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जाति हमारी आत्मा गोत्र हमारा ब्रह्म, सत्य हमारा बाप है मुक्ति हमारा धर्म || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न राजा जनक से सम्बन्धित है। वो एक शान्त, सरल और स्पष्ट जिज्ञासा करते हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो, मुक्ति कैसे हो और वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो। मैं जब राजा जनक की स्थिति की तुलना महाभारत के अर्जुन की स्थिति से करता हूँ तो पाता हूँ कि अर्जुन की पार्श्वभूमि बहुत स्पष्ट है, लेकिन राजा जनक के बारे में हमें इतना कुछ बताया नहीं गया।

हम जानते हैं कि अर्जुन कौन हैं, उन्होंने कितना कुछ देखा है, सम्बन्धियों द्वारा दिये हुए अनेकों कष्टों और अपमान को सहा है, वगैरह, वगैरह। इतना कुछ घटित होने के पश्चात जब कौरवों के विरुद्ध लड़ने के क्रम में उनके सामने पितामह भीष्म और गुरू द्रोण का खून बहाने की बात आयी तो वो टूट जाते हैं और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, तब जाकर उन पर गीताज्ञान की वर्षा होनी शुरू होती है। लेकिन राजा जनक के साथ ऐसा लगता है कि उनके जीवन में सब कुशल-मंगल ही चल रहा है, तो फिर अचानक से कैसे उन्हें मुक्ति और वैराग्य की जिज्ञासा आयी? इस बात पर आप कृपया थोड़ा प्रकाश डालें।

आचार्य प्रशांत: सबका ही तो कुशल-मंगल चल रहा होता है न ऊपर-ऊपर, लेकिन भीतर बेचैनी होती है न? अब मुझे क्या पता कि राजा जनक इतिहास में एक व्यक्ति थे कि पचास व्यक्ति थे। कौन जाकर ये सब ख़ुराफ़ात करे, ढूँढकर लाये! हमें क्या लेना-देना! हमें ये पता है कि जनक एक व्यक्ति हैं जो राजा हैं, लेकिन अष्टावक्र मुनि के पास आये हैं जिज्ञासा लेकर कि सत्य कैसे मिले, मुक्ति कैसे मिले। यही तो पहला श्लोक है आपका — ज्ञान कैसे प्राप्त हो।

तो बस हो गया! एक राजा है जो राजा होने के बावजूद ज्ञान चाह रहा है, माने राज-काज पूरा नहीं पड़ रहा। सारा जो राजसी धन-वैभव, ठाठ-प्रतिष्ठा होगी, वो पूरी नहीं पड़ रही, तो वो ज्ञान लेने आया है। बस इतना काफ़ी है। अब कहाँ से निकालकर लायें राजा जनक की कहानियाँ! जब ज़्यादा कहानियाँ वगैरह माँगने लग जाते हो तो फिर उसमें पौराणिक साहित्य की रचना होती है। उससे क्या मिल जाएगा? वैसे एक बात बता दूँ— उस समय के राजाओं के पास भी जितनी दौलत होती थी, उससे ज़्यादा आज आम आदमी के पास होती है। अगर सीधे-सीधे आप वैल्यूएशन (गणनात्मक तुलना) करके देखेंगे, तो तब का राजा भी उतना अमीर नहीं होता था जितना आज का एक उच्च मध्यम वर्ग का व्यक्ति होता है। तो बहुत सारे राजा हैं आज, करोड़ों राजा हैं। जैसे आज के करोड़ों राजा सब बेचैन घूम रहे हैं, वैसे ही तब के राजा भी बेचैन घूमते थे।

प्र: मेरे मन में राजा जनक की ये छवि है कि उनका भव्य दरबार सजता था, ऋषिगण बैठते थे, चर्चाएँ होती थीं। फिर एक दिन उनके दरबार में अष्टावक्र आये और वो उनके अनुगामी बनकर पीछे-पीछे चल दिये। तो मतलब बहुत सीधा-सीधा, सरल सा लग रहा है सबकुछ, उतार-चढ़ाव बहुत कम दिख रहे हैं।

आचार्य: देखिए, इतने सारे जो टीवी चैनल हैं, वो इसीलिए चल रहे हैं। इसको बोलते हैं वॉयरिज़्म — दूसरे की ज़िन्दगी में झाँकने की कोशिश करना। क्यों छवि बनानी है कि जनक का क्या चल रहा था, क्या नहीं? अब कह रहे हो कि मैंने छवि बनायी कि जनक का ठीक चल रहा था, फिर एक दिन अष्टावक्र आये, तो फिर जनक को बेचैनी हुई तो जनक वहाँ चले गये। फिर कह रहे हो कि ये तो स्ट्रेट लाइन लग रही है, इसमें कुछ उतार-चढ़ाव नहीं है, कुछ घुमावदार चीज़ें भी तो होनी चाहिए न।

तो ये सब बता दो किसी टीवी चैनल को, वो घुमावदार, मसालेदार सब बना देगा। कहेगा, ‘जनक की पत्नी थी, लेकिन फिर जनक का अपनी ही एक दासी से टाँका भिड़ गया।’ और जैसे ही ये बोला जाएगा, एकदम समझ में आ जाएगी। अच्छा, अच्छा, अब ठीक है सारी बात। हाँ, और बताओ, और बताओ। गूगल ट्रेंड्स में उस दिन अष्टावक्र गीता एकदम ऊपर चली जाएगी। अब इन लोगों को कोई ज्ञान से मतलब है! नहीं, इन्हें मसाले से मतलब है।

और अष्टावक्र गीता जो इतनी प्रसिद्ध नहीं हो पायी, शायद उसका एक कारण ये भी है, जैसा आपने कहा कि पृष्ठभूमि नहीं मिलती तो लोगों को मसाला नहीं मिलता। क्या करना है पृष्ठभूमि का? ये बात हमारे जीवन की है, हमारे जीवन में ये सब चल रहा है न। और मैं तो आपसे कह रहा हूँ कि आप श्रीमद्भगवद्गीता को भी बिना किसी पृष्ठभूमि के पढ़िए। जब आप कृष्ण की पृष्ठभूमि माँगने लग जाते हैं तो बड़ी दिक्क़त हो जाती है।

