आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा नाम पूजा है। आचार्य जी, मैं गीता सत्रों से तीन सालों से जुड़ी हुई हूँ और जब मैं आपको सुनती हूँ और आपकी बातों को लोगों तक लेकर जाती हूँ, तो उनके काफ़ी सारे सवाल होते हैं। जैसे मेरे भी मन में कुछ तर्क उठते हैं। उन्हीं तर्कों का जवाब जानने के लिए मैंने कई बार प्रयास भी किया आपसे सवाल पूछने का, पर हिम्मत नहीं हुई है। आज अवसर मिला है मुझे। तो क्या मैं अब वो दो-तीन सवाल रख सकती हूँ, आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: वैसे ही हैं सब?
प्रश्नकर्ता: जी, उनमें से कुछ फ़ॉलो-अप सवाल हैं आचार्य जी, इसमें सर, मेरा एक सवाल था। जैसे कहते हैं आप आध्यात्म को सबसे ऊपर रखने की बात करते हैं और आप कहते हैं कि आध्यात्म जो है वो विज्ञान और संविधान से भी ऊपर है। पर हम देखते हैं कि जो विज्ञान हमें सच्चाई के द्वारा उसे जानने का अवसर प्रदान करता है।
आचार्य प्रशांत: सच्चाई के द्वारा सच को जानने का अवसर।




