गुरु का परिचय उसका प्रभाव है; गुरु कोई पदवी नहीं है। गुरु वो हैं, जिनके होने से शांति, समझ और रोशनी आती हो। बुद्धि का भरपूर प्रयोग करो। किसी भी बात को बस आँख मूँदकर, हाथ जोड़कर स्वीकार मत कर लो कि, "गुरु जी कह रहे हैं तो ठीक ही होगी।" खासतौर पर उन जगहों से बचना जहाँ विज्ञान-विरुद्ध और अंधविश्वास से भरी हुई बातें की जाती हों। जहाँ डर हटने लगे, जहाँ मन से ईर्ष्या, संदेह, तमाम तरह की बेचैनियाँ हटने लगें, समझ लेना वह जगह तुम्हारे लिए ठीक है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारत अध्यात्म की राजधानी है और वहाँ इतने सारे आध्यात्मिक गुरु हैं। फिर भी भारत में इतनी परेशानियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं। पहली बात तो अध्यात्म संख्या का खेल नहीं है कि सौ या पाँच-सौ गुरु हो गए तो ज़्यादा संतोषजनक स्थिति हो जाएगी। यहाँ पर 'इनपुट इज़ प्रपोर्शनल टू आउटपुट' (इनपुट आउटपुट के लिए आनुपातिक है) नहीं चलता। फैक्ट्रियों में ऐसा होता है कि पाँच मशीनें और लगा दीं तो आउटपुट बढ़ जाता है। अध्यात्म में ऐसा नहीं होता कि पाँच गुरु और लगा दिए तो आनंद बढ़ जाएगा या मुक्तजनों की तादाद और बढ़ जाएगी। ऐसा नहीं है।
एक काफ़ी होता है।
मानवता के इतिहास को अगर आप देखेंगे, तो आप नहीं पाएँगे कि कभी-भी ऐसा हुआ हो कि एक ही समय में और एक ही जगह पर १००-२०० ज्ञानी गुरु घूम रहे हों। कितने गुरु हैं, यहाँ मत गिनिऐ।