और कृष्ण की इतनी बदनामी हुई है, और लोग गीता को पढ़ने से इनकार करते हैं कृष्ण की पृष्ठभूमि ही देखकर। वो कहते हैं, ‘हमने पृष्ठभूमि पढ़ ली है जाकर पुराणों में। और पृष्ठभूमि में हमें ये पता चला है कि ये तो ऐसे ही इधर-उधर घूमते थे, चीज़ें चुराते रहते थे।’ और पचास तरीक़े के इनके चरित्र में खोंट निकाल देते हैं। और वो सब खोंट निकालकर कहते हैं कि अब हम गीता नहीं पढ़ेंगे।

जो उच्चतम हैं और सर्वश्रेष्ठ बात कह रहे हैं, देखिए, उनकी भी बदनामी हो जाती है जब पीछे जाकर आप उनकी पृष्ठभूमि खोजने लग जाते हो। न होता वो सब पृष्ठभूमि का कारोबार तो कृष्ण के ख़िलाफ़ किसी को एक शब्द बोलने का कभी मौक़ा मिलता क्या? लेकिन उसी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करके देखिए, कृष्ण के ख़िलाफ़ लोग बातें भी कर लेते हैं और गीता से किनारा भी कर लेते हैं। तो क्यों किसी की पृष्ठभूमि जाननी है? पृष्ठभूमि जानने से बस यही होता है कि उस व्यक्ति से हटने का हमको एक कारण या बहाना मिल जाता है।

आज भी जो लोग कृष्ण की ख़िलाफ़त करते हैं, यही बोलकर तो करते हैं, ‘अरे! तुम्हारे कृष्ण अगर बहुत इतने ही अनासक्त थे और इतने ही ब्रह्मस्थ थे, तो ये सोलह हज़ार रानियाँ काहे के लिए की थीं?’ जब वो कहीं से किसी स्त्री को ब्याहकर लाते थे तो आपके पुराण बताते हैं कि वो वहाँ पर फ़लानी थी लड़की, उसका ब्याह हुआ श्रीकृष्ण से तो उसके बाद उसके पिता ने जो कि राजा थे, साथ में एक लाख मुद्राएँ दीं, एक करोड़ पशु दिये और एक अरब नौकर दिये।’

अब आज के तार्किक लोग जाकर इस बात का उपहास करते हैं, कहते हैं, ‘एक अरब तो उस समय भारत की पूरी आबादी नहीं थी, तो ये नौकर कहाँ से आ गये एक अरब! या पूरे भारत को ही नौकर बना दिया क्या! और एक अरब सारे नौकर गये कहाँ, रहे कहाँ होंगे, क्या कर रहे थे एक अरब, सब एक-दूसरे की सेवा कर रहे थे?’ ये सब तर्क चलते हैं। और कहते हैं कि क्या ये दहेज ही नहीं है। क्या ये दहेज ही नहीं है?

तो फिर तमाम तरह के जो दूसरे धर्म के लोग होते हैं, उनको हम पर उँगली उठाने का मौक़ा भी मिल जाता है। मिलता है न? वो कहते हैं कि देखो, तुम्हारे तो भगवान ही दहेज लेते हैं, तुम ऐसे लोग हो। ये होता है पृष्ठभूमि का कमाल! तो क्यों आपको कहानियों में घुसना है? क्यों कहानियों में घुसना है? ‘अरे! जो अपने ही वंश की रक्षा नहीं कर पाये, वो तुम्हारी रक्षा क्या करेंगे। उनका पूरा यादव वंश आपस में ही लड़कर तबाह हो गया था न?‘ बोले, ‘जो अपने ही वंश की रक्षा नहीं कर पाये, वो तुम्हारे वंश की क्या रक्षा करेंगे।’ ये होता है कहानियों का कमाल!

तो फिर जो श्रीमद्भगवद्गीता का अनुपम सौन्दर्य है, हमें उससे दूर होने का बहाना मिल जाता है कहानियों के कारण। और इसके उल्टे लोग होते हैं जिन्हें कहानियाँ इतनी पसन्द आती हैं कि वो कहानियों से ही चिपक जाते हैं। वो कहते हैं, ‘गीता की ज़रूरत क्या है, भागवत पुराण काफ़ी है।’ वो कहते हैं, ‘अगर हम गीता को भी पढ़ेंगे तो जैसे पुराण का भाव है, वही भाव लेकर गीता पढ़ेंगे।’ अब तुम कोई भाव वगैरह लेकर गीता पढ़ोगे, तो गीता कभी समझ में आएगी नहीं। तो कहानियों से नुक़सान ही होता है, कहानियों से दूर रहते हैं।

गुरू को मानुष जानते, ता नर कहिए अंध।

कहानियाँ सब इंसानों की होती हैं न। जिससे सीखते हैं, उसको इंसान नहीं माना जाता। जो गुरू को मनुष्य जाने, उसको साहब कह रहे हैं अन्धा है वो। वो जीते समय दुख में रहता है और अन्त जम को फंद। जीते समय नर्क में रहता है और बस फिर आख़िर में यम का फन्दा आता है, जम के फन्दे से लगकर वो ख़त्म हो जाता है।

तो कृष्ण गुरू हैं यहाँ पर, उनको मनुष्य नहीं माना जाता। उनको ये नहीं कहते कि ये तो मनुष्य ही हैं, ये तो इधर-उधर क्रीड़ा कर रहे हैं। इनकी कहानी बताओ, इन्होंने फिर क्या किया। कथा बताओ, कथा। गुरू की कथा नहीं माँगी जाती। गुरू की कथा सुनना बड़ा गड़बड़ हो जाता है। कृष्ण की कथा सुनेंगे तो गीता से वंचित रह जाएँगे।

और भारत इसीलिए गीता से वंचित रह गया है। हमें कथा-कहानी में ज़्यादा रस रहता है। आप कहें कि मैं कृष्ण की गीता सुना रहा हूँ; देखिए, कितने लोग सुनने आते हैं! फिर आप कहें कि मैं कृष्ण की कथा सुना रहा हूँ; देखिए, कैसे लाखों की भीड़ जुटती है! हमें कृष्ण की गीता नहीं, कृष्ण की कथा चाहिए। और वहीं सारी बर्बादी हो जाती है फिर। कथाओं से बचिए। भारत सत्य की जगह कथाओं का देश होकर रह गया।

प्र: आचार्य जी, जो आपने आख़िरी में बोला कि कहानियों का कितना असर होता है, तो एक तरह से वो कहानी अपनेआप में एक अवरोध खड़ा करती है समझने में।

