अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?

Acharya Prashant

16 min
543 reads
अध्यात्म, विज्ञान और संविधान: किससे मिलेगी सच्ची स्वतंत्रता?
आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा नाम पूजा है। आचार्य जी, मैं गीता सत्रों से तीन सालों से जुड़ी हुई हूँ और जब मैं आपको सुनती हूँ और आपकी बातों को लोगों तक लेकर जाती हूँ, तो उनके काफ़ी सारे सवाल होते हैं। जैसे मेरे भी मन में कुछ तर्क उठते हैं। उन्हीं तर्कों का जवाब जानने के लिए मैंने कई बार प्रयास भी किया आपसे सवाल पूछने का, पर हिम्मत नहीं हुई है। आज अवसर मिला है मुझे। तो क्या मैं अब वो दो-तीन सवाल रख सकती हूँ, आचार्य जी?

आचार्य प्रशांत: वैसे ही हैं सब?

प्रश्नकर्ता: जी, उनमें से कुछ फ़ॉलो-अप सवाल हैं आचार्य जी, इसमें सर, मेरा एक सवाल था। जैसे कहते हैं आप आध्यात्म को सबसे ऊपर रखने की बात करते हैं और आप कहते हैं कि आध्यात्म जो है वो विज्ञान और संविधान से भी ऊपर है। पर हम देखते हैं कि जो विज्ञान हमें सच्चाई के द्वारा उसे जानने का अवसर प्रदान करता है।

आचार्य प्रशांत: सच्चाई के द्वारा सच को जानने का अवसर।

प्रश्नकर्ता: जी, सच का अवसर प्रदान करता है। और संविधान हमें अधिकार देता है। पर आध्यात्म में ऐसा क्या अधिकार है, जो इन दोनों से ऊपर है?

आचार्य प्रशांत: अपने प्रश्न का उत्तर विज्ञान से माँगो। जब विज्ञान से इस प्रश्न का उत्तर न मिले, तो संविधान से माँगो, जाओ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक और सवाल।

आचार्य प्रशांत: पहले समझ में आई बात? एक और कहाँ जा रहे हो?

आपका जो प्रश्न है, वो जिस आयाम का है वहाँ विज्ञान और संविधान जाते ही नहीं और यह उनका दोष नहीं है। ये उनकी कमी नहीं है, ये उनकी परिभाषा है। संविधान आपसे नहीं कहेगा कि तुम्हारा जीवन तभी सार्थक है, जब तुम आंतरिक रूप से मुक्त हो जाओ। इतना तो साफ़-साफ़ समझाया था। लगभग कविता कर दी थी, कि

दूसरे तुम्हारा शोषण न करें, इसके लिए संविधान है और तुम ख़ुद अपना शोषण न करो, इसके लिए अध्यात्म है।

संविधान यही तो करेगा कि तुम्हें मौलिक अधिकार दे देगा। हाँ। सत्ता के जितने स्तंभ होते हैं, उन सब की सीमाएँ निर्धारित कर देगा। यही सब तो करेगा। ठीक? नागरिक के इतने अधिकार हैं, सरकार के इतने अधिकार हैं। नागरिक चाहे तो न्यायपालिका के पास जा सकता है और सरकार भी अगर नागरिक के प्रति कार्रवाई करना चाहती है, तो उसे भी न्यायपालिका के माध्यम से ही करनी पड़ेगी। ये सब बातें हैं, जो संविधान में आपको मिल जाती हैं।

एक नागरिक दूसरे नागरिक के ऊपर चढ़ नहीं सकता, एक नागरिक को दूसरे नागरिक से समान अधिकार ही मिलेंगे। नागरिक तो नागरिक, सरकार भी नहीं चढ़ सकती आपके ऊपर। सरकार भी आपका शोषण करे, तो आप कोर्ट जा सकते हो। ये सब काम संविधान आपके लिए बख़ूबी कर देता है। और बहुत सुंदर संविधान है हमारा। इसी संविधान के पक्ष में बार-बार बोलने के कारण न जाने कितने लोग मुझसे बहुत ख़फ़ा हैं। कि ये, वो चाहते हैं कि संविधान ही बदल डालें। और जब मैं कहता हूँ, हमारा संविधान तो पहले ही बहुत दुरुस्त है, इसको बदलोगे क्या तुम? तो नाराज़ हो जाते हैं।

