संस्था में स्वंयसेवियों का जीवन कैसा है? || आचार्य प्रशांत, केदारनाथ यात्रा पर (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं आपके द्वारा लोगों को लाभ पाता देखता हूँ। इस शिविर में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो लाभान्वित हुए हैं, और अपनी कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं और साथ में संस्था के जो स्वयं सेवक हैं उनके कार्य को भी देखता हूँ, तो मेरा अपना भी योगदान देने की इच्छा होती है, और फिर खुद भी स्वयं आपके साथ रहूँगा तो लाभान्वित हो पाऊँगा।
परन्तु कुछ सवाल भी दिमाग में आता है कि जो स्वयंसेवी होंगे, वो खुद आर्थिक रूप से भी स्वावलम्बी हो सकते हैं कि नहीं। दूसरा ये है कि यदि वो सामाजिक समाज में भी रहते हैं तो समाज में सब तरीके के कार्य तो नहीं कर रहे हैं जो आमतौर पर लोग करते हैं, तो उनके मन में अपने प्रति क्या धारणा बनती है? क्या वो अपनेआप को कम समझने लगते हैं या ज़्यादा समझने लगते हैं कि हम कैसे काम कर रहे हैं। और इसके अलावा क्या स्वयं वो जो है ये स्वयंसेवी का आजीवन प्रक्रिया है या ये एक शॉर्टटर्म ट्रेनिंग (लघु अवधि-प्रशिक्षण) के जैसी है?
आचार्य प्रशांत: पहली ही चीज़ तुमने पूछा कि क्या आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हैं सब, जितने स्वयंसेवी हैं, वॉलेंटियर्स हैं। खर्चे कम हैं, लोगों के जिन चीज़ों में बड़े खर्चे हो जाते हैं वो यहाँ पर कोई करता ही नहीं। खर्चे कम हैं। अध्यात्म अक्ल तो दे ही देता है न, बुद्धि का शोधन कर देता है। तो ब्रांड के पीछे नहीं भागते, विकेंड पर जाकर के शराब में और मनोरंजन, मस्तीखोरी में पैसा नहीं उड़ाते, इन चीज़ों में बहुत पैसा लगता है। वो पैसा जब नहीं व्यय होता तो एक औसत सी आमदनी में भी मज़े में स्वावलम्बन हो जाता है।
वास्तव में मुझे उत्तर यहाँ से देना चाहिए था कि जितना महत्वपूर्ण पैसा किसी आम कर्मचारी के लिए, एम्प्लॉई के लिए होता है; उतना महत्वपूर्ण यहाँ पैसा है नहीं। पैसे की अपनी उपयोगिता तो है ही, कपड़े-लत्ते के लिए चाहिए, आने-जाने के लिए। उतना रहता है सबके पास। फाउंडेशन है, दुनिया भर में सेवा करती है तो जो आन्तरिक लोग हैं उनकी भी कुछ सेवा कर ही देती है।