आचार्य: बिलकुल। देखो, कहानी अवरोध कैसे खड़ा करती है, इसको फिर से समझ लो। जिसकी कहानी है, वो कहानी अगर आपको बुरी लग गयी, आपने उस कहानी में कहीं कोई खोंट देख ली, तो आप कहोगे कि जो व्यक्ति ऐसा है, मैं उससे ज्ञान क्यों लूँ।

कई लोगों को बड़ा बुरा लगता है। कहते हैं, ‘ये तो ऐसा करते थे, वैसा करते थे, फ़लाने को धोखे से मार दिया। इतनी सारी गोपियाँ थीं, उनमें से कई सारी विवाहित गोपियाँ थीं, उनके साथ भी रास कर रहे हैं!’ बहुत सारे लोग जाते हैं, कहते हैं, ‘अरे! ये तो देखो कैसा काम है, ये तो कैसा अशोभनीय काम हो रहा है?’ और जिस तरीक़े से कहानियों में वो जो विवरण है, वो बहुत लोगों को लगता है अशोभनीय। तो उस चीज़ का बहाना बनाकर वो फिर गीता को नहीं पढ़ते। और गीता जैसा उत्कृष्ट ग्रन्थ दूसरा नहीं है, लेकिन लोग कहानी का बहाना बनाकर गीता से दूर हो जाते हैं।

और बहुत लोग हैं जिनको कहानी बड़ी मीठी लगने लग जाती है, तो वो क्या करते हैं फिर? वो कहानी-ही-कहानी पढ़ते हैं। वो कहते हैं, ‘ज़रूरत क्या है गीता की, कहानी बहुत है न? और सुनाओ कहानी।’ वो एक ही कहानी सौ बार सुनते हैं — हाँ, एक बार कथा और सुनाइएगा। बड़ा मीठा लगता है! वो फिर बस मधुरम, मधुरम, मधुरम चलता है उनका, कि मधुर लगना चाहिए। भले ही जो मधुरता है, उसमें कुछ पौष्टिकता हो चाहे न हो।

जहाँ सत्य हो, वहाँ कहानी से बचो। या नहीं भी बच सकते हो तो कहानी को जितना कम-से-कम रख सकते हो, उतना कम-से-कम रखो। हमें इतना पता है कि जनक अष्टावक्र गीता में एक राजा हैं और अष्टावक्र एक ज्ञानी हैं, कहीं जंगल में रहते हैं। और जनक अष्टावक्र से मिलने आये हैं और फिर ये संवाद होता है। इतना हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, हमें इससे ज़्यादा जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए। इसके आगे की जो जिज्ञासा है, वो फिर आपको पीपिंग टॉम बना देती है।

पीपिंग टॉम जानते हो न क्या होता है? जो दूसरों के घरों में जाकर ऐसे दरारों से झाँकते हैं कि इनके घरों के अन्दर चल क्या रहा है, वो पीपिंग टॉम कहलाते हैं। इसी को वॉयरिज़्म भी बोलते हैं। वो अश्लीलता का एक तरीक़ा होता है, कि जाकर कोई नहा रहा है तो उसको झाँक लिया कि कैसे नहा रहा है। तुम्हें क्यों झाँकना है भाई? तुम्हें क्यों झाँकना है कि वो कैसे नहा रहा है, छोड़ो उसको।

ये काम हम अपने उच्चतम आराध्यों के साथ भी कर लेते हैं कि हमें उनकी निजी ज़िन्दगी में घुसना है कि वो क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा है। तुम्हें क्या मतलब है? वहाँ पर सन्त आपको समझा गये हैं — “बूझ लीजिए ज्ञान, जाति न पूछो साधु की।” ज्ञान बूझो न, ज्ञान! तुम्हें क्या मतलब है कि वो कौनसी जाति का है और उसका अतीत क्या है, और क्या चला है, क्या कहानी है उसकी? तुम्हें इससे क्या मतलब है?

“मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान” — पर हमें तलवार से नहीं, म्यान से मतलब होता है। अच्छा, म्यान! लाल है कि पीली है? किसने दी थी? चुराकर तो नहीं लाये? चोर थे क्या? अच्छा, नहीं, चुराये नहीं हो। तो कोई पुराना अफ़ेयर था लगता है, उसी ने तुम्हें ये वैलेंटाइन्स डे पर म्यान दी थी। है न? बताओ, बताओ। वो ज्ञान लेकर बैठा है और तुम म्यान से चिपके हुए हो। वो कह रहा है कि थोड़ा मेरे ज्ञान की बात भी सुन लो, तुम उसी में चिपके हो कि तुम्हारी म्यान लाल-लाल क्यों है। ऐसे हम हैं!

तो ये जो बात होती है न कि किसी के जीवन के बारे में बता दो, मैंने व्यावहारिक तल पर इससे इतना नुक़सान होते देखा है। बड़ा बुरा लगता है। लोग राम से दूर हो जाते हैं, क्यों? क्योंकि कहानी बता दी कि शम्बूक-वध किया था। अब उस कहानी के मारे लोग, राम से जो कुछ सीखा जा सकता है, वो सीखने को तैयार नहीं हैं अब। यहाँ तक कि जो योगवासिष्ठ है, उसको भी पढ़ने को तैयार नहीं हैं। कहते हैं, ‘ये तो राम से बातचीत हुई है, हम नहीं पढ़ेंगे।’ क्योंकि कहानी एक बता दी गयी है, अब कहानी नहीं पसन्द आयी तो फिर आप राम को ही छोड़ दोगे।

और बहुत लोगों को कहानी इतनी पसन्द है, वो सोचते हैं कि हमने दशहरे में रावण जला दिया, जैसा राम की कहानी में था, तो बस हो गया, हम राम-भक्त हो गये। अरे! रावण जलाने से तुम राम-भक्त हो गये क्या? तुममें राम का रामत्व आया है क्या थोड़ा भी? राम के मर्म से तुम्हारा कोई परिचय नहीं! तुम दशहरा में रावण फूँकते हो और बोलते हो ‘जय श्रीराम’, इससे तुममें राम थोड़े ही जग जाएँगे!

