
बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?








कोई आपसे बोले कि कोई आदमी आपसे मिलने आ रहा है और वो धार्मिक है, तो तत्काल बताइए, आप क्या कल्पना करते हैं? कोई ज्ञानी आ रहा है? कोई विद्वान मिलने आ रहा है? तत्काल मन में क्या छवि आती है? एक भावुक-सा आदमी आएगा। यही हमारे साथ सबसे बड़ी गलत बात हुई, हम भावना का देश बन गए, और उसी भावना को फिर हमने धर्म भी बना लिया। और भावना से जो धर्म चलता है, वो फिर अंधभक्ति का धर्म होता है। यही दुर्भाग्य हो गया भारत का, ज्ञान का कोई सम्मान नहीं। जबकि धर्म का अर्थ ही ज्ञान होता है।






आपको सचमुच बुरा, लोगों की जान गई इससे लग रहा है; सचमुच? और अगर जानों का जाना ही इतना बुरा लगता है तो जो सबसे बड़ा नरसंहार है, वह तो नारी-संहार है; वहाँ सवाल क्यों नहीं पूछते? या ऐसा है कि एक पक्ष मज़हबी उन्माद फैला रहा है, तो पलट कर हमें भी फैलाना है? उनसे निपटने के लिए हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, पूरी एक सभ्य, सुसंस्कृत व्यवस्था है, जो उनसे निपट लेगी। जो अपराध कर रहे हैं, उनसे निपटने के लिए उन्हीं जैसा मत बन जाना। रावण को हराने के लिए राम, और राम हो गए। रावण को हराने के लिए राम रावण थोड़ी बन गए थे।


आप जब सोशल ओपननेस की बात आती है तब भी पीछे हो, और जब साइंटिफ़िक रिगर की बात आती है तब भी पीछे हो। और दोनों में आपके पिछड़े होने का कारण एक ही है — दर्शन का अभाव। और ये बात मुझे बहुत चुभती है क्योंकि पश्चिम में दर्शन ने जितनी भी ऊँचाई पाई है, उससे बहुत-बहुत-बहुत ज़्यादा ऊँचाई भारतीय दर्शन में मौजूद है।


प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, भारत अब कोरोना महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या में चौथे स्थान पर आ चुका है। अमेरिका लंबे समय से सबसे ऊपर, पहले स्थान पर है ही। भारत और अमेरिका दोनों ही जनतंत्र की मिसाल माने जाते हैं। अमेरिका सबसे शक्तिशाली जनतंत्र, और भारत सबसे बड़ा जनतंत्र।…

ख़ुद को मज़बूत बनाओ, दूसरे की शिकायत करने से क्या लाभ है। दूसरे तो दूसरे हैं, अपने हिसाब से काम करेंगे।




ऋग्वेद का नासदीय-सूक्त — "सृष्टि से पहले क्या था?” सब कुछ अचानक कहाँ से प्रकट हो गया? फिर यही श्लोक आगे कहता है कि "ये बातें लगता है सिर्फ़ परमात्मा को पता होंगी," और आगे पूछता है, "लेकिन उसको भी पता है क्या?” भारत इसलिए महान है! जब बहुत आसान था डर और अज्ञान के कारण विश्वास कर लेना — भारत ने सवाल उठाए। भारत जानना चाहता था, बोध की तरफ़ बड़ा गहरा झुकाव था, इसलिए भारत महान है। भारत को महान कहने में अगर रुचि रखते हो, तो ख़ुद महान बनो — तुमसे ही है भारत की महानता।




बच्चे के भीतर ये भाव होना चाहिए कि जो मुझे ये दे रहा है इसलिए दे रहा है, क्योंकि ये मेरा हक़ है। मुझे भीख नहीं दी जा रही है, हक़ दिया जा रहा है। और जैसे ही उसको ये आ जाएगा ना कि माई-बाप सरकार है। मेरे माई-बाप मुझे दाल-चावल नहीं दे पाए पर देखो, स्कूल आता हूँ, तो सरकार मुझे दाना-पानी दे देती है। तो फिर उसका सर झुक जाएगा। ये जो रीढ़ है ना, इसका सीधा रहना, तने रहना बहुत ज़रूरी होता है।

