक कारण है। आप समझिएगा। देखिये, अंग्रेज़ भारत आये और उसके बाद से आध्यात्मिक क्षेत्र में भी भारत का पश्चिम से सम्पर्क बढ़ा। और वो जो सम्पर्क था, वो अचानक सघन हो गया स्वामी विवेकानन्द के साथ। ये इतिहास हम जानते हैं सब, है न?
अब ये जिन दो इकाइयों में सम्पर्क हो रहा है वो कौन हैं, कैसी हैं? समझिए। भारतीय आध्यात्मिक लोग हैं और उधर पश्चिम का औद्योगिक समुदाय है, और दोनों की आर्थिक स्थिति में कितना अंतर है? ज़मीन-आसमान का अंतर है। आज से करीब डेढ़-सौ साल पहले का हाल सोच लीजिए। अब सब लोग जो अपनेआप को आध्यात्मिक बोलते हैं उनमें विवेकानन्द जैसी ऊँचाई नहीं होती। विवेकानन्द पुल बना गये। उन्होंने दिखा दिया कि एक भारतीय योगी जब अमेरिका जाता है और यूरोप जाता है तो वो लोग उसको सिर-आँखों पर बिठाते हैं। बड़ी प्रसिद्धि मिलती है, बड़े अनुयायी मिलते हैं। और अगर धन ही कमाना तुम चाहो तो धन भी बेशुमार मिलता है। ये स्वामी विवेकानन्द के उदाहरण से बिलकुल स्पष्ट हो गया। अब स्वामी जी तो बहुत लम्बा जिये नहीं। वो तो अपनी ये लीला पूरी करके अड़तीस की उम्र में ही विदा हो गये।