तो कहानियों से बचना चाहिए। भारत ने ऐसा कर दिया है जैसे कहानी ही धर्म होती है। हमारे यहाँ पर जिसको धार्मिक काम करना होता है, वो कहता है, ‘ज़रा कथा करवाते हैं अब।’ क्या कर रहे हैं? कथा करवा रहे हैं। कथा का भी महत्व तब है जब पहले तुमको जो मूल सिद्धान्त है, उनकी समझ हो, तब तुम उन मूल सिद्धान्तों के आधार पर उस कथा का वास्तविक अर्थ कर पाओगे। कथा ऐसे होती है जैसे बन्द ताला और वेदान्त होता है चाबी। जब वेदान्त की चाबी लगती है तो कथा का ताला खुलता है, नहीं तो बस वो ताला है इतना भारी। अलीगढ़ का मोटा ताला इतना वज़नी, मारो उसको सिर पर। कुछ नहीं खुलेगा, सिर खुल जाएगा तुम्हारा‌ बस!

वेदान्त पढ़ा नहीं, कथाओं में इतनी रुचि है तो क्या सीखोगे? हाँ, वेदान्त पढ़ने के बाद जब कथाएँ सुनता है व्यक्ति तो कथा भी समझ में आती है कि इस कथा का मर्म क्या है। वेदान्त पहले आता है, कथा बाद में आती है। और बहुत सारी ऐसी भी हैं कथाएँ जिनका कोई मर्म नहीं है, जो बस ऐसे ही हैं, मनोरंजन, इधर-उधर की साधारण बात, उसमें कुछ रखा भी नहीं है। कुछ कथाओं में बहुत मर्म है। वो सब तब पता चले, जब पहले गीता समझ में आयी हो, वेदान्त पढ़ा हो।

प्र: आचार्य जी, इससे एक बात याद आयी मुझे। जब हम विद्यालय में अंग्रेज़ी या हिन्दी साहित्य पढ़ते थे, तो शुरुआत में लेखक की जीवनी आती थी और फिर उनका लेखन।

आचार्य: वो बात घातक हो सकती है, बिलकुल घातक हो सकती है। आप लेखक का नाम देखकर ही बिदक सकते हो। और आप लेखक का देखकर किसी आग्रह से भी ग्रस्त हो सकते हो। कह रहे हैं, ‘नहीं, ये तो! मैं भी ब्राह्मण हूँ, जिसने लिखा है वो भी ब्राह्मण है, तो अच्छा ही लिखा होगा।’ अब उसने कुछ भी लिख रखा है, वो भी अच्छा लगेगा। क्योंकि पढ़ लिया कि फ़लानी जगह के ब्राह्मण थे, तो उसने अब जो भी लिखा है, वो अच्छा ही लगेगा। इस पर तो मैं प्रयोग कर चुका हूँ। तो एक बार मैंने एकदम ही कहीं से बिलकुल कूड़ा-कचरा वक्तव्य उठा लिये, दस-बारह साल पहले की बात होगी। तब रविवार को सुबह-सुबह अपने यहाँ बैठक लगा करती थी। मैंने प्रयोग के लिए एकदम कूड़े-कचरे वक्तव्य उठा लिये, उनके नीचे सब महापुरुषों के नाम लिख दिये। एकदम कूड़ा बात, नीचे महापुरुष का नाम! लोगों को दे दिया, लोगों से कहा, ‘देखिए, अब ये जो बात कही गयी है, इसकी थोड़ी मीमांसा करिए, माने इस पर थोड़ी चर्चा करिए।’ और लोगों ने बड़े दिल से कहा, ‘ये क्या ऊँची बात बोली है! अब्राहम लिंकन की बात है, ख़राब तो हो ही नहीं सकती। और ये बात फ़लाने कवि ने बोली है, ये बात फ़लाने क्रान्तिकारी ने बोली है, ये बात फ़लाने गुरू ने बोली है, ये बात फ़लाने ग्रन्थ में लिखी है तो ये बातें तो ऊँची होंगी ही न!’

और मैं अवाक् उनको देख रहा था। मैं इस उम्मीद में था कि एक-दो लोग तो होंगे। बीस से तीस लोग तब जुटा करते थे, इतने ही होते थे। सुबह-सुबह हमारा छोटा सा वहाँ था, उसमें बीस-तीस लोग बैठते थे दो-तीन घंटे, कई बार पाँच-छः घंटे। किसी को नहीं पकड़ में आया, कोई नहीं आलोचना कर रहा। कुछ भी लिख दो, उसके नीचे विवेकानन्द लिख दो। बहुत बढ़िया बात है! कुछ भी बोल दो, उसके नीचे लिख दो विवेकानन्द। कुछ भी लिख दो, उसके नीचे कृष्ण लिख दो। लोगों को नहीं समझ में आता, लोग बात देखते ही नहीं हैं। हममें ये जैसे क्षमता ही नहीं होती कि हम रूप, नाम, आकार और इतिहास को छोड़कर मर्म तक, सत्य तक पहुँच सकें। हमें किसी भी चीज़ का मूल्यांकन करना है तो हम उसके अतीत, इतिहास, नाम, आधार, सामाजिक प्रतिष्ठा, इन्हीं पर करते हैं।

प्र: एक आध्यात्मिक गुरू थे, जब पहली बार उनको पढ़ा तो अच्छा लगा। बाद में पता लगा कि वो बीड़ी की दुकान चलाते थे।

आचार्य: ये कैसे हो सकता है? एक दुकान नहीं थी उनकी, उनके बहुत सारे छोटे-छोटे खोखे थे। ख़ुद नहीं बैठते थे, लड़के बैठा रखे थे। निसर्गदत्त महाराज। वो अपना घर में बैठते थे। उनसे इधर-उधर के ज़्यादा लोग नहीं, दो-चार मिलने आते थे, उनके साथ वो लगे रहते थे। बहुत लोग कहते हैं, ‘हो ही नहीं सकता, बीड़ी!’ उनका नाम ही पड़ गया था बीड़ी बाबा।

“मोल करो तलवार की, पड़ी रहन दो म्यान।” कोई वजह थी न कि आप उपनिषदों के ऋषियों के बारे में बहुत कहानियाँ पाते ही नहीं। उन्होंने नहीं रखी। कई बार तो उन्होंने श्लोकों पर अपना नाम भी नहीं रखा। इससे वो क्या सन्देश देना चाहते थे? वो कह रहे थे कि हमारा व्यक्तित्व महत्वपूर्ण नहीं है। केयर फ़ॉर माइ मेसेज, नॉट फ़ॉर माइ पर्सनैलिटी (मेरे सन्देश की परवाह करो, न कि मेरे व्यक्तित्व की)। मैं क्या हूँ, मैं कहाँ था, कहाँ नहीं था, मेरा बाप कौन था, मेरी माँ, मेरा पैसा कितना था, कौनसे राजा ने मुझे बैठाया, कहाँ से मैं भगाया गया, कितने साल जिया, मेरी औलादें कितनी थीं, इन बातों से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए।