सच्चाई के लिए जब प्रेम होता है, सफाई के लिए जब प्रेम होता है तो आदमी फिर गंदगी के तथ्य को नकारता नहीं है वो कहता है हम देख पा रहे हैं कि बहुत गंदगी है। साफ करेंगे। बच्चे हों या बड़े हों सबको समझाना पड़ेगा कि विविधता एक बात होती है विविधता को विषमता मत बनाओ। दो अलग हैं इसका मतलब ये नहीं है कि उनमें से एक श्रेष्ठ है, एक हीन है। और अगर कुछ श्रेष्ठ कुछ हीन तुम्हें लग भी रहा है तो पहले देखो कि क्यों लग रहा है? श्रेष्ठता और हीनता का आधार बता दो?

भारत का विभाजन हुआ था राजनीतिक तौर पर। मोहम्मद अली जिन्ना का यही तर्क था। वो कहते थे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें नहीं हैं, ये दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। कहते थे कि ये लोग बिल्कुल अलग-अलग हैं। और चूँकि ये अलग-अलग राष्ट्र हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग राज्य भी बना देना चाहिए।" तो राष्ट्र किस आधार पर? चुन लिया कि धर्म के आधार पर हम चुनेंगे। और जो आप कह रहे हैं कि जड़ उसकी — यही लड़ाई है — आज तक।





पहले क्रांति मन में आती है। फिर समाज पर छाती है और हमारे मन की क्रांति को,जो हमने धर्म के विकृत संस्करण पकड़ रखे हैं। उस क्रांति को कुचल दिया है उसने। भारत का धर्म मूलतः बोध का धर्म है। जानने का वैदिक धर्म कहते हैं ना अपना हम, हां तो वेदांत जानने का दर्शन है जानो जानो बोधो अहम्, मैं सिर्फ बोध प्राप्त नहीं करता मैं बोध ही हूँ ये है हमारा असली धर्म लेकिन कालचक्र में हमने इस धर्म को मानने का विश्वास का धर्म बना दिया आस्था।

इसको गीता ऐसे बोलती है कि जब काम दिल से निकलता है न, दिल से, वहाँ पर बात चलती है, बोध, अंडरस्टैंडिंग, आत्म-ज्ञान। मैं उसको दिल बोल रहा हूँ। काम जब दिल से निकलता है तो उसका अंजाम क्या होगा, इसकी परवाह बहुत कम हो जाती है। क्योंकि दिली काम कर रहे हैं न अब अंजाम परिणाम फिक्र ही नहीं है, फुरसत नहीं है सच पूछो तो। फुरसत नहीं है कि कौन समय लगाये और कौन परेशान हो की अब, आगे क्या हो।






प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार। मेरा सवाल भारत देश के बारे में है कि मैं ये चीज़ नहीं देख पा रहा, अगर भारत आज से अपनी भाषा हिंदी और संस्कृति से जुड़ता है तो कैसे अन्य देशों के साथ कम्पीट (प्रतियोगिता) कर सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुम क्या करते हो, जिसमें…





आचार्य प्रशांत: पहला सवाल, यूरोपियन दार्शनिक जाँ जाक रूसो का प्रसिद्ध कथन है- “मनुष्य मुक्त पैदा होता है किन्तु हर जगह वह बेड़ियों में जकड़ा हुआ है (मेन इज़ बोर्न फ्री, बट एवरीवेयर ही इज़ इन चेन्स)” कृपया इसको समझायें।
भारत की और पश्चिम की दृष्टि अलग रही है। पश्चिम…