मैं संविधान के पक्ष में बोलता हूँ, लेकिन सीमाएँ जानता हूँ भाई उसकी। बहुत ख़ूबसूरत कार हो सकती है, रोल्स-रॉयस, पर उड़ेगी थोड़ी। मैं उसकी तारीफ़ करूँगा, पर उसकी सीमाएँ जानता हूँ। और संविधान ने अपनी सीमाएँ स्वयं निर्धारित करी हैं। संविधान सामाजिक क्षेत्र का है। संविधान राजनीतिक क्षेत्र का है। संविधान आपको आर्थिक अधिकार भी देता है। पर आपके भीतर क्या चल रहा है, संविधान को इससे…। आप डिप्रेशन के शिकार हो। क्योंकि आपने ख़ुद ही अपनी ज़िंदगी में उल्टे-पुल्टे चुनाव कर लिए। न्यायपालिका आपकी मदद नहीं कर सकती। संविधान इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर पाएगा। हाँ, इसमें उपनिषद् आपकी मदद कर देंगे। बात समझ में आ रही है?

और चूँकि दूसरे हमारे दुश्मन बाद में होते हैं, हम पहले अपने दुश्मन स्वयं होते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि संविधान तो निश्चित रूप से आपका मित्र है, पर उससे भी आपका बड़ा जो मित्र है वो अध्यात्म है। कारण बहुत सीधा है, आप ख़ुद अपने सबसे बड़े दुश्मन हैं। तो इसीलिए आपको अपना सबसे बड़ा मित्र भी वो चाहिए जो आपसे आपकी बात करे। मैं कौन हूँ? बात समझ में आई?

यही बात विज्ञान पर भी लागू होती है। अब मैं अंधविश्वासियों को लताड़ता हूँ, तो लोग नाराज़ हैं। मैं बार-बार विज्ञान के गुण गाता हूँ, तो लोग नाराज़ हैं। और यहाँ आप मुझ पर इल्ज़ाम ये लगा रहे हो कि आप विज्ञान को नीचा क्यों मानते हो? पहले तय कर लो, मैं नीचा मानता हूँ कि ऊँचा मानता हूँ। इधर वाले मुझसे नाराज़ हैं कि हर समय इतनी तार्किक और वैज्ञानिक बात क्यों करता रहता है? वो मुझे नाम देते हैं, द रेशनल स्पिरिचुअलिस्ट। और इधर वाले मुझसे नाराज़ हैं। कह रहे हैं, ये विज्ञान को नीचा मानता है अध्यात्म से। पहले तय कर लो कि नीचा मानता हूँ कि ऊँचा मानता हूँ। न नीचा मानता हूँ, न ऊँचा मानता हूँ, मैं उसे उसकी सही जगह देता हूँ।

विज्ञान की सही जगह यहाँ (बाहर) है। यहाँ की दुनिया में क्या होना चाहिए? विज्ञान। और यहाँ (अपने भीतर) की दुनिया में क्या होना चाहिए?

श्रोता: ज्ञान।

आचार्य प्रशांत: विज्ञान आपको नहीं बता पाएगा कि आप जिसके इश्क़ में बावले हुए जा रहे हो, वो ज़हरीला है आपके लिए। कोई साइंटिफिक टेस्ट नहीं है आपको ये बताने के लिए। पर यह बात आपको अध्यात्म बता सकता है, आपको आत्म-अवलोकन के लिए प्रेरित करके। साइंस नहीं बता पाएगा और संविधान तो बस ये कह देगा, हाँ, हमने तुम्हें हक़ दिया है। अपने हिसाब से अपना साथी चुन लो। तुम अगर गधहवे को भी अपना साथी बना रहे हो, तो संविधान आपत्ति नहीं करेगा। तुम इसको…कहाँ गया? यार, तुम उसको जुदा मत किया करो। कहाँ है? लेकर आओ उसको। ये (गधहवा) है।