तो आप वेदों में कई बार एकदम अज्ञात ऋषियों को पाते हो, पता ही नहीं चलता कि ये कहाँ से आ गया, ये कहाँ से बात आ गयी। कई जगह पर पता चल जाता है कि कहाँ से आया, नाम भी दिये जाते हैं, लेकिन बहुत बार नाम नहीं दिये जाते। बहुत बार ऐसा होता है कि नाम दे दिये हैं, लेकिन उसके बारे में कुछ नहीं बताया, बस नाम हैं। अब वो नाम कौन है, कुछ पता नहीं। कई बार नाम ऐसे दे दिये जाते हैं कि नाम तो पता है, लेकिन नाम से कुछ पता नहीं लगेगा।

अब वेद व्यास है। अब वेद व्यास से बताओ क्या पता लगेगा? एक ही वेद व्यास बता दिये जाते हैं। उन्होंने उपनिषद् लिखे। उन्होंने जो पूरा वैदिक भण्डार था, उसके चार हिस्से भी किये। फिर उन्होंने ही ब्रह्म सूत्र, वेदान्त सूत्र लिखे। महाभारत भी उन्हीं की है, तो गीता भी उन्हीं की हो गयी। और फिर कह दिया बाद में आगे जाकर कि पुराण भी अठारह उन्होंने ही लिखे। और अठारह पुराण में माने अगर मुख्य पुराण लो तो चार लाख से ऊपर उसमें श्लोक हैं।

अब एक आदमी कहाँ से चार लाख श्लोक लिख देगा, पहली बात। दूसरी बात, पुराण आये हैं वेदों से हज़ार-हज़ार साल बाद, तो वो एक ही व्यक्ति कैसे हो सकता है? तो भारत ने नाम और परिचय इत्यादि को कोई महत्व ही नहीं दिया। कह दिया, ‘हाँ, वेद व्यास। ठीक है।’ वेद व्यास — एक जेनेरिक (सामान्य) नाम। विद्वान व्यक्ति है तो नाम क्या दे दिया? वेद व्यास। जो ही विद्वान व्यक्ति ये सब काम कर रहा है, उसी का नाम बोल दिया वेद व्यास। कोई एक वेद व्यास थोड़े ही हैं।

समझ में आ रही है बात?

भारत ने इस बात को महत्व नहीं दिया। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कौन कह रहा है, तुम ये देखो न कि क्या कहा जा रहा है। जहाँ से भी चीज़ आ रही है, ले लो। आग चाहे लकड़ी के जलने से उठे और चाहे कागज़ के जलने से उठे और चाहे कपड़े के जलने से उठे, बेटा जलाएगी तो बराबर का ही न। ज्ञान वो आग है। ज्ञान आग है।

और ये नहीं देखते कि आग का ईंधन क्या है, आग जलाती है, इतना काफ़ी है। हो सकता है कि मेरी आग मेरे कपड़ों के जलने से आ रही हो, तुम्हारी आग मिट्टी के तेल के जलने से आ रही हो, इनकी आग कुछ और जलाने से आ रही है। आग तो आग है न! क्या करना है कि किस बात से आ रही है? ज्ञान आग है। ज्ञान की तुलना भी बार-बार वैदिक साहित्य में आग से ही की गयी है। अग्नि ऋग्वेद का प्रमुख देवता है और ज्ञान को अग्नि के समतुल्य रखा गया है। जैसे अग्नि सब जला देता है, शुद्ध कर देता है, वैसे ही ज्ञान का काम है अग्नि की तरह सबकुछ शुद्ध कर देना। कचरा सब जल जाएगा, जो बचेगा वो शुद्ध होगा।

बताओ ज़रा, ये बिजली कहाँ से आ रही है, न्यूक्लियर प्लांट (परमाणु संयन्त्र) से? भारत तो हर तरीक़े से बनाता है। न्यूक्लियर प्लांट से आ रही है, हाइडल (पनबिजली) से आ रही है, कहाँ से आ रही है? कोल (कोयला) से आ रही है? कहाँ से आ रही है, बताओ? विंड टर्बाइन (पवन चक्की) लगे हुए हैं, सोलर एनर्जी (सौर्य ऊर्जा) है, क्या है ये, बताओ? और अभी-अभी पता चला कि ये तो न्यूक्लियर एनर्जी (परमाणु ऊर्जा) से आ रही है तो दिल टूट जाएगा तुम्हारा? या इस प्रकाश पर कोई अन्तर पड़ता है कि ये न्यूक्लियर पावर है या बाँध से आ रहा है या टर्बाइन लगायी है? न्यूक्लियर रिएक्टर से आ रहा है या टर्बाइन से आ रहा है, उससे बिजली पर कोई अन्तर पड़ता है? तो फिर काहे को खोज रहे हो? कोई कमरे में घुसा, रोशनी देखी और कहे, ‘क्या ये विंड एनर्जी है?’ अरे! एनर्जी है, शक्ति, इतना पर्याप्त है। (आचार्य जी कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए) सुधी खोजते नहीं गुणों का आदि, शक्ति का मूल। शक्ति का मूल नहीं खोजा जाता, इतना पर्याप्त होता है कि शक्ति है। कर्ण के बाबत कहा था कि क्यों कर्ण की जाति देखी जाए, क्यों कर्ण का अतीत देखा जाए। कर्ण ज़बरदस्त योद्धा है, इतनी बात काफ़ी होनी चाहिए न। क्यों देख रहे हो कि कर्ण का इतिहास क्या है? पर हम ऐसे ही लोग हैं, हम इतिहास देखते हैं। वो जहाँ भी जाए, उसको बोलें, ‘अरे! सूत पुत्र।’ और वो फनफना जाए कर्ण बिलकुल, कि मुझ जैसा कोई धनुर्धर नहीं, अर्जुन को हराने के लिए मैं तैयार बैठा हूँ, और मैं जहाँ जाता हूँ, तुम बार-बार मेरी जाति देखते हो, जाति देखते हो। यही काम तुमने एकलव्य के साथ किया है। शक्ति का आदि — आदि माने उद्गम, शक्ति कहाँ से आ रही है — और ज्ञान और गुण, इनका मूल क्या है, ये नहीं देखा जाता।

“किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर नमस्य है फूल।”

विपिन माने बगीचा या जंगल। तो किसी वृक्ष पर, किसी डाल पर भी फूल खिला हो, उसको नमन है। मैं ये थोड़ी देखने जाऊँगा कि वो किस मिट्टी से निकल रहा है और उसका इतिहास क्या है और उस पेड़ के नीचे कौन-कौन लोग अतीत में आकर बैठे थे।

सुधी माने जिनको सुध है, जो ज्ञानी हैं, होश वाले लोग। होश वाले लोग ये नहीं देखते कि गुण तो है पर आदि क्या है, पीछे से कहाँ से आ रहा है। घर बता, किस मोहल्ले में रहता है? बाप क्या करता है तेरा? और वो बेचारा अमिताभ बच्चन परेशान! उसके हाथ में लिख दिया था कि मेरा बाप चोर था। ये सुधी न होने की निशानी है, कि तुम देख रहे हो कि इसका बाप क्या करता था। क्या करना है इससे कि क्या करता था बाप?

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग में प्रशस्ति करतब अपना दिखला के।

मैं किस जाति, किस गोत्र का हूँ, इससे नहीं सम्मान निर्धारित हो जाता तेज वालों का। तुम दिखाओ न कि तुम कौन हो और अपना कर्म दिखाओ, वो बात है। तुम्हारा इतिहास क्या है, इससे हमें क्या लेना है।

जगत पीछे की ओर देखता है, कहता है कि तुम्हारा मूल हीन है। मूल माने जहाँ से पीछे से आ रहे हो।

हीन मूल की ओर देख जग ग़लत कहे या ठीक, वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।

अब लोग कुछ भी, जगत कुछ भी बोले कि तुम्हारा मूल पीछे से, तुम्हारा ये नहीं ठीक है, वो नहीं ठीक है, तुमने पढ़ाई इतनी की है, तुम पहले पचास चीज़ों में असफल हुए हो, कितनी भी बातें बोली जाती हैं। दुनिया बोलती रहे, अब अतीत से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

तो उसके लिए कह रहे हैं —

सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्भुत वीर।

माँ का दूध भी नहीं पिया, क्षीर माने दूध — माँ का दूध भी नहीं पिया और एक साधारण घर में उसकी परवरिश हुई, क्या फ़र्क़ पड़ा? आग को कब तक कोई चीज़ दबाकर रखेगी? जो चीज़ आग को दबाकर रखती है, अगर आग दमदार है तो आग उसको भी जला देगी। आग में दम हो और तुम आग पर जाकर कम्बल डालो तो आग क्या करेगी? कम्बल को भी खाकर और प्रज्वलित हो जाएगी।

अर्जुन को जब चुनौती दी तो अर्जुन के गुरू लोग घबरा गये। बोले, ‘ये जिस तरीक़े से कर रहा है और जितना ये ज़बरदस्त लग रहा है!’ अर्जुन को चुनौती देने से पहले वो जो राजपुत्रों की सभा हुई थी जहाँ सब कह रहे थे, ‘अब शिक्षा हो गयी है, अब हम प्रजा को दिखाने आये हैं कि हमने क्या सीखा है।’ तो सब अपना-अपना अस्त्रबल दिखा रहे थे। तो वहीं पर कर्ण भी पहुँच गये। तो कर्ण ने भी अपना कौशल दिखा दिया कि लो, ये देखो, ये मेरी देह है, ये मेरा बल है और ऐसा मेरा अस्त्र संचालन है। और फिर ये करके अर्जुन को ललकारा कि अर्जुन, अब आ जा मुक़ाबले में सामने, तुम भी दिखाओ। तो अर्जुन के गुरू लोग घबरा गये।

द्वंद्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा

उसने माने कर्ण ने। तो अब अपना पूरा प्रदर्शन कर दिया प्रतिभा का और फिर पार्थ को ललकारा।

द्वंद्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, अर्जुन को चुप ही रहने का गुरू ने किया इशारा।

कि बेटा, अभी इस वक़्त चुप ही रह जाओ। वो इस वक़्त उफनते साँड की तरह है, सामने मत जाना उसके।

कृपाचार्य ने कहा, ‘सुनो हे वीर युवक अनजान’, भरत-वंश-अवतंस पाण्डु की अर्जुन है सन्तान।

देखो, किधर को मोड़ दी बात, कि कौन किसका सन्तान है!

क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यूँही नहीं लड़ेगा, जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा? अर्जुन से लड़ना हो तो मत रहो सभा में मौन, नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?

तो अब सुनो ये जो इसमें अब अन्त की पंक्तियाँ आएँगी दो। ये मेरा सौभाग्य था कि मैं एकदम जब जवान हो ही रहा था तभी ये सब मुझे मिल भी गया और मुझे पसन्द भी आ गया।

‘जाति! हाय री जाति!’ कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला, कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला ‘जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाखंड, मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड।’

ये रही जाति (आचार्य जी अपनी भुजाओं को दिखाते हुए)! ‘अर्जुन, ये मेरी जाति है, अपनी जाति दिखा अब।’ अब ठीक है, अब तो ऐसा थोड़ा! कहोगे कि इससे और ज़्यादा बहुत ऊँची बातें बोली गयी हैं, अभी हम अष्टावक्र के साथ हैं। पर जब किसी पन्द्रह-सोलह साल के लड़के को ये पंक्तियाँ मिलती हैं और वो उत्तर प्रदेश में रहा है जहाँ उसने जाति का ही सब गन्दा, घिनौना खेल देखा है चारों तरफ़, तब ये जो पंक्ति है न, वो बिलकुल भीतर आग लगा देती है। मैं क्या जानूँ जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड। ये है जाति (आचार्य जी पुनः अपनी भुजाओं को दिखाते हुए)!