आचार्य प्रशांत: इस तरह की व्यर्थ बातें प्रचलन में इसीलिए रह जाती हैं क्योंकि हिन्दू धर्म और भारतीय गौरव के नाम पर हम इनको कभी ख़ारिज नहीं करते।
जिसको जितना होता है, उतना पूरा नहीं लग रहा। हर आदमी अपनी चादर थोड़ा और फैलाना चाहता है, बस यही बात है। साधारण-सी चीज़ है कामना, कामना पूरी करने के लिए अगर इधर-उधर के तरीकों का इस्तेमाल करना पड़े, तो आदमी कर लेता है। उसमें दो चीज़ें होती हैं, एक तो जो आपकी व्यवस्था है या तो वो इतनी साफ़, सही और सख़्त हो कि वो गुंजाइश ही न छोड़े अवैध या अनैतिक तरीकों की, तो भी भ्रष्टाचार नहीं होगा।
भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं। जैसे भारतवासी आज के हैं, आज का भारत भी वैसा ही होगा। यहाँ हवा गंदी है, क्योंकि भीतर से हम गंदे हैं। सड़कों पर गड्ढे हैं, क्योंकि हम गड्ढे हैं। बाहर जो कुछ होता है, वो आपके भीतरी जगत का प्रतिबिंब होता है, एक अर्थ में। इंसान जगेगा, तो ये नज़ारा बदलेगा। जो तुम्हारी वास्तविक हालत है, उसको आँखें खोल करके देखो। उसको देख लोगे, तो फिर उससे आगे निकलने का रास्ता मिल जाएगा।
टोटल जीडीपी हमारा इसलिए हाई नहीं है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत है और मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है। इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों। न वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए।
लोगों को लगता है, संविधान तो हमारा दुनिया के बाकी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है; नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है। जिस देश के केंद्र में आत्मा हो, वहाँ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी अपने आप आ जाती हैं। फ्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है, देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्व देता है। भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार है, ऊँचा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए।
सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है।
“क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।
भाषा तो उतनी ही सशक्त हो पाएगी, जितने शक्तिशाली उसको बोलने वाले लोग हैं। हिंदी नहीं पीछे हट गई है; हिंदी बोलने वाले सब कायर हैं। इनको अपनी हस्ती पर ही शंका होनी शुरू हो जाती है, जब सामने कोई अंग्रेज़ी बोल देता है। विचार और चेतना के तल पर ऊँचे स्तर की सामग्री सब आपको अंग्रेज़ी में मिलेगी, और हिंदी हमने छोड़ दी है गाली-गलौज करने वालों और रोस्टर्स के हाथों में। ये बीमारी अब छोटे-छोटे कस्बों में, गाँवों में भी पहुँच रही है। अंग्रेज़ी सीखना एक बात है, अंग्रेज बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है ना।
अब सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दौर है; बहुत ही व्यर्थ तरीक़े का राष्ट्रवाद। आज जो जितना ज़्यादा अज्ञानी है, वो उतनी ऐंठ में घूम रहा है। एक बहुत अनपढ़ क़िस्म की भीड़ है, जो भारत के राष्ट्रीय जीवन पर छाती जा रही है। गंदी आदतें जगह बदलने से छूट नहीं जातीं। बाहर हिंदुस्तान को इज़्ज़त भी ख़ूब मिली है, पर बाहर उन भारतीयों को इज़्ज़त मिली है जो इज़्ज़त पाने के लायक़ हैं। जो वहाँ पर जाकर गंदगी मचाएँगे, उनको थोड़ी इज़्ज़त दे देंगे? हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम दोबारा हर क्षेत्र में दुनिया में चमकें। पर वो सब करना ध्यान और श्रम का काम है, नारेबाज़ी का काम नहीं है।