आप इसको लेकर के जाएँ कोर्ट के पास और कहें कि इसे ब्याहना है, तो कोर्ट आपके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करेगा और आप इसको ब्याह सकते हो। संविधान आपको नहीं रोकेगा इसको ब्याहने से। देखो, कितना ख़ुश है। बोलो, आई लव यू। संविधान आपत्ति नहीं करेगा, जाओ कर लो ब्याह। पर उपनिषद् आपसे पूछेंगे, तुम कौन हो और क्या बनकर इससे रिश्ता बना रहे हो? कौन-सी रिक्तता है और अपूर्णता है तुम्हारे भीतर, जो तुम्हें लग रहा है कि ये पूरी कर देगा? यह प्रश्न आपसे संविधान नहीं पूछेगा, उपनिषद् पूछेंगे। ये मूल्य है उपनिषदों का और इसमें मैं संविधान को नीचा नहीं दिखा रहा। हमारा संविधान बहुत ऊँचा है और बहुत सुंदर है। मैं बस आपको संविधान ने अपने लिए जो जगह निर्धारित करी है, वो जगह बता रहा हूँ। संविधान की जगह यहाँ की दुनिया में है, दिल की दुनिया में नहीं है। बात आ रही है समझ में?

इसी तरह से विज्ञान से पूछोगे कि इससे शादी करूँ कि नहीं करूँ? तो विज्ञान बस इतना कहेगा कि देख लो, इसको एड्स वग़ैरह तो नहीं है। हो भी सकता है, देखो, कैसे हिल रहा है। इसका ये अश्लील तरीके से हिलना ही बता रहा है, इसे कुछ भी हो सकता है। यतेंद्र जी, पता नहीं क्या समझ लेते हैं हर बार मैं सीधे-साधे तरीके से इतनी सीधी बात कह रहा हूँ। ये बेचारा काँप रहा है, इसे बुखार है। आपने क्या देख लिया?

तो आप विज्ञान से पूछेंगे कि इसको ब्याहूँ कि नहीं ब्याहूँ? तो विज्ञान तो बस यही कहेगा कि इसकी बीमारियाँ वग़ैरह देख लो। लोग विज्ञान भी आपसे पूछने नहीं आएगा कि प्यार है कि नहीं है, उपनिषद् पूछेंगे। ये अंतर है।

विज्ञान में आकर्षण होता है। विज्ञान ऑक्सीटोसिन की बात कर लेगा, डोपामिन की बात कर लेगा, *टेस्टोस्टेरोन# की बात कर लेगा, एड्रेनालिन की बात कर लेगा। लेकिन विज्ञान प्रेम की बात नहीं कर सकता, क्योंकि प्रेम रासायनिक नहीं होता, हार्मोनल नहीं होता। विज्ञान आपसे पूछ ही नहीं पाएगा कि प्रेम है कि नहीं है। हाँ, विज्ञान ये पूछ सकता है कि स्टिमुलेशन है, एक्साइटमेंट है, ये सब पूछ सकता है, क्योंकि वो सब बातें विज्ञान की परिधि में आती हैं। प्रेम नहीं आता।

तो विज्ञान की सीमाएँ हैं। संविधान की भी सीमाएँ हैं। यहाँ जो है, उन सीमाओं के बाहर है। वहाँ कौन पहुँचता है? वहाँ अध्यात्म पहुँचता है, वहाँ आत्म-जिज्ञासा पहुँचती है। आ रही है बात समझ में? इनमें मैं ये नहीं कह रहा कि कोई ऊपर है, कोई नीचे है, इनके अपने-अपने क्षेत्र हैं। जो काम विज्ञान का है, वो काम अध्यात्म नहीं कर सकता। आप बीमार हुए हो उसमें अध्यात्म कुछ नहीं कर लेगा। आपको वायरस लग गया है। अध्यात्म क्या करे अब इसमें? वायरस लग गया है, तो जाओ। उसका कुछ इलाज कराओ, वो डॉक्टर करेगा, विज्ञान करेगा।