और तब आप कहते हो कि यही है। एक ही जाति होती है, क्या? बल। और बल विकसित करो अपने भीतर। दो ही जातियाँ होती हैं, ये चतुर वर्ण वगैरह कुछ नहीं है। दो जाति होती है — एक सबल, एक दुर्बल। तुम देखो कि तुम्हारी जाति क्या है। हमारी संस्था इस अर्थ में बड़ी जातिवादी है। यहाँ दुर्बल नहीं चलते बेटा! समझ में आ रही है बात? पैफ़ प्राइड ! (पैफ़ — प्रशांत अद्वैत फ़ाउंडेशन)

हम दिल से खेलते हैं, आत्मा हमारी जाति है। कबीर साहब ने कहा था, बहुत उनका सुन्दर था। उनसे किसी ने पूछा कि जाति बताओ। बोले, ‘आत्मा जाति है, ब्रह्म गोत्र है।’ किसी ने जाति पूछा तो बोले, ‘आत्मा जाति है, ब्रह्म गोत्र है। आगे और कुछ पूछना है?’ शायद ऐसे कहा था कि जात अजात है। अजात माने आत्मा, जिसका कभी जन्म नहीं होता। कह रहे हैं, ‘क्या जात है?’ बोले, ‘अजात है, यही जात है हमारी।’ गोत्र क्या है? ‘ब्रह्म।’ बोले, ‘क्या ब्राह्मण हो?’ बोले, ‘नहीं, ब्रह्म हैं।’ नहीं, नहीं, पूरा बोलो। ब्राह्मण हो? ‘ब्रह्म हैं। तुम तो ब्राह्मण ही रह गये, हम तो ब्रह्म हैं।’

और सुनो। मुझे रोमांच हो रहा है इसको पढ़ने में ही, सब याद आ रहा है।

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से रवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से

रवि माने सूर्य। ये जो मेरा ललाट है जिसमें सूर्य जैसी प्रदीप्ति है, चमक है, इससे पूछो न मेरी जाति, ये बताएगा। रवि समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से। ये जो मैं यहाँ पर खड़ा हो गया हूँ अपने कवच-कुण्डल पहनकर युद्ध में वीर की तरह, ये मेरी जाति है।

पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प्रकाश, मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।

मेरा इतिहास जानना है न? मैं मेरा इतिहास हूँ। मेरा वर्तमान देखो — मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।

लोगों के ताने आते हैं, कहते हैं, ‘ये, इसे आचार्य कौन बोल रहा है, ये किसी गुरू परम्परा से तो आता नहीं।’ अरे! हटाओ परम्परा। बोले, ‘बताओ तुम्हारा गुरू कौन है?’ आत्मा। गुरुओं का गुरू हमारा गुरू है। तुमने दीक्षा किससे ली है? ब्रह्म से। कोई समस्या? बोलते हैं, ‘नहीं, नहीं, ऐसे थोड़ी होता है। किसी आश्रम जाओ, ये सब जो परम्पराएँ चलती हैं और जो समुदाय चलते हैं, वहाँ पर जाकर जो गुरुजी लोग बैठे हैं, वो तुमको गीता का जो अर्थ बतायें, वो आगे बताना।’ मैं कह रहा हूँ कि मैं गीता का शुद्ध अर्थ तुमको बताता इसलिए हूँ, क्योंकि मैंने सीधे कृष्ण से पूछा है। कृष्ण माने आत्मा।

किसी इंसान से अगर गीता का मैंने भी अर्थ ले लिया होता, तो मैं भी आज आपको गीता के विकृत अर्थ ही बता रहा होता, जैसे चारों तरफ़ गीता के उल्टे-पुल्टे अर्थ फैला दिये गए हैं। मैंने भी किसी इंसान से ही दीक्षा ली होती तो मैं भी आपको उल्टे-पुल्टे ही अर्थ बता रहा होता। मैं आपको सही अर्थ बता ही इसलिए पाता हूँ, क्योंकि मैं किसी परम्परा से नहीं आता हूँ। आ रही है बात समझ में? परम्परा से आता तो परम्पराओं की सारी खोंट लेकर आता।

अर्जुन को लक्ष्य करके कहा —

अभी छीन इस राजपुत्र के कर से तीर-कमान, अपनी महाजाति की दूँगा मैं तुमको पहचान।

कर माने हाथ। ये जो राजपुत्र तुमने ऊपर बैठा रखा है ऊँची जाति वाला — अभी छीन इस राजपुत्र के कर से तीर-कमान, अपनी महाजाति की दूँगा मैं तुमको पहचान — जब ये तुम्हारा जो अर्जुन है, इससे मैं इसका तीर-कमान सब छीन लूँगा न, तब तुम्हें मेरी महाजाति पता चलेगी।

तो ये सब मत पूछो कि कौनसी परम्परा है, कौन तुम्हारा गुरू है। जो हमारा गुरू है, वो तुम्हारे लिए अदृश्य है। न तुम्हारा उससे कोई परिचय है, न तुम उसे कभी पहचान पाओगे। तो बार-बार इस सवाल को उठाने से कोई लाभ नहीं कि ये कैसे आ गया वेदान्त पढ़ाने, इसका गुरू कौन है और इसको दीक्षा किसने दी है, और कौनसे मठ से, कौनसे आश्रम से, कौनसी परम्परा से आया है।

कहीं से नहीं आये। कहीं से आते तो जहाँ से आते वहाँ की सारी गन्दगी ले आते। आत्मा कहीं से आती है? अजात है न वो? हाँ। मौलिक का क्या अर्थ होता है? आत्मा मूल है और मौलिक माने होता है ओरिजिनल। बस! वो कहीं से आता थोड़ी है, किसी पर आश्रित थोड़ी होता है, किसी से ग्रहण थोड़ी किया होता है।

आ रही है बात समझ में?