राष्ट्रों का निर्माण किसी समाज की परिष्कृत बुद्धिमत्ता से होना चाहिए था, लेकिन वे सामूहिक अहंकार का दर्पण बन जाते हैं। व्यक्ति जो अपनी संपत्ति के साथ करता है, राष्ट्र वही GDP के साथ करता है—जो गिना और तुलना किया जा सके, उसे योग्यता का प्रमाण मान लेता है। हम इसे समझदारी कहते हैं, फिर आश्चर्य करते हैं कि व्यक्ति और देश दोनों सदा घिरे हुए क्यों महसूस करते हैं, मानो विश्राम करना निषिद्ध हो।
पहले भी कई बार चेतावनी दी गई थी। इंस्पेक्शन हुआ था गवर्नमेंट एजेंसी से, तो उनको बोला गया था कि भाई, ये सब ठीक करो; उन्होंने ठीक नहीं किया। रेगुलेशंस का उल्लंघन हुआ है, और उसके बाद जो वहाँ चल रहा था, वह बस बेहोशी का समाँ है, उसमें कुछ भी करो। हमारा कोई भी उत्सव हो, समारोह हो, उसका मतलब ही यही होता है कि चेतना को और गिरा दो। हमारे मन में यह बात डाल किसने दी कि सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन? फिर उसी का एक एक्सट्रीम रूप हमें देखने को मिलता है; ये जो पच्चीस-पचास मौतें हो गईं।
60–65% शेयर है इंडिगो का। आप इंडिगो को सज़ा दे दो, आप बोल दो ‘कल से इंडिगो की उड़ानें बंद,’ तो भारत की दो-तिहाई उड़ानें बंद हो जाएँगी। कौन-सी रेगुलेटरी अथॉरिटी अब इंडिगो को सज़ा दे सकती है? फ्लाइट कैंसल हो गई, तो जो पैसेंजर्स थे, उन्होंने क्रांति कर दी; ऐसे होती हैं क्रांतियाँ? जब जीवन में गीता आती है न, तो जीवन में गरिमा आती है। फिर इंसान कहता है कि ‘मैं आकाश हूँ। मुझे धरती पर ये तिलचट्टा और केंचुआ क्यों बनाया जा रहा है? मुझे मिट्टी में क्यों गाड़ा जा रहा है?’ फिर उठती है क्रांति, भीतर से।
अर्थशास्त्र का साधारण-सा सिद्धांत है कि ग्रोथ और डेवलपमेंट एक चीज़ नहीं होते। जीडीपी माने बाहरी तरक़्क़ी: सड़क बन गई, फ़ैक्ट्रियाँ ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं, इन सब से जीडीपी बढ़ता है। लेकिन यह अपने-आप में अंत नहीं हो सकता, वह सब तभी तक अच्छा है जब तक उससे इंसान को लाभ हो रहा हो। और इंसान को लाभ हो रहा है कि नहीं, यह जानने के लिए इंसान को पहले यह पता करना पड़ेगा कि वह है कौन? ख़ुद को जानना विकास की दिशा में पहला कदम है। राष्ट्र के विकास का सबसे अच्छा तरीका है, राष्ट्र के लोगों को भीतरी तल पर बेहतर बनाना।
भारत का संविधान एक बहुत सुंदर फूल है, लेकिन वह जिस पेड़ पर लगा है, वह धर्म का पेड़ है। जो मूल्य भारत के संविधान में निहित है, वह दुनिया के ऊँचे से ऊँचे मूल्यों में है। बाहर की दुनिया में हमें वह सब कुछ चाहिए जो हमें संविधान देता है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय; वह सारे अधिकार जो एक मुक्त नागरिक के एक मुक्त समाज में होने चाहिए। लेकिन साथ ही साथ हमें वह सब चाहिए जो हमें भीतर से भी तृप्ति देगा: उपनिषद्, भगवद्गीता। हमें दोनों चाहिए।