कोरोना के समय पर लोग आते, बोलते थे कि वो मंत्र मारकर कोरोना ठीक हो जाएगा। गंगाजल, गौमूत्र और बहुत सारी चरणामृत पी कर पंचगव्य से कोरोना ठीक हो जाएगा। और तब भी मुझ पर बहुत नाराज़ हुए कि बोल रहे हैं कि नहीं, ऐसे नहीं ठीक होता। अरे नहीं होता, भाई। मंत्रों से कोरोना नहीं ठीक होगा। वो जगह विज्ञान की है, वहाँ अध्यात्म कुछ नहीं कर सकता। जो जगह जिसकी है, वो जगह देना सीखो। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक सवाल और था मेरा। पूछ सकती हूँ? सवाल था मेरा गुरु और उनकी निर्भरता पर। आचार्य जी, आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, पर लोग कहते हैं कि जो आपके अनुयायी हैं वो आप पर ही निर्भर हैं, आपकी बातों पर ही निर्भर हैं। उन्हें कहीं भी कोई व्याख्या देनी होती है तो वो आप पर निर्भर हो जाते हैं। तो आचार्य जी, ये स्वतंत्रता है या निर्भरता है? क्या सही गुरु वो नहीं होना चाहिए, जो अपने शिष्य को भी स्वतंत्र कर दें?

आचार्य प्रशांत: अरे, मैं स्वतंत्र तो अभी कर दूँ, पर मेरे स्वतंत्र करने से वो स्वतंत्र नहीं होने वाले। वो वहीं जाकर परतंत्र हो जाएँगे जहाँ वो पहले परतंत्र थे।

अभी गीता परीक्षा में आपको एक विकल्प दिया था, रवींद्रनाथ ठाकुर का था कि मिट्टी से स्वतंत्र हो जाना वृक्ष के लिए आज़ादी नहीं होती, मौत होती है। डॉक्टर यहाँ बैठे हैं। कौन-कौन डॉक्टर हैं, ज़रा उठाइएगा हाथ। बाप रे, इतने सारे। चलो, ठीक। तो इनके मरीजों को इनकी दवाइयों से स्वतंत्र क्यों नहीं कर देती आप? इनके मरीज क्यों आश्रित हैं इनकी दवाइयों पर? बोलो, नहीं होना चाहिए। डॉक्टर हाय-हाय! डॉक्टर हाय-हाय! डॉक्टर हाय-हाय! मैं फ्री थिंकर हूँ। मुझे जो मन में आएगा, मैं खाऊँगा। मैं तुम्हारी दवाई क्यों खाऊँ? मैं तुम पर डिपेंडेंट क्यों हो जाऊँ कि जो तुमने प्रिस्क्राइब करा है, मैं वही खाऊँगा। डॉक्टर हाय-हाय! ये डॉक्टर अथॉरिटी बनकर हमको मेंटली एन्स्लेव कर रहा है। मैं तेरी बताई दवाई क्यों खाऊँ? डॉक्टर हाय-हाय!

अगर तुम स्वस्थ होते, तो डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन भी नहीं देता। मरीज के लिए दवाई छोड़ना आज़ादी की बात नहीं होती है, पागलपन होता है। पर जब अहंकार ये मानने को तैयार ही न हो कि वो मरीज है, तो वो दवाई को भी फिर बंधन कहेगा। कुल मिलाकर के दावा ये है कि मैं जैसा हूँ, ठीक हूँ। मुझे दवाई क्यों दे रहे हो? तुम्हारी दवाई नहीं है। ये दवाई तुम्हारी तानाशाही का सबूत है। तुम चिकित्सक नहीं हो, तुम हुक्मरान हो। मैं नहीं ले रहा तुम्हारा प्रिस्क्रिप्शन। चलो, सब मिलकर के सामूहिक दहन करते हैं प्रिस्क्रिप्शन्स का। अपने-अपने प्रिस्क्रिप्शन लेकर आओ। सब मिलकर आग लगाते हैं।