श्रोता: आचार्य जी, जो अभी आपने जाति के बारे में बताया या कहानियों के बारे में, उसको थोड़ा और भी मैं देख रहा था कि ये कहाँ तक जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, इस्लाम में फ़िल्में देखना भी मना है, फ़िल्में भी नहीं पता होनी चाहिए।

फिर मुझे एमडीटी के दिन याद आते हैं, मिथ डेमोलिशन टूअर। हम आपके पैम्फ़्लेट लेकर लोगों के पास जाया करते थे, तो अंग्रेज़ बोलते थे कि दिस कैन नॉट बी अ स्पिरिचुअल मैन (ये एक आध्यात्मिक आदमी नहीं हो सकता)। ये हमें अजीब सा लगता था। फिर हमें इसकी वजह पता चली। आमतौर पर जो तथाकथित आध्यात्मिक आदमी होते हैं, उनकी छवि है कि वो मुस्कुरा रहे हैं या उनकी आँखें एक विशेष तरीक़े की हैं। ये बताने का मेरा मतलब ये है कि कहानियाँ कहाँ-कहाँ तक जा सकती हैं।

प्र२: आचार्य जी, मेरा एक प्रश्न था। हमने बुल्लेशाह के काफ़िये पर आज चर्चा की — माटी कुदम करेंदी यार, वाह-वाह माटी दी गुलज़ार। कृष्णमूर्ति जी ने भी बोला है कि हैव यू एवर सीन अ ट्री (क्या तुमने कभी कोई वृक्ष देखा है)। यहाँ जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति और परा-प्रकृति, सब प्रकृति ही हैं, तो बाबा बुल्लेशाह या कृष्णमूर्ति जी के कथन को पढ़ने का जो (विस्मय) था, वो रहा नहीं।

आचार्य: हम ऑड (अभिभूत) उसी चीज़ से अनुभव करते हैं जो हमें समझ में न आये न। ये हमने भी एक बड़ी ग़लत ट्रेनिंग , संस्कार पकड़ लिया है। जो कुछ हमें विचित्र, अद्भुत लगता है, अपने बोध से आगे का, जो समझ में न आये, वो बढ़िया है। अगर कोई संस्कृत का श्लोक सुना दे, एकदम समझ में नहीं आया तो आप ऑड नहीं, ओवरऑड हो जाओगे। कहोगे, ‘ये क्या बोल दिया!’ और बोला भले उसने कालिदास के नाटक से कोई संवाद हो! पर आपको लगेगा कि बड़ी कोई गहरी आध्यात्मिक बात बोल दी है।

तो ये हमने ट्रेनिंग पा ली है, ख़ासतौर पर भारत में, कि जो चीज़ समझ में न आये, हमको लगता है कि वो बड़ी ऊँची, बड़ी अच्छी, बड़ी महान है। संस्कृत से उस बात का बड़ा सम्बन्ध है। आपको किसी को प्रभावित करना हो, दबाना हो, धाराप्रवाह संस्कृत में उसे दो श्लोक मार दीजिए। वो बच्चू कहीं का नहीं रहेगा, तड़पता नज़र आएगा। आप दो घंटे बहस करके उसको क्या हरा पाते, दो श्लोक मारिए संस्कृत के। भले ही उसका कुछ-का-कुछ अर्थ हो, कोई लेना-देना नहीं कि अर्थ कुछ है भी कि नहीं है। लेकिन एकदम धराशायी हो जाएगा।

हमसे बहस करेगा!

प्र२: मेरा कहने का मतलब था कि जो बुल्लेशाह कहते हैं, “माटी कुदम करेंदी यार, वाह-वाह माटी दी गुलज़ार”, इसको पढ़ने का जो था एक, वो रहा नहीं जब अष्टावक्र कहते हैं कि प्रकृति या परा-प्रकृति, सभी प्रकृति हैं।

आचार्य: नहीं, कृष्ण कहते हैं ये। समझो न इस बात को। आपको ये पूछना पड़ेगा कि वो क्यों आया जब आप उसको पूरी तरह समझते ही नहीं थे तो। ये बात समझिए कि हमारा जो आन्तरिक सिस्टम है, वो संस्कारों ने गड़बड़ कर दिया है। अगर मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो मैं उससे प्रभावित कैसे हो सकता हूँ? मैं उसके प्रति जिज्ञासु तो हो सकता हूँ, लेकिन उससे प्रभावित कैसे हो सकता हूँ? मैं ये कैसे कह सकता हूँ, ‘वाह, वाह, वाह!’ का तो मतलब होता है अद्भुत, आश्चर्य, अनूठा, विस्मय। ये सब शब्द, ये भाव निहित हैं शब्द में। तो कैसे आ गयी जब आप समझे ही नहीं अभी तक तो? पर हम ऐसे ही होते हैं।

पूरी दुनिया में ऐसे ही तो घूम रहे हैं। जो चीज़ समझ में नहीं आती है पर बड़ी-बड़ी दिखायी देती है, हमें लगता है — वाह! का अगर चित्रण किया जाए, का अगर कोई चेहरा हो तो का चेहरा ऐसा होता है (आचार्य जी अभिभूत हुआ सा चेहरा बनाते हुए)! और हमारा चेहरा हमेशा ऐसा ही रहता है। इस चेहरे का क्या नाम है? ऑ।

कोई बड़ी गाड़ी दिख गयी — ऑ! कोई दिख गया जो स्मार्ट या सेक्सी है — ! अरे! कुछ ऐसा दिख रहा है जो भले ही प्रभावशाली है पर समझ में तो आया नहीं, तो जाकर समझेंगे न। समझेंगे न? अब ये भी तो हो सकता है कि वो जिस बड़ी गाड़ी में जा रहा है, उसने गुटखा बेचकर कमायी हो, पर तुम तो गाड़ी देखकर ही एकदम प्रभावित हो जाते हो। ‘अभी एक रोल्स रॉयस का हुआ है।’ ये भी तो देखो कि वो पैसा आया कहाँ से है। क्यों आ गयी? अपनेआप को पकड़ने की कोशिश करिए। ये एक अच्छी साधना है कि किस तरह से आप उन चीज़ों से प्रभावित हो रहे हैं जिनको आप समझते भी नहीं हैं कि वहाँ मामला क्या है।

किसी से मिलने कोई बड़ा आदमी चला गया, किसी अनजान आदमी से मिलने कोई बड़ा आदमी चला गया। आप कहते हैं, ‘ये अनजान आदमी ज़रूर बढ़िया ही होगा, देखो इससे मिलने कौन आया है।’ आप क्या ये पता करते हो कि वो जो मिलने आया है, वो क्यों मिलने आया है? कहीं उसमें कोई योजना तो नहीं? बस जल्दी से आपका क्या हो जाता है? ! अरे, थोड़ी जिज्ञासा भी कर लिया करो। ये दिमाग चलाने के लिए ही मिला है। जैसे पाँव न चलाओ तो पाँव की माँसपेशियाँ क्या हो जाती हैं? कमज़ोर हो जाती हैं। वैसे ही दिमाग न चलाने से हमारे दिमाग की माँसपेशियाँ सब कमज़ोर हो गयी हैं।

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