तुमने विश्वकप उठाया है, और उसके साथ सदियों से झुके हुए करोड़ों सिरों को भी। ऐसी जीतें मैदान की सीमाओं से आगे जाती हैं, वे दिखाती हैं कि जब तुम आदिम भूमिकाएँ लाँघती हो, तो क्या संभव हो जाता है। मैदान पर बना हर रन, उस रण की याद दिलाए जो स्त्री आज भी हार रही है। मैदान पर लगा हर चौका, उस चौके की याद दिलाए जो रसोई से ज़्यादा जेल है। गेंद तो सीमा रेखा पार कर गई, पर याद रखना कोई अभी भी सीमा में ही कैद है।
ये एक ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस है, हमारा राज्य बिहार। वो बच्चा मर रहा है वहाँ पर, वो औरत मर रही है वहाँ पर, वो युवा बेरोज़गार खड़ा है वहाँ पर; जिस बात का महत्त्व है, वो बात करो ना। आपको बिहार के चुनाव में शिक्षा की बात कितनी दिखाई दे रही है? हमें एक ज़मीनी क्रांति चाहिए, बिहार को नेता से बहुत-बहुत पहले शिक्षक चाहिए। श्रीकृष्ण को नेता बोलोगे क्या? गीता समझा रहे हैं — हज़ार नेता उनके पीछे पैदा हो जाएँगे, और वो सब क़ाबिल निकलेंगे।
किसी भी समुदाय की अपनी भाषा में उतनी ही निष्ठा होगी, जितना उसके भीतर अपनी हस्ती के प्रति आत्मविश्वास होगा। भारत की पहचान रहा है — धर्म; जीवन के प्रति समझ और गहराई। मूल पहचान के साथ संस्कृति का अटूट रिश्ता होता है और भाषा संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। जितना एक भारतीय में धर्म के प्रति विश्वास होगा, उतने ही विश्वास से वह अपनी भाषा के साथ खड़ा हो पाएगा। यदि धर्म के प्रति अपमान-भाव पैदा होगा तो भाषा नहीं टिकेगी।
जैसा उपनिषद् के ऋषि उसे चाहते थे, वैसा होना चाहिए, सच्चा भारतीय युवा — ज्ञानी, साहसी, निडर, मज़बूत। ऋषियों को पता था कि अगर उपनिषद् के साथ रहोगे तो कोई कमज़ोरी तुम्हें नहीं पकड़ेगी। जिसके पास ज्ञान और जिज्ञासा है, वो कभी कमज़ोर पड़ नहीं सकता। वेदान्त के अलावा कोई चारा नहीं, एक नया भारत पैदा ही करना पड़ेगा, जो पूरे विश्व को बदल डालेगा।
जब तक हमारा राष्ट्रीय चित्त भ्रमित रहेगा, तब तक हम नहीं कह सकते कि हम समग्र रूप से स्वतंत्र हैं।
प्रश्न: आचार्य जी प्रणाम। हाल ही में एक घटनाक्रम हुआ, जिसमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा चंद्रयान-२ प्रक्षेपित किया गया। पूरे विश्व की उसपर नज़रें थीं। यह भारतीय वैज्ञानिकों की ओर से एक बहुत बड़ा कदम था। बिलकुल अंतिम क्षणों में भारतीय वैज्ञानिक इस पूरे मिशन में थोड़ी सी…
प्लेन के लिए सबसे नाज़ुक क्षण होता है, जब वो टेकऑफ़ कर रहा होता है। उसके बाद भी हम वहाँ पर हॉस्पिटल जैसी सेंसिटिव चीज़ बना रहे हैं — फिर तो राम ही मालिक है। ये अद्भुत बात भारत में ही पाई जा सकती है — कि ये रहा एयरपोर्ट, और एयरपोर्ट के बिल्कुल बगल में बिल्डिंग है, और कोई सवाल भी नहीं उठाता। जब तक हम समझेंगे नहीं कि गरिमा के साथ जीना ज़्यादा ज़रूरी है, तब तक हम अपनी सुरक्षा, अपना आत्मसम्मान — सब बेचना गवारा करते रहेंगे।