क्योंकि ये डॉक्टर कौन होता है बताने वाला कि मेरे मुँह के अंदर क्या जाएगा और कितने बजे जाएगा और कितना जाएगा? मेरी मर्ज़ी। तू दवाई का पूरा डब्बा ले आ। मैं पूरी अभी खाऊँगा। एक तो ये बता रहा है क्या खाना है। दूसरे, बता रहा है कब खाना है, ऊपर से यह भी बता रहा है कितना खाना है। इससे बड़ी ग़ुलामी कोई हो सकती है? ऐसी ग़ुलामी सर पर रखिए। पलकों पर लेकर चलिए ऐसी ग़ुलामी। यही वो ग़ुलामी है, जो आज़ाद कर देगी। कोई डॉक्टर नहीं चाहता कि उसका प्रिस्क्रिप्शन अनंत काल के लिए चले। बात आ रही है समझ में?

और फिर मैं प्रश्नकर्ता की ओर। “आपके छात्र स्वतंत्र नहीं हैं।” आपको कैसे पता? आपको कैसे पता? और ये जो आप 1500 लोगों के बीच खड़े होकर दावा कर रही हैं, अगर इन्होंने अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन कर दिया, तो? ये कैसा दावा है? और ये नई चीज़ चल रही है कि आचार्य जी तो ठीक हैं, पर उनके छात्र जो हैं वो एकदम ही…, आप जानो, देख लो, बोल रहे हैं, आचार्य जी के छात्र, इन्हें समझ में नहीं आता है, ये बस रटी-रटाई बातें बोलते रहते हैं। आप देख लो, आप पर आक्षेप है। आपको उसका क्या जवाब देना है? अरे, अगर रटी-रटाई बातें भी बोल रहे होते तो परीक्षा में इतने कम नंबर पाते, ये तो रट भी नहीं पा रहे।

अब मैं सुनने में थोड़ा पारंपरिक गुरु जैसा लगूँगा। लेकिन आपने पूछा है, तो बोल लेने दो, क्योंकि इस भाषा में मैं आमतौर पर बोलता नहीं हूँ। गुरु पर जो सचमुच पूरी तरह आश्रित हो जाए, वो अपनी आश्रयता में ही आज़ाद हो जाता है। तो आप जो इल्ज़ाम लगा रही हैं, स्थिति उसकी बल्कि उल्टी है। ये सब दो नहीं, पाँच-पाँच, दस-दस नावों पर सवार लोग हैं। कई तो ऋषिकेश आए हैं, तो लगे हाथ मौक़े का फ़ायदा उठाकर लोकधर्म के अड्डे भी घुमे होंगे। कईयों ने, जो आए भी नहीं यहाँ पर, वो कम्युनिटी में लिख रहे हैं कि जितने लोग ऋषिकेश गए हैं, मैं उनको बताना चाहता हूँ, फलानी जगह फलाने बाबा का अड्डा है वहाँ ज़रूर जाना, और लिंक भी भेजा है।

और बस यही है कि वह अभी मैं बोल रहा हूँ, तो देख भी नहीं पा रहे होंगे, क्योंकि ऐसा लिंक जैसे ही आता है, हमारी एक बैठी हुई है, एकदम विचित्र टीम। वो तुरंत इजेक्ट का बटन दबाती है। डिलीट नहीं, इजेक्ट। इजेक्ट समझते हो न? अगर अगला जन्म कुछ होता है, तो तब मुलाक़ात होगी। आप लोग भी अपने व्यवहार का ध्यान रखा करो कम्युनिटी पर। कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाएगा, बस वह बटन दब जाएगा। कुछ नहीं तो दो-चार सौ लोग रहे होंगे, जो यहाँ आना चाहते थे, उपस्थित नहीं हैं। और संस्था ने उन्हें कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाएगा। कुछ नहीं बताएँगे।

