प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली सीख ले। आप कितना भी बोल लो कि आप किसी फ़िज़िकल (भौतिक) गुरु को डिवोटेड (समर्पित) हो, वगैरह-वगैरह। लेकिन आप चौबीसों घंटे उसी का स्मरण थोड़े ही कर रहे हो।
तो जो सीखने वाला कार्यक्रम होता है वो हमेशा बहुत सारे लोगों, बहुत सारी परिस्थितियों, और बहुत सारी घटनाओं वगैरह को शामिल करके चलता है। उसमें ये हो सकता है कि पन्द्रह-बीस-पचास तरीके के फैक्टर्स (तथ्य) शामिल हैं। तो उनमें कोई एक फैक्टर सेन्ट्रल लगे, या कि कोई एक फैक्टर बाकी सारे फैक्टर्स का कारण लगे।
लेकिन ऐसा कभी भी नहीं होता कि कोई किसी एक इंसान से ही सीख रहा है, ऐसा कुछ हो रहा है। तो पचासों फैक्टर्स सबके लिए होते हैं। किसी के में ये हो सकता है कि किसी एक व्यक्ति की प्रधानता हो जाए, कोई एक व्यक्ति है व्यक्ति केन्द्रिय हो जाए।
और किसी के में ऐसा भी हो सकता है — दूसरे छोर पर — कि उसमें कोई विशेष व्यक्ति शामिल ही न हो। विशेष व्यक्ति शामिल ही न हो। उसमें बहुत सारे छोटे-छोटे व्यक्तियों के छोटे-छोटे रोल हों। हम सीखने की बात कर रहे हैं कि जो शिष्य गुरु से सीखता है वो प्रक्रिया क्या है।
सीखने की आपमें एक कैपेबिलिटी (क्षमता) आती है सुनने की, तो ऐसा थोड़े ही होता है कि आप किसी एक आदमी को ही सुन पाओगे, या एक जगह से ही सीख पाओगे।