11 लोगों की जानें गई हैं, और टीम में भी 11 ही लोग होते हैं। टीम के 11 लोग जान देने को तैयार होंगे? उनसे कहा जाए कि, “साहब, 1 लाख फैन बच जाएँगे अगर आप में से एक खिलाड़ी जान दे दे,” — वह तब भी न तैयार हो जान देने को। तुमको ये दुनिया समझ में नहीं आ रही है। यहाँ तुम्हें जो दिखाया, सुनाया जा रहा है — पर्दे के पीछे उससे बिल्कुल विपरीत चल रहा है। जिसकी जो भी छवि तुम्हारे सामने आ रही है, वो एक बनावटी छवि है, ताकि तुम्हारा शोषण होता रहे। वो प्लेयर्स नहीं हैं, वो परफ़ॉर्मर्स हैं, और तुम परफॉर्मेंस को ट्रुथ समझ रहे हो।
राष्ट्र का अर्थ होता है — लोग जो साथ रह रहे हैं, और उनके साथ होने का कोई कारण होता है। वह कारण ऊँचे से ऊँचा होना चाहिए। सेना भी इसीलिए होती है कि उच्चतम की रक्षा की जाए। भारत इस अर्थ में थोड़ा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार और ऊँचा है। संविधान में जो प्रस्तावना है, उसकी एक-एक बात वास्तव में वेदांत है। भारत रक्षा के योग्य इसलिए है, क्योंकि अगर भारत सशक्त होगा, तो यही ऊँचे और उदार विचार पूरी दुनिया में फैल पाएँगे।
भारत राष्ट्र मूलतः वेदान्त के ऊँचे मूल्यों पर आधारित है। जिसे भारत कहते हैं — यह महान तो है ही, लेकिन खतरे में भी है। जो हिस्से भारत से अलग हो गए, इतिहास पर नज़र डाल लो कि उनके साथ क्या हुआ। बामियान (अफ़गानिस्तान) में बुद्ध की प्रतिमाएं थीं, जिन्हें तालिबान ने बम से उड़ा दिया। धर्म, कला, संस्कृति और विचार की ऊँची से ऊँची उड़ान — यह सब बहुत बढ़िया है; लेकिन इन सबको सुरक्षा और संरक्षण चाहिए। और एक संयुक्त सेना ही वह सुरक्षा दे सकती है।
भारतीय सेना को पाकिस्तान को घुटनों पर लाने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। जो ज़ुल्म और अंधेरे के पक्ष में ही खड़ा हो गया है, वह और ताक़तवर न हो जाए — इस उद्देश्य से युद्ध करना उचित होता है। पर भारत-पाकिस्तान का एक Conventional War भी 500 करोड़ का हो सकता है। एक Rafale 2,500 करोड़ का आता है। युद्ध शुरू करना भी एक गणित है — पता होना चाहिए कि कब शुरू करना है और यह भी पता होना चाहिए कि अब कहाँ पर जाकर हमारे उद्देश्यों की पूर्ति हो गई है।
आतंकवाद आपके मन में डर पैदा करने का काम करती है, तभी इसका नाम ही है आतंकवाद। आतंकी का निशाना बस वह लोग नहीं होते जिन्हें गोलियों से मार दिया जाता है। आतंकी का निशाना वो करोड़ों लोग होते हैं, जिन तक ना गोली पहुँचती है, ना गोली की आवाज़ पहुँचती है — जिन तक बस हत्याकांड की खबर पहुँचती है। आतंकी का इरादा, भारत के जितने 150 करोड़ लोग हैं, उनमें डर बैठाना है। आतंक और डर क्या है — यह भगवद्गीता समझाती है। जो जितना कम डरेगा वो आतंकवादियों के लिए उतना अनुपलब्ध होता जाएगा। और भारत अगर गीता का हो जाए, तो भारत डरना ही बंद कर दे।
आजकल खूब चल रहा है, “भारत विश्व गुरु है।” अरे! जब तुम गुरु हो ही तो तुम शिक्षा लेकर क्या करोगे। ये अगले स्तर का धोखा है कि हम तो पहले ही सबसे आगे हैं, तो अब आगे जाने की ज़रूरत क्या है। और अगर कोई अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट आ जाए जो बता दे, भारत में शिक्षा का स्तर क्या है या मानव अधिकार का स्तर क्या है, तो बोल दो, ‘ये रिपोर्ट तो विदेशी प्रोपेगेंडा है। ये तो सब गोरे लोग हमारी तरक्की से जलते हैं, इसलिए वो दिखाते हैं कि भारत में हालत खराब है। गोरे लोग, गरीब ये, भूख से मर रहे हैं, भारत की खुशहाली से जल रहे हैं ये।