समझना चाहते हो कि तुम्हें क्यों नहीं आने दिया गया, तो अपना व्यवहार देख लो, परीक्षाओं के नंबर देख लो। पोस्ट्स में क्या लिख रहे हो, ये सब देख लो। हम तुम्हें बताने नहीं आएँगे कि संस्था ने तुम्हें वर्जित क्यों कर दिया या संस्था ने तुम्हें निकाल क्यों दिया। अपने बर्ताव का ख़याल रखो। हम अकाउंटेबल नहीं हैं। और इतना हमारे पास समय भी नहीं है कि लाख-डेढ़ लाख लोगों में एक-एक व्यक्ति को जाकर बताएँ कि देखो, तुम जो लिख रहे हो, उसमें ग़लत क्या है। तुम जो लिख रहे हो, उसमें क्या हानिकारक है और विषैला है, तुम ख़ुद देखो।

तुम कोई प्रश्न पूछ रहे हो, तुम कोई आपत्ति कर रहे हो। तुम कोई इल्ज़ाम लगा रहे हो। अरे, दे तो दिया फ़्रेमवर्क। पहले वहाँ जाकर पूछ लो। तुम कहीं किसी बाबा की, किसी गुरु की कोई कोटेशन लाकर के डाल रहे हो, उसको भी फ़्रेमवर्क से गुज़ार लो। फ़्रेमवर्क ख़ुद ही उसकी धज्जियाँ उड़ा देगा। उल्टे तुम वो सब लाकर के कम्युनिटी पर डाल रहे हो। कम्युनिटी में ज़हर घोल रहे हो। उसके बाद तुम कहते हो, अरे, पर मुझे ऋषिकेश क्यों नहीं आने दिया? ताकि तुम यहाँ आकर के जो बैठे हैं, उनके सम्मुख खड़े होकर के ज़हर घोलो। अभी तो कम्युनिटी पर ही कर रहे थे, वर्चुअली। अब फ़िज़िकली भी करना चाहते हो। नहीं करने देंगे, नहीं आने देंगे। ठीक कर रहे हैं न?

आपको कुछ बोल थोड़ी रहा हूँ। लेकिन देखो, बात में एक कोण से दम है। ये जो गंदी आदत पकड़ी है न कि मेरे ही वाक्यों को दोहरा देते हो। ये आदत बाहर जाकर भी प्रदर्शित करते होगे। जब रिफ़्लेक्शन लिखने का समय आता है, तो मैंने जो बोला है, वही शब्दशः उठाकर चिपका देते हो। तो यही काम बाहर जाकर भी कर आए होंगे। अपने रिश्तेदारों के पास कर आए होंगे। कहीं और कर आए होंगे या कि यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर ऐसा कर दिया होगा। तो लोगों को फिर तोहमत लगाने का मौक़ा मिल गया कि गीता छात्र तो जितने हैं, ये आचार्य जी का ही शब्द बस दोहराते रहते हैं।

थोड़ा सतर्क रहो। हम जो काम कर रहे हैं न, वो बहुत नायाब है, बहुत अनूठा है और हर आदमी उस पर कीचड़ उछालने को बेताब है। बाहर जाकर जो कुछ भी करते हो, यह ध्यान रहे कि मेरे प्रतिनिधि हो। ध्यान रहे कि कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से नहीं पढ़ रहा है। तुम्हारे नाम के माध्यम से मुझे देखा जा रहा है। छात्र ही शिक्षक की पहचान होते हैं। होते हैं न?

आप ही अगर बाहर जाकर के नकलची जैसा व्यवहार करोगे या दब्बू जैसा व्यवहार करोगे, तो यही माना जाएगा कि ये देखो, ये होता है आचार्य जी की पाठशाला में। ये जो प्रश्न है, यह हमारे लिए ख़तरे की घंटी है। दुनिया में जहाँ भी जाओ, वहाँ पर मशाल की तरह जलो। राख और धुआँ उड़ाकर मत आ जाओ बस। आपके नाम के साथ मेरा नाम जुड़ा हुआ है, ये स्मरण है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories