अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”। और अहं की दृष्टि में जो छोटे हैं उनसे तारीफ़ लेने में मज़ा क्या है। वह कुछ ख़ास नहीं। जो ऊँचे से ऊँचा हो, उससे तारीफ़ मिलनी चाहिये। तो अहंकार सबको निशाना बनाता है। अहंकार इससे तारीफ़ माँगता है, अहंकार उससे तारीफ़ माँगता है। जिससे ना मिले, उसी को अपना दुश्मन बना लेता है। और अंततः अहंकार गुरु से भी मान्यता चाहता ही चाहता है, गुरु से भी प्रशंसा चाहता ही चाहता है। ये जो अहं की आग है, इसमें गुरु को भी वो जला ही डालता है।
“अहं अगनि हिरदै जरै, गुरु सो चाहै मान”
वो गुरु को भी नहीं बख्शेगा। गुरु ने भी अगर कह दिया कि तुझमें कुछ कमी थी, तो वो गुरु को भी जला देगा। ठीक वैसे ही जैसे वो सारे संसार को जलाने के लिए तत्पर है, वैसे ही वो गुरु को भी जला देगा। गुरु भी तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वो तुम्हें अनुमोदन देता रहे कि बहुत अच्छे थे, बहुत बढ़िया। जिस क्षण गुरु भी तथ्य रख दे सामने कि आँखें बंद हैं तुम्हारी और पागल हो, नींद में चल रहे हो, बेहोशी में नाच रहे हो, तुम गुरु को भी नहीं बख्शोगे। क्योंकि गुरु कितना भी बड़ा हो, तुम्हारे अहंकार से छोटा ही है। गुरु कितना भी बड़ा हो, वो सिर्फ एक साधन की तरह है, तुम्हारी अहंता को बढ़ाने के लिये। मैं कौन? जिसकी ‘अ’ ने तारीफ़ की, ‘ब’ ने तारीफ़ की, ‘स’ ने तारीफ़ की और जिसकी गुरु ने भी तारीफ़ की। अब ये तुम्हारे ऊपर बड़ा धब्बा है कि ‘अ’ ने तारीफ़ की, ‘ब’ ने तारीफ़ की, ‘स’ ने तारीफ़ की लेकिन गुरु ने नहीं की। ऐसे गुरु को तो तुम जला ही दोगे अपने अहंकार की आग में। और कोई और न तुम्हारी प्रशंसा कर रहा हो, तब गुरु भी ना करे, तो चल जायेगा। पर उसी गुरु ने तुम्हारी ऊँगली पकड़ कर तुम्हें ऐसा बना दिया है कि दो-चार लोग तुम्हारी वाह-वाही करने लगे हैं। गुरु स्वयं नहीं कर रहा अभी क्योंकि उसे दिख रहा है कि तुम कहीं के नहीं हो। पर तब गुरु तुम्हें बहुत अखरेगा। आँख में रेत की तरह चुभेगा वो। हत्या भी कर सकते हो क्योंकि वो आखिरी है जो तुमको अहंकार के शीर्ष पर जाने से रोके हुए है।


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