क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मेरा नाम शैलेश है। परिप्रेक्ष्य यह है कि पिछले 15–20 सालों से अलग-अलग स्तरों से, जो आप तीन स्तर बताए, तो उसमें दो स्तरों से तो गुज़रा हूँ।
इसमें जो आज बात हुई है, उसमें दो-तीन चीज़ें मुझे बहुत समान लगीं, जो जे. कृष्णमूर्ति ने भी बोला कि "ट्रुथ इज़ अ पाथलेस लैंड।" जो अभी आपने बोला, वही चीज़ इसमें भी दिखाई दे रही है। क्योंकि पाथ तो विषय ही है। तो अगर विषय है, तो कोई path हो नहीं सकता। और दूसरा, जो आपने बोला कि बंधनों में जो स्वार्थ है, उसको देखो। वह वही बात है, जो बुद्ध ने बोला था कि कामना को देखो। वहीं पर वार करो, और वहीं से ही आएगा।
एक बहुत समय से जो मेरे दिमाग़ में चल रहा था, क्योंकि क्रिया योग वग़ैरह किया था मैंने। और मुझे हमेशा यह लगता था कि कबीर का जो भजन है, "निर्भय निर्गुण," उसमें एक-दो पंक्तियाँ आती हैं कि "इंगला, पिंगला, सुखमनी नाड़ी।" तो मुझे लगता था कि उन्होंने किया ऐसा। तो वह बेसिकली एक लेवल था, जिसके ऊपर मैं सोच रहा था। लेकिन आज यह लगा कि विषयों से जो संबंध है, वह भी अगर आप बना रहे हो, तो वह ख़ुद को देखने का विकल्प हो सकता है या ख़ुद को देखने का आईना हो सकता है, बिल्कुल। तो यह बात पूरी समझ में आई आज।