जिस समाज और संस्कृति में वास्तविक धर्म के लिए जगह न हो, वहाँ जिज्ञासा कैसे होगी? और बिना जिज्ञासा के खोज कैसे संभव है? नोबेल प्राइज़ तो उन्हीं को मिलता है, जो मानने की बजाय जानने के लिए खोजते हैं। भारत में संस्कृति का मतलब परंपरा और अंधविश्वास बन चुका है। वैज्ञानिक समाज की ज़मीन से खड़ा होता है। इसलिए जब तक हमारी सोच, शिक्षा प्रणाली और संस्कृति नहीं बदलती, तब तक खोज, प्रगति और नोबेल प्राइज़ असंभव है।
एक दासता वो है जिसमें कोई बाहरी ताकत आकर आपको अपने अधीन कर लेती है। दूसरी गुलामी वो है जिसमें आप अपने ही अहंकार के गुलाम होते हैं। मालिक सामने दिखाई नहीं पड़ता, तो हमें धोखा हो जाता है कि हम स्वाधीन हैं। अगर भारत को आत्मनिर्भर बनना है, तो बाकी सब सिद्धांतों को छोड़कर सच्चाई मात्र पर चलना पड़ेगा, और वह सच्चाई सबसे स्पष्ट रूप से वेदांत में समझायी गई है। जब भारत की सारी शक्तियाँ उसकी आध्यात्मिक शक्ति का अनुगमन करेंगी, तब भारत वास्तव में आत्मनिर्भर हो पाएगा।
लड़ने-भिड़ने, नारेबाज़ी, हुड़दंग, शोर-शराबे इनसे महानता नहीं आती। महानता बड़ी मेहनत और साधना लेती है - आध्यात्मिक तौर पर साधना और भौतिक तौर पर श्रम। अगर भारत को महान कहने में रुचि रखते हो तो खुद महान बनो। तुमसे ही है भारत की महानता। भारत धर्म का पालना रहा है। भारत विज्ञान, गणित और संगीत का भी पालना रहा है, इसीलिए भारत महान था। आज भारत को महान बनाना है तो अपने भीतर लोहा और सच की तरफ़ निष्ठा पैदा करो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी कुछ लोगों से भी सुन रहा था और यूट्यूब पर कमेंट्स (टिप्पणियों) में पढ़ा है, कि “गीता-वगैरह की अब ज़रूरत क्या है? अब तो संविधान ही आज की गीता है।" तो इस बारे में कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: सौ से अधिक संविधान-संशोधन हो चुके हैं, सौ…
आचार्य प्रशांत: तो हमें बेटियों की चिन्ता हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन बेटियों की चिन्ता का जो कारण आपके पास है, शायद बेटियों पर जो ख़तरा है वो किसी दूसरे कारण से है। जिस कारण से है, उसकी बात कर लेते हैं।
आप जब कहते हैं कि भारत…
कोई नहीं कहता कि बहन को पढ़ाना है, लिखाना है। ‘आचार्य जी, भाई हूँ, धर्म निभाना है, बहन को स्वावलम्बी बनाना है। बहन अपने पैरों पर खड़ी हो, आज़ाद हो जाए’, कोई आता ही नहीं। क्या समस्या है? ‘बहन की शादी।’ अरे! बहन से पूछ तो लो, शादी वगैरह ये उसका निजी मसला है। निजी कुछ समझते हो? *प्राइवेट*, *पर्सनल* (व्यक्तिगत) *मैटर* (मसला) है ये। या तुम ज़बरदस्ती उसको कहोगे कि ले इसके साथ बाँध रहा हूँ, अब एक कमरे में घुस जा, सुहागरात मना?
भारतीय जैसे हैं, भारतीयों को वैसे नेता मिल जाते हैं। “People get the leaders they deserve.” जब मतों की गिनती होती है तो यह नहीं देखा जाता कि जिसने वोट डाला है वह बुद्ध है या बुद्धू, दोनों की बराबर हैसियत होती है जनतंत्र में। बेहतर नेता तभी मिल सकते हैं जब लोग बेहतर हों, और लोग तब बेहतर होंगे जब उन्हें एक बेहतर आध्यात्मिक नेता मिलेगा।
प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र:…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…