आचार्य जी, आपके भीतर इतना जज़्बा आता कहाँ से है? || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: सर, प्रणाम! आपका पुराना छात्र हूँ। दो-हज़ार-दस से आपको सुन रहा हूँ, देख रहा हूँ। आप नहीं बदले, सब बदल गया। ज़माना बदल गया! आपके भीतर इतना जज़्बा आता कहाँ से है?
आचार्य प्रशांत: मुझे तो नहीं पता चलता कि मुझमें कोई जज़्बा है। तुमने कहा, ‘इतना जज़्बा! विशेष जज़्बा!’ मुझे तो कोई साधारण जज़्बा भी पता वगैरह नहीं चलता है। हाँ, कोई अनूठे ही मौके हों, तो बात अलग है। अभी तुमने सवाल भेजा है, तुमसे बात कर रहा हूँ। कोई विशेष मौका ये है नहीं मेरे लिये। जब इस सत्र में बैठता हूँ तुम्हारे सामने आकर के, तो मेरे लिए खास बात बस इतनी ही होती है कि कुर्ता पहन लेता हूँ और बालों में कंघी कर लेता हूँ। इसके अलावा तो सबकुछ वैसा ही है, सरल! सहज! इस क्षण में, जैसा कि अभी से एक घंटे पहले था या तीन घंटे पहले था या पाँच घंटे पहले था।
अभी दो घंटे पहले मैं खाना बना रहा था, वैसे ही बना रहा था जैसे तुम्हारे सवाल का जवाब दे रहा हूँ। कोई खास जज़्बा न मैं तब दिखा रहा था, न मैं अब दिखा रहा हूँ। या अगर मैं कोई खास जज़्बा अभी दिखा रहा हूँ, तो उतना ही खास जज़्बा में दो घंटे पहले भी दिखा रहा था। खाना बनाते वक्त भी ऐसा तो कोई भाव था नहीं कि कोई बहुत विशेष मौका है, कोई बहुत खास काम हो रहा है। और इस वक़्त भी जब तुम्हारे सामने बैठा हूँ तो ऐसा तो मुझे कोई एहसास या तनाव नहीं है कि मैं कोई बहुत विशेष काम कर रहा हूँ।
हाँ, कुछ बातें होती हैं जीवन सम्बन्धित, समय सम्बन्धित, उनका खयाल रखना पड़ता है क्योंकि इंसान हूँ, तो समय सीमित है। तो उस वक्त भी ये खयाल रख रहा था कि भई, जो भी खाना-पीना है, नौ-सवा-नौ तक निपटा दो। आज सत्र है! और आज सत्र जल्दी शुरू करना है क्योंकि आज बारह बजे से टीवी पर प्रसारण आएगा। उसी तरीके से अभी भी तुमसे बात कर रहा हूँ, तो समय का थोड़ा अहसास है।
लेकिन उससे ज़्यादा तो कोई ऐसा जज़्बा नहीं। न अभी है, न पिछले दस सालों में ही किसी सत्र में रहा है। बाकी ये है कि कोई अनूठा ही सवाल आ गया, कोई बिलकुल अद्भुत ही प्रश्नकर्ता मिल गया, तो फिर जज़्बा भी खास उमड़ने-घुमड़ने लग जाता है। पर उस खास जज़्बे का कारण ये मौका नहीं होता, उस खास जज़्बे का कारण ये सवाल-जवाब की प्रक्रिया नहीं होती है। वो तो ऐसा है कि कोई साहब मिल गये जो एकदम ही विशिष्ट थे, तो हमें भी जज़्बा आ गया।



